सुब्रत राय ने नौकरी छीनी तो श्रमिक जगत ने हमें सिर-माथे पर लिया

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग पांच)

लखनऊ के श्रमिक आंदोलन का ऐसा जोश अब स्वप्न से परे है

राजकुमार केसवानी ने की थी भोपाल औद्योगिक नर-संहार की भविष्यवाणी

लखनऊ: आज के पत्रकारों को यह अहसास करने का मौका तक नहीं मिला होगा कि इस देश में कोई भीषणतम औद्योगिक नर-संहार भी हो चुका है। जी हां, हम यूनियन कार्बाइड हादसे की बात कर रहे हैं जिसकी भोपाल वाली कीटनाशक दवा बनाने वाली यूनिट में एमआईसी(मिक) यानी मिथाइल आइसो सायनाइड की टंकी रिसने लगी और इस हादसे में करीब चालीस हजार लोगों की मौत हो गयी। इतना ही नहीं, करीब सवा पांच लाख लोगों पर स्थाई तौर विकलांगता का प्रभाव पड़ा।

 
यह हादसा 3 दिसम्बर-84 की रात तब हुआ जब पूरा भोपाल समेत पूरा देश गहरी नींद की आगोश में था। इस हादसे की गम्भीरता का पता तो दो दिन बाद तब पता चला जब सरकारी ऐलान हुआ कि हादसे की रात ही 2259 लोगों ने दम तोड़ दिया था। हैरत की बात तो यह रही थी कि न तो फैक्ट्री प्रबंधन को और न ही सरकार को यह पता तक नहीं था कि यहां गैस रिसाव का इलाज क्या होना चाहिए। करीब चार दिन तक भोपाल श्मशान में तब्दील होता रहा था। उसके बाद ही पता चला कि इस गैस टंकी के रिसाव पर अगर पानी का छिड़काव कर दिया जाए तो उसे थामा जा सकता है। नतीजा, हेलीकॉप्टर से पूरी फैक्ट्री परिसर पर पानी का छिड़काव किया गया।

इसके एक हफ्ते बाद मध्य प्रदेश सरकार ने दावा किया कि इस हादसे में कुल 3787 व्यक्तियों की मृत्यु गैस के रिसाव के परिणामस्वरूप हुई थी। लेकिन गैर सरकारी अनुमानों के अनुसार आठ से दस हजार लोगों की मौत गैस रिसाव के 72 घंटे के भीतर हो गई थी, और लगभग 25,000 व्यक्ति गैस से संबंधित बीमारियों से मर चुके हैं। 40,000 से अधिक स्थायी रूप से विकलांग, अंधे और अन्य गैस व्याधियों से ग्रसित हुए थे, सब मिला कर 5,21.000 लोग गैस से प्रभावित हुए। इस हादसे ने पूरे विश्व को दहला दिया था।

दरअसल यूनियन कार्बाइड की जमीनी हकीकत को पहली बार एक पत्रकार ने खुलासा किया था जिसका नाम था राजकुमार केसवानी ने। वह जनसत्ता का भोपाल रिपोर्टर था। पहले पन्ने के पांच कॉलम बॉटम में छपी इस खबर में राजकुमार केसवानी ने लिखा था कि यहां कभी भी हो सकता है श्रमिकों का नरसंहार, जिसका कारण बनेगी यहां बनने वाली दवा की गैस-टंकी। इस खबर ने देश भर के श्रमिकों का ध्यान आकर्षित किया और फिर तो बवण्डर ही खड़ा हो गया। और फिर अचानक जैसे ही यह हादसा हुआ, श्रमिक जगत में हंगामा खड़ा हो गया। देश में ओद्योगिक असुरक्षा के माहौल के खिलाफ श्रमिकों का गुस्सा स्वाभाविक भी था।

यूनियन कार्बाइड की एक यूनिट लखनऊ में भी थी, मगर यहां जीप नामक टॉर्च और बैटरी बनती थी। यहां भी हजारों कर्मचारी थे और आंदोलन चरम पर था। और भोपाल काण्ड के बाद तो यहां मानो आग ही लगा दी थी। वैसे भी, अक्सर यहां बवाल होता रहता था। गेट मीटिंग्स नियमित होती रहती थी। धरना दिन-रात चलता था। अक्सर भूख-हड़ताल भी चलती थी। दरअसल, यह गढ़ था कर्मचारी असंतोष और उसके खिलाफ उमड़े श्रमिक आंदोलन का।

जैसा कि मैंने कहा, कि यह श्रमिक आंदोलनों का दौर था। हालांकि इसके पहले भी ट्रेड यूनियनों की सक्रियता खूब थी। जहां भी शोषण और अन्याय होता था, यह यूनियनें अपना झण्डा लेकर खड़ी हो जाती थीं। चाहे वह दवा उद्योग रहा हो या फिर फैक्ट्री या बैंक, रेल या प्रिंटिंग उद्योग। बाजार और दूकानों पर भी आंदोलन की आंच थी। श्रमिक आंदोलन के बड़े नेता यहीं जुटते थे। मसलन उमाशंकर मिश्र और उनके सहयोगी शिवगोपाल मिश्र जो आज देश की रेल श्रमिकों द्वारा निर्वाचित प्रमुख हैं और उनका दर्जा केंद्रीय मंत्री का है। बैंक-‍कर्मियों के नेता राकेश का गजब जलवा हुआ करता था। नाटककारों में आत्मजीत हम लोगों के आदर्श थे। क्या् ऐशबाग इं‍डस्ट्रियल एरिया था या फिर नादरगंज, इस्माइलगंज, अमौसी या फिर अपट्रान अथवा मोहन डिस्टलरी का क्षेत्र। यह वह दौर था जहां जिजीविषा हुआ करती थी, दलाली की गुंजाइश नहीं। एक आवाज पर सारे कर्मचारी जुट जाते थे।

28 मई-85 से हम तीनों लोग तो बर्खास्तशुदा हो चुके थे। सो, मैंने और श्याम अंकुरम ने अपना डेरा-डंगर श्रमिक आंदोलन में लगा दिया। ज्यादातर वक्त यूनियन कार्बाइड के गेट पर ही बीतने लगा। श्याम अंकुरम तो अपना ज्यादातर वक्त किताबें पढ़ने में लगाता था, बाकी वक्त् में वह नारकीय, असह्य और भीषण बदबू रिलीज करने में जुटा रहता था। मैं क्रांतिकारी गीतों और नुक्कड़-नाटकों में जुट गया। वहां के प्रमुख श्रमिक नेता थे गंगाप्रसाद जी, विद्युत सिंह जैसे करिश्माई लोग। उनके प्रेम-स्नेह की गंगा, जल्दी ही हम लोगों पर जमकर बरसने लगी। कुछ ही समय भीतर हम लोग लखनऊ के श्रमिक आंदोलन के अपरिहार्य अंग बन गये। हर गेट मीटिंग पर हमारी टोली जुटती थी। नाटक के बाद हम लोग अपनी चादर गेट के सामने बिछा देते थे जिस पर लोगबाग अपनी सामर्थ्य भर पैसा डाल देते थे। लेकिन हम लोगों ने शान-ए-सहारा प्रेस की ड्योढ़ी नहीं छोड़ी थी। सुबह-शाम हम लोग यहां जुटते थे। नियम से।
 
शहर की सारी फैक्ट्रियों के मजदूरों से मिलना-जुलना शुरू हुआ तो बदले में वहां के मजदूर भी हमारे गेट पर जुटने लगे। सारे कम्पोजीटर्स तो हमारे साथ थे ही। हमारे आंदोलन ने इन लोगों का हौसला बढ़ाया था। वैसे भी, वे बेचारे अगर जाते भी तो कहां। उधर हम लोग जब नुक्कड़ नाटकों के बाद जो पैसा जुटाते थे, उससे रोटी-चोखा-भुर्ता हमारे ही प्रेस के गेट पर बनता था। पूरी रात यहीं से संचालित होती थी। देर रात तक चकल्लस और क्रांतिकारी गीतों और नाटकों का रिहर्सल हुआ करता था। शाम उतरते ही हमारा प्रेस मजदूरों का किला बन जाता था। चूंकि हम लोग पूरी तरह शांतिपूर्वक रहते थे, इसलिए पीएसी वालों ने प्रेस बंद होने बाद हम लोगों को मैदान और उसका शौचालय आदि इस्तेमाल करने की इजाजत भी दे रखी थी। सुबह नौ बजे तक हम लोगों को यह परिसर खाली करना होता था। पीएसी की ओर से पूरी सख्ती बरती जा रही थी कि कोई भी साथी मजदूर प्रेस की ओर न जाए।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

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