शशिशेखर इन दिनों पाठक परिवार को उपकृत करने में लगे हैं

दैनिक 'हिन्दुस्तान' के सम्पादकीय पृष्ठ पर पिछले काफी दिनों से अमितांशु पाठक और उनके भाई किंशुक पाठक के लेख नियमित तौर पर चित्र के साथ छप रहे हैं। तमाम जाने-माने लेखकों, पत्रकारों को उनसे ईष्या हो सकती है क्योंकि ये युवा स्तम्भकार हिन्दुस्तान के सभी संस्करणों में प्रमुखता से छपते हैं। अमितांशु पाठक का परिचय स्वतंत्र पत्रकार के रूप में दिया होता है गोया वे जाने-माने पत्रकार रहे हों। जानकार बताते हैं कि वे कुछ समय तक 'नई दुनिया' के लिए वाराणसी से फीचर आदि लिखते थे। वाराणसी में उनके काफी ठाठ रहे हैं। वे बड़ी बड़ी गाड़ियों में चलते और पुलिस-प्रशासन में उनकी हनक भी थी लेकिन कानाफूसी के अनुसार, मायावती के शासनकाल में महत्वपूर्ण पद पर रहे एक पुलिस अधिकारी ने उनके साथ कुछ ऐसा व्यवहार किया कि वे लम्बे समय तक नेपथ्य में चले गए। अब वे इन स्तम्भ के साथ प्रकट हुए हैं।

 
सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी योग्यता है जिसके बूते 'हिन्दुस्तान' जैसे प्रतिष्ठित अखबार में वे और उनके भाई स्तम्भकार के रूप में प्रमुखता से छप रहे हैं। यह योग्यता है वाराणसी के पुराने और पत्रकार राममोहन पाठक के बेटा होने की। बताते चलें कि हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशिशेखर के पुराने मित्र हैं राममोहन पाठक और 'आज' एवं 'अवकाश' के दिनों में दोनो का काफी साथ रहा है तो शशिशेखर न सिर्फ राममोहन पाठक का स्तम्भ छाप रहे हैं बल्कि उनके दोनों बेटों का भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। आखिर शशि जी से बेहतर यह कौन जान सकता है कि योग्यता किसी मतलब की नहीं होती और अन्ततः सम्बन्ध ही काम आते हैं। तमाम योग्य लोगों को दाएं-बाएं कर और अन्ततः नवीन जोशी को भी हाशिए पर लगाकर उन्होंने योग्यता को उसकी औकात बता ही दी है। तो शशि जी इन दिनों अपने पुराने सम्बन्धों का निर्वाह करते हुए पाठक परिवार को उपकृत करने में लगे हैं।

अब अमितांशु के लेखन के कुछ उदाहरण भी देख लें। 'फिर उसी मोड़ पर खड़ी है वाराणसी' (2 अप्रैल 2014) में वह लिखते हैं-'वाराणसी की दिक्कत यह है कि उसे पिछले कुछ समय से स्थानीय सांसद मिले ही नहीं हैं। इसे लेकर यहां कई बार अब और नहीं, बाहरी नहीं का नारा भी बुलंद हुआ है।' लेकिन अगर हम तथ्यों पर जाएं तो पाते हैं कि हाल के मुरली मनोहर जोशी से पहले लम्बे समय तक यहां स्थानीय सांसद रहे हैं। जोशी के पहले कांग्रेस के राजेश मिश्र सांसद थे जो स्थानीय थे । शंकर प्रसाद जायसवाल लगातार तीन चुनावों 1996, 1998, 1999 में विजयी हुए और सांसद बने। राजेश मिश्र ने उन्हें 2004 में हराया था।

संभव है कि 1996 से 2009 में जोशी के जीतने के पहले के स्थानीय सांसदों के करीब 13 वर्षों के कार्यकाल को अमितांशु 'पिछले कुछ समय' के रूप में न देख पाते हों। शंकर प्रसाद से पहले श्रीचन्द्र दीक्षित और अनिल शास्त्री जरूर बाहरी रहे, हालांकि अनिल शास्त्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे हैं, लेकिन उनसे पहले श्यामलाल यादव और कमलापति त्रिपाठी भी स्थानीय रहे। तो काशी की पीड़ा यह नहीं कि उसे स्थानीय सांसद नहीं मिले, विडम्बना यह रही कि स्थानीय सांसदों ने भी अपने नगर की सुध नहीं ली। लगता है कि अमितांशु को पापा ने ठीक से बताया नहीं।

 

(वाराणसी से एक पत्रकार की रिपोर्ट)

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