मतदाता को डराने-धमकाने की राजनीति और ख़ामोश चुनाव आयोग

जब बात सत्ता पाने की राजनीति को लेकर हो तो उसमें अच्छी नीति की संभावना न के बराबर ही होती है। राजनीति और झूठ का रिश्ता इतना गहरा हो गया है कि सत्ता सुख के लिए जनता को ललचाना, बहकाना, खरीदना, झूठे वादे करना ये सब राजनीति की प्रवृत्ति बन चुकी है, और एसे में जब कोई नेता वोट के लिए मतदाताओं को डराना शुरू कर दे तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। हमारे राजनेताओं का स्तर इतना गिर चुका है कि वें वोट बैंक के लिए किसी भी अमानविय घटना को अंजाम देने के लिए एकदम तैयार बैठे हैं। 9 चरण वाले लोकसभा चुनाव 2014 का दौर जारी है, 6 चरण पूरे हो चुके हैं और तीन चरण अभी भी बाकी हैं और ऐसे में अमित शाह और आजम खान का मुद्दा अभी शांत हुआ नहीं था और आचार संहिता के उल्लंघन की प्रतियोगिता अभी चल ही रही थी कि मतदाताओं को डराने व धमकाने के जो नए मुद्दे सामने आए हैं वो लोकतंत्र के निर्वाचन प्रणाली में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए अशुभ संकेत है।

मतदाताओं को डराने के मामले में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के साथ-साथ सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी शामिल हैं। हाल ही में जारी हुए एक वीडियो में पवार ताजा विवादों में घिर गए हैं वीडियो में पवार ग्रामीणों को धमकी दे रहे हैं कि रांकपा प्रमुख शरद पवार की बेटी और उनकी चचेरी बहन सुप्रिया सूले को वोट नहीं दिया तो वे उस गांव की जलापूर्ति काट देंगे। यह वीडियो समाचार चैनलों पर खुब प्रसारित की जा रही है। बारमती लोक सभा क्षेत्र से आप प्रत्याशी व पूर्व आईपीएस अधिकारी सुरेश खोपड़े ने इस वीडियो का हवाला देते हुए चुनाव आयोग के अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई है कि पवार ने चुनावी सभा के दौरान लोगों को धमकी दी जो आचार संहिता का उल्लंघन है। हालांकि अधिकारी अभी वीडियो के सत्यता की जांच कर रहे हैं जिसके बाद आरोप सुनिश्चीत होने पर वे कार्रवाई करेंगे।

दूसरा मामला राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले उत्तरप्रदेश का है जहां की राजनीतिक गतिविधियों पर पूरे देश की नजर टिकी है। यहां के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बुलंदशहर में सरकारी स्कूल के शिक्षकों को उनकी नौकरी खोने का भय दिखाते हुए कहा कि अगर आप हमें वोट नहीं देंगे तो ये समझ लीजिए कि आपकी नौकरी खतरे में है। जरा सोचिए उस पार्टी के नेता जो वर्तमान में सत्ता पर काबीज है, एक ऐसा व्यक्ति जो उस राज्य मुख्यमंत्री रह चुका है और पार्टी का सर्वे-सर्वा हो, के द्वारा जब खुलेआम निर्वाचन प्रणाली को मज़ाक बनाया जा रहा हो और मतदाताओं के अंदर डर का संचार कराया जा रहा हो तो ऐसे में हम अन्य नेताओं या अन्य पार्टियों से क्या उम्मीद कर सकते हैं।

गौरतलब हो कि पहले भी इसी पार्टी के नेता आजम खान द्वारा विवादीत बयान देने के आरोप में चुनाव आयोग ने खान पर प्रतिबंध भी लगाया है लेकिन फिर भी पार्टी के नीति में कोई खास परिवर्तन नहीं दिख रहा है। एक और मामला भी इसी राज्य के उस लोकसभा क्षेत्र से है जहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खुद मैदान में है और इनके विरोध में आप से कुमार विश्वास खड़े है, संकेत साफ है कि यहां जिक्र अमेठी का हो रहा है जहां अपने भाई को जीताने के लिए प्रियंका गांधी भी डेरा डाले हुई हैं। लेकिन हाल ही में जारी हुआ एक वीडियो राहुल के लिए प्रियंका गांधी द्वारी की गई मेहनत पर पानी फेर सकता है। वीडियो के अनुसार गेस्ट हाऊस में विनोद मिश्रा नाम का एक कांग्रस कायर्कर्ता प्रियंका गांधी से बात करते हुए यह कहता है कि कुमार विश्वास राहुल भईया के खिलाफ बोल रहा है उसे गोली मार दूंगा। इस पूरे मामले का फायदा उठाते हुए कु. विश्वास ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए यह कहा है कि अगर भविष्य में मेरे उपर कोई भी हमला होता है तो उसकी जिम्मेदार कांग्रेस होगी।

अमेठी में इससे किस पार्टी को फायदा होगा और किसको नुकसान ये तो परिणाम आने पर ही पता चलेगा लेकिन सोचने वाली बात ये है कि मतदाताओं पर इन घटनाओं का क्या असर होगा, एक तरफ हमारे मतदान प्रतिशत बढ़ाने की बात कर रहे हैं और वहीं दुसरी तरफ एसी घटनाएं उनके दोहरे चरित्र को उजागर करती है जो निर्वाचन प्रक्रिया के प्रति लोगों में अविश्वास पैदा कर सकता है। आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में अगर लोकतंत्र के नींव को मजबूती प्रदान करने वाला निर्वाचन आयोग की भूमिका पर गौर करें तो इन नेताओं के सामने आयोग भी बौना साबित हो रहा है, आयोग द्वारा थोक में नोटिस भेजी जा रही है लेकिन नेताओं पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। अगर आयोग द्वारा किसी नेता को नोटिस दी जाती है या कोई कार्रवाई की जाती है तो उस नेता से संबंधित पार्टी अपनी नीतियों में सुधार लाने के बजाय उल्टे चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करने लगती है, उदाहरण के लिए आजम खान और अमित साह का मुद्दा ले सकते हैं जिसमें पार्टियों ने भेद-भाव के आरोप लगाते हुए आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए।

इन सारी बातों से यह स्पष्ट है कि भले ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता हो लेकिन यहां कि राजनीतिक पार्टियां और उनके राजनेता आज भी जनता को लोकतंत्र के लोक नहीं बल्की राजतंत्र की प्रजा मान रही है। ऐसी प्रजा जिसे लालच देकर, डरा-धमका कर सत्ता तक पहुंचने का प्रयत्न बदस्तुर जारी है और शायद यही कारण है कि लोगों का मतदान से भरोसा उठता है और अखबारों में हमें मतदान का बहिष्कार या मतदान प्रतिशत कम होने जैसी खबरें पढ़ने और सुनने को मिलती है। अगर वक्त रहते राजनेता और जनता दोनों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में यह जनतंत्र की सेहत के लिए यह ठीक नहीं होगा।

 

लेखक किसलय गौरव से उनके ईमेल kislaygaurav@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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