मीडिया से गायब होते साहित्य को आक्रमक मार्केटिंग नीतियों की ज़रूरत

मीडिया साहित्य को जन-जन के बीच पहुंचाने का सबसे बड़ा जरिया रहा है, लेकिन व्यावसायीकरण की अंधी दौड़ में मुख्यधारा मीडिया ने साहित्य व संस्कृति को लगभग भुला दिया है। निजी टीवी चैनलों व एफएम रेडियो में साहित्य के लिए कोई स्थान नहीं है। साहित्य की गंभीर चर्चा की उम्मीद तो छोड़िए, टीआरपी न दे पाने के कारण कवि सम्मेलनी कार्यक्रम भी टीवी के दृश्यपटल से गायब ही रहते हैं। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में मीडिया ने अपना जबरदस्त विस्तार किया है। मीडिया के विस्तार को यदि मीडिया की तरक्की मान लिया तो निश्चित तौर पर इसे काफी अंक मिल जाएंगे, चाहे अखबरों की बात हो या टीवी व एफएम की सभी का विस्तार हुआ है। आज देशभर में विभिन्न भाषाओं के करीब तीन सौ से ज्यादा समाचार चैनल टीवी पर दिखाए जा रहे हैं। जन सेवा प्रसारण, जिसमें दूरदर्शन, संसद के दोनों चैनल व आकाशवाणी शामिल है, को छोड़कर किसी भी निजी न्यूज चैनल पर साहित्य से संबंधित कोई कार्यक्रम नहीं प्रसारित किया जाता है। भारतीय इलेक्टॉनिक मीडिया में तो भूत-प्रेत, टोना- टोटका, ज्योतिष व अंध विश्वास को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम भी साहित्य पर भारी दिखाई देते हैं।

 
यदि साहित्य के दृष्टिकोण से प्रिंट मीडिया की बात की जाए तो समाचार पत्र व पत्रिकाएं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुकाबले कुछ संजीदा दिखाई देते हैं। विभिन्न भाषाओं के राष्ट्रीय समाचार पत्रों में, ज्यादा न सही, कम से कम सप्ताह में एक या आधे पन्ने की साहित्य चर्चा शामिल की जाती है, इसमें पुस्तक समीक्षा, लेखक परिचय, कविता, कहानी व साहित्य विमर्श आदि शामिल होते हैं। यह अलग बात है कि अधिकांश समाचार पत्रों में छपने वाली साहित्य समीक्षा में गहराई का आभाव होता है। पुस्तक समीक्षा में लेखक, विषय व प्रकाशन के अलावा कुछ गंभीर होता ही नहीं है। देश में प्रकाशित होने वाले लगभग सभी राष्ट्रीय समाचार पत्रों का यही हाल है। साहित्य जिम्मेदारी निर्वाहन के मामले में अंग्रेजी के द हिंदु व हिंदी के जनसत्ता अखबार को धन्यवाद दिया जा सकता है। दि हिंदु अखबार में शनिवार को साहित्य से संबंधित छह पेजों का प्रकाशन किया जाता है। वहीं, जनसत्ता में भी गंभीर साहित्य विमर्श देखने को मिल जाता है। वैसे भी, मुख्य धारा मीडिया में गिने जाने वाले अखबारों में साहित्य से ज्यादा बालीवुड, ब्यूटी टिप्स, गैजेट्स, सेलेब्रिटी गॉसिप व चुटकुले ही ज्यादा प्रकाशित होते हैं।
 
अंग्रेजी व हिंदी के अखबारों में छपने वाले साहित्य की पड़ताल करें तो एक और गंभीर समस्या का पता चलेगा। अंग्रेजी के अखबार अंग्रेजी साहित्य के बारे में और हिंदी के अखबार केवल हिंदी साहित्य के बारे में बात करते हैं। अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों की भी कमोबेश यही स्थिति है। अखबारों के इस व्यवहार को देखकर हर साहित्य प्रेमी के मन यह सवाल उठने लाजमी हैं कि साहित्य को संकीर्ण भाषायी खांचे में क्यों बांट दिया गया है? भाषा के आधार पर लोगों को साहित्य के आनंद व ज्ञान से क्यों वंचित रखा जा रहा है? भारतीय संघीय ढ़ाचे की अवधारणा के अनुसार तो परस्पर भाषायी आवाजाही तेज होनी चाहिए थी। साहित्य के जरिए संस्कृतियों का आपसी संवाद बढ़ना चाहिए था, लेकिन हकीकत में इसके ठीक उलटा हो रहा है।
 
साहित्य के साथ मीडिया द्वारा भाषायी भेदभाव के इन हालातों में पाठकों व दर्शकों को दोहरी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पहली मुश्किल है, मुख्यधारा मीडिया से साहित्य गायब है। दूसरी बड़ी मुश्किल है जो पाठक केवल एक भाषा जानता है, उसे दूसरी भाषा के साहित्य से वंचित रहना पड़ता है। वैसे, आजकल के पाठकों में भी साहित्य के प्रति नजरिए में भारी बदलाव आया है। पहले पाठक साहित्य के शब्दों में जीवन और भावनाओं की अभिव्यक्ति तलाशता था, उससे इतर आज का पाठक साहित्य में मनोरंजन अधिक चाहता है। यही कारण है कि आज के साहित्य का व्यावसायीकरण हो गया है। अंग्रेजी साहित्य ने हिंदी या अन्य भारतीय भाषायी साहित्य के मुकाबले इस व्यावसायिक खांचे में खुद को  ज्यादा अनुकूलता के साथ फिट कर लिया है।
 
अंग्रेजी साहित्यकारों के बीच अंग्रेजी का यह कथन बेहद प्रचारित है कि ‘मार्केटिंग इज मेकिंग ऑफ लिटरेचर’। यह उक्ति भारतीय साहित्य के परिपेक्ष्य में भी सही बैठती दिखाई देती है। अमीष त्रिपाठी व चेतन भगत जैसे अंग्रेजी के साहित्कारों ने मार्केटिंग के जरिए खुद को फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया। क्योंकि, वर्तमान दौर में सफलता का मानक आर्थिक सफलता है। अंग्रेजी साहित्यकारों को रिकॉर्ड रॉयलटी मिलेनी की खबरें आए दिन मीडिया में आती रहती हैं। अंग्रेजी का साहित्यकार अपने साहित्य के अलावा खुद को भी आइकॉन के रूप में स्थापित करने में विश्वास करता है, जोकि उसके साहित्य की बिक्री व लेखक के भविष्य साहित्यकर्म के लिए भी आवश्यक होता है। इसेक लिए वह मीडिया के इस्तेमाल से भी गुरेज नहीं करता है।

हिंदी या अन्य भाषायी साहित्कार मार्केटिंग करने या करवाने के मामले में पिछड़े हुए दिखाई देते हैं, जिसका खमियाजा उनके साहित्य को भी भुगतना पड़ता है। भाषायी प्रकाशक भी मीडिया के जरिए लेखक व उसके साहित्य को प्रचारित कराने में पीछे रह जाते हैं, वे गोष्ठी व पुस्तक विमोचन कार्यक्रम तक ही खुद को सीमित रखते हैं। मीडिया में प्रचार मामले मे जब तक लेखक व प्रकाशक द्वारा आक्रमक नीतियां नहीं बनाई जाएंगी, कोई बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं की जा सकती है। होना यह चाहिए की प्रकाशकों द्वारा टीवी व एफएम में छोटे-छोटे स्लॉट खरीदे जाएं और उनके जरिए साहित्यकर्म का प्रचार किया जाए। मीडिया को भी इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। साहित्यकर्म भी पत्रकारिता का एक हिस्सा है। निकट भविष्य में ऐसी उम्मीद की जा सकती है। साहित्य भी बिकेगा। नया पाठक वर्ग भी तैयार होगा।

 

लेखक आशीष कुमार पत्रकारिता एवं जनसंचार के रिसर्च स्कॉलर हैं उनसे संपर्क 09411400108 पर किया जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *