आयकर नियम 17 ए : राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक ख़तरा

कोई भी जंजीर अपनी सबसे कमजोर कड़ी से मज़बूत नही होती , अगर आप जंजीर को मज़बूती देना चाहते हैं तो आपकों इसकी सबसे कमजोर कड़ी को ढूंढ कर उसे मज़बूत करना होगा। यदि आप ये मान बैठे है कि अब कोई कमजोर कड़ी नही बची है तो आप एक ऐसे घटना चक्र को जन्म दे बैठते है जिसका परिणाम क्या होगा ये आप नही जानते। जब कोई अप्रत्याशित परिणाम आपके सामने आ जाता है तो आप जो कि ये मान बैठे थे कि कोई कमजोर कड़ी तो रही नही थी, एक ऐसे कुचक्र में उलझ जाते है कि फ़िर आप बाहर नही निकल सकते। दूसरी तरफ एक कमजोर कड़ी दूसरी कड़ी को कमजोर करती चली जाती है और अंत में सब कुछ धराशायी हो जाता है।

अतीत में हुई अनेक घटनाओं से देश ने सबक ही सीखा है। वर्ष 2001 के संसद हमले ने मोबाइल कनेक्शन के लिए पहचान पत्र को अगर अनिवार्य किया तो, 26/11 के हमले ने तटीय सुरक्षा पर हमारा ध्यान दिलवाया।  शेयर बाजार के घोटालों ने सेबी को मज़बूत किया तो फ़्लाइ बाई नाइट ऑपरेटरों से सुरक्षा देने के लिए कंपनी एक्ट में बदलाव किए गए। यहां तक कि आधार जैसी महत्वपूर्ण योजना के मूल में भी कालाबाजारी और सबसिड़ी की चोरी रोकना महत्वपूर्ण कारण रहे हैं। ऐसे में जबकि गैस का एक रियायती सिलैंडर लेने के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ रही हो, क्या यह बहुत खतरनाक नहीं कि करोड़ों रुपए की सम्पति और आय वाले ऐसे ट्रस्ट खुले छोड़ दिए जाए और उनको बढ़ावा भी दिया जाए जिनका गठन और संचालन ऐसे अंधकार में डूबा हो जिसे किसी तरह भी रोशनी और पारदर्शिता में ना लाया जा सके ?

इस आलेख का विषय आयकर नियम 17 ए की कमजोरी और उससे पैदा ख़तरे पर चर्चा करना है। इतिहास- यह नियम ट्रस्ट को आयकर अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण (अनुच्छेद 12 ए या 12ए ए ) करने की प्रणाली निर्धारित करता है और 1970 के दशक से बिना किसी बदलाव के लागू है। प्रावधान – इस नियम के अनुसार जो कोई ट्रस्ट आयकर से छूट लेना चाहता है उसे अपनी डीड़ जिसके द्वारा उसका गठन हुआ है, की प्रतिलिपि लेकर आवेदन करना होता है। यदि ट्रस्ट बिना किसी डीड के बना है तो उसके गठन का कोई दस्तावेजी साक्ष्य ले कर आवेदन किया जा सकता है। मूल रूप से यह प्रावधान उन पुराने ट्रस्ट की सहायता के लिए बना था जो बहुत ही पुराने थे और जिनके पास कोई डीड नही थी। लेकिन समय बीतने के साथ साथ चतुर अपराधियों और ऐसे लोग जो किसी कारणवश पारदर्शी तरीके से काम नही करना चाहते थे इसे एक घातक विकल्प के रूप में बदल दिया। देखने में नितांत मामूली लगने वाले ये प्रावधान वास्तव में बहुत घातक है।

 जरा इन बातों पर गौर करिए 1. कानून के मुताबिक किसी ट्रस्ट या सोसायटी का गठन डीड से करना और उसका किसी अधिनियम में पंजीकरण करवाना ऐसी बात नही है जिसकी कोई परवाह की जाए। आलसी सरकारी अफ़सर इस प्रकार के मामलों को झाड़ू मार कर कालीन के नीचे ड़ाल देते है। वैसे भी कोई पंजीकरण अनिवार्य नही है 2. ट्रस्ट अपने आप में एक कानूनी व्यक्तित्व है जो सम्पति पर अधिकार के साथ साथ किसी प्रकार का व्यवसाय भी चला सकता है 3. अगर यह आयकर अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण करवा ले तो इसकी आय भी कर मुक्त हो जाएगी क्या ऐसे में जब आप किसी फर्म और कंपनी का गठन भी बिना किसी डीड के ना कर सकते हों और ना ही कोई सहकारी समिती ही बिना किसी लिखित विधान के चल रही हो तो एक ट्रस्ट का गठन और संचालन और तो और आयकर से छूट भी बिना किसी डीड के देना देश की सुरक्षा को ख़तरे में डालने वाली बात नहीं होगी?

आयकर आयुक्तों के हाथ बंधे हैं – किसी ट्रस्ट का गठन बिना डीड के कर देना ही काफ़ी नहीं हैं। उसका पंजीकरण भी आयकर आयुक्त के द्वारा करवाना जरूरी है, लेकिन यह कानून इतना लोचशील और न्यायालय इसकी व्याख्या करने में इतने उदार है कि कोई भी इस पंजीकरण को चाह के भी नही रोक सकता और इस प्रकार एक के बाद एक नितांत कागजी और अपारदर्शी ट्रस्ट बनते चले जाते है मसलन कोई समाचार किसी अख़बार में आ जाए कि अमुक समूह या स्वामी जी ने ट्रस्ट बना लिया है तो क्या ये दस्तावेजी साक्ष्य नही है? और भी ऐसी अनेक चालें इस्तेमाल की जा सकती है जिनका बखान करना यंहा बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।

ख़तरा – यदि आप औसत बुद्धि के प्राणी भी है तो अब तक समझ गए होंगे कि इसके क्या ख़तरे है। फ़िर भी दो –चार खतरों का बखान करना ज़रूरी है। इस प्रकार के ट्रस्ट निजी हित और कल्याण का साधन बन सकता है। आतंकवाद और माओवाद को ढांचागत सुविधा दे सकता है। मनी लांड्रिंग कर सकता है। कर चोरी का बढ़िया मॉडल है। जनता से चंदा लेकर रातों रात चंपत हो सकता है। क्या ऐसे ट्रस्ट हैं ? – जी बिल्कुल है, किसी भी आयकर आयुक्त के पास पंजीकरण करवा चुके ट्रस्ट में बहुत से ऐसे हैं और बहुत से नए बनकर तैयार हो रहे हैं। रोकने का उपाय- 1. नियम 17 ए में तुरंत उचित संशोधन लाया जाए 2. जितने पुराने ट्रस्ट जो गठित हो चुके है और पंजीकरण करवा चुके है उनको निर्धारित समय में डीड का गठन करने की सुविधा दे कर इस गलती का सुधार और नियमन किया जाए। अगर ये बदलाव नहीं लाए गए तो हमारा देश हमेशा ख़तरे में रहेगा और आतंकवाद- माओवाद को वित्तीय सहायता और कवच मिलता रहेगा।

लेखिका अर्चना यादव स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. उनका यह लिखा मोलतोल डाट इन पर प्रकाशित हुआ है, वहीं से साभार.

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