ये Kavita Krishnan ‘आप’ पर इतनी आक्रामक क्यों हैं चचा?

Samar Anarya : ये Kavita Krishnan 'आप' पर इतनी आक्रामक क्यों हैं चचा?

भतीजे- इनकी करतूतों के चलते भाकपा माले (लिबरेशन) में जो 'आप' में जाने के लिए भगदड़ मची है, तो बिचारी, और कर भी क्या सकती हैं?

-वो तो ठीक है चचा. पर लिबरेशन का राज्य पार्टी होने का दर्जा तो पिछले चुनाव में ही छिन गया था.

-टीवी क्रांतिकारी होने का दर्जा तो बाकी है चचा.

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लिबरेशन का राज्य पार्टी होने भर का अधिकार बस बिहार भर में बचा था. वो पिछले चुनाव से ही छिनने के कगार पर था. इस बार Kavita Krishnan और जहरीले प्रोफ़ेसर की करतूतों के चलते चला ही जाएगा। बेचारे, अब क्या करेंगे?

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एनडीटीवी से लेकर आजतक पर दहाड़ते रहने वाली नारीवादियों में से कितनों को बीरभूम सामूहिक बलात्कार मामले पर मुंह खोलते तक सुना है? रस्मी बयानों को छोड़ मुज़फ्फरनगर पर भी चुप ही थे ये सब. उदारवादी, समाजवादी, अराजकतावादी आदि आदि नारीवादी आन्दोलनों को चुनौती दे रही इन कैमरा-माइक नारीवादियों को मेरा सलाम!

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राज्यसभा उपसभापति कुरियन साहब बलात्कार आरोपी हैं. बाकी हजार नेताओं पर भी यौन हिंसा के हजार मामले हैं. पर तमाम नारीवादी उनके खिलाफ कभी ऐसे नहीं बोले, ऐसे आग नहीं उगली जैसी 'आप' के सोमनाथ भारती पर उगल रहे हैं. मैं समझ नहीं पा रहा क्यों। आप बता दें प्लीज़।

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सुना है कि Kavita Krishnan सुनन्दा पुष्कर मामले में एआईसीसी को चिट्ठी लिखेंगी। ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने खुर्शीद भाई के मामले में लिखी थी. बाकी बेचारी जहरीले प्रोफ़ेसर के साथ मिल के भी वीडिओ का जुगाड़ नहीं कर पा रही है.

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ऑल इंडिया स्टूडैंट एसोसिएशन (आइसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और और पूर्व अध्यक्ष जेएनयू छात्रसंघ संदीप सिंह के इस्तीफे की अब तक उड़ रही ख़बरों की पुष्टि। 'आप' में शामिल होने के लिए चल रही है बातचीत। जमीनी राजनीति को टीवी स्टूडियो की बहसों में बेच आये, मधु किश्वर के नेतृत्व में बिरादराना कामरेडों की हत्या पर उतर आये संगठन में ईमानदार लोग रह भी कब तक सकते थे. जहाँ भी रहें कामरेड, आपकी प्रतिबद्धता और जनपक्षधरता असंदिग्ध है. लाल सलाम।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.


Shahnawaz Malik : खुर्शीद प्रकरण पर आईसा के एक कॉमरेड मुझपर भड़क गए। सामान की क्वालिटी पर शक करेंगे तो दूकानदार भड़क ही जाता है।

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संदीप सिंह आईसा के ज़मीनी, जुझारू और तूफानी कार्यकर्ता थे। उम्मीद करता हूँ कि संदीप पर गद्दार, अवसरवादी और कैरियरिस्ट का ठप्पा नहीं लगाया जाएगा।

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आईसा के पेशेवर आंदोलनकारी अभी संघियों से बड़े शैतान नहीं हुए हैं। फिर भी उन्हें बताना चाहता हूं कि जब मोदी की साइबर टीम मेरे पीछे पड़ी हुई थी और वर्चुअल किलिंग के अलावा मुझे हर तरह से डैमेज करने में पूरी ताकत झोंक दी थी, तब भी मैं यहीं रहा। कुछ भी नहीं बिगड़ा मेरा। अपनी सारी एनर्जी लगाने के बाद वो दुम दबाकर भाग गए। अब उनकी जगह आईसा के फासीवादी कॉमरेड्स ने ले ली है। लेकिन हे कॉमरेड…मैं हफ्ते में चार दिन आपके गढ़ में ही रहता हूं। पेरियार हॉस्टल में नाइट स्टे करता हूं। डिनर भी वहीं करता हूं। फिर आमने-सामने टकराने की बजाय आपको स्टेटस लगाने की क्या ज़रूरत पड़ गई? भाई ये संदीप सिंह और राजन पांडेय और अलंकार के जाने का फ्रस्टेशन है या फिर अक्ल से पैदल हैं आप। मेरी गुज़ारिश है कि मुझे धमकाने की बजाय अपना वक्त सबूत मिटाने में लगाइए। पुलिस जल्दी आपके आलाकमान के हाथों में हथकड़ी पहनाएगी। वैसे दिलचस्प ख़बर तो यह भी आ रही है कि हिंदी पट्टी के ज्यादातर कॉमरेड्स आपकी पार्टी को बाय-बाय करने वाले हैं।

नवभारत टाइम्स में कार्यरत पत्रकार शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से.

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