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सुख-दुख...

28 मई 1985 को सुब्रत राय ने मुझे बर्खास्त कर दिया, मजदूर हितैषी तडि़त कुमार दादा ने जारी कराया आदेश

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग चार)

पारिवारिक संस्था व सर्वहारा की डींग मारते पाखण्डी बुर्जुआ लोग

लखनऊ: अखबार को शुरू हुए दो साल शुरू हो चुके थे। कर्मचारियों में खुसफुसाहट शुरू हो गयी थी कि वेतन बढ़ना चाहिए। सम्पादकीय लोगों में भी चर्चा पकड़ रही थी। कि अचानक अप्रैल-85 को ऐलान हुआ कि सभी कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ गयी है। दिल धकड़ने लगा था। किसी से भी पूछने लगो तो जवाब ही नहीं मिलता था। जिस जिसी से भी पूछता, तो जवाब मिलता कि लेटर मिलने के बाद ही पता चलेगा। आखिरकार एक दिन लेटर मिल ही गया। हालांकि सबको गोपनीय पत्र से सूचित किया था, लेकिन यह बात छुप कहां होती है। दो-एक दिनों में ही पता चला कि तडित दादा का वेतन साढ़े छह हजार, वर्मा जी का साढे चार हजार, सम्पादकीय लोगों का 12 सौ से ढाई हजार के बीच मिला था। मेरा व श्याम की पदोन्नति हो गयी थी और हम लोगों को कॉपी-होल्डर के बजाय सीधे प्रूफ रीडर बनाते हुए 660 रूपया महीना मिलेगा।

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग चार)

पारिवारिक संस्था व सर्वहारा की डींग मारते पाखण्डी बुर्जुआ लोग

लखनऊ: अखबार को शुरू हुए दो साल शुरू हो चुके थे। कर्मचारियों में खुसफुसाहट शुरू हो गयी थी कि वेतन बढ़ना चाहिए। सम्पादकीय लोगों में भी चर्चा पकड़ रही थी। कि अचानक अप्रैल-85 को ऐलान हुआ कि सभी कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ गयी है। दिल धकड़ने लगा था। किसी से भी पूछने लगो तो जवाब ही नहीं मिलता था। जिस जिसी से भी पूछता, तो जवाब मिलता कि लेटर मिलने के बाद ही पता चलेगा। आखिरकार एक दिन लेटर मिल ही गया। हालांकि सबको गोपनीय पत्र से सूचित किया था, लेकिन यह बात छुप कहां होती है। दो-एक दिनों में ही पता चला कि तडित दादा का वेतन साढ़े छह हजार, वर्मा जी का साढे चार हजार, सम्पादकीय लोगों का 12 सौ से ढाई हजार के बीच मिला था। मेरा व श्याम की पदोन्नति हो गयी थी और हम लोगों को कॉपी-होल्डर के बजाय सीधे प्रूफ रीडर बनाते हुए 660 रूपया महीना मिलेगा।

लेकिन कम्पोजिंग सेक्शन में मातम पसर गया। उनमें से 5 से लेकर 50 रूपया तक की वेतन-वृद्धि दी गयी थी और कई लोग तो ऐसे थे जिन्हें एक कानी-फूटी दमड़ी तक नहीं दी गयी थी। चूंकि हम लोग इसी कम्पोजिंग सेक्शन में बैठते थे, इसलिए उनका रूदन सबसे हम लोगों ने सुना। कम्पोजीटर्स ही हम लोगों के अभिन्न थे, और उनमें बेहिसाब आक्रोश था। तय हुआ कि चूंकि यह बढोत्तरी अपमानजनक है। आपको सच बताऊं कि कम्पोजिंग सेक्शन वाकई अमानवीय माहौल में बैठता था। बाकी दफ्तर मे तो गर्मियों के दिनों कूलर लगे हुए रहते थे और जाड़ों में हीटर। लेकिन कम्पोजिंग सेक्शन एसबेस्टेस शीट से घिरी छत पर सिमटा हुआ करता था। गर्मी के दिनों में तो यहां बेहोश कर देने वाली गर्मी तड़कती थी जबकि सर्दियों में टेम्पेरेचर बाकी दफ्तर के मुकाबले बेहद कम।
 
उस पर तुर्रा यह कि कम्पोजिंग कर्मचारियों की तनख्वाह कुछ इस तरह बढ़ायी गयी थी मानो भीख दी गयी हो। हालांकि मेरा और श्याम का वेतन दो गुना से भी ज्यादा बढ़ चुका था, लेकिन आक्रोश तो हम लोगों में भी था। प्रश्न केवल यही नहीं था कि हम लोगों की तनख्वाह बढ़ी है, बल्कि समस्या यह थी कि हमारे बाकी साथी भूखों मर रहे थे। अरे सौ-सवा सौ में भी कोई आदमी कैसे अपना परिवार का पेट पाल सकता है? मैं मानता हूं कि इनमें कई कम्पोजिटर्स ऐसे थे जो वाकई गधे थे, लेकिन मैं शपथ ले कर कह सकता हूं कि ज्यादातर कम्पोजीटर्स में ज्ञान, कुशलता, और त्वरा इतनी थी कि शायद खुद वर्मा जी और तडित जी में भी न रही होगी। इन लोगों ने कई बार नहीं, सैकड़ों हजारों बार मुझे इन बड़े पत्रकारों की ऐसी-ऐसी कापी दिखायीं जिससे किसी को भी शर्म आ सकती थी, जिनमें इन कम्पोजीटर्स ने हंस करते हुए उन्हें सुधार लिया था। जी हां, यही था इन छोटे लोगों का बड़प्पन। फिर जब ऐसे छोटे-ओछे लोग अगर भूख के लिए तड़प रहे हों, तो कम से कम हम लोग तो चुप नहीं रह सकते थे। इसीलिए हम लोगों ने तय कर लिया इस वेतन बढोत्तरी के खिलाफ हम लोग विरोध दर्ज करेंगे और जब तक वेतन असंगति बनी रहेगी, कम्पोजिंग सेक्शन के हम सारे लोग अपना वेतन नहीं उठायेंगे।

लेकिन यह क्या? आसमान फट गया। वही लोग जो क्यूबा, रूस, चीन आदि देशों के मजदूर आंदोलनों से लेकर चेग्वेरा-माओ-लेनिन-मार्क्स को आदर्श के तौर पर माना करते थे, वे हम लोगों पर तेल-पानी लेकर पिल पड़े। उनकी नयी शब्दावली में सर्वहारा का मतलब अपने श्रमिकों को पूरी तरह हारा-त्रस्त कर देना ही बन गया था। अब उनका सर्वहारा का अर्थ पूरी तरह बदल चुका था। तडित दादा तो किसी सामन्ती जमीन्दार या उनके शब्दों में कहें तो बुर्जुआ की तरह अपने राजा की रक्षा के लिए हर सच-झूठ साबित करने में जुटे थे। कम्पोजीटर्स के आर्तनाद पर हम लोगों ने जो फैसला किया, उसका पता चलते ही तडित दादा रौद्र-रूप पर आ गये। राम-सीता स्वयंवर-लीला के परशुराम की तरह फरसा-नुमा पेन नचाते हुए बोले:- "तुम, तुम लोग? मेरे ही खिलाफ हो और मेरी ही कब्र खोदने पर आमादा हो तो मैं भी अब तुम लोगों को औकात में खड़ा न कर पाया तो मेरा भी नाम तडित कुमार चटर्जी नहीं।"
 
यकीन नहीं आया कि यह तडित दादा की आवाज है, जिन्होंने अपनी बेरोजगारी के दौर में कविता लिखी थी कि:- "मैं कुत्ता नहीं जो वक्त–बेवक्त अपनी पूंछ हिलाता रहूं।" तडित दादा की नाराजगी कर्मचारियों के रवैये पर तो थी ही, साथ ही वे आनन्द स्वरूप वर्मा के रवैये पर ज्यादा खफा थे। वजह यह कि वर्मा जी ने अपना वेतन बहुत कम समझा था। नतीजा, वर्मा जी ने पहले तो हमारे आंदोलन से दूरी बनाये रखी, क्योंकि उन्हें  अपनी वेतन-वृद्धि बहुत कम लग रही थी और वे चाहते थे कि यह बढ़ोत्तरी कम से कम छह हजार तक हो। सम्पादकीय से जुडे कुछ लोगों ने हम लोगों को खुफिया जानकारियां दी थीं। छन कर जो भी खबरें आयीं, उनसे पता चला कि सुब्रत राय से भेंट करके वर्मा जी ने अपने घर के सारे खर्च का बाकायदा एक परचा लिख कर सौंपा था। उनका कहना था कि इतनी कम वेतन में उनका काम नहीं चल पा रहा है। लेकिन सुब्रत राय ने उस परचे की ओर झांका तक नहीं। बोले: "अगर आपको लगता है कि इतने पैसे से आपका काम नहीं चल पायेगा, तो आप कहीं दूसरी जगह पर काम खोज लीजिए।"

अब यह तो पता नहीं चला कि सु्ब्रत राय से और क्या-क्या बातचीत वर्माजी की हुई, लेकिन एक दिन बाद ही वर्मा जी के घर से जाकर सहारा के कुछ लोग पहुंचे और स्कूटर अपने साथ लेकर चले गये। यह अपमान की पराकाष्ठा थी, हम लोगों को भी यह हरकत बहुत बुरी लगी। और अपनी इसी नाराजगी को हम लोगों ने अपने आंदोलन की ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया।
 
कुछ भी हो, दो-चार दिनों के भीतर हम लोगों के साथ ज्यादातर सम्पादकीय सहकर्मी जुड गये। इसी के साथ ही साथ अगली 28 मई-85 को तडित कुमार दादा ने संस्थान के तीन लोगों को बर्खास्त करते हुए करीब छह लोगों को देश के भिन्न-विभिन्न शहरों पर ट्रांसफर करने का आदेश जारी कर दिया। जिन लोगों को बर्खास्त किया गया था उनमें पहले नम्बर पर था, मेरा यानी कुमार सौवीर का नाम, फिर श्याम अंकुरम और तीसरा नाम था एक कम्पोजीटर सुरेंद्र सिंह। हम लोगों को दफ्तर में आने पर मनाही कर दी गयी। लेकिन हम लोग भीतर जाने लगे। हमारा विरोध बढ़ चुका था, हमारे खिलाफ मैनेजमेंट ने सुब्रत राय को क्या-क्या पट्टी सिखाया-समझाया, पता नहीं। लेकिन अगले पखवाड़ा के भीतर ही सुब्रत राय ने प्रेस के गेट पर ही एक पीएसी का तीन टेंट लगवा दिया, जिसमें करीब तीन दर्जन जवान मुस्तैद रहते थे। साफ संदेश था कि सुब्रत राय अब हम मजदूरों का दमन ही करेंगे। इसके लिए उन्हें चाहे कितनी भी कीमत चुकानी पड़े।
 
पीएसी के यह जवान दिन भर प्रेस के प्रांगण में सावधान-विश्राम करते रहते थे। उनकी राइफलें और उनकी संगीनें लगातार चमकती रहती थीं। सहारा के लोग उनके साथ ही गेट पर रहते थे, और उनकी इजाजत के बिना किसी को भी भीतर जाने की इजाजत नहीं मिलने लगी। यानी जंग शुरू हो गयी।

और यह जंग उस सुब्रत राय नामक शख्स ने छेड़ी, जो अपने संस्थान को कर्मचारियों की एक निजी पारिवारिक संस्था के तौर पर पेश करता और प्रचारित करता रहा था। वह सहारा इंडिया को परिवार बताता था और इस परिवार के सारे सदस्य मेरे इसी परिवार के बच्चे हैं और सुब्रत राय इस परिवार का मुखिया है। इसी परिवार के मुखिया ने अपने ही परिवार के विखण्डन का ताना-बाना बुना और तय कर दिया कि इस परिवार के इन तीन सदस्यों का जीवन तबाह कर देगा। और इसके लिए वह पीएससी तैनात कर इन्हींक पारिवारिक सदस्यों को खण्ड-खण्ड कर चूर-मसल देगा।

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520

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