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देश में स्वतंत्र नहीं है मीडिया: रमेश उपाध्याय

दिल्ली। सत्य हमेशा निरपेक्ष नहीं होता। मीडिया जिस सत्यता का दावा करता है वह सत्य किसका पक्षधर है यह जाने बिना मीडिया को जनपक्षधर नहीं कहा जा सकता। सुप्रसिद्ध कथाकार और साहित्य-संस्कृति की पत्रिका 'कथन' के संस्थापक सम्पादक रमेश उपाध्याय ने हिन्दू कालेज में आयोजित एक परिसंवाद में कहा कि हमारे देश में मीडिया स्वतंत्र नहीं है और जनता का मीडिया गायब है। उन्होंने कहा कि जिस माध्यम को संवाद बनाकर मनुष्य को बनाने का काम करना था वह एकायामी हो गया है और वहाँ संवाद का स्थान प्रचार ने ले लिया है।

दिल्ली। सत्य हमेशा निरपेक्ष नहीं होता। मीडिया जिस सत्यता का दावा करता है वह सत्य किसका पक्षधर है यह जाने बिना मीडिया को जनपक्षधर नहीं कहा जा सकता। सुप्रसिद्ध कथाकार और साहित्य-संस्कृति की पत्रिका 'कथन' के संस्थापक सम्पादक रमेश उपाध्याय ने हिन्दू कालेज में आयोजित एक परिसंवाद में कहा कि हमारे देश में मीडिया स्वतंत्र नहीं है और जनता का मीडिया गायब है। उन्होंने कहा कि जिस माध्यम को संवाद बनाकर मनुष्य को बनाने का काम करना था वह एकायामी हो गया है और वहाँ संवाद का स्थान प्रचार ने ले लिया है।

 

हिंदी साहित्य सभा द्वारा आयोजित इस परिसंवाद में उपाध्याय ने कहा कि जनपक्षधरता को ठीक से जन समझने के लिए जन और अभिजन के अंतर को स्पष्ट करना होगा। आयोजन में कवि और लघु पत्रिका 'धरती' के सम्पादक शैलेन्द्र चौहान ने भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन और पत्रकारिता के सम्बन्ध से अपनी बात को प्रारम्भ करते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से भारत में जन्म लेने वाला मीडिया अब मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग में बदल गया है। उन्होंने सवाल किया कि हाशिये के लोग मीडिया की चिंता में क्यों नहीं हैं? उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता के सम्बन्ध की चर्चा करते हुए कहा कि चूंकि साहित्य प्रतिरोध का सन्देश देता है इसलिए मुनाफे को लक्ष्य बनाने वाले मीडिया ने अपने यहाँ साहित्य को जगह देना समाप्त कर दिया। उन्होंने साम्प्रदायिक घटनाओं के सन्दर्भ में मीडिया की भूमिका को भी रेखांकित कर कहा कि सवर्ण मध्यवर्ग की ताबेदारी को छोड़कर बहुजन समाज के लिए काम करने पर भारतीय मीडिया सच्ची विश्वसनीयता अर्जित कर सकेगा।

परिसंवाद की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. हरीश नवल ने मीडिया से जुड़े अपने निजी अनुभवों को युवा विद्यार्थियों से साझा किया। उन्होंने कहा कि मीडिया आमतौर पर व्यवस्था के साथ खड़ा दिखाई देता है जबकि उसकी भूमिका व्यवस्था के बदलाव में होनी चाहिए। डॉ. नवल ने मीडिया में बढ़ती व्यावसायिकता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया को मानवता के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। उन्होंने मीडिया में हिंदी की उपेक्षा और हिंदी के भ्रष्ट चलन पर कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि अपनी भाषा को विरूपित करने वाले मातृहंता कहे जायेंगे।  

इससे पहले हिंदी साहित्य सभा के परामर्शदाता डॉ पल्लव ने अतिथियों का स्वागत और विषय प्रवर्तन किया। विभाग की हस्तलिखित पत्रिका 'हस्ताक्षर' की सम्पादक डॉ. रचना सिंह ने अतिथियों को पत्रिका के नए अंक की प्रतियां भेंट की। आयोजन में डॉ. विजया सती, डॉ. रामेश्वर राय, डॉ. अभय रंजन, डॉ. हरीन्द्र कुमार, डॉ. अरविन्द कुमार सम्बल, डॉ. नीलम सिंह, डॉ. क्षमा, डॉ. राजीव कुमार, डॉ. राकेश उपाध्याय, डॉ. सुमिता सहित बड़ी संख्या में युवा विद्यार्थी और शोध छात्र उपस्थित थे।  अंत में विभाग के प्रभारी डॉ विमलेन्दु तीर्थंकर ने आगंतुकों का आभार व्यक्त किया।

डॉ अरविन्द कुमार सम्बल, सहायक आचार्य हिंदी विभाग, हिन्दू कालेज,दिल्ली।
 

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