आसान नहीं है राघवेन्द्र मुदगल की आवाज़ को खामोश कर देना

 

राघवेन्द्र से मेरा परिचय काफी पुराना था। उनका एक करीबी मित्र संजीव, जो पटना का ही रहने वाला है, मेरे काफी नज़दीक है। एक दिन अचानक उसका फोन आया कि वो और राघवेन्द्र पटना के एक पुलिस थाने में हैं और पुलिस उनपर मुकद्दमा बनाने जा रही है। मैं आनन-फानन में वहां पहुंचा, तो पता लगा कि वहां के एक स्थानीय दबंग ने उनके खिलाफ़ शिक़ायत की है।
 
 
जब डिटेल जानकारी मिली तो हंसी भी आई और गुस्सा भी। दरअसल, राघवेन्द्र सुबह चाय पीने निकले थे और चाय की दुकान पर कुछ स्थानीय लोगों ने उनसे एंकरिंग के डॉयलाग सुनाने की गुज़ारिश की। राघवेन्द्र भी मूड में आ गये उन्होंने न सिर्फ कुछ संवाद सुनाए, बल्कि बिहार में मौज़ूद गुंडा राज पर भी कुछ व्यंग्यात्मक टिप्पणियां कर दी। वहां मौज़ूद कुछ दबंगों को उनकी बात नागवार लगी और उन्होंने राघवेन्द्र को हड़का कर चुप कराने की कोशिश की। राघवेन्द्र भला कहां मानने वाले थे। बजाय चुप बैठने के, वो और जोर देकर अपनी बात कहने लगे। मामला बढ़ा और पुलिस तक पहुंच गया। मैंने किसी तरह उनका झगड़ा निपटवाया तब जाकर उन्हें छुट्टी मिली।
 
जब हम बाहर निकले तो मैंने हंस कर चाय की दुकान पर 'ज्ञान बांटने' की वज़ह पूछी, तो बड़े ही शायराना अंदाज़ में उन्होंने जवाब दिया, "बात जगह की नहीं, तथ्य की थी और अगर मैं उनसे सहमत नहीं हूं, तो चुप नहीं रह सकता।" मैंने तभी महसूस किया कि वो एक बड़े ही दमदार क्राइम रिपोर्टर थे। हालांकि वो दिल्ली में थे और मैं पटना में, इसलिए उनसे कभी-कभार ही मुलाक़ात का मौका नसीब हुआ, लेकिन एक-दो बार की मुलाक़ातों ने मेरे जेहन में उनके बारे में जो राय बनायी वह यह है कि वो अव्वल रिपोर्टर थे क्राइम रिपोर्टिंग की दुनिया के, लेकिन असल में वो मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं के प्रति बेहद संजीदा थे। 
 
इंतकाल के ठीक पंद्रह दिनों पहले उनसे मेरी बात हुई थी। वो बता रहे थे कि कैसे उन्हें किसी ने ऑफिस में माथे पर टीका लगा कर आने पर 'पंडित जी' कह कर टोका और कैसे वे झगड़ कर नौकरी छोड़ आए। मेरा ये मानना था कि वे किसी नौकरी से बंध कर रहने वाले पत्रकार ही नहीं थे। वो बेहद स्वतंत्र विचार के पत्रकार थे और उन्हें मालिकों की गुलामी और संपादकों की बंदिशें बर्दाश्त नहीं थी। वे ब्राह्मण थे और धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं में भरोसा करनेवाले थे लेकिन कोई उन्हें पंडित कह कर बुलाए, ये उन्हें मंजूर नहीं था।  वे हमेशा चाहते थे कि उनके दोस्त मित्र और संपादक उनकी पहचान या फिर उनके बारे में कोई राय उनके माथे के टीके से नहीं बल्कि उनके कामकाज के तरीके और उनके रोजमर्रा के व्यवहार से कायम करें। उन्होंने हमेशा पत्रकारिता की… कभी उस तरह नौकरी नहीं की, जिस तरह की चाकरी आमतौर पर आम पत्रकार करते हैं। 
 
राघवेन्द्र जब बेकारी के दिनों में थे तो पटना के पीटीएन चैनल में मैंने उन्हें काम करने का ऑफर दिया। वे आए, एक अलग ही नज़रिये के साथ। उन्होंने जो प्रोग्राम बनाए वो आज तक याद किए जाते है। मुझे याद है कि कैसे उनके दिनों में बिहार के मंत्रियों और आला अधिकारियों ने उनके कार्यक्रमों के लिए मुझे खासतौर से फोन कर बधाई दी थी। आज बेहद अफसोस होता है एक ऐसे मित्र को खो देने की जिसे शिद्दत के साथ चाहने के बावजूद शायद मैं उसे कभी अपना नहीं बना पाया या फिर उनका खास बनाने में बहुत कामयाब नहीं रहा। फिर भी जब भी उन्हें समय मिलता था, वो मुझे फोन करते थे।
 
फोन पर अक्सर राघवेन्द्र पत्रकारिता के पेंचीदा जीवन और संघर्ष की चर्चा करते थे। वैसे आज कई क्राइम रिपोर्टर पत्रकारिता की दुनिया में अपना नाम रौशन कर रहे हैं, लेकिन मेरा मन है कि राघवेन्द्र हमेशा उनके लिए एक मिसाल बने रहेगें। अपने मूल्यों और नैतिकता के साथ समझौता करके पत्रकारिता करना और अपने मूल्यों और नैतिकता के लिए हमेशा अपने मालिकों और संपादकों से संघर्ष करते हुए राघवेन्द्र की तरह पत्रकारिता करना अलग बात है।
 

मुझे आज भी यक़ीन नहीं होता कि राघवेन्द्र हमारे बीच नहीं हैं। मेरा ये मानना है कि राघवेन्द्र का शरीर बेशक शिथिल पड़ गया है, लेकिन उनकी आवाज़ को खामोश कर पाना नामुमकिन है।
 
(श्रीकांत प्रत्युष एक जाने-माने पत्रकार हैं। वे एक अरसे से ज़ी न्यूज़ के बिहार प्रमुख हैं और पीटीएन चैनल के भी सर्वेसर्वा हैं। ये आलेख उनकी वरिष्ठ पत्रकार धीरज भारद्वाज से बातचीत पर आधारित है।)

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