मियां और महावीर को साथ बैठाने की बेवकूफी

जैन समाज को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा मिल गया। जैन समाज के बहुत सारे लोग इससे खुश हैं। जो लोग खुश हो रहे हैं, खुशी व्यक्त कर रहे हैं, और खुशी का पैगाम पसार रहे हैं, उनको खुश होने का हक भी है। क्योंकि वे नहीं जानते कि जैन समाज को अल्पसंख्यक बनाकर कांग्रेस ने एक तीर से कितने निशाने साध लिए हैं। वे यह भी नहीं जानते कि जैन समाज को मिले इस दर्जे से समाज का कोई भला नहीं होना है। क्योंकि जैन समाज का जो भला होना था, वह तो उसकी अपनी मेहनत, अपनी ताकत और अपने बल बूते पर हो चुका। उसे फायदे के नाम पर कुछ नहीं मिलेगा। क्योंकि वह एक सक्षम समाज है। यह दर्जा ठीक वैसा ही है, जैसे सिख भी अल्प संख्यक हैं और उनको किसी भी तरह का कोई सरकारी फायदा अल्पसंख्यक होने के कारण नहीं मिलता।

जैन समाज के अल्पसंख्यक घोषित होने के बाद जिस तरह से कुछ सामाजिक बंदर बहुत बहुत उछलकूद कर रहे हैं, उनको जरा पूछिये कि उनकी खुशी का कारण क्या है, तो उनके पास कोई जवाब नहीं है। उनको तो बस, सरकार की मेहरबानी की खबर पर खुश होने का बहाना चाहिए था। लेकिन असल बात यह है कि जैन समाज सदियों से अपने दम पर अपने भविष्य का निर्माता तो रहा ही है, वह दूसरो समुदायों का भविष्य भी गढ़ता रहा है। इसलिए वह कभी किसी भी सरकार की मेहबानियों का मोहताज नहीं रहा है।

असल बात यह है कि जैन समाज का एक बहुत बड़ा प्रबुद्ध वर्ग शुरू से ही नहीं चाहता था कि समाज को अल्पसंख्यक होने का सरकारी दर्जा मिले। क्योंकि इस दर्जे के मिलने के बाद अब राजनीतिक रूप से जैन समाज को उस वर्ग के साथ बैठना पड़ेगा, या अधिकारिक रूप से उनके साथ गिना जाएगा, जिनके साथ दिखने में भी जैन समाज को हर तरह का एतराज हमेशा से रहा है। इस पर बहुत से हिंदू भी नाखुश हैं। क्योंकि जैनों को मुसलमानों की तरह अल्पसंख्यक की मान्यता देकर कांग्रेस सरकार ने जैन समाज की उच्च धार्मिक मान्यताओं को तो मुसलमानों की बराबरी में खड़ा किया ही है, हिंदुओं की एकता को भंग कर दिया है और वृहत्त हिंदू जनसंख्या को कम कर दिया है। हम सबको कांग्रेस सरकार के इस षड़यंत्र को समझना चाहिए कि मनमोहन सिंह की सरकार ने हिंदु समाज के सबसे सक्षम वर्ग जैन समाज को हिंदुओं से काटकर मुसलमानों के समकक्ष खड़ा कर दिया है। महावीर के अनुयायियों को अब मुसलमानों के साथ गिना जाएगा, यह किसी भी जैन को सहज स्वीकार्य नहीं हो सकता।

देश के जाने माने लेखक – चिंतक डॉ. वेद प्रताप वैदिक मानते हैं कि जैन धर्म हमारी दुनिया में हिदू धर्म से भी पुराना है। जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर 2500 साल से भी ज्यादा समय पहले हुए थे। तब हिंदू धर्म नाम की कोई चीज़ भारत में नहीं थी। जिसे आज हिंदू धर्म के नाम से हम जानते हैं, उसके मंदिर, मूर्तियां, पूजा-स्थल आदि दो हजार साल से ज्यादा पुराने कहीं नहीं मिलते। यानी जैन संप्रदाय हिंदू संप्रदाय से कम से कम 500 साल से भी ज्यादा पुराना है।  वैदिक मानते हैं कि जैन समाज को अल्पसंख्यक दर्जा देना वोट कबाड़ने का सबसे सस्ता तरीका है, लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा कभी नहीं हो सकता। क्योंकि जहां तक वोट देने का सवाल है, जैन एक प्रबुद्ध समाज है और वह मुसलमानों की तरह भेड़चाल नहीं चलता। इस समाज में हर व्यक्ति अपना निर्णय स्वयं करता है। इसलिए कांग्रेस ने थोक वोटों के लालच में यह जो कदम उठाया है। लेकिन इससे उसे निराशा ही हाथ लगेगी, क्योंकि जैन समाज सदा से ही कांग्रेस के विरोध में ज्यादा रहा है। और वोट पाने के लिए कांग्रेस की जिस करह की करतूत रही हैं, जैन समाज उसका समर्थन कभी कर ही नहीं सकता।

ऐसी आम धारणा है कि अल्पसंख्यक समाज को उनके स्कूल-कालेजों, अस्पतालों, धर्मशालाओं, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों आदि को स्वायत्ता मिलती है। सरकारी हस्तक्षेप कम से कम होता है। सरकारी प्रावधान के अनुसार उनकी हर योजना पर 15 प्रतिशत सरकारी मदद मिलेगी। लेकिन इस तरह की मदद लेने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। सरकारी दफ्तरों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। बाबू साहब के सामने हाथ जोड़ने पड़ते हैं, और सरकारी अफसरों और नेताओं को रिश्वत देनी पड़ती है। मतलब, कि 15 प्रतिशत में से कुछ प्रतिशत तो पहले से लगाना पड़ता है। इतनी सी सरकारी भीख के लिए कोई भी स्वाभिमानी समाज किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता। जो जैन समाज हमेशा से दाता रहा है, दान कते मामले में जैन समाज की दुहाई दी जाती है वह 5 – 10 टक्के के लिए किसी के सामने क्या हाथ फैलाएगा। जैन समुदाय देश का सबसे अधिक उद्यमी और स्वाभिमानी समुदाय है। उसमें पढ़े लिखे लोगों की भी कोई कमी नहीं है। जैन समाज किसी भी मदद का मोहताज़ नहीं है। सरकार द्वारा जैन समाज को मिले इस नए दर्जे के बाद जो लोग बहुत उछल कूद कर रहे हैं, उनसे जरा पूछिये कि देश के 11 राज्यों में तो जैन समाज को पहले से ही अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है, वहां किसी ने क्या तीर मार लिया।

दरअसल, जैन समाज को अल्पसंख्यक बनाकर खुश करने के पीछे की साजिश को समझिये। मिलने वाला कुछ भी नहीं है, उलटे महावीर को मुसलमानों के साथ बिठाने की साजिश है। मुर्ग – मुसल्लम वालों के साथ हमारा पानी पीने का भी व्यवहार नहीं है, अब वे हमारी बराबरी में बैठेंगे, विभिन्न राजनीतिक दलों के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठों में मुसलमान नेताओं की अध्यक्षता में जैन काम करेंगे। जैन समाज के अल्पसंख्यकीय मामलों में उनका दखल होगा, वे जैन समाज को लोगों के भी नेता होंगे, क्योंकि जैन भले ही अल्पसंख्यक है, लेकिन अल्पसंख्यकों में तो मुसलमान ही बहुसंख्यक हैं। कांग्रेस सरकार ने बहुत सोंच समझकर जैन समाज को मुसलमानों के मातहत खड़ा होने का यह खेल तैयार किया है। फिर भी कुछ लोगों को अपने अल्पसंख्यक होने पर खुशी है, तो फिर उनके दिमाग के दिवालियेपन का भगवान ही मालिक है। ऐसे बंदरों को खुश होने दीजिए, क्योंकि उनको समझ नहीं है। लेकिन जो लोग समझदार हैं, उनको अपने आप को महावीर का अनुयायी होने के कारण मुसलमानों के साथ बैठने से बचना चाहिए।    

जैन समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग पहले ही सरकार की इस चाल को समझ रहा था, क्योंकि अल्पसंख्यक होने की वजह से उसे जो फायदे मिलने हैं, उसके लिए मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चैन्नई, हैदराबाद, पुणे, अहमदाबाद, जयपुर, जैसे बड़े शहरों में तो कोई भी सहज स्कोप नहीं है। क्योंकि यहां पहले से ही जिनको यह र्दजा मिला हुआ था, वे सारे फायदे चट करके बैठ गए हैं। जैन समाज के लिए पीछे कुछ बचा नहीं है। आप ही बताइए, मुंबई में अगर जैन समाज को किसी स्कूल, किसी कॉलेज या किसी शैक्षणिक संस्थान के लिए कोई जमीन चाहिए तो कहां मिलेगी। आप इन पंक्तियों को याद रखना, जैन समाज को अल्पसंख्यक होने की वजह से स्कूल वगैरह के लिए आनेवाले दस सालों में भी अगर कोई जमीन मुंबई में मिल जाए, तो कहना। इस तरह के सारे फायदे तो मुसलमान लोग पहले से ही ले चुके, महावीर के अनुयायियों के लिए बाकी कुछ बचा नहीं है। भूखे नंगों की पूरी बारात जब सारा भोजन करले, तो उसके बाद किसी के खाने के लिए पीछे बचता क्या है, कोई बताएगा ? 

 

                                                                     लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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