पटना के दलित प्रेमी संताजी और साहित्यकार बंताजी

राजधानी पटना में इन दिनों नए संता और बंता कि खूब धूम है। इनकी धूम "धूम" फिल्म जैसी नहीं बल्कि समाज तोड़क-सी है। संता बड़े हैं, पढ़े-लिखे हैं, दलित हैं। संता एक चेहरा उतारते हैं तो इनके चेहरे पर तुरंत एक नया चेहरा उग आता है–एकदम डरावना, एकदम अबूझ! संता "संत" बनकर ही इनको-उनको गालियाँ देते हैं। गरियाने के सारे कॉपीराइट्स संता ने ले रखे हैं। जब तक आप "संता-बंता" की इस हॅारर फिल्म के बीच में क़ोई अच्छा-सा दृश्य ढ़ूंढ़ें, तब तक मैं संता के जीवन में दलित-प्रेम कितना है, उसका एक प्रसंग सुना दूं। हुआ यूं कि, "पटना प्रगतिशील लेखक संघ" ने एक समाचार जारी किया था। समाचार में हमारे एक दलित कवि मित्र का नाम जाने से रह गया। इस पर संता इस कदर नाराज हुए कि Facebook पर तुरंत यह कहते हुए आंदोलन छेड़ दिया कि "किसी भी दलित का नाम कोई छोड़ेगा तो मैं उसे नहीं छोडूंगा!" बात यहीं खत्म नहीं हुई। जिस साथी ने समाचार जारी किया था, उन्हें धमकी दे डाली कि वे पटना में कहीं आ-जा नहीं सकते। संता के "दलित प्रेम" पर बहुत खुशी हुई थी। मैंने संता से कहा भी, "संताजी, जिस दलित साथी का नाम छोड़ दिए जाने से आप इतना आक्रोश दिखला रहे हैं, उनकी कविताओं का संग्रह आया है, आप कृपया पुस्तक के लोकार्पण करवाने में सहयोग कर दें।" इस बीच, आप पाठकवृंद थोड़ा बादाम "फाँक" लें। मै आपको बतलाता चलूं, संग्रह का लोकार्पण करवाने में संताजी का सहयोग आज तक नहीं मिला है। बस गरियाने तक ही था संताजी का दलित प्रेम!

अब पाठकवृंद बंता की कथा का जायका लें। बंता संता से छोटे हैं। संता की तरह पढ़े-लिखे नहीं हैं। "पैरवी-पैगाम" की सीढ़ी लगा कर साहित्य-जगत की छत पर चढ़ने की कोशिश में लगे रहते हैं। बंता की विशेषता यही है कि बंता दस-बीस पंक्तियाँ शुद्ध तक नहीं लिख पाते, परन्तु बंता चर्चित युवा समीक्षक हैं, चर्चित युवा आलोचक हैं, चर्चित युवा कवि हैं। बंता चर्चित दलित चिंतक भी हैं। हालांकि बंता दलित नहीं हैं। उर्दू के बड़े शायर शीन काफ़ निज़ाम ने पटना के एक कार्यक्रम में कहा था, "ग़ज़ल सुनने की चीज़ है और नज्म़ पढ़ने की।" परंतु बंता न सुनने की चीज थे, न पढ़ने की! तब भी बंता साहित्य में "बनते" फिर रहे थे। बंता आपसे पैसे लेकर आपका शोधकार्य लिख दे सकते थे, किताबें छपवा दे सकते थे। मित्रो, बंता किसी निपुण शिकारी की तरह राजधानी में निकलते थे। बंता का शिकार वे होते थे जिनकी जेबें भरी होती थीं! बंता पैसों के लिए कुछ भी कर सकते थे। बंता ने पैसों के लिए ही शादी की। पैसों के लिए ही पत्नी को घर से बेघर किया। अब चर्चा है कि बंता ने पैसों के लिए दूसरी शादी कर ली है।

मित्रों, नए संता और नए बंता की कथा काफी दीर्घ है। "मंत्र गृह" में संता इन दिनों अपने एक चेहरे पर कई चेहरे लगाकर "संत" बनने का कोई नया नाटक रचने में लगे हैं तो बंता इन दिनों कई स्त्रियों को "भोगकर" पत्रिकाओं के स्त्री-विशेषांक का संपादन करने मे लगे हैं। इन दोनों को मेरा साधुवाद! आप पाठकवृंद भी इन "साधु-प्रवृत्ति" के संता और बंता को कुछ देना चाहें तो दे ही डालें!

शहंशाह आलम, पटना।
मो. 9835417537

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