प्रसून जी, आशुतोष जी आप पीआरओ बनकर जर्नलिज्म नहीं कर सकते

मेरे लिए केजरीवाल-पुण्य प्रसून प्रकरण तहलका के तरुण तेजपाल से कहीं ज्यादा शॉकिंग रहा है। खोजी पत्रकारिता, प्रगतिशील विचारों के लिए तरुण तेजपाल के लिए हमारे मन में गहरा सम्मान रहा है। अपने पत्रकारिता के विद्यार्थियों को जब 'इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग/ जर्नलिज्म' का अध्याय पढ़ाता था तो तहलका और तरुण की रिपोर्टिंग, सत्साहस-दुस्साहस का उदाहरण देता था। पर, जो अभी तक आरोप है उसके अनुसार ''काम '' के प्रकोप के कारण वे फिसल गए, और हमारे जैसे लोगों के लिए उनकी फिसलन एक घाव की तरह हो गयी। मूल्य, अधिकार, सरोकार की बात करने वाला पत्रकार व्यक्तिगत जीवन में ऐसा हो जायेगा, पता नहीं था।

   
पुण्य प्रसून वाजपेयी की पत्रकारिता को भी मैं काफी पसंद करता हूँ। अपने विद्यार्थियों को अब तक जिन अच्छे पत्रकारों का उदाहरण देता रहा हूँ, उनमें पुण्य भी एक हैं। इसलिए नहीं कि वे एक बड़े एंकर है। टीवी में काम करते हैं। स्टार हैं। बल्कि इसलिए कि उनकी पत्रकारिता में एक स्थाई भाव है, सरोकार और आंदोलन। हाशिये के जीवन के प्रति उनकी पत्रकारिता में गहरा लगाव है। प्रिंट में भी जो वे लिखते हैं उसमें संसद से सड़क तक सरोकार निकल कर आता है। किसानों की आत्महत्या, आदिवासी, नक्सल, राजनीति और समाज पर उनका लेखन काफी प्रभावकारी है।  

अरविन्द केजरीवाल से बातचीत में पुण्य ने कोई बहुत बड़ा पाप नहीं कर दिया है। ऑफ दी रिकॉर्ड बातचीत में कोई पत्रकार आपसी बातचीत करता ही है। याद है जब प्रिंट के लिए हम रिपोर्टिंग, इंटरव्यू करते थे तो सामने वाला साहित्यकार, राजनीतिक, सामजिक कार्यकर्ता आदि कह ही देता था थोड़ा बढ़िया कर के दीजियेगा, मेरे वाले बयान में वह वाला जरूर छापियेगा। और हम, जी ठीक है कहकर खिसक लेते थे। प्रसून भी अपने चैनल के लिए अपने सम्बन्धों के बल पर ही 'अरविन्द एक्सक्लूसिव' जुटा पाते हैं। जाहिर सी बात है एक पत्रकार को अनेकों पत्रकारों की भीड़ में, चैनलों की भीड़ में एक्सक्लूसिव इंटरव्यू आसानी से हासिल नहीं होता है।
 
प्रसून के व्यक्तिगत सम्बन्ध है अरविन्द या किसी और से तो कोई गलत बात नहीं है। लेकिन मैं जब यह वीडिओ प्रसून को 'संदेह का लाभ ' देते हुए देखा और सोचा कि अरे इसमें ऐसा कुछ नहीं तो बरबस मेरे सामने  बीजेपी दफ्तर पर आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन वाले दिन की पत्थरबाजी का दृश्य तैर गया। उस दिन मुझे प्रसून न चाहते हुए भी पक्षधर लग रहे थे। मन नहीं मान रहा था उस दिन भी और आज भी कि वे ''तेज'' चलते हुए "अरविन्द दर्शन'' को आगे बढ़ाने में मदद करेंगे। अगर चैनलों की भीड़ न होती, खबरों के अनेक स्रोत न होते तो जो कुछ चैनल तुरत फैसला दे देते। 10' तक में तो भाजपा नेता रवि शंकर प्रसाद ने कह भी दिया कि वाजपेयी जी आपके प्रति बहुत सम्मान है, आप बड़े पत्रकार हैं, पर एकपक्षीय खबरें देखकर दुखी हुआ। प्रसून उस दौरान गम्भीर थे। एक दर्शक की तरह मुझे लगा कि वे यही सोच रहे हैं कि पकड़ लिए गए हैं वे।

दोस्तों, यह समय किसी को ''परमानेंट'' शाबाशी(साभार- सविनय रवीश कुमार) देने का नहीं है। किसी को महान घोषित करो, उसके अभी तक के काम के लिए। पता नहीं आगे क्या हो। कई ''भगवान ' आज जेल में हैं। कहते हैं कि हर व्यक्ति की विचारधारा होती है, होनी भी चाहिए। सिर्फ इडियट की विचारधारा नहीं होती। प्रसून और आशुतोष को भी किसी को पसंद करने का पूरा- पूरा अधिकार है। पर, वह मीडिया सलाहकार, पीआरओ बनकर जर्नलिज्म नहीं कर सकते। आशुतोष के ' आप'  ज्वाइन करने से पहले का बतौर एंकर-पत्रकार, मैनेजिंग एडिटर उनकी बहसों का कंटेंट एनालिसिस होनी चाहिए।  
''धरती के विकासी द्वन्द क्रम में एक मेरा पक्ष निःसंदेह '' (मुक्तिबोध)

 

लेखक प्रमोद पांडेय युवा पत्रकार हैं। कई अखबारों में कई शहरों में काम कर चुके हैं। इन दिनों दिल्ली में मीडिया में सेवारत हैं। संपर्कः journalism.subhartiuniversity@gmail.com

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