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कालाहांडी में अब भूख से लाशें नहीं बिछतीं, बचपन नहीं बिकते

समाज में दलाल और दलाली को हिकारत की नजर से भले ही देखा जाता हो, लेकिन जब दलाल किसी समाज और व्यवस्था की काया पलट कर दें तो इसे आप क्या कहेंगे। जी हां, केबीके के नाम से दुनिया में बदनाम उड़ीसा का कालाहांडी, बोलांगीर और कोरापुट जिले पिछले पांच सालों में विकास की नई इबारत लिख रहे है। हांलाकि इस विकास की कहानी में सरकार की नीति, सरकारी पहल, किसान, किसानी व सिंचाई के लिए बेहतर व्यवस्था और साथ ही किसानों की सोंच में आई तब्दीली की काफी अहमियत हैं। लेकिन इन सबसे उपर इस इलाके की तकदीर बदलने में दलालों की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता। आइए आपको ले चलते हैं देश में भूखमरी के लिए अभिशप्त कालाहांडी के भूगोल पर जहां अब कंगाली नहीं हर जगह हरियाली है, रूदन के स्थान पर मंगल गीत गाए जा रहे हैं और लगभग हर घर में टीवी, फ्रीज, रेडियों, डिश एंटिना साइकिल के बदले मोटरसाइकिल और नंग धरंग बच्चें और अधनंगे बुढे चमचमाते कपड़ों से लैस हैं। मानों पूरा का पूरा कालाहांडी मुस्कुरा रहा हो।

समाज में दलाल और दलाली को हिकारत की नजर से भले ही देखा जाता हो, लेकिन जब दलाल किसी समाज और व्यवस्था की काया पलट कर दें तो इसे आप क्या कहेंगे। जी हां, केबीके के नाम से दुनिया में बदनाम उड़ीसा का कालाहांडी, बोलांगीर और कोरापुट जिले पिछले पांच सालों में विकास की नई इबारत लिख रहे है। हांलाकि इस विकास की कहानी में सरकार की नीति, सरकारी पहल, किसान, किसानी व सिंचाई के लिए बेहतर व्यवस्था और साथ ही किसानों की सोंच में आई तब्दीली की काफी अहमियत हैं। लेकिन इन सबसे उपर इस इलाके की तकदीर बदलने में दलालों की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता। आइए आपको ले चलते हैं देश में भूखमरी के लिए अभिशप्त कालाहांडी के भूगोल पर जहां अब कंगाली नहीं हर जगह हरियाली है, रूदन के स्थान पर मंगल गीत गाए जा रहे हैं और लगभग हर घर में टीवी, फ्रीज, रेडियों, डिश एंटिना साइकिल के बदले मोटरसाइकिल और नंग धरंग बच्चें और अधनंगे बुढे चमचमाते कपड़ों से लैस हैं। मानों पूरा का पूरा कालाहांडी मुस्कुरा रहा हो।

 
कालाहांडी की ये जो बदली तस्वीर हम आपको दिखा रहे हैं इसमें दलालों की बड़ी भूमिका है। कालाहांडी के हर गांव में पलायन एक कुटीर उद्योग का रूप ले चुका हैं। जब से छत्तीसगढ राज्य बना तब से ही कालाहांडी की तस्वीर बदल गई। दाने दाने को मोहताज और बात बात में गुलामी के शिकार हो रहे बच्चें और महिलाओं के लिए छत्तीसगढ़ ने रोजगार का द्वार खोल दिया। रोजगार सामने आए तो दलालों का नेटवर्क शुरू हुआ और देखते देखते कालाहांडी के हर गांव और बाजार में दलालों के आफिस खुल गए। रोजगार के अवसर मिले तो गांव से लोगों का पलायन शुरू हुआ और देखते ही देखते लोगों की रंगत बदने लगी। आमदनी बढ़ी तो भोजन मिलना शुरू हुआ, पचके गाल और पेट फुलने लगे, नंगा शरीर कपड़ों से ढकने लगे, बच्चे स्कूल जाने लगे और लाख सूखा पड़ने के बावजूद लोगों को फिर भूख का डर नहीं रह गया।
      
आइए ये है कालाहांडी का जिला हेड क्वार्टर भवानीपटना। आज से पांच साल पहले गरीबी और दरिद्रता का साक्षातकार लेने के लिए जब कोई खबरची या फिर कोई गैर सरकारी संगठन भवानी पटना उतरते थे तो पता नहीं चलता कि वे किसी शहर में आए हैं। खेतों में सुखार और भूख से तड़पते, भागते बच्चे, बुढ़े और नौजवान यही दिखाई पड़ता था। इसी भवानी पटना स्टेशन पर भूख से बिलखती महिलाओं और लकड़ी चबाते बच्चों की तस्वीर को खीचकर विदेशी पर्यटकों ने देश दुनिया में कालाहांडी के सच को उजागर तो किया ही साथ ही इस तरह की बेबसी भरी तस्वीर को बेचकर भारी रकम भी कमाया। लेकिन आज यह भवानीपटना बदल गया है। भवानी पटना की स्टेशन की वही दुकाने अब सज संवर गई है। नंग धरंग महिलाएं और बचचे अब दिखाई नहीं पड़ते। अब जान बचाने के लिए भागते लोगों की हुजुम दिखाई नहीं पडती।
 
इसी भवानीपटना में कभी लोग अनाज के बदले बिक जाते थे लेकिन आज यहां मजदूरों को नौकरी दिलाने वाले दलालों और एजेंसियों की भरमार है। हालाकि पलायन यहां की नियति है लेकिन उसी पलायन ने अब कालाहांडी को हरा भरा कर दिया है। भवानीपटना के पंचायत अरतल, बोरभाटा, चांचर या फिर केंद्रपती चले जाएं कही आपको बेबसी नहीं मिलेगी। चांचर के अधिकतर लोग छत्तीसढ में काम कर रहे हैं। रिक्शा चलाने से लेकर सड़क बनाने और फैक्ट्रियों में काम करने से लेकर रायपुर और राजनादगांव में चुलहा चैका तक का सारा काम इसी चांचर और बोरभाटा के लोगों ने सम्हाल रखा है। हालाकि गांवों में लागों की आज भी कमी है लेकिन जो लोग घर पर है भी वे केला की खेती करके अपने और गांव को भी खुशहाल किए हुए है। कालाहांडी का ही एक ब्लाक है लांजीगढ। लांजीगढ के बेनगांव, भर्तीगढ,गुंडरी और लांजी गांव तो अब पहचान में आते ही नहीं। हालाकि इन गावों में आज भी पलायन के कारण सन्नाटा पसरा हुआ लेकिन गांवों में बजते मोबाईल और साइकिल पर स्कूल जाती लड़कियों और लड़कों को देखकर लगता है कि यह कालाहांडी का गांव ही नहीं है। इन गांवों में केबल और डिश टीवी हर घर में लग गई है। परचुन की दुकाने है तो जिसमें मनिहारी और सौंदर्य प्रसाधन के सामान भी।   

कालाहांडी के पूरे इलाके में युवाओं के बीच एक नई सोंच विकसित हो गई हैं। बार बार और हर बार सूखा पड़ने से खेतीबाड़ी करने को कतई तैयार नहीं है। दूसरे राज्यों और शहरों में जाकर वह हर छोटा मोटा काम करने को तैयार है लेकिन खेती के भरोसे जीने को तैयार नही है। बलसिंगा के रूपन का कहना है कि खेती में अब कुछ नहीं रह गया। दलालों के जरिए हमें काम मिल जाता है और दिहाडी 200 से ज्यादा की हो जाती है। मंडेल गांव के बिरछी की सोंच हलाकि कुछ अलग है लेकिन बिरछी साफ कर देता है कि जब से गांव के लोग बाहर कमा रहे हैं तब से भूखे मरने की नौबत नहीं रही। दलालों ने इन्हें छत्तीसगढ, मघ्यप्रदेश और लेह लद्दाख से लेकर कश्मीर तक काम करने की जमीन तैयार कर दी है। इसके अलावा कालाहांडी को संवारने में सरकार भी बडे स्तर पर जुटी हुई है। सूखा से परेशान कालाहांडी को जीवित करने में केला रामबान साबित हो रहा है। सरकारी मदद और किसानों में इस केले की खेती के प्रति ललक ने कालाहांडी की तस्वीर को बदल दिया है। अभी सिर्फ कालाहांडी में ही 12000 हेक्टेयर में केले की खेती हो रही है और साल में इससे किसान एक लाख रूपए तक की आमदनी कर रहे हैं। किसानों को इसके लिए बैंक लोन दे रही है और साथ ही सब्सिडी भी। इस तरह से केले की खेती और दलालों ने पूरे कालाहांडी की तस्वीर बदल दी है।  
      
गरीबी, शोषण और भूख से हाने वाली मौतों के लिए बदनाम रहे उड़ीसा के कालाहांडी की तस्वीर अब बदल गई है। यहां अब भूख से मौतें नहीं होती या यूं कहे कि पिछले आठ सालों में भूख से मौत की मात्र तीन खबरें सामने आई है। इन खबरों के बाद जब सरकारी जांच हुई तो भूख से हुई मौत की पुष्टि नहीं हो पाई। भूख से बिलबिलाते बच्चों को देखकर पहले इसी कालाहांडी में मां बाप अपने बच्चों को बेचते रहे हैं। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे एक मन बाजरे में दो बच्चे यहां बिके थे। इस खबर से परेशान होकर राजीव गांधी ने कालाहांडी की यात्रा की थी और दशकों पुरानी कालाहांडी की सच्चाई को जाना था। राजीव गांधी के प्रयासों और अब केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का भरपूर फायदा कालाहांडी को मिल रहा है। हालाकि कालाहांडी अभी भी शेष भारत के विकास से कोसों दूर है लेकिन अब कालाहांडी के विकास का पहिया घूम चुका है। कालाहांडी में आज भी सूखे का प्रकोप दिखाई पड़ सकता है लेकिन यकिन मानिए अब वहां भूख से लाशें नहीं बिछती और बचपन नही बिकते।

 

अखिलेश अखिल। संपर्कः [email protected]
 

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