पुण्य प्रसून मुंहफट हो सकता है लेकिन वह सेटिंगबाज नहीं हो सकता

पहले ही साफ कर दूं कि मैं पुण्य प्रसून वाजपेयी को जानता हूं। मैंने उनके साथ नागपुर के लोकमत समाचार में वर्षों काम किया हैं। वे मेरे मित्र हैं, बावजूद इसके मेरी बात- सोमवार सुबह से उन पर यू टयूब पर लोड एक वीडियो क्लिपिंग को लेकर जिस तरह से हमले हो रहे हैं। वह कुछ तो नासमझी है, कुछ साजिश और कुछ टीआरपी की लडाई। मीडिया को नहीं समझने वालों की नासमझी, प्रसून के विरोधियों की साजिश और ज़ी न्यूज की टीआरपी की लड़ाई।

अपन भी मीडिया में हैं। हजारों इंटरव्यू किए हैं, हर इंटरव्यू के बाद नेता लोग कहते हैं देख लीजिएगा ठीक-ठाक आ जाए, वो वाला जो बोले हैं, वह हाईलाइट हो जाए, वो वाला हटा दीजिएगा। इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। हम भी जी, हां करते हैं। यह सामान्य व्यावहारिकता है। पत्रकारिता की पढ़ाई में भी शिक्षक बताते हैं- सोर्स बनाए रखने के लिए कभी-कभी सोर्स की बात मान लेनी चाहिए। साजिश इसलिए की यह क्लिप यू टयूब पर किसने डाला। वे ही न जो वाजपेयी की साख व प्रतिभा से जलन रखते हैं। टीआरपी की लडाई इसलिए कि सोमवार की रात ज़ी न्यूज के संपादक व एंकर सुधीर चैधरी इसी टयूब पर आधा धंटा बोलते-बतियाते रहे।

जी न्यूज टीआरपी में आजतक, एबीपी न्यूज, इंडिया टीवी और इंडिया न्यूज के बाद पांचवें नंबर पर हैं। उन्हें मौका मिल गया टीआरपी बढाने का। ये वही सुधीर चैधरी हैं, जो नवीन जिंदल की कंपनी के अधिकारियों से न्यूज दबाने के एवज में सौ करोड़ विज्ञापन के रूप में मांगने के आरोप में जेल जा चुके हैं। और इसी पुण्य प्रसून ने इसी बात पर जी न्यूज को टाटा बोल दिया था। सो, श्री चैधरी को प्रसून से व्यक्तिगत खुन्नस तो है ही। कम से कम श्री चैधरी को नैतिकता, ईमानदारी पर प्रवचन नहीं देना चाहिए। इसे ही कहते हैं खिसियायल बिल्ली खंभा नोचे। और बिहार में कहते हैं- 'चलनी दूसलन सूप के जेकरा अपने बहत्तर गो छेद’ और हां, कल रात मैंने प्रसून से पूछा- ये क्या हो रहा है! प्रसून ने हमेशा  की तरह हंसते हुए कहा- अरे बंधु, जिसकी साख होगी, उसी पर हमले होंगे न, और मैं कहता हूं- प्रसून की साख थी, है और बनी रहेगी।

मजदूर नेता शंकरगुहा नियोगी की हत्या के बाद जिन्होंने प्रसून की रिपोर्टिंग देखी है, वे जानते हैं कि वे कैसे पत्रकार हैं। नागपुर में निको कारखाने में मजदूरों पर गोली चालाने में मजदूरों की मौत पर जिन्होंने प्रसून की खबरें पढी हों, विदर्भ के आदिवासियों को नक्सली बताकर जेल भेजने की धटनाओं पर जिन्होंने प्रसून की रपट, किताब पढ़ी हो, वे जानते हैं कि प्रसून किस माटी का बना है। नागपुर में भरी धूप में प्रसून को पैदल टहलते जिसने देखा हो, वही जान सकते हैं कि वह है क्या। प्रसून वाजपेयी मुंहफट हो सकता है, आपको बुरा लगे या भला, वह अपनी बात कह देगा, लेकिन वह सेटिंगबाज नहीं हो सकता। ज्यादा बोलेंगे, तो प्रसून कह देंगे- हमरा घंटा से! और शायद इस विवाद के बाद भी वे बोले होंगे- हमरा घंटा से!!

 

लेखक संतोष मानव वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारो में संपादक रह चुके हैं। 

 

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