सहारा प्रबंधन ने मुझे दी थी एक लाख की रिश्वत वाली पेशकश

कुमार सौवीरः नंगे अवधूत की डायरी में दर्ज सुनहरे चार बरस (भाग छह)

सहारा इण्डिया के पाप-कुण्ड में केवल ओपी और सुबोध ही निष्पाप दिखे

देर रात तक चकल्लस और क्रांतिकारी गीतों और नाटकों का रिहर्सल

लखनऊ: हमारे अखबार में एक विज्ञापन प्रतिनिधि हुआ करता था केके श्रीवास्तव। थोड़ा घमण्डी, लेकिन कम से कम मुझसे और अचिन्त्य अधिकारी से खुला हुआ था। कारण यह कि जब वह एच-रोड वाले मकान में आया, तब तक हम लोग आफिस बंद होने के बाद खूब मस्तीन किया करते थे। बाथरूम में तो गजबै कार्रवाइयां हुआ करती थीं। अचिन्त्य जब यहां आया तो सबसे पहले मैंने उसे सम्पूर्ण नंगा किया। फिर श्याम अंकुरम का नम्बर आया। एक नया क्लर्क भर्ती हुआ अभय श्रीवास्तव। वह भी गोरखपुर का था। रेल कालोनी में उसके पिता रहते थे। वह भी यहां नंगा हो गया। इसके बाद तो तय यह हुआ कि दफ्तर का काम निबटने के बाद से पूरे परिसर में हम लोग केवल नंगे ही रहते थे। चार के चारों नंगे।

बस इसी बीच एक फिर नया नमूना केके श्रीवास्तव वहां धड़ाम की तरह पहुंच गया। बस फिर क्या  था। उसे भी नंगा कर दिया गया। शुरूआत तो उसे अपने बड़े होने का बड़ा घमण्ड था, लेकिन जब जबरिया नंगा किया गया तो काफी डायल्यूट हो गया। उसके बाद से वह भी हमारी ही तरह नंगा ही रहने लगा। लेकिन कुछ भी इतना होने के बावजूद वह ओहदे के स्तर पर हम लोगों को किसी चपरासी से ज्यादा नहीं समझता था। हां, मेरे प्रति उसका व्यवहार दूसरे अन्य के अपेक्षाकृत ज्यादा घनिष्ठ था।

शान-ए-सहारा का आंदोलन अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचने लगा था। श्रमिक जगत में हम लोगों के नाम के डंके बजने लगे थे। इसी बीच अचानक केके श्रीवास्ताव ने एक दिन मुझे टोका। बोला:- "कहां रहते हो सौवीर। मैं न जाने कब से तुम्हें  खोज रहा हूं। चलो, मेरे एक चाचा जी हैं, तुमसे कुछ जरूरी बात करना चाहते हैं। चलो, अभी चलो।" और बिना पूरी बात किये उसने अपना स्कूटर स्टार्ट किया और फर्राटा का गन्तव्य सीधे अलीगंज के सेक्टर-बी में कोहली पैथॉलॉजी के सामने स्थित एक मकान तक पहुंचा। केके श्रीवास्तव ने इस मकान की घण्टी बजायी। कोई नौकर दरवाजा खोलकर बाहर झांका और केके श्रीवास्तव को देखते हुए दरवाजा पसार कर हम लोगों को पूरे सम्मान के साथ अन्दर ले गया।

रवैये से पता तो चल ही गया कि केके श्रीवास्तव के इन चाचा के यहां उसकी खासी पूछ है। मैंने टेबुल पर पड़ी मैग्जी‍न के पन्ने पलटना शुरू किया कि अचानक केके श्रीवास्तव हड़बड़ा कर खड़ा हो गया। साफ लगा कि घर का मालिक पहुंच गया था। मैं भी उठा लेकिन इस शख्स को देखते ही मैं हैरत में आ गया। केके श्रीवास्तव के यह चाचा कोई और नहीं, साक्षात ओपी श्रीवास्तव ही थे। सहारा इंडिया में सुब्रत राय के बाद के दूसरे नम्बर के निदेशक। हालांकि मेरी समझ में ओपी श्रीवास्तव का व्यवहार हमेशा सुलझे हुए शख्स की ही तरह होता रहा था, इसलिए इस अचानक हुई मुलाकात से कोई खास हड़कम्प मैंने खुद में नहीं समझी। लेकिन एक झिझक तो हो ही गयी। आखिर वह बहुत बड़े ओहदेदार थे और मैं सम्पादकीय विभाग के सबसे छोटे पायदान पर लटका हुआ शख्स। तुर्रा यह कि आजकल मैं बर्खास्तशुदा भी था।

केके श्रीवास्तव ने लपक कर ओपी श्रीवास्तव का चरण-स्पर्श किया और फिर जबरिया मुझे झुकाकर मेरे हाथों को उनके चरणों पर स्पर्श करा दिया। मेरी हल्की भी सही, मगर झिझक को तोड़ा ओपी श्रीवास्तव जी ने। बोले:- "अरे आराम से बैठो, यह मिठाई खाओ। न न, शर्माओ मत। जैसे यह केके श्रीवास्तव मेरा भतीजा है, ठीक उसी तरह मैं भी तुम्हारा चाचा हूं।" और अपनी ही बात पर ओपी श्रीवास्तव जी जोरदार ठहाके लगाने लगे। मैंने भी हंसने की कोशिश की। ऐसे मौकों पर, जब सबसे बड़ा आदमी हंस रहा हो, तो हम जैसे लोगों का न हंसना भी तो अभद्रता हो जाती है ना। बात भले चूतियापन्थी की हो।

अगली बात भी ओपी जी ने ही की। बोले:- "क्या चल रहा है आजकल।" वक्ती तौर पर तो मैं हल्का झिझका था, लेकिन था तो मैं गजब का ही खिलन्दड़, बोला:- "बस, वही आन्दोलन, सहारा इंडिया के खिलाफ ही चल रहा है।" चाचा ने कुछ सोचा, फिर बोले:- "बेटा, मैं तुम को बहुत प्या‍र करता हूं। बहुत सम्मान देता हूं तुम लोगों के हौसलों को। अगर यह गर्मी न हो, तो इंसान कभी भी इंसान न बन पाये। लेकिन जरा यह भी तो समझो कि इससे तुम्हें मिलेगा क्या? केवल परेशानियां और दुश्वारियां ही तो!

चाचा ने अपनी बातें जारी रखीं:- "देखो सौवीर, तुम जवान हो, समझदार हो, मेहनती हो, जोश भी है तुमने, कुछ कर डालने का माद्दा है तुममें। तो फिर उसका इस्तेमाल भी तो करो। चलो, माना कि यह जवानी का जोश तुम पर चढ़ा हुआ है। यह आन्दोलन-फान्दोलन से क्या मिलेगा तुम्हें? इससे रोटी तो नहीं मिल सकती है ना? बताओ ना? खुद भी भूखे रहोगे और अपने साथियों को भी भूखा रखोगे? क्या यही जिन्दगी होगी तुम्हारी? मैं समझता हूं कि अब मैं तुम्हें सही लाइन पर खड़ा कर दूं। मैंने तय किया है कि मैं तुम्हा्रे लिए एक प्रेस खुलवा दूं। न न, पैसे के लिए तुम्हें परेशान नहीं होना पड़ेगा। मैं हूं ना अभी। तुम्हारा चाचा अभी जिन्दा है बेटा, इसीलिए कह रहा हूं कि तुम जाओ और अपना एक नया प्रेस खड़ा करो। दूसरों के भड़काने पर मत चलो। अरे कितना खर्चा लग जाएगा एक प्रेस खड़ा करने में? 70-80 हजार? अरे 90 हजार या इससे भी ज्यादा, बताओ ना? अरे चलो, माना कि इसके लिए एक लाख रूपयों की जरूरत पड़ेगी, तो हो। मैं हूं ना। चाचा के रहते कुछ मत सोचना। मैं दूंगा यह रकम। हां, हां, अपनी जेब से दूंगा। सहारा इंडिया के खाते से नहीं। वहां से तो दे भी नहीं सकता। बड़े साहब ( सुब्रत राय ) इसकी इजाजत ही नहीं देंगे। तुम्हें बताऊं कि वे तुमसे बहुत नाराज हैं। तुम्हारी हरकतों से उनका दिल ही टूट गया है। खैर, उन्हें तो अब पता भी नहीं चलना चाहिए कि मैं यह सब तुम्हारे लिए कर रहा हूं। बिलकुल अपने स्तर पर रखना।"

"और यह मेरी एक सलाह है तुम्हें। सलाह क्या, समझो तुम्हारे चाचा तुम्हें हुक्म दे रहे हैं और अब भतीजे को अपने चाचा का आदेश मानना ही पड़ेगा कि तुम इन हड़तालियों से हट जाओ। बिलकुल हट जाओ। जाओ, अपना भविष्य सम्भालो। और जब भी कभी तुम्हें मेरी जरूरत पड़ेगी, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा। तो आज और अभी से ही यह हड़ताल की बात भी तुम्हारी दिमाग में नहीं आनी चाहिए। हट जाओ इन लोगों से। यह लोग तुम्हारी जिन्दगी खराब कर देंगे। यह लोग तो खुद को भुखमरा करने के लिए पैदा होते हैं, तुम्हें भी भूखा मार कर खत्म कर देंगे। तो, मानोगे ना मेरी बात?"

गजब घेराबंदी हो गयी थी मेरी। समझ में नहीं आया कि तत्काल मैं क्या जवाब दूं? अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए आखिरकार बोल ही दिया:- "जी, जैसा आप कहेंगे, वैसा ही करूंगा।" एक ताजा-ताजा जबरिया बने चाचा-भतीजे के खालिस बलुआ रिश्ते से इतने से ज्यादा रस निकल भी तो नहीं सकता था ना। उस घर से निकलने पर जब ताजा हवा के झोंकों ने मेरे दिल-दिमाग को ठण्डा किया तो यही पहला अहसास हुआ कि:- "इतना ही बहुत है यार। बोलो, है कि नहीं"

 

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं। संपर्क 09415302520
 

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