मोदी की आक्रामक राजनीति के चलते एनडीए का विस्तार हो रहा है

आसन्न लोक सभा चुनाव में भाजपा कितनी सफल होगी और मोदी की राजनीति कितनी रंग लाएगी इस पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी हो सकती है। लेकिन इतना तो तय है कि मोदी की आक्रामक राजनीति की वजह से मृत प्रायः एनडीए फिर से आकार लेने लगा है। एनडीए का विस्तार हो रहा है और संभावना इस बात की भी की जा सकती है कि आगामी एक सप्ताह में एनडीए के साथ कई दल जुड़ने में अपना सौभाग्य मानेंगे। भाजपा की पूरी राजनीति अभी इसी पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि भाजपा ने अपने दर्जन भर से ज्यादा नेताओं को इसी काम पर लगा रखा है। हम एनडीए के विस्तार पर चर्चा करेंगे लेकिन पहले राजनीति पर एक नजर।

 
सत्ता की राजनीति कितनी प्रबल होती है इसका दिलचस्प नमूना सामने दिखता जा रहा है। आज से कुछ महीने पहले तक जिस मोदी के नाम भाजपा के भीतर और बाहर नाक-भौं सिकोड़ने के दृश्य दिखाई पड़ रहे थे, अब मोदी के साथ जुड़ने के लिए तमाम तरह के जुगाड़ लगाए जा रहे है। ये जुगाड़ की राजनीति भाजपा के भीतर के नेताओं के बीच भी चल रही है और देश की छोटी बड़ी पार्टियों के बीच भी चल रही है। पिछले साल डेढ़ साल के भीतर भाजपा छोड़ निकलने वाले नेताओं को जब अपनी औकात का पता चल गया तो फिर इसी जुगाड़ के दम पर मोदी के सामने नाक रगड़ने के लिए साष्टांग हो गए। बेइज्जती के साथ भाजपा ने उन्हें फिर आत्मसात कर भी लिया। कर्नाटक के येदुरप्पा की राजनीति को आप इसी सांचे में ढाल कर देख सकते है। गोवा में जब भाजपा कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी तो भाजपा के भीतर ही मोदी के विरोध में कई नेता खड़ा हो गए थे। उनके विरोध के स्वर भले ही अलग अलग रहे हों लेकिन राजनीति ये थी कि आडवाणी के रहते मोदी क्यों? आडवाणी ने भी मोदी का अलग-अलग अल्फाजों में कई दफा विरोध किया। लेकिन अब वही विरोधी मोदी के सामने शरणागत है। मोदी के नाम पर नीतीश भाजपा से तो अलग हो गए लेकिन नीतीश की राजनीति कमजोर हो गई। यह बात और है कि नीतीश एक अलग तरह की राजनीति कर रहे है और उनकी राजनीति में कोई खोट भी नहीं है लेकिन नीतीश की पार्टी का क्या हाल हुआ सब जानते है। भाजपा की राजनीति का ही कमाल था कि नीतीश को अपनी पार्टी के 5 से ज्यादा वरिष्ठ नेताओं समेत दर्जनों अन्य नेताओं को अपनी पार्टी से चलता करना पड़ा और वे सभी भाजपा की गोद में जा बैठे। अब एनडीए विस्तार पर एक नजर।

12 साल बाद लोक जनशक्ति पार्टी मुखिया राम विलास पासवान एनडीए में लौट आए है। उनकी वापसी इस मायने में महत्व रखती है कि एनडीए के बारे में यह अशुभ भविष्यवाणी गलत साबित हुई है कि एनडीए का विस्तार नहीं होगा। इससे यह धारणा बनी है कि देश में मोदी की लहर चलने की संभावना नजर आने के बाद राजनीतिक दल उसका फायदा उठाने के लिए एनडीए में शामिल होने की तैयारी करने लगे हैं। यही सिलसिला चलता रहा तो आश्चर्य नहीं यदि एनडीए की संख्या पहले की तरह 22 के आसपास पहुंच जाए। जब नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित हुआ था तब उनके विरोधी लालकृष्ण आडवाणी का यही कहना था कि यदि मोदी को प्रधानमंत्री बनाया गया तो एनडीए टूट जाएगा और हमे कोई नया साथी भी नहीं मिलेगा। इसलिए मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से बचना चाहिए। शुरुआत में हुआ भी यहीं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जेडीयू साथ छोड़ गई। लंबे समय तक भाजपा को एनडीए के लिए नए घटक नहीं मिले लेकिन जैसे जैसे मोदी की हवा तेज होने कई राज्यों में मौसम बदलने लगा। कई राज्यों के दल अब एनडीए के साथ जुड़ना चाहते हैं। रामविलास पासवान से इसकी शुरुआत हो गई है। दूसरे दिन ही तमिलनाडु के द्रमुक के अध्यक्ष करुणानिधि ने एनडीए के साथ जुड़ने की इच्छा जताई। हालांकि राज्य में पहले ही भाजपा का विजयकांत की डीडीएमके और वायको की पार्टी पीएमके के साथ समझौता हो चुका है। कल तक जिस जयललिता ने वाम दलों के साथ गठबंधन कर राजनीति करने का ऐलान किया था वह अब सीट बंटवारे के नाम पर दरक गया हैं । कहा जा सकता है कि जयललिता एनडीए का हिस्सा आज नहीं तो कल हो सकती है। तेलंगना में भाजपा को कई साथी मिलने की संभावना है। उम्मीद की जा रही है कि कम से कम यहां की तीन राजनीतिक पार्टियां एनडीए का हिस्सा बन सकती है।
 
पंजाब में अकाली दल के साथ  भाजपा का पुराना गठबंधन है। हरियाणा में कुलदीप विश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठबंधन है। भाजपा चैटाला की पार्टी इनलोद को इसमें शामिल करके महागठबंधन बनाना चाहते है लेकिन कुलदीप बिश्नोई इसके लिए तैयार नहीं। इसलिए इनलोद चुनाव के बाद एनडीए का हिस्सा बन सकती है और इसकी पूरी रणनीति भी बन गई है। महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा की पुरानी साथी है। पिछले कुछ दिनों से रामदास अठावले की आरपीआई और राजू शेट्टी की स्वाभिमानी शेतकरी संगठना भी गठंबंधन के साथ जुड़ गए हैं। चंद्रबाबू नायडू के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन की कोशिश पहले से ही चल रही है। चुनाव के बाद सीमांध्र में जगन कांग्रेस और तेलंगाना में टीआरएस के साथ गठबंधन संभव है। जम्मू कश्मीर में सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेस कांग्रेस के साथ है मगर विपक्षी पीडीपी की नेता मेहबूबा मुफ्ती ने हाल ही में कहा कि वह उनकी पार्टी दिल्ली में एनडीए के साथ काम करने को तैयार है। लेकिन मुफ्ती की पार्टी का चुनाव से पहले एनडीए के साथ तालमेल की संभावना कम है। केरल में भाजपा ने कई ओबीसी और दलित संगठनों के साथ गठबंधन किया है। चुनाव पूर्व किसी के साथ गठबंधन नहीं है। लेकिन चुनाव के बाद बहुमत में कमी होने पर नवीन पटनायक की बीजू जनता दल का समर्थन लिया जा सकता बिहार में रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाह की आरएलएसपी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन है। भाजपा असम गण परिषद के साथ गठबंधन के लिए उत्सुक है। लेकिन चुनाव के बाद भाजपा ममता बनर्जी के साथ गठबंधन करना चाहेगी। नए गठबंधन के इस दौर में एक नजर बिहार की राजनीति पर भी।
 
बिहार
में लोकसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियों ने करीब-करीब अपने राजनीतिक साथियों की तलाश कर ली है और चुनावी समर में गठबंधन का खम ठोंकना शुरू कर दिया है। इधर, नए गठबंधनों को देखते हुए चुनावी व्यूह रचना करने वाली पार्टियों में राजनीतिक समीकरणों का बदलना तय माना जा रहा है। पिछले चुनाव में बिहार की सतारूढ़ पार्टी जनता दल यू भारतीय जनता पार्टी के साथ चुनावी अखाड़े में उतरी थी, जबकि इस बार के लोकसभा चुनाव में जदयू का भाजपा से अलग होकर भारतीय कम्यूनिस्टा पार्टी के साथ चुनावी मैदान में उतरना तय माना जा रहा है।
 
इधर, भाजपा ने भी अपने नए साथी के रूप में लोकजनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को चुना है। बिहार की राजनीति में अलग पहचान रखने वाले लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल इस बार चुनाव में लोजपा से अलग कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ चुनाव मैदान में उतर रही है। ऐसे में पुराने गठबंधन के टूट को देखते हुए आगामी चुनाव में राजनीतिक समीकरण में बड़ा उलटफेर होना तय माना जा रहा है। राजनीति के जानकार कहते हैं कि लालू की मंशा कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के मतों के बिखराव को रोकने की रही है। ऐसे में जदयू का भाजपा से अलग होकर अल्पसंख्यक मतों को अपनी ओर आकर्षित करने की मंशा राजद-कांग्रेस गठबंधन के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। राजद और कांग्रेस का गठबंधन राज्य में अल्पसंख्यक मतदाताओं की पहली पसंद मानी जाती रही है।
 
आंकड़ों
पर गौर करें, तो राज्य में मुस्लिम आबादी 17 प्रतिशत है और यहां 13 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां मुसलमानों की आबादी 18 से 44 प्रतिशत के बीच है। किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में 69 प्रतिशत के करीब मुस्लिम मतदाता हैं। जानकार बताते हैं कि अल्पसंख्यक मतों का ध्रुवीकरण अगामी लोकसभा चुनाव में हो पाने की संभावना नजर नहीं आ रही। माना जा रहा है कि अल्पसंख्यक मतदाता उसी गठबंधन को मत देंगे जो भाजपा उम्मीदवार को हराने में सक्षम हो। यही स्थिति पिछड़ी जातियों को लेकर है। भाजपा पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए रामविलास पासवान की लोजपा के साथ गठबंधन कर चुकी है। बिहार में पिछड़े मतदाताओं की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का लगभग 11 प्रतिशत है जबकि कुर्मी और कोइरी सात प्रतिशत के करीब है। माना जाता है कि यादव मतदाता लालू के पक्के वोट बैंक हैं। इधर, नीतीश कोइरी-कुर्मी वोटों के सहारे सत्ता में आए जरूर परंतु सता में आने के बाद उन्होंने अति पिछड़ों का कार्ड खेला। इन 50 प्रतिशत पिछड़े मतदताओं में अति पिछड़े 30 से 32 प्रतिशत हैं जबकि शेष 20 प्रतिशत पिछड़ों में यादव, कुर्मी, कोइरी करीब 18 प्रतिशत हैं।
 
पिछले लोकसभा चुनाव में जदयू भाजपा गठबंधन को राज्य के कुल 40 लोकसभा सीट में 32 पर अपना कब्जा जमाया था। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस चुनाव में पूर्वानुमान लगाना कठिन होगा क्योंकि जदयू भाजपा गठंबधन ने पिछले कई वर्षों में मतदाताओं में एक अलग पहचान बनाई थी जो इस बार टूट चुका है, ठीक वहीं हाल लोजपा का भी है। इस बार चुनावी समीकरण गड़बड़ाना तय है परंतु इस चुनाव में ऐसे मतदाता निर्णायक होंगे जो हवा का रुख देखकर मतदान करते हैं। वैसे तो सभी गठबंधन एक दूसरे दलों के मतों में सेंध लगाने की कोशिश करेंगे ही साथ ही वोट बैंक के बिखराव के बाद उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करेंगे। लेकिन इतना तय है कि हवा का रूख को देखते हुए हर दलों में जोड़ तोड़ की राजनीति तेज है और इसका सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को होते दिख रहा है। लेकिन अभी इस बात का अंदाजा कोई नहीं लगा सकता कि पासवान सरीखे जो लोग कल तक मोदी और भाजपा को गाली दे रहे थे मोदी समर्थक बनने के बाद उनकी राजनीति इस चुनाव में क्या होगी?

 

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं। इनसे mukheeya@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

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