जानेमन जेल (तीन) : मैं हूं शहंशाह ए डासना… जिसके छूटने की आस ना….

जेल में एक बंदी मिले. दिल्ली पुलिस में दीवान. शर्मा जी नाम से उनकी पहचान. उनसे कब दोस्ती हो गई, पता ही नहीं चला. हम लोग एक ही बैरक में थे. वे सुबह योगा करने जाते, दोपहर में कंप्यूटर सीखने. पूरी दिनचर्या उनकी दुरुस्त और अनुशासित. खूब सारा सीख लेने की लालसा-तमन्ना से भरे हुए. बैरक के बाहर जब वे टहलते तो हर बार कोई नया शख्स उन्हें प्रणाम करके उनके साथ टहल रहा, बतिया रहा होता. दीवान जी का चेहरा मोहरा आकर्षक और दोस्ती का संदेश देता हुआ. मुझे याद नहीं कैसे हम दोनों का परिचय हुआ लेकिन वे मेरे बारे में मुझसे आमने-सामने परिचय होने के पहले से जान चुके थे.

दरअसल बैरक में अगर कोई ठीकठाक शकल या ठीकठाक क्राइम वाला और अखबार में छप चुपे प्रकरण वाला बंदा आता तो जेल में रह रहे पुराने बंदी उसके बारे में एक दूसरे को इशारों इशारों या कानाफूसी करके जानकारी दे दिया करते. इस तरह सबको बिना कहे पता हो जाता कि फलां आदमी फलां केस में अंदर आया है. दीवान जी से मैंने भी योगा में शामिल होने की इच्छा जताई. उन्होंने मुझे उत्साहित किया और रास्ता बताया. सुबह खुंटी पर पेश हो जाओ और कह दो कि योगा में मेरा नाम लिख दिया जाए. मैंने ऐसा ही किया.

जेल जाने के दसवें दिन मैंने योगा क्लास ज्वाइन करने के लिए खुंटी पर आवेदन दिया. सुबह के वक्त उन बंदियों का नाम लिखा जाता है जो पेश होने को इच्छुक हैं. मैंने भी नाम लिखा दिया था. सभी को समूह में खुंटी पर ले जाया गया. जब हम लोगों की बैरक की बारी आई तो सबको डिप्टी जेलर व जेलर के सामने खाली छोटे पार्क में जोड़े से बिठा दिया गया. फिर एक एक करके उनके सामने पेश किया जाने लगा. बंदी अपनी अपनी दिक्कत परेशानी बताने लगे. ज्यादातर बंदी किसी दूसरे बैरक में बंद अपने परिचित या परिजन से मिला देने की बात कहते.

इन लोगों की इच्छा तत्काल पूरी की जाती और बताए गए बैरक से उनके जानने वाले को वहीं बुलवाकर पांच दस मिनट के लिए मिलवा दिया जाता. इस सिस्टम का इस्तेमाल मैंने भी किया था जब भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह दैनिक जागरण की कृपा से अंदर आ गए. पहले मैं कोशिश करता रहा कि अनिल मेरे ही बैरक में मेरे साथ रहें लेकिन जेल प्रशासन जाने क्यों अड़ा हुआ था कि दोनों को एक साथ नहीं रखना है, सो उन्हें किसी दूसरी बैरक में कर दिया गया. इस कारण उनसे मिलने और उनकी परेशानी-समस्या जानने हेतु एक दिन खुंटी पर पेश होकर अनिल से मिलने का अनुरोध किया था और तब अनिल को वहीं बुलाकर मुझसे मिलवा दिया गया. मैंने मुस्कराते अनिल के कंधे पर हाथ रखकर शाबासी दी- ''चिंता ना करो, तुम्हारा नाम भी भ्रष्ट कारपोरेट मीडिया से लड़ने वाले न्यू मीडिया के स्वतंत्रता सेनानियों की लिस्ट में दर्ज हो चुका है, लोग कई दशक तक पत्रकारिता करते रहते हैं और जेल जाने की नौबत तक नहीं आ पाती, क्योंकि वे ऐसा कुछ लिख पढ़ नहीं पाते, ऐसा कुछ हंगामेदार कर नहीं पाते कि उन्हें भ्रष्ट लोग और भ्रष्ट सिस्टम जेल भेज पाता. हम लोगों ने कम ही समय में ऐसा लिखा पढ़ा और ऐसा तूफान खड़ा किया कि देश के भ्रष्ट मालिकों, हरामी मीडिया कलाकारों, देश के नंबर वन अखबार आदि की फट गई और हम लोगों को उलजुलूल मामलों में फंसाकर उसे जेल भिजवाना पड़ा. और, महान लोगों पर आरोप हमेशा घटिया ही लगाए जाते हैं, जूलियन असांजे को देख लो. अमेरिका उसे परेशान करने के लिए किस किस तरह के मामले उस पर जड़ मढ़ रहा है. इसलिए हे सच्चे मन-मस्तिष्क वाले नौजवान, इस चरम उपलब्धि का आनंद लो और इसके लिए मेरी बधाई स्वीकारो. अब आप इस चरम सफलता पर पहुंचने के बाद दिल्ली से चैन से विदा ले सकेंगे.''

दरअसल अनिल व मेरे बीच दो महीने पहले यह तय हो गया था कि नए सेशन यानि जुलाइ से अनिल चंदौली या बनारस या लखनऊ में रहकर काम करेंगे. ऐसा इसलिए कि अनिल का दिल्ली में मन लग नहीं रहा था. साथ ही यहां खर्चे ज्यादा थे. पर उनके जाने से पहले मैं जेल चला गया और फिर पीछे पीछे अनिल खुद जेल चले आए सो सारा प्रोग्राम कुछ समय के लिए स्थगित हो गया. इसी कारण अनिल को मैंने कहा कि आप अब दिल्ली से जब विदा लेंगे तो यह भाव मन में रखकर विदा लेंगे कि आपने पत्रकारिता के उस चरम को छू लिया है जिसके लिए बाकी पत्रकार तरसते हैं यानि अपनी लेखनी के कारण प्रभावशाली लोगों की पोल खोलना और प्रभावशाली लोगों का विरोध झेलना… ये प्रभावशाली लोग शासन सत्ता का सहारा लेकर पोल खोलने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न करते हैं और उन्हें तरह तरह के मामलों में फंसाते हैं और जेल की हवा तक खिलवा देते हैं. अनिल मेरे इस तर्क से खासे खुश व उत्साहित दिखे. साथ ही जेल आने के कारण अनिल को एक आनंद यह आया कि यहां कुछ करना धरना नहीं था, टेंशन फ्री लाइफ थी, खाना-पढ़ना और सोना. बाहर रहने के दौरान वह मेरे मुकदमों में जमानत के लिए भागदौड़ करना, उसके बाद साइट पर खबर अपलोड करने की व्यवस्था यानि आफिस देखना, मेरे घर और अपने घर के घरेलू कामकाज व दिक्कतों-तनावों को मैनेज करना…  ऐसे ढेरों काम में इतने परेशान रहते कि जीना भूल गए थे. उस आफत व भागादौड़ी से उन्हें मुक्ति मिल गई थी, इसका चैन उनके चेहरे पर था. लोग पता नहीं क्यों नहीं समझते कि आप जिस चीज को दूसरों के लिए परेशानी का बड़ा कारण मानते-समझते हो, वही चीज हम जैसे संतों के लिए सुख का सबब बन जाया करती हैं…. मेरे और अनिल के मामले में जेल जीवन ऐसा ही साबित हुआ. अदभुत आनंद और अविस्मरणीय अनुभवों वाली जगह.

मैं योगा वाले प्रकरण के बारे में बात कर रहा था. खुंटी पर जब मेरी बारी आई तो मैं जेलर मनीष कुमार से मुखातिब था. उन्होंने पूछा- बताओ, क्या बात है. मैंने कहा- सर, मुझे योगा क्लास ज्वाइन करा दें. जेलर मनीष कुमार ने एक लंबरदार को निर्देश दिया कि इनका नाम योगा में लिखवा दिया जाए. लंबरदार ने मेरा नाम बैरक नंबर आदि नोट किया और मुझे बैरक में जाने को कह दिया. वह पर्ची लेकर योगा क्लास वालों के पास गया और मेरा नाम इनरोल करा दिया. अगले दिन सुबह आठ बजे एक राइटर बैरक में चिल्लाया– ''खुंटी पर पेश होने वालों, अस्पताल जाने वालों, योगा क्लास वालों…. चलो रे…. नाम लिखवा लो….'' यह डेली का रुटीन था. सुबह जिन्हें अस्पताल जाना होता, वे पहले ही अपना नाम लिखा देते. जिन्हें पेश होना होता अफसरों के सामने, वे भी अपना नाम लिखा देते. और योगा वालों के योगा जाने का टाइम डेली आठ बजे होता. उन्हें भी बैरक में नाम नोट कराना होता कि फलां फलां लोग योगा गए हैं… तो, सबके नाम एक साथ पुकारे जाते.

दिल्ली पुलिस वाले दीवान जी मेरे फट्ठे पर आए और मुझे योगा चलने का मुस्कराते हुए इशारा किया. मैं खुशी खुशी चल पड़ा. सफेद गमछा गले में डाले, हाफ पैंट नीचे और बनियान उपर पहने. अमूमन मेरा ड्रेस यही रहा जेल के अंदर. जब कोई मुलाकात करने आता तो बनियान के उपर टीशर्ट या शर्ट डाल लेता वरना बाकी समय बनियान में रहता. बेहद आराम की मुद्रा. योगा क्लास पहुंचा तो वहां का माहौल देखकर अच्छा लगा. योगा क्लास और लाइब्रेरी, दोनों एक साथ. ढेर सारी किताबें. आठ दस लोग योगा करते हुए. कोई नाक से तेज तेज आवाज निकाल रहा तो कोई गले से. कोई लेटा हुआ हाथ पैर फेंक रहा तो कोई पेट के बल हाथ पैर उठाए हुए. कोई सूर्य नमस्कार की मुद्रा में तो कई शीर्षासन कर रहा. कोई ऊं का जाप कर रहा तो कोई अजीब अजीब किस्म की आवाज नाक व मुंह से निकाल रहा. यह सब देख पहले तो मुझे अंदर से हंसी आई लेकिन हंसी को बाहर नहीं निकलने दिया. बेहद साफ सुथरी और पेड़ पौधों से घिरी हुई जगह. नीचे मोटी दरी, फिर उसके उपर कई चद्दर. बगल में जिम वालों के साजो सामान थे. जिम वाले अपनी बाडी बनाने व फिट रखने के लिए पसीना बहाते रहते. हीमैन सरीखी उनकी बाडी देख मैं भी सोचता कि यार जेल में रहकर कम से कम बाडी शाडी ही बना लिया जाए लेकिन बाद में पता चला कि बाडी बनाना मुश्किल नहीं, उसे मेनटेन रखना बेहद मुश्किल है और ज्यादा एक्सरसाइज का असर बाद में पड़ता है जब कई अंग दर्द करने लगते हैं. मैंने मन ही मन हीमैन भाइयों को प्रणाम किया और सिर्फ योगा में ही दिल लगाने का खुद से वादा किया.

मैं नया नया था. योगा वगैरह पहले कर चुका था लेकिन यहां के लिए नया था. सो नया ही दिखना चाहता था. दीवान जी ने योगा शुरू किया तो उनके सामने खड़े होकर मैंने उन्हीं की तरह कापी करना शुरू कर दिया. शुरू में खड़े होकर उछलकूद करना. फिर बैठकर कपालभांति, अनुलोम-विलोम समेत कई तरह के एक्सरसाइज करना. पूरे एक घंटे तक दर्जनों एक्सरसाइज करते रहे. दूसरे दिन योगा गुरु मेरे सामने प्रकट हुए. बाद में पता चला कि इनकी उम्र सत्तर के आसपास है लेकिन दिखते हैं बिलकुल नौजवान और छरहरे. आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं. पैरोल पर बीच में कुछ दिनों के लिए बाहर गए थे. पर उनका स्थायी घर एक तरह से जेल हो चुका है.

योगा गुरु ने मुझे कई आसन सिखाए. उनका सिखाना असरकारी था क्योंकि वे आसन करने के तरीके, सावधानियां, इसके फायदे सब कुछ विस्तार से बताते सिखाते. कुछ आसन शुरू में मुझे काफी कष्टप्रद लगते जैसे पीठ के बल लेटकर दोनों पैर को उपर उठाते हुए सिर के पीछे ले जाकर जमीन से सटा देना. पीछे जमीन से टिका देने जैसे सुख को हासिल करने में मुझे कई रोज लग गए. इस काम में करीब बीस दिन बाद तब सफल हुआ जब योगा गुरु ने इसका ट्रिक सिखाया. उन्होंने कहा कि आखिर में सांस छोड़कर बेहद धीमे धीमे सांस लेते छोड़ते रहे और तब आखिरी प्रयास करो. ऐसा किया तो दोनों पैर की उंगलियां धरती छू गईं. हम लोग जब सुबह योगा करने आते तो योगा गुरु उस समय तरह तरह के पौधों का पेय तैयार कर रहे होते. अंकुरित चनों व अन्य चीजों का मिक्सचर तैयार कर रहे होते. ये सब बीमार बंदियों, जेल अफसरों आदि के लिए बनता. कई बार योगास्थल पर आकर कुछ चीफ साहब या कुछ लंबरदार लोग भी इसे पी लेते. योगा गुरु अपने आप में आयुर्वेद के संस्थान दिखे, दवा से लेकर योगा तक, सब कुछ के एक्सपर्ट.

एक दिन हम लोगों ने उनके घोले गए प्राकृतिक घोल को पीने की इच्छा जताई तो उन्होंने सहर्ष टेस्ट कराने का वादा किया और अगले दिन सबके लिए एक एक गिलास एक्स्ट्रा घोल तैयार करके पिला दिया. यह घोल कई पौधों की पत्तियों से तैयार किया जाता जो उम्र बढ़ाने वाला, पाचन ठीक रखने वाला, हृदय रोगों से बचाने वाला होता. मैंने मन ही मन तय किया कि जब जेल से बाहर निकलूंगा तो यह सब पेय तैयार कराकर पियूंगा. लेकिन जबसे बाहर निकला हूं तब से नया कुछ बेहतर करने की बजाय पुराना जेल वाला जो अच्छा था, वह सब एक एक करके छूटता जा रहा है.

एक बार श्री श्री रविशंकर के लोग योगा कराने आए. उन लोगों ने शुरुआती आसनों के बाद 'सोहम' नामक कैसेट लगा दिया. रवि शंकर की आवाज में सोहम के उतार चढ़ाव पर हम लोगों को सांस लेना और छोड़ना होता. इस एक्सरसाइज में मैं इतना लीन हुआ कि जब इसके चरम पर पहुंचकर लेट जाने को कहा गया तो जाने क्यों मेरी बंद आंखों से खुद ब खुद पानी गिरने लगा. मैंने खुद को बेहद ढीला छोड़ रखा था. पूरी तरह आसन में लीन था. बाद में मुझे समय़ में आया कि जब आप शरीर को वैज्ञानिक तरीके से उर्जान्वित करके ढीला सहज बनाते हैं तो एक समय ऐसा आता है जब आप खुद से अलग हो चुके होते हैं और आनंद की अवस्था में पहुंच चुके होते हैं. श्री श्री रविशंकर के जादू का अनुभव मैंने जेल में किया. मुझे समझ में आया कि यूं ही नहीं रविशंकर की इतनी फालोइंग है. मुझे अच्छा लगा कि जेल में रविशंकर के ''सोहम'' को समझ सका. आगे भी इसे करने की इच्छा है, भले ही इसके लिए रविशंकर के ग्रुप को ज्वाइन करना पड़े.

योगा खत्म करके जब हम लोग बैरक के लिए चले तो खुंटी के एक तरफ भजन मंडली सुर लय ताल बिखेर रही थी, खुंटी की दूसरी ओर एक बंदी की लंबरदार पिटाई करने में जुटे थे. मतलब एक तरफ अच्छा सा भजन चल रहा था और दूसरी ओर पीटे जाने से निकल रही चिल्लाहट व कराह. अजीब कंट्रास्ट था. भजन मंडली वाले इस सबसे बेपरवाह गाने बजाने में जुटे थे, जैसे यह सब उनके लिए रुटीन था. उधर, पीटने वाले और पिटाई खाने वाले भी भजन से अनजान अपने अपने काम में जुटे थे, जैसे यह सब उनके लिए भी रुटीन था. मैंने पता करने की कोशिश की कि आखिर इस बंदी का क्या अपराध है? जो पता चला, वह दिल दहला देने के लिए पर्याप्त था. इस बंदी ने रात में कट्टन के बल पर एक नए बंदी के साथ गलत काम किया था. रात में तो वह बंदी नहीं बोल पाया लेकिन सुबह उसने खुंटी पर आकर कंप्लेन की. उसने पांच-छह लोगों के नाम बताये जिन्होंने धमकाकर गलत काम करने की कोशिश की.
मेरे मुंह से निकल पड़ा- ओ माई गॉड!

खैर, भजन और रुदन के संयुक्त कार्यक्रम को देखते हुए मैं अपने बैरक में घुस चुका था. देर तक सोचता रहा. जो कांट्रास्ट सामने था, वह निकल नहीं पा रहा था. इस जेल में पिटाई अब बहुत कम होती थी. पुराने बंदी बताते हैं कि पहले के समय में यहां रोज दर्जनों लोगों की पिटाई होती, छोटी छोटी गल्तियों पर तलवा परेड की जाती. लेकिन अब सिर्फ गंभीर और बड़े अपराध पर ही दंड दिया जाता ताकि बंदी अनुशासन न तोड़ें. ज्यादातर कंप्लेन सुल्फा (एक नशा जिसे सिगरेट में भरकर पिया जाता है) की होती. अगर कोई सुल्फा पीते हुए पकड़ गया तो पहले उसे बैरक इंचार्ज चीफ साहब यानि जेल के सिपाही के यहां पेश किया जाता. ज्यादातर मामलों में चीफ साहब मामले को अपने स्तर से रफा दफा करने की कोशिश करते. लेकिन अगर बंदी उनकी बात नहीं मानते तो वह सुल्फाई को लेकर खुंटी पर चले जाते और जेल अफसरों से शिकायत करते. तब जेल अफसर उस नशेड़ी बंदी को दंडित करते. दंडस्वरूप कई बार उसका बैरक बदल दिया जाता या फिर उसे भंडारे काम करने के लिए भेज दिया जाता.

जेल में भंडारे का बहुत खौफ रहता बंदियों में. भंडारा वह जगह जहां सभी बंदियों कैदियों के लिए खाना बनता. एक बंदी के लिए औसत छह रोटी सुबह और छह रोटी शाम का तय है. मतलब सिर्फ रोटी रोटी की बात करें तो चार हजार बंदियों कैदियों के लिए चौंसठ हजार रोटियां बनानी होतीं. इतनी रोटी बनाने के लिए कितना आटा माड़ना पड़ता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. हालांकि आंटा माड़ने की मशीन भी वहां होती लेकिन गर्मी के समय में बड़े-बड़े चूल्हों के बगल में रोटी सेंकना, रोटी बेलना, दाल-चावल-सब्जी आदि पकाना कष्टप्रद काम होता. इस काम में ज्यादातर उन बंदियों कैदियों को लगाया जाता जो गरीब हैं, जो काम करना चाहते हैं ताकि उन्हें मजदूरी मिले. इनमें से कई लोग अगर भंडारे से निकल कर किसी बैरक में रहने को जाना चाहते तो उन्हें जेल अधीक्षक के सामने पेश होना होता है. खोड़ा का एक युवक मेरे सामने जेल में आया, भंडारे गया. उससे मुलाकात व परिचय नोएडा कोर्ट में पेशी के दौरान हुई. उसने भंडारे की तकलीफ बयान की. बाद में वह मेरे बैरक में दिखा. उसने बताया कि रांची से उसके परिजन आए और जब वो अधिकारियों से मिले तब जाकर भंडारे से मुक्ति मिली.

भंडारे में उन लोगों को भी भेजा जाता जो जेल में गलत काम करते हुए पकड़े जाते. जैसे, सुल्फा पीने, किसी से मारपीट करने, किसी के साथ दुष्कर्म का प्रयास करने जैसे अपराधों में भी सजा के तौर पर दोषियों को भंडारे भेज दिया जाता. इलाहाबाद के एक मिश्रा जी का फट्ठा हम लोगों के फट्टे के सामने था. वे टाइम्स आफ इंडिया अखबार पढ़ने के लिए मंगाते. किसी पढ़े लिखे व ठीकठाक परिवार के नौजवान लगते. एक दिन उनसे मैंने परिचय किया. उन्होंने बताया कि वे एक कंपनी में साफ्टवेयर इंजीनियर थे. सब कुछ ठीक चल रहा था. उन्हें आमतौर पर गुस्सा नहीं आता, लेकिन जब आता तो वे आउट आफ कंट्रोल हो जाते. ऐसी ही एक मनःस्थिति में उन्होंने घर का ताला उठाकर पत्नी की तरफ दे मारा और वह ताला पत्नी के सिर पर लगा. वहीं आन स्पाट डेथ हो गई. मिश्रा जी इस घटना से इतने सदमें में आ गए कि उनका हाथ पैर कांपने लगा. जेल में भी वे नार्मल नहीं रह पाते. अक्सर सोचते सोचते वे डिप्रेशन में चले जाते और हाथ पैर कांपने लगता, आवाज लड़खड़ाने लगती. वे बताते हैं कि पत्नी से मामूली कहासुनी तो हर घर में होती है, उनके यहां भी कभी कभार बातचीत में गर्मागर्मी हो जाती लेकिन उस दिन जाने क्या मेरे सिर पर भूत चढ़ा कि उसकी बात बर्दाश्त न कर पाया और गुस्से में ताला उठाकर उसकी तरफ फेंक दिया. वह ताला एकदम से उसके माथे पर लगा और उसकी मौके पर ही डेथ हो गई. कई साल हो गए जेल में. जमानत नहीं हुई. क्या सपने संजोए थे और क्या हो गया, कहां आ गया.

हम लोगों के बगल में एक नौजवान रहता. रिंकू. कोई कहता वह सोनू पंजाबन गिरोह का सदस्य रहा है तो कोई कहता वह छोटा मोटा क्राइम करने वाला भटका हुआ युवक है. रिंकू से उसके परिजनों ने लगभग नाता तोड़ लिया था. उससे कोई मिलने नहीं आता और न ही कोई उसे पैसे देकर जाता. सो, उसने मजबूरन पैसे वाले कुछ बंदियों के फट्टे को संभालने का काम ले लिया और इसके बदले उसका जेल जीवन ठीक से बीत जाता, किसी चीज की कोई कमी नहीं पड़ती. रिंकू जेल लाइफ के टिप्स बताता. जैसे ये कि यहां हर कोई समय काटता है, शेर से लेकर सियार तक, और सब चुपचाप समय काटते हैं, कोई किसी पर नहीं गुर्राता. इसलिए सबसे अच्छा तरीका है कि अपने काम से काम रखो, और टाइम काटो. उसकी बातें किसी बड़े बुजुर्ग सी लगतीं.

एक सज्जन जो करीब छह साल से जेल के भीतर थे, एक दिन शाम को बेहद उदास से बैठे दिखे. मैंने उन्हें छेड़ा और उदासी का सबब पूछा तो वे फूट पड़े. कहने लगे- जिंदगी बड़ी मुश्किल हो गई है यशवंत भाई, किसी भी तरह यहां से निकलने का मन करता है. मुझे अब निकलवा दो यहां से. मुझे जिंदगी की कीमत पता चल रही है. पूरी जवानी जेल में गुजर गई. बाइस साल की उम्र में आया था. 29 का हो गया. ये सात साल कैसे लौटेंगे. अब यहां एक पल नहीं कटता. मैं उनकी बातें सुनकर अवाक. उन्हें मैं हर रोज नहाकर पावडर व खुशबूदार तेल लगाते देखता तो सोचता कि इन लोगों का जीवन जेल में भी कितना नार्मल और सुंदर है. लेकिन आज देख रहा हूं कि इस नामर्ल व सुंदर लग रहे जीवन के पीछे कितना दर्द छिपा है.

एक सज्जन ने एक दिन बताया कि इस बैरक के जो सबसे ताकतवर कैदी हुआ करते थे, जो अब छूट गए हैं, और उन्हें बैरक का सीओ बोला जाता था, ने जाड़े की एक रात कंबल में मुंह ढंककर काफी आंसू बहाए. उनका कंबल उपर से हिलता लगा तो उनसे धीरे से पूछा कि भाई क्या हो गया, तब उन्होंने अंदर ही मुंह करके कहा- अब नहीं जिया जाता यहां, जिंदगी झांट हो गई है, किसी तरह यहां से बाहर निकलवाओ भाई. उन सीओ साहब की पूरी बैरक में तूती बोलती थी. उनकी भारी व रोबीली आवाज ऐसी और उनका अंदाज ऐसा कि जैसे वही जेल के जेलर हों. पर उस सख्त से दिखने वाले शख्स के भीतर कितना भावुक दिल था, यह उस रात उनके पड़ोसी सज्जन ने जाना. वही पड़ोसी सज्जन मुझे इस घटना के बारे में बता रहे थे.

दिल्ली पुलिस वाले दीवान जी से एक रोज उनके जेल में आने के बारे में पूछ बैठा. उन्होंने बताया कि उन पर पत्नी की हत्या का आरोप लगाया गया है. लेकिन वास्तविकता यह है कि जिस वक्त पत्नी ने मेरे घर पड़े रिवाल्वर से खुद को गोली मारकर सुसाइड किया उस समय मैं शहर में एक सरकारी आफिस में बैठा था और इसके प्रमाण स्वरूप उस आफिस के सीसीटीवी फुटेज हैं. आपसी कहासुनी के एक मामले के कारण पत्नी ने गुस्से में उस समय सुसाइड कर लिया जब घर पर कोई नहीं था. उस वक्त मां स्कूल से आ रहे बच्चों को लेने बस स्टाप गई हुई थीं. पर पूरे मामले को ससुराल वालों ने मर्डर का रंग दे दिया है. ससुराल वाले केस खत्म करने के लिए अब उनसे ज्यादा से ज्यादा पैसे ऐंठने की फिराक में है पर दीवान जी का कहना है कि एक तो मेरी पत्नी गई, बच्चे अकेले रह रहे हैं, मैं जेल में हूं, अब किस बात के पैसे ससुराल वालों को दूं? दीवान जी नौ महीने से ज्यादा समय से जेल में हैं. छोटे छोटे कई बच्चे हैं उनके. उन बच्चों के प्रति बेहद चिंतित और संवेदनशील. खुद की सोशल लाइफ और अपना सोशल रेपुटेशन खत्म हो जाने की चिंता से कई बार व्यथित हो जाते. कई तरह के ग़मों में घुलते पिघलते दीवान जी ज्यादातर वक्त अपनी जमानत के बारे में सोचते बतियाते रहते हैं. उन्होंने खुद को जेल में हर तरह से इंगेज रखा हुआ है. अंग्रेजी की मोटी डिक्शनरी के डेली यूज वाले शब्दों को वे अलग कापी पर उसके अर्थ समेत लिखते हैं. एक राम नाम की पुस्तिका बना रखी है जिसपे वे राम राम लिखते रहते हैं. योगा के अलावा वे कंप्यूटर क्लास करते हैं. इस तरह उनके जेल जीवन में वक्त नहीं बचता डिप्रेशन के लिए. वे सुबह चार बजे उठ जाते और फ्रेश हो नहा धोकर तैयार हो जाते. उनकी अनुशासित दिनचर्या से मैं काफी प्रभावित होता. जब वे बैरक के बाहर मेरा हाथ पकड़कर टहल रहे होते और बातें कर रहे होते तो वे उस दौरान वे मेरे पंजे की एक एक उंगली को अपने हाथ से चटका रहे होते. इससे मुझे बहुत आराम मिलता. बाद में मैंने खुद ब खुद दूसरा हाथ उनके पंजे में देना शुरू कर दिया ताकि इसकी भी सेवा हो जाए.

दीवान जी मेरे मामले में खूब रुचि लेते. मैं उनसे हमेशा यही कहता कि जेल तो अपन का घर है, यहां से कहां जाना. इस पर वे चौंकते और हंसते. वे कहते कि तुम मन से ये बात नहीं कहते. मैं कहता- सीना फाड़कर नहीं दिखा सकता कि अंदर क्या है लेकिन सच यही है कि मुझे यहां बहुत अच्छा लगता है. उन्हें मैं समझाने लगा. अगर बाहर की जिंदगी में मेरा ऐसा कोई कारोबार होता जो कि मेरे जेल में आने से ठप हो रहा होता, करोड़ों का नुकसान हो रहा होता, तो लगता कि जेल में मैं परेशान हूं. मेरे लिए बाहर की दुनिया में रहना ज्यादा मुश्किल था और जेल में रहना ज्यादा आसान लग रहा है तो कैसे कह दूं कि जेल में मन नहीं लग रहा. रही परिवार की बात तो मैंने परिवार की कभी परवाह नहीं की. हां, जेल में रहूं चाहें जहां रहूं, परिवार वालों को आर्थिक संकट नहीं होने दूंगा, इतने दोस्त यार शुभचिंतक तो हैं ही मेरे.

दीवान जी मेरी बात सुनकर हंसने लगते.

प्रतिदिन सुबह जब गिनती के लिए बैरक का दरवाजा खुलता तो मैं बाहर निकलकर आंख मींचते हुए नारा लगाता…. जेल का दसवां दिन जिंदाबाद. जेल का 11वां दिन अमर रहे. जेल का बारहवां दिन लांग लिव. जेल का तेरहवां दिन मार्च आन. जेल का 14वां दिन जिंदाबाद. मेरी नारेबाजी से ढेर सारे बंदी कैदी परिचित हो गए थे. बाद के दिनों में अगर किसी के कान तक मेरी नारेबाजी की आवाज नहीं जा पाती तो वे आकर पूछ जाते कि आपने नारा क्यों नहीं लगाया. मैं बताता कि नारा तो लग गया, सुनने के लिए आप आसपास थे ही नहीं. महीने डेढ़ महीने जेल में गुजरने के बाद दीवान जी कहने लगे कि आजकल आप सुबह नारे नहीं लगाते, लगता है कि थक गए हैं या जेल में मन नहीं लग रहा है. तब मैं उन्हें वास्तविक स्थिति बताता कि जेल में ही नहीं, बाहर भी मैं कोई काम नियमित नहीं कर पाता. उब जाता हूं. अगर महीने भर यहां नारा लगा दिया तो समझो एक काम बहुत दिनों तक नियमित कर गया. बाद के दिनों में मैं बात बात पर एक बात बोल देता, वह यह कि- ''कभी कभी दिल में खयाल आता है कि जिंदगी लौंड़े लग गई.'' इस लाइन को बोलने के पीछे अपन की कोई पीड़ा वजह नहीं, बल्कि दूसरों की पीड़ा को वनलाइनर बनाने का आनंद व इसके जरिए मजा लेने की तमन्ना. इसे सुनकर दूसरे बंदी कैदी भाई मुस्करा देते और बाद के दिनों में वे लोग ज्यादा इस लाइन को बोलते और मैं अपने वनलाइनर के हिट हो जाने को देखकर मुस्कराता. उसी तरह कई सारे लोगों ने ''जेल का फलां दिन जिंदाबाद'' करके नारा भी लगाना शुरू कर दिया. मतलब कि जेल आते वक्त जो डर था, अब उसके उलट जेल को इंज्वाय कर रहा था.

हर बंदी कैदी मुझसे बात करना चाहता. मैं लोगों की कहानी सुनता और सभी को जेल से बाहर निकलकर नकारात्मक कुछ भी न करने की सलाह देता. जेल में बंद नब्बे प्रतिशत से ज्यादा बंदी कैदी रिवेंज यानि बदले की भावना से भरा हुआ है. कोई उस दरोगा को निकलते ही गोली मार देने की तैयारी किए बैठा है जिसने उसे गलत फंसाकर जेल भेज दिया है. कोई उस गवाह को गोली मारने की तैयारी किए बैठा है जो लगातार गवाही दिए जा रहा है और जिसके कारण उसे जेल की सजा संभव होती दिख रही है. कोई उस दोस्त को सबक सिखाने की तैयारी किए हुए है जो जेल आने के बाद मिलने नहीं आता और उसी की दोस्ती यारी में कांड करने के कारण जेल आना हुआ. कोई ससुरालियों को सबक सिखाने के लिए कसम खाए बैठा है जिनके कारण वह लंबे समय से दहेज हत्या के फर्जी मामले में जेल काट रहा है. ऐसे बदला लेने वालों को मैं समझाता कि जिंदगी सिर्फ बदला लेना और जेल काटना नहीं. आप बदला लेने का काम प्रकृति पर छोड़ दीजिए. प्रकृति ने ऐसा सिस्टम बना रखा है कि हर कोई दुख के पहाड़ के नीचे दबता है और वही आपका बदला है. बड़े से बड़ा आदमी अपने एकांत में अपने कई सारे दुखों तनावों के कारण रोता डरता कलपता है. वह बाहर से खुद को ताकतवर दिखाता है. सो, आप काहे को भगवान या प्रकृति का काम अपने हाथ में लेते हो. आप तो अपनी जिंदगी जियो, आनंद लो, घूमो, यह देश कई देशों का समुच्चय है. केरल जाओ, गोवा जाओ. हर जगह की अलग अलग जिंदगी, संस्कृति, खानपार को जियो, महसूसो. लाइफ आनंद लेने का नाम है, बदला लेकर फिर जेल में आ जाने और फिर डिप्रेशन में रहने का नाम नहीं है. अगर आपको आनंद लेना आता तो आप यहीं जेल में भी आनंद लेते, देखो मुझे, मैं सच में कह रहा हूं कि मुझे जेल में आनंद आ रहा है. सामूहिक जीवन का ऐसा आनंद पहली बार जिया है मैंने. रात में जब नौ दस बजे के बीच में सोने की कोशिश करता हूं तो दौ सौ लोगों वाली इस बैरक से लोगों की बातचीत का शोर कुछ यूं कानों में घुलता है जैसे कोई संगीत बज रहा हो, कोई कोरस सुला रहा हो… इन आवाजों के बीच में खुद को बेहद सुरक्षित और संतुष्ट मानता हूं और तुरंत नींद आ जाती है. सच बता रहा हूं, इतनी जल्दी नींद मुझे बाहर कभी नहीं आती. कई बार तो रात गुजर जाती है और सोचने का काम बंद नहीं होता. लेकिन यहां जाने क्या जादू है कि नींद तो जैसे आसपास डांस की मुद्रा में हो और मेरे आंख बंद करते ही मेरे भीतर प्रवेश कर जाए. मेरी बातों का पता नहीं बंदियों कैदियों पर कितना असर होता लेकिन मुझे लोग पत्रकार मानने लगे थे. उनकी नजर में पत्रकार वही जो खूब बोले और खूब समझाए.

मेरा नाम वहां भड़ासजी पड़ चुका था. लोग मुझे यशवंत नाम से कम, भड़ास जी नाम से ज्यादा बुलाने लगे थे. लोगों को यह मालूम हो चुका था कि भड़ास नामक कंप्यूटर पर दिखने वाली एक चीज के जरिए इस भड़ास जी ने बड़े बड़े लोगों से पंगा ले रखा है और बड़े लोगों ने इनका काम लगा दिया है, फंसा कर जेल भिजवा दिया है, और जमानत न हो पाए, इसके लिए भी बड़े लोगों ने ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया है. पूरी बैरक मेरी दास्तान से परिचित थी, बस मैं ही अपनी दास्तान को जेल से बाहर छोड़कर जेल में नई कहानी जानने-बूझने-रचने में लगा हुआ था. जेल में मेरी गायिकी फेमस हो गई थी. रात में खाना खाने के बाद एक राउंड गायिकी का होता था. फिल्मी से लेकर गैर फिल्मी और ग़ज़ल-भजन तक का दौर चलता…. सबसे ज्यादा डिमांड पंडित छन्नू लाल मिश्रा के इस भजन का था…

ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी….
सजधज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी…

छोटा सा तूं कितने बड़े अरमान हैं तेरे
मिट्टी के तन सोने के सामान हैं तेरे

मिट्टी की काया मिट्टी में जिस दिन मिलाएगी…
उस दिन…
ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी….
सज धज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी….

करमों का परताप तूने पाया मानव तन
पाप में डूबा है पापी देखो तेरा मन
ये पाप की लंका तुम्हें जिस दिन जलाएगी…
उस दिन…
ना सोना साथ जाएगा…. ना चांदी जाएगी….
सजधज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी….

पंछी है तू तोड़ पिजड़ा तोड़ के उड़ जा
माया महल के सारे बंधन छोड़ के उड़ जा
दिल की धड़कन में मौत जिस दिन गुनगुनाएगी…
उस दिन…
ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी….
सजधज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी….

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फिल्मी गाने पूरे याद नहीं थे, केवल दो दो लाइन गाकर लोगों का और अपना मनोरंजन करता… और इन गानों के कारण बंदियों कैदियों की नीरस दुनिया काफी सरस व सजीव हो जाती, ये महसूस करता…. बाद में लोग मुझसे टाइम बेटाइम फरमाइश करते और मैं खुशी खुशी गाकर सुनाता क्योंकि मेरे एक गीत से अगर उनका मन प्रसन्न हो जाता तो मुझे यह करते हुए बेहद खुशी होती… फिल्मी गीत जो मैं गाता और उन लोगों को भाता…. वे इस प्रकार हैं….

तुम्हें दिल से कैसे जुदा हम करेंगे
कि मर जाएंगे और क्या हम करेंगे…

किसी दिन हमें आजमाए ये दुनिया
मुहब्बत की कीमत बताए ये दुनिया

मुहब्बत की कीमत अदा हम करेंगे….
कि मर जाएंगे और क्या हम करेंगे…

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मेरे प्यार की उमर हो इतनी सनम
तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम से खतम

बिन तेरे एक पल भी मुझे रहा नहीं जाए
ये दूर दूर रहना अब सहा नहीं जाए
हाजिर है जान जानेमन, जान की कसम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से खतम…

मेरे सपने गुलाबी नीले हो गए जवां
लो आके तेरी बाहों में मैं खो गई कहां
तेरे प्यार भरे बाहों में ही निकलेगा दम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से खतम…

एक छोटा सा घर हो, रहे दोनों जहां
जहां प्यार से मिले ये धरती आसमां
टूट जाए ना कहीं मेरे प्यार का भरम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से खतम…

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जिंदगी की ना टूटे लड़ी प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी
ओ लंबी लंबी उमरिया को छोड़ो
प्यार की इक घड़ी है बड़ी
प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी

उन आंखों का हंसना भी क्या
जिन आंखों में पानी ना हो
वो जवानी जवानी नहीं
जिसकी कोई कहानी ना हो
जीने मरने की किसको पड़ी….
प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी….

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ऐसे ही ढेरों गाने गाए जाते और लोग झूमते, गुनगुनाते, अपने ग़मों को भूलते. बाद में तो मैं इतना लोकप्रिय हुआ कि बैरक में टहलते कोई सज्जन आते और मुझे गवाने के लिए एक कोने में ले जाते और अनुरोध करते कि भाई साहब, वो वाली लाइन फिर गाकर सुना दीजिए… तब मैं गाता…. जीने मरने की किसको पड़ी…. प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी… उन आंखों का हंसना भी क्या, जिन आंखों में पानी न हो…. वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी ना हो… एक बार नोएडा पेशी पर हम लोग जा रहे थे तो पूरे रास्ते गाते गए…. बाहर वालों की जाम में फंसी भागती हांफती दौड़ती जिंदगी देखकर उन पर तरस आ रहा था, जैसे बाहर वालों को हम लोगों की मुर्गियों की तरफ कैद, फंसी, अंटकी, भुगतती जिंदगी देखकर तरस आता….

बैरक में सुबह गिनती के वक्त बैरक से बाहर पार्क में निकलने पर कई लोग बैरक की दीवार पर बने महाभारत के एक दृश्य में खड़े कृष्ण के पैरों में हाथ जोड़कर देर तक प्रणाम करते. दीवार पर महाभारत का वह सीन पेंट किया गया है जिसमें अर्जुन को भगवान कृष्ण युद्ध करने के लिए उपदेश दे रहे हैं और सेनाएं आमने सामने मैदान में डंटी हुई हैं. इस पेंटिंग को रियाज नामक किन्हीं बंदी पेंटर ने बनाया है, रियाज ने अपने दस्तखत बेहद करीने से पेंटिंग के कोने में किए हुए हैं. मैं सोचता कि बाहर हिंदू मुस्लिम के नाम पर कितनी मारकाट मची रहती है लेकिन जेल में कितना भाईचारा है. जिस बैरक में मैं रहा, वहां पूरे रमजान भर मुस्लिम भाई नमाज पढ़ते और उनके खाने पीने के लिए विशेष इंतजाम जेल प्रशासन द्वारा किया जाता. ईद के दिन सबसे गले मिलकर अच्छा लगा. एक सामूहिक कार्यक्रम भी जेल प्रशासन द्वारा कराया गया जिसमें सबने मिलकर नमाज अता की. रमजान के अलावा भी कई मुस्लिम भाई रुटीन में पांचों वक्त की नमाज अदा करते. वे एक जगह इकट्ठे हो जाते और एक साथ नमाज अदा करते. मेरा भी मन कई बार करता कि मैं भी यहां नमाज अदा करना सीख लूं लेकिन अपनी इच्छा व्यक्त करने की हिम्मत नहीं कर पाया. हां, नमाज अदा करने वाले सभी साथियों से मैंने जान-पहचान अच्छी कर ली थी. उनमें से कई साथियों के साथ मैं शतरंज खेला करता.

उधर, शाम की गिनती शुरू होने के बाद बैरक में आते ही पूरे बैरक में दो जगह लोगों को जमावड़ा हो जाता और भजन गायन का दौर शुरू हो जाता. यह कार्यक्रम आधे घंटे के करीब चलता. इस वक्त ऐसा लगता जैसे हम किसी मंदिर में बैठे हों और तरह तरह के धुनों पर भजन गाए जा रहे हों. हम लोगों के हाथ पांव खुद ब खुद हिलते रहते. अंत में प्रसाद वितरण होता और मैं भी पूरे चाव से प्रसाद खाकर शतरंज का नया दौर शुरू करता. जब जीत जाता तो मैं चिल्लाकर कहता…. मैं हूं शहंशाह ए डासना… जिसके छूटने की आस ना…. । यह तकिया कलाम बहुत लोगों को याद हो गया…. कई बार तो जीतता मैं और नारा लगाते हारने वाले सज्जन कि… भड़ासजी हैं शहंशाह ए डासना…. जिनके छूटने की आस ना…. ।।

इस धारावाहिक उपन्यास के लेखक यशवंत सिंह 68 दिनों तक डासना जेल में रहकर लौटे हैं. उन्हें जेल यात्रा का सौभाग्य दिलाने में इंडिया टीवी और दैनिक जागरण प्रबंधन का बहुत बड़ा योगदान रहा है क्योंकि ये लोग भड़ास पर प्रकाशित पोलखोल वाली खबरों से लंबे समय से खार खाए थे, इस कारण फर्जी मामलों में फंसाकर पहले थाने फिर जेल भिजवा दिया. लेकिन यशवंत जेल में जाकर टूटने की जगह जेल को समझने बूझने और उसके सकारात्मक पक्ष को आत्मसात करने में लग गये. इसी कारण ''जानेमन जेल'' शीर्षक से उपन्यास लिखने की घोषणा उन्होंने जेल में रहते हुए ही कर दी. वे इस उपन्यास के जरिए बंदियों-कैदियों-जेलों की अबूझ दुनिया की यात्रा भड़ास के पाठकों को कराएंगे. पाठकों की सलाह आमंत्रित है. आप यशवंत तक अपनी बात yashwant@bhadas4media.com के जरिए पहुंचा सकते हैं. उनसे संपर्क 09999330099 के जरिए भी किया जा सकता है.


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