चुनाव का टाइम है, नेताजी लाख रुपया महीना देंगे तभी छपेंगे

चुनाव के दौरान पेड न्यूज प्रकाशित और प्रसारित करने के मीडिया के रवैये के खिलाफ पिछले 6-7 साल से तूफान मचा हुआ है। 2007 के उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव में इसकी चर्चा शुरू हुई। इस कुरीति से मतदाता व जनवादी तबके तो परेशान नहीं दिखे लेकिन पत्रकार और उनकी महंती का शौक रखने वाले इस क्षेत्र के दिग्गज आपे से बाहर होते गये। पत्रकार संगठनों के सम्मेलनों में बगुला भगतों ने इस मुद्दे पर गला फाड़-फाड़ कर आसमान को जैसे सिर पर उठा लिया। चुनाव आयोग ने इसके बाद न्यूज छापने पर तमाम तरह की पाबंदियां लगा दीं। वैसे तो गंगा अभी भी घोषित रूप से पवित्र नदी है लेकिन कानपुर में इसकी वास्तविकता क्या है सभी जानते हैं। किसी गंदे नाले से ज्यादा गंदगी कानपुर में है, इस बात से सभी परिचित हैं। इसी तरह चुनाव आयोग की पाबंदियों के बाद मीडिया संस्थाओं के संचालकों के बैकफुट पर आ जाने से पत्रकारिता की गंदगी साफ हो जाने जैसे फतवे जारी किये जा रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इस बार लोकसभा चुनाव की दुदंभि बजने के पहले ही पेड न्यूज धड़ल्ले से छपना शुरू हो गयी है।

लखनऊ में इस्पात उपभोक्ता परिषद की बैठक के बहाने उत्तरप्रदेश की राजधानी के पत्रकारों को केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा द्वारा कीमती तोहफे बांटने की खबर अपवाद नहीं है। हालत यह है कि जालौन जैसे छोटे जिलों में आधा दर्जन के करीब पत्रकारों को कुछ पार्टियों के घोषित उम्मीदवारों ने 25 से 50 हजार रुपये महीने अपने जन संपर्क के समाचार छापने के लिये बांध दिये हैं। वैसे यह गत दिसम्बर तक का रेट था। पता चला है कि कतिपय पत्रकारों ने नये वर्ष के पहले दिन इन नेताओं के घर जाकर अल्टीमेटम दे दिया था कि अब चुनाव में महज 3-4 महीने बचे हैं, इसलिए अब वे एक लाख रुपये महीने से कम नहीं लेंगे। इस कारण उम्मीदवार पत्रकारों से अपने ऊपर तरस खाने की गुहार लगा रहे हैं फिर भी वे 75 हजार रुपये महीने पर आ गये हैं जबकि पत्रकार एक लाख रुपये से कम लेने को तैयार नहीं हैं। पता चला है कि आखिर में नेताओं को सरेंडर करना ही पड़ा। नतीजा यह है कि अखबारों के स्थानीय पन्नों पर खबरें गायब हो गयी हैं। नेताजी का थोबड़ा और उनके कालम डेढ़ कालम के बोर प्रवचन छपना शुरू हो गया हैं। अगर विज्ञापन के रूप में अखबार इतना स्पेस बेचता तो हर दिन नेताजी को 10 से 15 हजार रुपये देने पड़ते। एडवरटोरियल का रेट तो कामर्शियल विज्ञापन से कई गुना ज्यादा रखा गया था, इस कारण पूरे अभियान भर में तीन-चार से ज्यादा एडवरटोरियल छपवाने की हिम्मत सामान्य उम्मीदवार में नहीं हो सकती थी। इन दिनों अखबारों से हर रोज प्रत्याशियों की कन्वेसिंग हो रही है। वैसे इतना दैनिक कन्वेसिंग कवरेज महीने भर में 6-7 लाख रुपये का पड़ता। अब मात्र एक लाख रुपये में काम सधा जा रहा है।
 
भारत का चुनाव आयोग त्रेता के भगवानजी से कम नहीं है। उनके राज की चाहे जितनी तारीफ की जाती हो लेकिन सही बात यह है कि उनका राजकाज बड़ा ढीला था। रावण तो काल को पाटी पर बांधकर रखता था। यानि उसके राज में अकाल मौत असंभव थी, जबकि भगवानजी का प्रबंधन स्वास्थ्य एवं चिकित्सा जैसे मूलभूत क्षेत्र में भी इतना लचर हो गया था। इसका अंदाजा तब हुआ जब 12 वर्ष के एक ब्राह्मण बालक की उपचार न हो पाने के कारण हुई मौत के बाद बवंडर खड़ा हो गया। दरअसल भगवानजी भोले थे। उन्होंने अपने मातहतों के भरोसे राजकाज छोड़ दिया था जबकि खुद भेष बदलकर सड़कछाप लोगों की बातें सुनते रहते थे ताकि अंदाजा लगे कि लोग उनके राज के बारे में क्या कह रहे हैं। उनके इस छुईमुई स्वभाव का लोगों ने फायदा उठाया। एक उठाईगीर ने सीता मइया जैसी सच्चरित्रता, अग्नि परीक्षा दे चुकी भगवानजी की पत्नी के बारे में पिनक में कुछ कह दिया और भगवानजी इतने विचलित हो गये कि उन्होंने सीता मइया के गर्भवती होने की भी परवाह नहीं की। उन्हें अपने भाई लक्ष्मण से निर्जन लेकिन खूंखार जानवरों से भरे जंगल में छुड़वा दिया। चुनाव आयोग भी आत्मविश्वास के साथ अपना काम करने की बजाय उठाईगीरों की बातें सुनकर फैसला लेता है।

2007 के चुनाव में एक बहुप्रसारित अखबार का जिला संवाददाता बना। इस बात से परिचित था कि चुनाव के दौरान पैसे लेकर उम्मीदवारों के जनसंपर्क को छापने का रिवाज कई वर्षों से चल रहा है। ऐसे समाचारों में उम्मीदवार के समर्थकों के नामों की भरमार होती है। ऐसी खबर को केवल उम्मीदवार व उसके समर्थक ही पढ़ते हैं जबकि आम पाठक ऐसी खबरों की भरमार हो जाने पर अखबार फेंकने लगते हैं। यह रिवाज बदलने की मैं अपनी तरफ से कोशिश करता तो उम्मीदवारों का जबर्दस्त कोपभाजन बनता। मैं सोच रहा था कि टकराव की नौबत न आये तो ज्यादा अच्छा हो। इस बीच अखबार के प्रबंधन का आदेश आया कि किसी उम्मीदवार के जनसंपर्क की खबर तब तक नहीं छपेगी जब तक वह एडवरटोरियल के रेट पर जितना स्पेस उसकी खबर को मिले उतना पेमेन्ट देने को तैयार नहीं होता। रेट इतने ज्यादा थे कि उम्मीदवारों की घिग्घी बंध गयी। मुझे इस चुनाव में फालतू की न्यूज नहीं छापनी पड़ेगी जिससे मुझे बड़ी तसल्ली हुई। 2007 का उस अखबार में पहला चुनाव था जिसमें खांटी समीक्षायें निर्वाचन क्षेत्र का इतिहास आदि वास्तव में पाठकों के साथ न्याय करने वाली खबरें छापी गयीं। मैंने एडवरटोरियल छपवाने में कोई योगदान नहीं किया इसके लिये प्रबंधन ने मेरे खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं की। दूसरी ओर अखबार की आंतरिक बैठक में प्रबंधन के इस फैसले को अपने लिये मैंने सुकूनदेह क्या बता दिया मेरी बिरादरी ही मुझ पर बिगड़ पड़ी। संपादकीय कक्ष के चंद लोगों को छोड़कर सभी ने मुझसे गहरी नाराजगी जतायी क्योंकि चुनाव में जिला संवाददाता जो कमाई करता था उसके टुकड़े ऊपर तक के लोगों को पहुंचते थे।

चुनाव आयोग की गलती यह है कि उसने बेवजह के मुद्दे पर दिमाग लगाया। पेड न्यूज से लोकतंत्र का कुछ नहीं बिगड़ रहा था क्योंकि ऐसी न्यूजें छपी ही बहुत कम थीं। पेड न्यूज तब खतरनाक हो जाती है जब पैसे लेकर किसी दूसरे का चरित्र हनन करने वाला समाचार, सर्वे में कमजोर को बढ़ा चढ़ाकर और ताकतवर को पिद्दी साबित करने का षड्यन्त्र किया जाये। मैं जिस अखबार में था उसमें एडवरटोरियल के लिये जो मर्यादायें तय की गयी थीं उसमें यह किया जाना संभव ही नहीं था। अंतर केवल इतना है कि पेड न्यूज के खिलाफ तब माहौल बनाया गया जब इसका पैसा मालिकान अपनी जेब में डालने लगे जबकि आज पहले की तरह फिर पत्रकारों की जेब में पैसा जा रहा है तो शांति है। इसी कारण पहले से ज्यादा पेड न्यूज छापने की शुरूआत हो गयी है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मीडिया की साख मालिक से जुड़ी नहीं होती। भले ही मीडिया संस्थान में पत्रकार का दर्जा नौकर का हो लेकिन उसके आचरण से मीडिया की साख नापी जाती है। उसे पैसा मिलता है तो वह मन लगाकर गलत खबरें गढ़ता है। मालिक को पैसा मिलेगा तो उसके दबाव में किसी के पक्ष में पत्रकार द्वारा लिखी गयी खबर में मजा नहीं आ सकता।
 
आज संपादक की कुर्सी पर बैठे लोग बेहतर अग्रलेख लिखने की योग्यता भले ही न रखते हों लेकिन जिलों और तहसीलों के संवाददाताओं से वसूली में उन्हें महारत हासिल है। इसी कारण स्थानीय पत्रकारों की इमेज ट्रैफिक के सिपाही से ज्यादा लुटेरे की बन गयी है। वह बेरोजगारों की, अंधो और लंगड़ों की न्यूज भी पैसा लेकर प्रकाशित व प्रसारित करते हैं। पिछले कुछ सालों में पत्रकारिता में जो अंधा युग आया है वह पहले कभी नहीं था। इस समय ग्लोबलाइजेशन का जमाना है जिसे दूसरे शब्दों में एकरूपता का जमाना कहा जाना चाहिये। इस जमाने में सबके पैर एक जैसे करने के लिये बड़े पैरों की कटाई छंटाई का नारा दे दिया गया है। हर आदमी को अपने जीवन स्तर के उत्थान की दौड़ में शामिल हो जाना चाहिये। यह ग्लोबलाइजेशन की सृष्टि का अनिवार्य नियम है। पर कुछ पेशे ऐसे हैं जहां सुख सुविधा भोगिता का प्रवेश हो जायेगा तो उनकी पहचान ही मिट जायेगी। पत्रकारिता का पेशा भी उसमें एक है। लेकिन मूल रूप से जिनका चरित्र पत्रकार का नहीं है, वे मीडिया में पैठ कर चुके हैं। यह मारीच तो चाहेंगे ही कि उन्हें अफसर और नेता से ज्यादा आरामतलब जिंदगी हासिल हो। भले ही इसके लिये उन्हें पत्रकारिता की पहचान मिटानी पड़े। मीडिया आज छद्म के रूप में अवशेष है जिसमें लहरों से भी पैसा कमा लेने का हुनर रखने वालों की तूती बोल रही है। बहरहाल भले ही घोषित रूप से मीडिया लोकतंत्र का कोई स्तंभ न हो लेकिन लोकतंत्र की प्रक्रियायें संचालित करने में मीडिया की अहम भूमिका है। जिसकी यदि विश्वसनीयता और पहचान मिट गयी और जिसने निष्पक्षता की बजाय बिकाऊ चोला ओढ़ लिया तो लोकतंत्र भी नहीं बचेगा।

 

लेखक केपी सिंह उरई(जालौन) के वरिष्ठ पत्रकार हैं। संपर्क: 09415187850

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