अनंत श्री ने किया दिवंगत रवीन्द्र शुक्ला के काव्य संग्रह का लोकार्पण

लखनऊ। सोशल मीडिया, ब्लाग व पत्र पत्रिकाओं में लेखन, पत्रकारिता व सामाजिक सरोकारो पर अपनी लेखनी चलाने वाले दिवंगत रवीन्द्र शुक्ला द्वारा रचित काव्य संग्रह ‘दरकती है जिन्दगी‘ का लोकार्पण अनन्त श्री द्वारा स्थानीय जयशंकर प्रसाद सभागार, राय उमानाथ बली प्रेक्षाग्रह कैसरबाग में किया गया। ‘एक शाम काव्य, ध्यान और आध्यात्मिक संवाद अनंत श्री के साथ’ नामक इस कार्यक्रम में अनंत श्री जो कि अनंत पथ के संस्थापक, नयी आध्यात्मिक क्रांति के सूत्रधार हैं, ने उपस्थित श्रोताओं से जीवन और मृत्यु के रहस्यों पर तथा जीवन में प्रसन्नता के स्थान पर चर्चा की तथा सामूहिक ध्यान भी कराया।

                           काव्य संग्रह दरकती है जिन्दगी का लोकार्पण करते अनन्त श्री
इस मौके पर लखनऊ के महापौर डा. दिनेश शर्मा ने रवीन्द्र शुक्ला को करूणा का कवि बताया। उन्होने ने रवीन्द्र शुक्ला के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने काव्य संग्रह की सराहना करते हुए इसे अनूठा प्रयास बताया। कार्यक्रम में रवीन्द्र के काव्य संग्रह की चुनिंदा रचनाओं का पाठ भी हुआ तथा रवीन्द्र के नजदीकी लोगों ने रवीन्द्र के जीवन तथा उनकी रचनाधर्मिता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अनन्त श्री ने कहा कि, रवीन्द्र शुक्ला के काव्य संग्रह का नाम तो अनंत की संभावनाओं की ओर होना चाहिए क्योंकि लेखक ने जीवन के रहस्यों पर इस पुस्तक के माध्यम से पर्दा उठाने का काम किया है। लेखक, जो कवि भी है ने वर्तमान आपाधापी पर अपनी पैनी नजर फेरी है। जनान्दोलनों से लेकर एकात्म तक का सफर उन्होने किया और इस पर अपनी लेखनी चलाई है। रवीन्द्र शुक्ला का आत्म-रूपान्तरण हुआ है उनकी मृत्यु नही हुई है। वे अमर हैं। अध्यात्म और संसार एक ही हैं। संसार में रहते हुए ही सजगता, संवेदनशीलता और करुणा से भरकर जीना ही अध्यात्म है। जीवन और मृत्यु के रहस्यों में उतरना तभी संभव होता है जब हम ध्यान की गहराइयों में उतरते हैं। उन्होनें कहा कि जीवन और मृत्यु एक ही यात्रा के भिन्न पड़ाव हैं। ठीक से वही जी पाता है जिसे मृत्यु का कोई भय नहीं है। जो मृत्यु को जीवन के सहज तथ्य की तरह जानता है। प्रत्येक क्षण में जीवन और मृत्यु की धाराएं बहती हैं। एक सांस बाहर जाती है तो यही मृत्यु की प्रक्रिया है और सांस का भीतर जाना ही जीवन है। दोनों में संतुलन जरुरी है।

श्रोताओं से सीधा संवाद करते हुए अनंत श्री ने जीवन में प्रसन्नता आने को घटना बताया। उन्होने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रसन्नता प्रत्येक व्यक्ति की खोज है। ऐसा कोई भी व्यक्ति नही जो प्रसन्नता नही चाहता। प्रसन्नता धर्म का आधार है। एक धार्मिक व्यक्ति की कसौटी प्रसन्नता ही है। प्रसन्न व्यक्ति ही धार्मिक व्यक्ति है।

कार्यक्रम का संचालन लखनऊ जर्नलिस्टस् एसोसिएशन के अध्यक्ष पत्रकार अरविन्द शुक्ला ने अनंत श्री का परिचय देते हुए कहा कि अनंत श्री एक सम्बुद्ध रहस्यदर्शी हैं जो कृष्ण, बुद्ध, ओशो और जे. कृष्णमूर्ति जैसे सद्गुरूओं की अनन्त धारा में एक खूबसूरत मोड़ की तरह प्रकट हुए हैं। वह धार्मिकता की सुगन्ध से भरे हुए हैं जो किसी भी धर्म से सम्बंधित नही हैं। उनका जीवन दर्शन व संदेश कोई सिद्धांत, मत या वाद नही है। वह तो आत्म रूपान्तरण का विज्ञान हैं। उन्होने महापौर दिनेश शर्मा के प्रति आभार व्यक्त किया। इस कार्यक्रम की सहयोगी उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) थी। उपजा के प्रांतीय अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित एवं महामंत्री रमेश चन्दजैन ने आये हुए अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

इस कार्यक्रम में पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी, सुरेन्द्र दुबे, राजीव चतुर्वेदी, प्रमोद गोस्वामी, वीर विक्रम बहादुर मिश्र, पी.वी. वर्मा, अरविंद विद्रोही, डा. आशीष वशिष्ठ, सुनील त्रिवेदी, प्रदीप उपाध्याय सहित लखनऊ जर्नलिस्टस् एसोसिएशन(एलजेए) के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने तथा रवीन्द्र शुक्ला के परिजनों, गणमान्य अतिथियों एवं बडी संख्या में पत्रकारों ने भाग लिया।

रवीन्द्र शुक्ला का परिचय

रवीन्द्र शुक्ला का जन्म 1 फरवरी 1963 को तथा निधन अल्पअवधि में 24 अगस्त 2012 को हो गया। उनके पिता का नाम स्व. उमेश चन्द्र शुक्ल था, वे अध्यापक थे। बाबा स्व. पंडित श्रीरामचन्द्र शुक्ला एवं स्व. डा. रमाशंकर शुक्ल रसाल हिन्दी बृजभाषा साहित्य के विद्वान थे। माता श्रीमती विभारानी शुक्ला, प्रबन्धक सहाय सिंह बालिका इण्टर कालेज नरही, लखनऊं हैं। बडे भाई श्री अरविन्द शुक्ला ’पत्रकार’, भाभी डॉ. गीता, स्पूतनिक की संपादक हैं।

कृतित्व एवं व्यक्तित्व

रवीन्द्र शुक्ला, का सारा जीवन अपनी ननिहाल लखनऊ में डिप्टी रघुवर दयाल मिश्रा भवन और बाद में सप्रूमार्ग, शुक्ला पैलेस में व्यतीत हुआ। रवीन्द्र ने अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि लखनऊ को ही चुना। वे लोकतन्त्र और अन्ना हजारे के जन आन्दोलन के प्रबल पक्षधर थे। लखनऊ विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. तथा लालबहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट लखनऊ से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। अपना पेशा व्यवसाय चुना। वे शुक्ला बिजनेस प्वांइट के संस्थापक थे। उन्होने रवीन्द्र आर्टस नामक प्रिटिंग प्रेस का भी संचालन किया। रवीन्द्र शुक्ला ने कुछ समय तक वर्तिका कीर्तिमय सार नामक साप्ताहिक का प्रकाशन भी किया था।

बचपन से ही लिखने-पढ़ने का शौक था। कविताओं के साथ-साथ समसामयिक विषयों पर लेखन, इंटरनेट पर वर्तिका अभिव्यक्ति नामक ब्लाग का सृजन एवं निःशेष जीवनपर्यन्त संचालन किया। शान्त स्वभाव, निश्चल प्रेम, परोपकारी सचरित, मृदुभाषी, अपनत्व हास्य विनोदी थे वे। उनकी इच्छा थी कवितायें, लेख अखबारों में छपवायें, किताबें लिखें। अल्पकाल में हम सबों को छोड़कर चले गये। कितना अच्छा होता कि उनका यह कविता संग्रह उनके जीवन काल में आ पाता। उनकी कविताओं को संग्रहित करके एवं उसकी काव्य-पुस्तक छपकर हमारे सम्मुख आ गयी है।

रवीन्द्र शुक्ला  की एक प्रतिनिधि कविता –

अनंन्त आवशकताओं के बीच
इन्ही वीथिकाओं के
जंगल में
चुनता हूं
शान्ति का
मूल
खोजता हूं
सन्तोष का
फूल
किन्तु मेरी चेतना
सोई है
सदा की तरह
मैने अपनी पहचान
फिर खोई है।

 

प्रतुतिः आशीष वशिष्ठ

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