बुरा न मानो चुनाव है, बदजुबानी जायज़ है

पिछले कई सालों से परंपरा सी बन गई है कि चुनावी राजनीति में एक-दूसरे के खिलाफ बदजुबानी की जाए। कुछ अंदाज होली के माहौल जैसा हो चला है, मानो कहा जा रहा हो कि बुरा न मानो चुनाव है। पिछले दशकों में स्थानीय नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ कठोर टिप्पणियां उछालते दिख जाते थे। लेकिन, बड़े नेता राजनीतिक शालीनता बनाए रखने का शिष्टाचार जरूर निभा लेते थे। लेकिन, अब कई दलों के बड़े नेता भी बेशर्मी से जुबानी जंग पर उतारू हो रहे हैं। ताजा मामला केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा का है। उन्होंने गोंडा की एक चुनावी सभा में एनडीए के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करते वक्त अपना संयम तोड़ दिया।

उन्होंने मोदी पर निशाना साधते हुए कह दिया कि वे संघ के सबसे बड़े गुंडे के रूप में उभरे हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को उन्होंने मोदी का गुलाम करार किया है। इस मौके पर वरिष्ठ नेताओं की शर्मनाक बयानबाजी राजनीतिक वातावरण को जमकर प्रदूषित कर रही है। संघ परिवार के नेता भी बदजुबानी में ज्यादा पीछे नहीं रहे हैं। कई बार इनके नेता भी अभद्र बोल निकालने से बाज नहीं आते। एक-दूसरे के खिलाफ तीखे कटाक्ष करना तो सामान्य राजनीति मानी जाने लगी है। इसके चलते ही कांग्रेस के नेता आम तौर पर मोदी को दंगाई नेता करार करते हैं, तो मोदी कांग्रेस के चुनावी चेहरे राहुल गांधी को ‘शहजादे’ पुकार कर तंज कसने से बाज नहीं आते।

हालात यह हो गए हैं कि यदि किसी प्रतिद्वंद्वी दल के नेता ने कोई सकारात्मक टिप्पणी कर दी, तो वह नेता अपने दल में ही संदेह के घेरे में आ जाता है। ऐसा वाकया भाजपा के महासचिव वरुण गांधी के साथ हो रहा है। वे राहुल के चचेरे भाई हैं। उन्होंने अमेठी के विकास के संदर्भ में राहुल की कुछ तारीफ कर दी, तो भाजपा के तमाम नेताओं को वरुण की राजनीतिक नीयत पर संदेह होने लगा है। क्योंकि, जिस दौर में प्रतिद्वंद्वी पक्ष के लिए गाली-गलौच की भाषा इस्तेमाल की जा रही हो, वहां सकारात्मक टिप्पणी भला, कैसे बर्दाश्त हो सकती है? विडंबना देखिए कि वरुण यदि बड़े भाई राहुल के लिए कोई अमर्यादित जुमला उछालते, तो शायद संघ परिवार में उनकी नीयत पर संदेह नहीं किया जाता।

 

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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