सुप्रीम कोर्ट को सुब्रत राय पर पहले ही सख्ती दिखानी चाहिए थी

भारत की न्याय व्यवस्था के बारे में मशहूर है कि वह 100 गुनहगारों को छोड़ सकती है किन्तु एक निर्दोष को गुनहगार साबित नहीं करना चाहती। चाहे संजय दत्त मामला हो या राजीव गांधी या फिर सहारा सुप्रीमो सुब्रत राय का। हालांकि सारे मामले अलग है और एक दूसरे से उनकी तुलना नहीं की जानी चाहिए किन्तु न्याय व्यवस्था का मसला है, इसलिए ऐसा आंकलन किया जाना यथोचित लगता है।

तमाम रास्ते अपना कर जनता के धन के दुरूपयोग मामले में अब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने सहारा के विरुद्ध सही रास्ता अख्तियार किया है। ये तो अदालत पहले ही कह चुकी थी कि सुब्रत राय के काम तो जेल जाने लायक है लेकिन जनता का फंसा हुआ पैसा निकलवाने के लिए उनके साथ नरमी बरती जा रही है। जनता के पैसे के दम पर इतरा रहे सुब्रत राय ने अदालत की इस नर्मी का गलत मतलब लगाया और हठधर्मिता पर अड़े रहे। अब जाकर कोर्ट ने सेबी से कह दिया है कि सहारा की सम्पत्तियां बेच कर अगर 20000 करोड़ रूपये में से जो भी धन वसूला जा सकता है उसको वसूल कर जनता को लौटाया जाए।

देखा जाए तो अगर सहारा के विरुद्ध इस तरह की कार्यवाही हो गई तो फिर ऐसी ही गतिविधियों में लगी कम्पनियों की कारगुजारियों पर भी लगाम लग सकती है। ऐसी कंपनियां जो रियल स्टेट से लेकर पशुपालन और कृषि, आलू और मसाले जैसे कितने ही ऊलजुलूल कामों में जनता का पैसा लगवा कर उसे 5-6 साल में दुगुना करके लौटाने का झांसा जनता को देतीं हैं और उसकी गाढ़ी कमाई को हजम करने की जुगत में लगी रहती हैं।

बताते चलें कि जस्टिस केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने सेबी को कहा कि वह निवेशकों के पैसे की वसूली के लिए सहारा की प्रॉपर्टी क्यों नहीं बेच देती। सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को सहारा पर भरोसा नहीं करने की हिदायत देते हुए आदेश को लागू करने का निर्देश दिया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना के मामले में सहारा प्रमुख सुब्रत राय और तीन निदेशकों के खिलाफ समन जारी कर 26 फरवरी को अदालत में पेश होने के आदेश दिया है।

 

लेखक हरिमोहन विश्वकर्मा से vishwakarmaharimohan@gmail.com  के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है।

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