पत्रकारिता के नीरा राडिया काल में ‘निष्पक्षता’

नत्थी पत्रकारिता के खतरे  

न्यूज चैनल– ‘आज तक’ के एंकर-पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल के बीच ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर न्यूज मीडिया और चैनलों पर सुर्ख़ियों में है। अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ भाजपा नेताओं से लेकर कुछ न्यूज चैनल तक एंकर-पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी पर पत्रकारिता की नैतिकता (एथिक्स) और मर्यादा लांघने का आरोप लगा रहे हैं। इस ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत में वाजपेयी की केजरीवाल से अति-निकटता और सलाहकार जैसी भूमिका को निशाना बनाते हुए उनकी निष्पक्षता पर ऊँगली उठाई जा रही है।

आरोप लगाया जा रहा है कि वाजपेयी आम आदमी पार्टी की ओर झुके हुए हैं और चैनल के अंदर आप के प्रतिनिधि/प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वाजपेयी भी आशुतोष जैसे कई पत्रकार-संपादकों की तरह हैं जो चैनल/अखबार में आम आदमी पार्टी के पक्ष में काम कर रहे हैं, खबरों के साथ तोड़-मरोड़ कर रहे हैं और पार्टी के अनुकूल जनमत बनाने के अभियान में शामिल हैं।

इस कारण केजरीवाल के साथ उनका इंटरव्यू ‘फिक्सड’ और पी-आर किस्म का है जिसका मकसद केजरीवाल की सकारात्मक छवि गढ़ना है और जिसमें शहीद भगत सिंह तक को इस्तेमाल किया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या वाजपेयी और केजरीवाल की ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत सिर्फ एक स्वाभाविक सौजन्यता/औपचारिकता या हद से हद तक एक तरह का बड़बोलापन है या फिर इसे पत्रकारीय निष्पक्षता और स्वतंत्रता के साथ समझौता माना जाए?

हालाँकि पत्रकारिता के नीरा राडिया और पेड न्यूज काल में पुण्य प्रसून और केजरीवाल की बातचीत काफी शाकाहारी लगती है लेकिन इसमें पत्रकारिता की नैतिकता, मानदंडों और प्रोफेशनलिज्म के लिहाज से असहज और बेचैन करनेवाले कई पहलू हैं। इस बातचीत में वाजपेयी किसी स्वतंत्र पत्रकार और नेता के बीच बरती जानेवाली अनिवार्य दूरी को लांघते हुए दिखाई पड़ते हैं। दूसरे, पत्रकारिता और पी-आर में फर्क है और पत्रकार का काम किसी भी नेता (चाहे वह कितना भी लोकप्रिय और सर्वगुणसंपन्न हो) की अनुकूल ‘छवि’ गढ़ना नहीं बल्कि उसकी सच्चाई को सामने लाना है।

असल में, किसी भी पत्रकारीय साक्षात्कार में पत्रकार-एंकर अपने दर्शकों का प्रतिनिधि होता है और इस नाते उससे अपेक्षा होती है कि वह साक्षात्कारदाता से वे सभी सवाल पूछेगा जो उसके दर्शकों को मौका मिलता तो उससे पूछते। याद रहे कि कोई भी पत्रकारीय इंटरव्यू पत्रकार और साक्षात्कारदाता खासकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय या पद पर बैठे नेता के बीच की निजी बातचीत नहीं है। सच यह है कि जब कोई नेता अपने को इंटरव्यू के लिए पेश करता है तो इसके जरिये वह लोगों के बीच यह सन्देश देने की कोशिश करता है कि वह अपने विचारों/क्रियाकलापों में पूरी तरह पारदर्शी है, कुछ भी छुपाना नहीं चाहता है और हर तरह के सार्वजनिक सवाल-जवाब और जांच-पड़ताल के लिए तैयार है।

ऐसे में, पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह उस नेता से कड़े से कड़े और मुश्किल सवाल पूछे ताकि उसके विचारों/क्रियाकलापों से लेकर उसकी कथनी-करनी के बीच के फर्क और अंतर्विरोधों को उजागर किया जा सके। क्या पुण्य प्रसून वाजपेयी, केजरीवाल से इंटरव्यू करते हुए इस कसौटी पर खरे उतरते हैं? इसका फैसला दर्शकों पर छोड़ते हुए भी जो बात खलती है, वह यह है कि ‘आफ द रिकार्ड’ बातचीत में केजरीवाल कार्पोरेट्स और प्राइवेट सेक्टर के बारे में बात करने से बचने की दुहाई देते नजर आते हैं क्योंकि इससे मध्यवर्ग नाराज हो जाएगा।
 
लेकिन
क्या यह वही अंतर्विरोध नहीं है जिसे इंटरव्यू में उजागर किया जाना चाहिए? यही नहीं, यह और भी ज्यादा चिंता की बात है कि वाजपेयी जैसा जनपक्षधर पत्रकार केजरीवाल को अपनी ‘क्रांतिकारी’ छवि गढ़ने के लिए भगत सिंह के इस्तेमाल का मौका दे।

कहने की जरूरत नहीं है कि यहीं से फिसलन की शुरुआत होती है जब कोई पत्रकार किसी नेता-पार्टी के साथ ‘नत्थी’(एम्बेडेड) दिखने लगता है।

 

वरिष्ठ पत्रकार आनंद प्रधान के ब्लाग 'तीसरा रास्ता' से साभार।
 

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *