प्रेस क्लब आफ इंडिया उर्फ पीसीआई के चुनाव को लेकर राजनीति चरम पर, वोटिंग 23 मार्च को

प्रेस क्लब के साथियों के नाम एक खुला पत्र… दोस्तों नमस्कार, देश की राजधानी दिल्ली में स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के भीतर इस समय चुनाव की सरगर्मियां चल रही है… जाहिर है प्रेस क्लब के सदस्य साथियों को सत्ताधारी पैनल से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के बारे में कुछ जानकारी मिलनी चाहिए ताकि वे कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार कर सकें। 23 मार्च को वोट करने के लिए आने वाले साथियों के समक्ष क्लब के कुछ शुभचिन्तक दोस्तों की तरफ से ये खुला पत्र प्रस्तुत है। मैं स्पष्ट कर दू कि न तो मै क्लब का सदस्य हूँ न ही कोई चुनावी उम्मीदवार…..

हां लम्बे समय से क्लब में मेरा आना-जाना जरुर है मेरे कुछ साथी जरूर हैं जो क्लब के शुभचिंतक है उनका मुझे क्लब में भरपूर प्यार मिलता है। इसलिए क्लब में चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को नजदीक से जानता हूँ और उनकी खूबियों को भी। हो सकता है लोग इसे विरोधी पैनल का दुष्प्रचार पत्र घोषित करें…..जिसकों जो सोचना है सोचें मेरी बला से। मतदाताओं को समझाने के लिए हम पहले क्लब का प्रशासन चलाने वाले सत्ताधारी पैनल के लोकप्रिय उम्मीदवारों की खूबियाँ बताते है।

शुरू करते है संदीप दीक्षित से, जो अब इस क्लब का दूसरा पुष्पेन्द्र बनने की राह पर है… क्लब कैसे चलेगा, कौन चुनाव लडेगा, क्लब का मेम्बर कौन बनेगा, क्लब में क्या प्रोग्राम होगा, विदेश में क्लब प्रतिनिधि मंडल में कौन पदाधिकारी जाएंगे… सब कुछ यही श्रीमान तय करते हैं। हालाँकि एक बार जनरल सेक्रेट्री रहने के बाद कहने को ये क्लब कार्यकारिणी में किसी पद पर नहीं है। लेकिन चुनाव के दौरान अनिल आनंद के सत्ताधारी पैनल की सारी रणनीति ये साहब ही बना रहे है, इनका पूरा वामपंथी ग्रुप और दक्षिण भारतीय तंत्र सक्रिय हो चुका है, जिसको ये झलक देखनी हो 23 मार्च को क्लब आकर देख लें।

इनके बाद दूसरे शख्स है श्री अनिल आनंद… ये काफी अभिमानी आदमी हैं। क्लब के कर्मचारियों से लेकर काफी सारे सदस्यों में आनंद साहब डिक्टेटर यानि तानाशाह के नाम से लोकप्रिय हैं। इनके पैनल में उन्हीं उम्मीदवारों को चुना गया जिन्होंने वर्ष भर इनकी हां में हां भरी और संदीप दीक्षित को सलाम ठोंका। इन साहब ने मामूली सी और झूठी शिकायतों पर क्लब के कई मेम्बरों को सस्पैंड किया तो अपने खास मेंबरों के खिलाफ सच्ची शिकायतों को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया। इनके पैनल में कई ऐसे साथी पिछली बार थे जिन्होंने क्लब को आगे बढ़ाने में काफी योगदान दिया लेकिन अनिल आनंद का यसमैन नहीं होने के कारण इस बार पैनल में नहीं लिया गया। संदीप दीक्षित के सुझाव पर ऐसे लोगों को पैनल में जरूर शामिल कर लिया जिनका क्लब की गतिविधियों से कोई वास्ता नहीं है। क्लब के कई वरिठ सदस्य इस बार इस पैनल को क्लब से बाहर का रास्ता दिखाने का मन बना चुके हैं। आखिर क्या वजह है कि अनिल आनंद खुद दुसरी बार भी जनरल सेक्रेट्री के पद पर चुनाव लड़ रहे हैं। अगर उनको इस बार पैनल से बाहर करना ही था तो खुद को करते ऐसे पदाधिकारियों को क्यों पैनल से बाहर किया जो काम करते थे। आखिर आनंद साहब के क्लब से जुड़े रहने का राज क्या है। चलो हो सकता है इस इस बार बी क्लब के ऑफिस से ही उनका दफ्तर पिछले साल की तरह चलता रहें। वैसे भी ग्रेटर कश्मीर जैसे जिस अखबार के लिए वे काम कर रहे हैं उसके ऊपर तो भारत विरोधी समाचार पत्र का ठप्पा लगा है। इस समाचार पत्र के दफ्तर पर आईबी की निगाहें वैसे ही लगी रहती हैं। ऐसे में अगर अनिल आनंद चुनाव जीत जाते हैं तो एक साल के लिए सुरक्षित ठिकाना रहेगा।

भैय्या मैने तो सवाल उठाया है बस…..विचार आपको करना है……. क्या करना है, ये आप जानें। श्री आनंद की कठपुतली बनकर उनके पैनल में शामिल कुछ दुसरे लोगो पर भी नजर डाल ले।

अजय अग्रवाल: संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार – एक ऐसा आदमी जिसकी अपनी कोई आवाज नहीं है…. बस हिंदुस्तान मीडिया ग्रुप के वोट और कुछ फोटोग्राफरों के वोट हासिल करने के लिए उनको पैनल में शामिल कर लिया गया क्लब की गतिविधियों से इनका कोई मतलब नहीं है इनके अधिकांश फोटोग्राफर साथी ही इनको नापसंद करते है। लेकिन अनिल आनंद के यसमैन है और सबसे बड़ी बात अनिल जी के किसी अच्छे बुरे फैसले का विरोध नही करेंगे।

जोमी थॉमस: कोषाध्यक्ष उम्मीदवार – पिछली बार ये श्रीमान प्रबंध समिति के लिए चुने गए थे। पूरे कार्यकाल के 15 महीने में कार्यकारिणी की केवल एक बैठक में इन्होने भाग लिया. इनका खुद अपने आप के बारे में कहना है कि उसे वित्त और लेखा का ज्ञान नहीं है। तो ये साहब क्लब का लेखा-जोखा कैसे रख पायेंगे क्या श्री आनंद की महत्वाकांक्षा के लिए और दक्षिण भारतीय सदस्य वोटो को पाने के लिए ही उनको ऐसे महत्त्वपूर्ण पद पर चुनाव लड़ाया जा रहा है।

एक शख्स है विजय शंकर चतुर्वेदी पूरे पैनल में ये भाई साहब सबसे अमीर आदमी माना जाता है। रुपये-पैसे से काफी दमदार है। जब वह क्लब में बैठते हैं तो इनके इर्द-गिर्द मुफ्त का खाने वाली कई मक्खियाँ भिनभिनाती हैं। वैसे विजय शंकर चतुर्वेदी जी के बारे में इन दिनों खुलकर ये चर्चा है कि पिछले दिनों प्रेस क्लब के सदस्यों का ग्रुप जब लाहौर गया था तो खुद लाहौर ले जाने के बदले विजय शंकर जी ने अनिल आनंद के लाहौर में ढेरों बिल चुकता किए। अब इन बातों में कितनी सच्चाई है ये तो अनिल आनंद और विजय भैय्या ही बता पाएंगे लेकिन अपने पैनल में विजय शंकर को शामिल कर अनिल भाई ने इन अफवाहों को हवा जरूर दे दी है। इसी पैनल के एक साथी ने ये भी बताया है कि पूरे पैनल के चुनाव प्रचार का भारी भरकम खर्च भी चतुर्वेदी साहब ही उठा रहे है। इनके लिए ये खर्चा मामूली है। दिल्ली सरकार के कई मंत्री …….. भाई साहब के दोस्त हैं… किसी के नाम का पर्चा फाड़ देंगे, कोई बात नही।

कार्यकारिणी सदस्य के रूप में चुनाव लड़ रही एक मोहतरमा है अन्नपूर्णा झा… इनको महिला प्रेस क्लब से आयात करके इस क्लब में चुनाव लडऩे के लिए लाया गया है जिसका श्रेय जाता है क्लब में नारदमुनि की भूमिका निभाने वाले एक पत्रकार कुशाल जीना को। कुशाल जीना क्लब के सदस्य नहीं हैं… इनको सात साल पहले संजीव आचार्य की कार्यकारिणी के कार्यकाल में क्लब से वित्तीय हेरफेर के आरोप में चित्रिता सान्याल ने बाहर कर दिया गया था। लेकिन जब संदीप दीक्षित का पैनल पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ का हराकर क्लब में काबिज हुआ तो कुशाल जीना की पत्नी नीलम जीना को क्लब का सदस्य बना दिया गया। सदस्य का पति होने के नाते अब फिर से कुशाल जीना की दुकान क्लब में चलने लगी। भले ही वह क्लब के सदस्य न हों मगर अनिल आनंद पैनल की मीटिंग से लेकर उनकी रणनीति का कुशाल महत्वपूर्ण हिस्सा है। उत्तरांचल से जुडे अपने ही सदस्य साथियों की हंसी का पात्र बनने वाले कुशाल जीना को ये अधिकार केवल इसलिए मिला है कि अनिल आनंद के मुखबिर खास की भूमिका अदा करते हैं। दरअसल पत्नी की क्लब में बहाली की कीमत कुशाल इसी तरह चुका रहे हैं। बहरहाल हम बात कर रहे थे अन्नपूर्णा जी की। वे महिला प्रेस क्लब से लेकर पीआईबी की प्रेस कमेटी तक में सक्रिय हैं…. ऐसा कौन लाभ है जिसे लेने के लिए अन्नपूर्णा जी को क्लब का भी चुनाव लड़ाया जा रहा है। अच्छी…सुन्दर…सौम्य महिला है अन्नपूर्णा जी, क्यों हर जगह पांव फंसाकर और किसी की कठपुतली बनकर हंसी उड़वाने पर तुली हैं। खैर उनका जो मन हो सो करें…..जो तीर दूसरे संगठनों में रहकर चलाए हैं, वही तीर जीतने के बाद यहां भी चला लें, हमें क्या….हम तो दर्शक हैं…..जैसा अब से पहले देखते आए हैं, आगे भी देखना पड़ेगा।

अब हम जिनका जिक्र कर रहे है वे बड़े भारी मौका परस्त इंसान है। इनका नाम है अवतार नेगी। पहाड़ से जुड़े कई पत्रकार संगठनों में पदाधिकारी अवतार नेगी प्रेस क्लब की कार्यकारिणी में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है। शायद इसीलिए सभी दोस्त इन्हें मौका परस्त और गिरगिट कहते है। इस बार इनको अनिल आनंद के पैनल से इसलिए बाहर कर दिया गया था कि ये बड़े पद पर चुनाव लडऩे की दावेदारर जता रहे थे। भाई ने गुस्से में दो तीन पदों पर निर्दलीय पर्चा भर दिया। देखा जब कोई मान-मनौव्वल नही हो रही तो आ गए उसी पैनल में कार्यकारिणी सदस्य के उम्मीदवार बनकर। धन्य हो भाई साहब अवतार नेगी जी…..कई साल हो गए क्लब का चुनाव लड़ते अब तो काफी माल कमा लिया हो एक दिन हमें भी पार्टी देना।

कार्यकारिणी के लिए चुनाव लड़ रही एक और सदस्य है अदिति टंडन। क्लब की कार्यकारिणी में पिछली बार भी थी। इनका क्लब में क्या योगदान रहा, कोई नहीं जानता। हां सुन्दर और सौम्य हैं। ये अनिल आनंद और संदीप दीक्षित की यसमैन हैं। जिस फैसले पर साइन कराना हो, आंखे बंद करके बिना विरोध किए साइन कर देती हैं अदिति जी। इस क्लब का दुर्भाग्य है कि हाल ही में क्लब की सदस्य बनीं और उसी साल कार्यकारिणी सदस्य का चुनाव लड़ी अदिति जी भारी भरकम वोटों से जीत गई। दरअसल देश के सबसे बड़े प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का यही दुर्भाग्य है कि यहां ढेर सारे सदस्य बिना सोचे समझे, बिना विवेक का इस्तेमाल किए चुनाव लड़ने वाली खूबसूरत लड़कियों को आंख बंद कर वोट देते हैं।

नई उम्र की एक और मोहतरमा है इनका जिक्र करना भी बेहद जरूरी है। ताजा-ताजा इन्होंने पत्रकारों की जमात में राजनीति करना शुरू किया है। इनका नाम है विनीता यादव। इन्हें भी अनिल आनंद के सलाहकार और कुशाल जीना की पत्नी नीलम जीना महिला प्रेस क्लब से आयात करके यहां लाई है। क्लब की राजनीति का क ख भी ना समझने वाली इस नव यौवना का शायद ये भी नहीं पता कि इतने छोटे से पत्रकारिय जीवन में उसने इतना बड़ा कदम उठाकर अपने कैरियर को कैसी चुनौती दे दी है। इस बाला को तो ये भी पता नही चलेगा कि चुनाव जीतने के बाद उसे कब कौन, मोहरे की तरह इस्तेमाल कर लेगा।

कार्यकारिणी का चुनाव लड़ रहे एक और महोदय का जिक्र करना बेहद जरूरी है जिनका नाम है अमृत मोहन भाषा न्यूज एजेंसी में काम करते है। अपने ही संगठन में दिन-रात क्लब में बैठकर शराब पीने के लिए बदनाम है। संदीप दीक्षित और अनिल आनंद से लेकर उनके इर्द-गिर्द पकड़ रखने वाले सभी लोगों के यसमैन हैं। लंबे समय से पैनल में शामिल होने के लिए लामबंदी कर रहे थे। अमृत मोहन नापते ज्यादा है और सिलते कम है। इसीलिए क्लब में भाई लोगों ने इन्हें गोलीबाज और टोपीबाज के नाम से भी अलंकृत किया हुआ है।

अनिल आनंद भाई साहब ने प्रबंध कार्यकारिणी में इस बार एक और शख्स को दोबारा चुनावा लड़ाया है नाम है संजय सिंह। पिछले कार्यकाल में इन भाई साहब ने कोई ऐसा काम क्लब के लिए नहीं किया जिसे ये अपना बता सकें लेकिन हर अच्छे काम का श्रेय लेने में पीछे नहीं रहते फिर भी अनिल आनंद भाई के यसमैन होने के कारण इनको दोबारा पैनल में शामिल किया गया। लेकिन संजय भाई की चाटुकारी काबिलियत से जलने वाले इनके कुछ नामुराद साथी कहते है कि अनिल भाई ने कह दिया है संजय जीत गए तो ऐसे ही चुप रहना जैसे पिछली बार रहे.. संजय भाई थोडे रूठ कर बोले- का अनिल भैय्या हम पर भरोसा नहीं का अब बहुत हो गया साथियों…..मुद्दे काफी संजीदा है…वो तो मेरे संस्कार है जो मैने केवल इशारों में और हल्के -फुल्के ढंग से उठाए है। मुद्दा तो ये भी है कि पिछली बार इस पैनल में संयुक्त सचिव रही महुआ चटर्जी जी ने सार्वजनिक की गई वार्षिक लेखा रिपोर्ट में अपने हस्ताक्षर क्यों नही किए। उन्होंने दोबारा चुनाव क्या नहीं लड़ाया गया। संतोष ठाकुर, दिनेश शर्मा को अच्छे काम करने के बावजूद क्यूं दोबारा इस पैनल में किसी पद पर चुनाव लडऩे के लिए तैयार नहीं किया गया। मुद्दा ये भी है कि क्या प्रेस क्लब ऑफ इंडिया वामपंथियों का दुसरा अड्डा बनने जा रहा है। क्लब को किसी भी राजनीतिक विचारधारा से दूर रखने वाले लोग अब क्यूं क्लब को कुछ लोगों के भरोसे छोडऩे को मजबूर हो रहे हैं।

आपका ही एक दोस्त
क्लब का सदस्य बनने की कतार में

This is election time at the Press Club of India and a few facts need to be presented before the journalists who would be coming to vote on 23 March. First of all, this email is from neither panel nor even from any candidate contesting elections. The purpose of the mail is to enlighten the voters on their popular candidates this time.

Lets begin with Mr *Anil Anand*. He is probably the most arrogant man in Delhi and obviously disliked by many. Many journalists in the Club have nicknamed him "The Great Dictator" because he actually behaves like a dictator so much so that the candidates in his panel are all personally handpicked by him. They are all his puppets who he will move the way he wants during the next year term.

In the name of encouraging youngsters, he has chosen candidates who do not even know how Press Club or any Club for that matter functions. They are Mr Anand's *yesmen* who will say yes to every decision he takes in the meetings.

*More on Mr Anand's panel of puppets. Lets go one by one:*

*Ajay Aggarwal: Joint Secretary* — a meek guy who has no voice of his own. Even his photographer colleagues have never seen him speak beyond thirty seconds.

*Jomy Thomas: Treasurer* — He was elected to the Managing Committee last year, attended only one meeting in the entire 15-month term. He himself says he has no knowledge of finance and accounting. So this serves the ambitions of Mr Anand.

*Vijay Shankar Chaturvedi* — He is supposed to be the richest man in the Club. Everytime he sits in the Club, he foots a bill of not less than Rs 3000 to 4000. So obviously he is quite popular with the freeloaders of food and liquor. Mr Anand knows his potential as a sponsor and "fund raiser." Interestingly, Mr Anand made a trip to Lahore in October and took Mr Vijay Shankar Chaturvedi alongwith him. And this time when the journalists from Lahore came to Delhi last month, Mr Chaturvedi paid all the bills from his own pocket. Must say he has very "deep pockets.

उपरोक्त बातें फेसबुक पर Pankaj Pasi ने अपने वॉल पर प्रकाशित की हुई हैं.  अगर आप भी प्रेस क्लब आफ इंडिया को लेकर और चुनाव को लेकर कुछ कहना चाहते हैं तो bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

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