राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ संस्करण की 22वीं सालगिरह पर अतीत की कुछ यादें

आज राष्ट्रीय सहारा लखनऊ संस्करण की 22वीं सालगिरह है. वर्षगांठ का महत्व हर जगह होता है, चाहे यह किसी मनुष्य के जीवन का पहलू हो, या संस्था अथवा संगठन के. इसकी अहमियत तब और बढ़ जाती है जब यह ऐसे व्यक्ति, संगठन या संस्था की ज़िन्दगी से सम्बन्धित हो जिसके प्रारम्भ से ही लोगों को शक़ रहा हो चाहे उसकी कोई भी वज़ह रही हो. लिहाज़ा मैं सबसे पहले अपने उन दर्ज़नों बिरादराना साथियों को भविष्य के लिए अप्रतिम शुभकामनाओं के साथ दिली मुबारक़बाद देना चाहता हूँ जो अब भी राष्ट्रीय सहारा में कार्यरत हैं, फिर वे लखनऊ, दिल्ली (नॉएडा), गोरखपुर, पटना, कानपुर, देहरादून, वाराणसी में, या कहीं – किसी ब्यूरो में ही क्यों न हों. हालांकि इनमें मेरे समकालीन या साथ राष्ट्रीय सहारा ज्वाइन करने वाले बमुश्किल एक-दो मुट्ठी लोग ही बचे हैं.

अपनी तरह के अनूठे और आज के एक बड़े कॉरपोरेट संगठन में शुमार ‘सहारा इण्डिया’ का मीडिया को लेकर बड़ा ‘चार्म’ इसके आरम्भिक दिनों से ही रहा है. ‘80 के दशक में ‘शान-ए-सहारा’ का प्रकाशन शुरू करके सहारा ने बज़रिये उत्तर प्रदेश (के पूर्वाञ्चल) अख़बारी जगत (प्रिण्ट मीडिया का प्रयोग इसलिए की अब इलेक्ट्रॉनिक भी है) में एक ‘क्रान्तिकारी शुरुआत की थी. उस प्रकाशन ने पूर्वाञ्चल में न सिर्फ़ तब के “सद्य:प्रसूत” पत्रकारों को उन्नत आधार दिया बल्कि नामानिगारों से लेकर ख़बरचियों और पत्रकारों की नयी पौध भी तैयार की जिनमें अनेक आज भी जहां-तहां कार्यरत हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो अपने कतिपय दुर्गुणों व कमजोरियों से गुमनामी झेलने को अभिशप्त हैं. इन्हीं में कुछ ‘शान-ए-सहारा’ की असामयिक मृत्यु के ज़िम्मेदार भी रहे हैं. इस घटना ने सहारा के संस्थापक सुब्रतो रॉयजी को काफी गहराई तक मर्माहत किया था. (उसकी चर्चा कभी दूसरे प्रसंग में तफ़सील से करना चाहूँगा.)

बहरहाल, 1991 में सहारा इण्डिया परिवार ने बड़े अरमान से बाकायदा ‘मीडिया संस्थापन’ या कम्पनी ‘सहारा इण्डिया मास कम्युनिकेशन’ (एस.आई.एम.सी.) स्थापित करते हुए ‘राष्ट्रीय सहारा’ के प्रकाशन की शुरुआत दिल्ली से की थी. इसके लिए पहले कमलेश्वरजी को मुखिया बनाया गया, अफ़सोस यह कि, वह योजना को बढ़ाते हुए रात-दिन अनथक परिश्रम के साथ टीम बनाने में जुटे ही थे कि एक अप्रत्याशित घटना से उन्हें अपने कदम सहसा रोक लेने पड़े, उसके बाद उन्होंने दोबारा फिर कभी इस कम्पनी के दफ़तर की तरफ़ मुंह (करके गोया …भी) न करने की कसम खा ली. उसी समय सुनील दूबे, माधवकान्त मिश्र, उपेन्द्र मिश्र, अशोक मिश्र आदि गोचर-अगोचर टोली ने अजन्मे ‘राष्ट्रीय सहारा’ को सेवित करने, पल्लवित करने का बीड़ा उठाया. (यानी आज की भाषा में सुपारी ली.) 15 अगस्त, 1991 को ‘राष्ट्रीय सहारा’ की पूरे आन-बान-शान के साथ नॉएडा ने लॉन्चिंग हुई. दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव के महाप्रबन्धकत्व में सुनीलजी वरिष्ठ सम्पादकीय सलाहकार और माधव कान्त(मिश्र)जी सलाहकार मुकर्रर हुए. ( प्रसंगवश उल्लेख्य है कि सुनीलजी तो अब भी गुलिस्ताँ कॉलोनी, लखनऊ में बची ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं किन्तु माधवकान्तजी ने अपने व्यक्तित्व के अनुरूप आधुनिक ‘आध्यात्मिक पथ’ अपना लिया जो आजकल श्री पञ्चायती अखाड़ा महानिर्वाणी के महामण्डलेश्वर होकर स्वामी मार्तण्डपुरी के नाम से ख्यातिलब्ध हो रहे हैं.)

खैर, करीब सवा दो दशक पहले पत्रकारिता को पुनर्परिभाषित करने (Redifine to Journalism) के ध्येय वाक्य के साथ राष्ट्रीय सहारा अख़बार चल निकला. तब यह मध्य के दो विचार-प्रधान ‘खुला पन्ना’ के साथ 16 समाचारीय पृष्ठों वाला हिन्दी का ऐसा पहला अख़बार था जिसके साथ चिकने कागज़ पर रोज़ाना ‘उमंग’ नाम से चार पृष्ठ का अलग विशिष्ट रंगीन परिशिष्ट और प्रत्येक सप्ताह किसी चर्चित राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मुद्दे पर ‘हस्तक्षेप’ नामक खास परिशिष्ट हुआ करता था (कालान्तर में स्वरूप बदले, बन्द होने और ‘पुनर्अवतार’ के बाद ‘हस्तक्षेप’ अब भी किसी तरह महत्वपूर्ण बना हुआ है, हालांकि ‘उमंग’ अब दैनिक न रहकर ‘साप्ताहिक खिचड़ी’ जैसी हो गयी है.) इन परिशिष्टों, विशेषत: ‘हस्तक्षेप’ की वज़ह से तब यह अख़बार हिन्दी भाषी क्षेत्रों के प्रतियोगी युवा-छात्रों का प्रिय रोज़नामा बन गया था जिसका वे शनिवार को बेसब्री से इन्तिज़ार किया करते थे. इसके अलावा राष्ट्रीय सहारा में हर अहम ख़बर की अपनी तरह से विशिष्ट प्रस्तुति हुआ करती थी. हिन्दी पत्रकारिता में महत्वपूर्ण समाचारों के साथ नियमित ‘वैल्यू एडिशन’ करने वाला भी ‘राष्ट्रीय सहारा’ पहला समाचार पत्र रहा.

यह इसी की अर्जित सफलता का श्रेय था कि इससे ऊर्ज्वसित होते हुए छह महीने में ही 16 फरवरी, 1992 को ‘बड़े साहब’ (सुब्रतो रॉयजी को तब यही सम्बोधन प्रिय था) ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ को लखनऊ में भी रोप दिया. इसके साथ वे सभी विशिष्टताएं जुड़ीं जो नॉएडा से छपने वाले इसके पहले व दिल्ली संस्करण के साथ जन्मी थीं और उन्होंने अन्य समाचार पत्रों के समक्ष ऐसी चुनौती पेश की थी कि उत्तर भारत के सभी बड़े और कालान्तर में छोटे अख़बारों को भी धड़ाधड़ सारे वही चेहरा, चाल, चरित्र और चिन्तन अपनाना पड़ा. नॉएडा से निर्देशित “भारत गुलामी की ओर” जैसे इसके महाअभियान के आज भी अनेक प्रशंसक मिल जाते हैं. यह भी क़ाबिल-ए-गौर है कि ‘भारत गुलामी की ओर’ प्रकाशन अभियान चलाने के लिए राष्ट्रीय सहारा में अलग से एक रिसर्च सेल (नॉएडा) में स्थापित किया गया था. यह भी किसी समाचार पत्र में अपनी तरह का तब तक इकलौता प्रयोग था. बताना वाज़े है कि ‘भारत गुलामी की ओर’ (जिसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ‘गांधी भवन’ तथा डॉ. बनवारी लाल शर्मा के नेतृत्व वाले ‘आज़ादी बचाओ आन्दोलन’ से भी बौद्धिक ऊर्जा प्राप्त होती थी) से तब केन्द्र में पामुलापति व्यंकट नरसिंहराव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इतनी सशंकित हो गयी थी कि 1993 में उसने अपने वित्तमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह (मौज़ूदा प्रधानमंत्री) को सरकारी क्षेत्र के बैंकों की उत्तर क्षेत्रीय बैठक लखनऊ में आयोजित कर अपनी देखरेख में सहारा पर छापे डालने का अवसर बनाने को निर्दिष्ट किया था. यह अलग बात है कि तब भी सहारा इण्डिया परिवार का कोई बाल बांका नहीं हो सका था. कुछ अप्रत्याशित खर्चे ज़ुरूर बढ़ गये जो इस तरह के मामलों से निपटने के लिए आज तमाम कॉरपोरेट समूहों के बज़ट का अहम हिस्सा हुआ करता है. राष्ट्रीय सहारा के जैसा विशाल पुस्तकालय (लाइब्रेरी) तो देश में ‘मलयाला मनोरमा’ और ‘हिन्दू’ और ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ के अलावा शायद ही किसी संस्थान के पास हो, अन्य में बड़ी मुश्किल सन्दर्भ अनुभाग दी होते रहे हैं. जब से दुनिया मुट्ठी में सिम्त कर कथित तौर पर एक ‘क्लिक’ की दूरी पर रह सिमट गयी है, अब उसकी भी अख़बारों में कोई ख़ास उपयोगिता नहीं देखी जाती, फिर तथ्य और आंकड़े भले ही कितने भी ‘घचुआ-घमाल’ क्यों न हों !!

बातें, और भी बहुत सी हैं किन्तु आज मौज़ूं मुद्दे से विषयान्तर होने के ख़तरे से बचते हुए ज़ियादा मुफ़ीद उस पीड़ा का ज़िक्र है जो 19 साल, 9 महीने से भी ज़ियादा समय तक ख़ुद के भी राष्ट्रीय सहारा से जुड़े रहने और इसके साथ सहारा की बनती अनेक बुनियादों की ईंट-दर-ईंट का साक्षी होने के नाते मुझे सालती है और मेरे ख़याल से यह स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष विचार वाले किसी भी बिरादर (पत्रकार) में होनी चाहिए कि उसे जब भी अपने दिहाड़ी के उपक्रम (Hand to Mouth) से मुक्ति या फ़ुर्सत मिले, अपनी ज़मात के लोगों के बारे में भी फ़िक्र-ए-दरपेश हो ताकि इंसानियत ज़िन्दा रहे. इसकी रोशनी में मेरी चिन्ता ‘राष्ट्रीय सहारा’ की आज की हालत को लेकर है जिसकी वज़ह कम से कम मुझे आर्थिक नहीं, बल्कि मालिकानों की बेपनाही, नज़रअन्दाज़ियत और कुप्रबन्धन लागे है. इसके कारण राष्ट्रीय सहारा के सभी सात संस्करणों की कुल प्रकाशित होने वाली प्रतियों की तादाद आज उतनी भी नहीं रह गयी है जितनी कि 1992 में अयोध्या की 6 दिसम्बर की घटना के बाद सिर्फ़ लखनऊ में हो गयी थीं- 1,15,000 (एक लाख, पन्द्रह हज़ार) से भी ऊपर. यह हालत कई महीनों तक बनी रही, राष्ट्रीय सहारा मुसलमान भाइयों का सबसे पसन्दीदा अख़बार बन गया था. (कमोवेश लखनऊ में जिनके सहारे ही आज भी यह किसी तरह ज़िन्दा है.) इसकी बड़ी वजह वह ऐतिहासिक और तब के हालात में बड़ी हिम्मत और हिकमत वाला शीर्षक था- “बाबरी मस्ज़िद बचायी नहीं जा सकी. इसे सुब्रतो रॉयजी ने ख़ुद खड़े होकर पेस्ट करवाया था, यह कहते हुए कि “सुनीलजी ! ‘हैडिंग’ तो यही जाएगी.” दरअसल सुनीलजी, उपेन्द्रजी, तबके प्रमुख संवाददाता रणविजयजी आदि अपने-अपने तर्कों के साथ इस शीर्षक को न लगाने पर अड़ गये थे. बाबू विजय प्रताप सिंहजी जनरल डेस्क के इंचार्ज हुआ करते थे, वे इसके ही पक्ष में थे. इण्ट्रो समेत प्रकाशित स्टोरी के एक बड़े भाग का पुनर्लेखन ‘राज्य (उत्तर प्रदेश) डेस्क’ पर होने के नाते मैंने किया था जो तब जनरल शिफ्ट के तहत कार्य करती थी. शायद उल्लेख की आवश्यकता नहीं कि शीर्षक मेरे दिमाग में कौंधा था और आगे बढ़ा. इसने मुसलमानों को इतना अपील किया कि 7 दिसम्बर को अंक की कई हज़ार प्रतियां पुनर्मुद्रित करनी पड़ीं, जिन्हें भयानक कर्फ्यू के बीच ख़ास युक्ति से वितरित किया गया.” अपनी तहज़ीब व नज़ाकत और नफ़ासत के लिए मशहूर नवाबों के शहर में तब कुछ महीनों बाद आज के सर्वाधिक प्रसारित अख़बार (दैनिक जागरण) को भी अपने पहले पेज पर ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) की प्रकाशित रिपोर्ट के हवाले से खुद को दूसरे स्थान पर दिखाने पर मजबूर होना पड़ा था. उस वक़त समय-असमय के वर्तमान नियमित-अनियमित क़िस्म के भारतीय पाठक सर्वेक्षण (आई.आर.एस.) की रिपोर्ट के बजाय ए.बी.सी. रिपोर्ट का प्रामाणिक चलन और मान्यता थी.

बहरहाल, आज जब बहुत सारे बड़े और मानी तौर पर छोटे अख़बारों के भी तक़रीबन सारे पन्ने रंगीन और हफ़्ते के ज़ियादातर दिनों में उनके 20-24 से 44-48 तक पेज और घेलैया में ख़ास पत्रिकाएं छपती, प्रकाशित होतीं और वितरित होती हैं, राष्ट्रीय सहारा के 16 पन्ने भी रंगीन नहीं दिखते हैं. अनेक बड़े अख़बारों में ‘करिअर’ से लेकर कॉमर्स और मनोरञ्जन से अध्यात्म तक सभी के अलग परिशिष्ट अथवा प्रभावी और आकर्षक विशिष्ट-पृष्ठ प्रकाशित होते हैं, राष्ट्रीय सहारा केवल समाचारों-विचारों के ‘जूठन का वाहक’ बन कर रह गया है. अनेक अख़बारों तथा संस्थापनों में भी कई बार अयोग्य और नाक़ाबिल लोग विभिन्न कारणों से होते हैं लेकिन उन्हें अहम ज़िम्मेदारियों और काम की जगहों पर नहीं बिठाया जाता. ‘राष्ट्रीय सहारा’ में अब भी अनेक क़ाबिल लोग हैं किन्तु पहले तो उन्हें निर्णायक क्रियान्वयन का ज़िम्मा नहीं है और सर्वाधिक दु:खद यह है कि उन्हें हांकने वालों में कतिपय अपवादों को छोड़ दें तो ज़ियादातर ऐसे हैं जिनके सम्यक सम्बोधन के लिए अब तक के ज्ञात व प्रचलित सभी विशेषण छोटे पड़ जाएंगे, बेमानी हो जाएंगे. इसकी वजह से लखनऊ हो या इसका कोई भी संस्करण, सब जगह हालत एक सी है. किसी संस्करण का कुल ज़मीनी (हक़ीक़त का) प्रसार उसकी अपनी सालगिरह के अंकों से बराबरी को तरस रहा है. नतीज़तन मुझे राष्ट्रीय सहारा का वर्तमान (अस्तित्व) खतरे में है. कहने की ज़ुरूरत नहीं कि वर्तमान किसी के भी भविष्य का ‘आधार’ होता है, चाहे वह इंसान हो या संस्थान.

मैं क्या हूँ, मेरी अपनी स्थिति क्या है यह महत्वपूर्ण नहीं, क्योंकि यह एक व्यक्ति-विशेष का मुआमला है. कोई संस्था, संगठन और संस्थापन व्यक्ति-विशेष से बहुत अलग होता है. किसी ख़ास आदमी की स्थिति या सूरत का ताआल्लुक़ जहां उसकी अपनी, या ज़ियादा से ज़ियादा उसके घर-परिवार तक होता है, वहीं संस्थापन या संगठन का बहुधा प्रत्यक्ष व परोक्ष तौर पर अनगिनत परिवारों, असंख्य सरोकारों से. फिर सहारा तो देश में अनेक विशिष्टताओं वाला अकेला संगठन आज भी है. मसलन इकलौता ऐसा (मीडिया ही नहीं) संस्थापन जहां ज्वाइन करने के दिन से प्रत्येक कार्मिक को अपनी पहचान (आई.डी.) मिल जाती है. कतिपय तकनीकी कारण से खड़े होने वाले अपवादों को छोड़ दें तो अमूमन सभी कार्मिकों को महीने के अन्तिम कार्य दिवस को उनके खाते में तनख्वाह ज़ुरूर मिल जाती है. किसी का नियमितीकरण भले बरसों न हो, लेकिन पहली माहवारी (वेतन) से उसका पी.एफ. कटते हुए खाता बन जाता है. कुछ अपवादों को दरकिनार कर दें तो अपनी उत्पादकता के अनुसार कर्मयोगियों को वेतन भी प्राप्त होता है. हाँ, क़ाबिल और क्षमतावान को उत्पादकता बढ़ाने का प्रभावी अवसर कभी न मिले, ये और बात है !!
सो,,, राष्ट्रीय सहारा के मेरे साथियों, बधाई! कि, आपने आज लखनऊ संस्करण की 22वीं वर्षगांठ मनाई, पर आप सब भी सोचें कि किसमें, और किस तरह हो सकती है आपकी भलाई! अपने पास तो आप सबके लिए महज़ शुभकामनाओं की है मलाई ! बताइएगा, गरचे आपको रास आई?

लेखक डॉ. मत्स्येन्द्र प्रभाकर स्वतंत्र वेब पत्रकार हैं.

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