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जब ‘विजय दीनानाथ चौहान’ ने पत्रकार को आतंकियों से छुड़ाया

जय देशमुख फ्रांस की समाचार एजेंसी AFP के मध्य-पूर्व के संवाददाता हैं। मिस्र की राजधानी काइरो से रिपोर्ट करते हैं। करीब दो दशक पहले मुम्बई से अपने कैरियर कि शुरुआत करने वाले जय 1990 के दशक में THE SUNDAY OBSERVER और BUSINESS & POLITICS के लिए भी काम कर चुके हैं।

जय देशमुख फ्रांस की समाचार एजेंसी AFP के मध्य-पूर्व के संवाददाता हैं। मिस्र की राजधानी काइरो से रिपोर्ट करते हैं। करीब दो दशक पहले मुम्बई से अपने कैरियर कि शुरुआत करने वाले जय 1990 के दशक में THE SUNDAY OBSERVER और BUSINESS & POLITICS के लिए भी काम कर चुके हैं।

जय पिछले 15 सालों में AFP न्यूज़ एजेंसी संवाददाता के रूप में श्रीलंका, ईरान, इराक, लीबिया में काम कर चुके हैं। मध्य-पूर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पत्रकारों के लिए काम करना आसान नहीं है। इराक और लीबिया, जहां युद्ध और सिविल वार जैसी स्थितियां हो वह से रिपोर्टिंग करना बहुत हिम्मत और प्रेफेशनल कमिटमेंट का काम है।  

अभी तीन साल पहले जय को ईरान सरकार ने उनकी सरकार विरोधी पक्षों पर की गई सशक्त रिपोर्टिंग के लिए देश से निकाल दिया था। जय सम्भवतः भारत के एक मात्र ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने पश्चिम एशिया के इतने दिलचस्प क्षेत्रों से एजेंसी के लिए रिपोर्टिंग की है।

जय स्वीकार करते हैं के ऐसे क्षेत्रों से रिपोर्टिंग करने में खतरे बहुत हैं। जान का भी जोखिम है। एक एजेंसी के पत्रकार को 24 घंटे सजग रहना होता है। निश्चित रूप से ऐसी जगह पर काम करने के लिए पैसा ही एक मात्र आकर्षण नहीं है। जय कहते हैं कि उन्होंने बहुत सोंच समझ कर पश्चिम ऐशिया जैसे क्षेत्र में एक संवादाता के रूप में काम करना स्वीकार किया। उनका मानना है कि, क्यों सिर्फ पश्चिम के ही पत्रकार अफ्रीका अरब और पश्चिम ऐशिया की कहानियां दुनिया को बताएं। भारतीय पत्रकारों को भी दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में रिपोर्टिंग का काम करना चाहिए, अपनी आँखों से दुनिया को देखना चाहिए और एक भारतीय परिपेक्ष दुनिया के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। जय इस बात से निराश हैं कि भारतीय मीडिया ने अभी तक इस बारे में ज्यादा ध्यान नहीं दिया है।

अपने पुराने मित्र सुधींद्र कुलकर्णी से एक मुलाकात के दौरान जय ने अमरीका और इराक युद्ध के समय का बड़ा ही रोचक किस्सा बताया। 2003 से 2008 के बीच जय एजेंसी के लिए इराक युद्ध कवर कर रहे थे। एक दिन उनको औऱ उनके अरबी ट्रांसलेटर को अमरीकी जासूस होने के शक़ में एक मिलिटेंट ग्रुप ने किडनैप कर लिया। उनको हथकड़ी पहना कर घसीटते हुए एक अनजान जगह ले जाया गया। किडनैपरों ने उनसे तरह-तरह से सूचनाएं उगलवाने कि कोशिश की- वे कौन है, कहाँ से आयें हैं, वहाँ क्या कर रहे थे, किसको सूचना दे रहे थे आदि आदि।

जय ने उन्हें अपनी टूटी-फूटी अरबी में समझाने की बहुत कोशिश की कि वो एक पत्रकार हैं और एक न्यूज़ एजेंसी के लिए काम करते हैं। पूरा दिन बीत गया लेकिन कोई उनकी बात सुनने समझने को तैयार ही नहीं था। खैर, फिर एक नया पूछ-ताछ करने वाला आया और उसने पूछा, "क्या तुम पाकिस्तान से हो?"
जय ने उसे जवाब दिया, "नहीं मैं इंडिया से हूँ।"
इतना सुनना था कि पूछ-ताछ करने वाला उछाल पड़ा। बोला "क्या!! इंडिया? शोले? अमिताभ बच्चन? क्या तुम अमिताभ बच्चन को जानते हो?"

फिर जय ने उसे अपनी हिंदी फिल्मों की जानकारी से  और ख़ास तौर से अमिताभ बच्चन की फिल्मों के बारे में बता कर समझाया कि वो वाकई में हिन्दुस्तानी हैं। इसके बाद वहाँ का माहौल बदल गया। पूछ-ताछ करने वाले का रवैय्या भी बदल गया। उसने बताया के वो अमिताभ बच्चन की फिल्मों का बहुत बड़ा फैन है। कुछ देर बाद उसने अपने साथियों से कहा "ये आदमी हमारा दोस्त है। ये इंडिया से है। इसे आज़ाद कर दो।"

ये किस्सा जय के लम्बे कैरियर में पेश आए अनेक किस्सों में से एक है और उनकी रिपोर्टिंग की तरह ही दिलचस्प है। वैसे हमारे देसी पत्रकार भाई जो स्टूडियो में हैलमेट लगा कर बैठ जाते है और अफग़ानिस्तान युद्ध की रिपोर्टिंग कर देते हैं, उनको भी जय देशमुख से कुछ सीखना चाहिए।

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