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मीडिया और सोशल मीडिया को सवालों के कटघरे में खड़ा करती है खुर्शीद अनवर की मौत !

टीआरपी की होड़ में पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को दरकिनार कर केवल मसाला खबरें बेचने की जो होड़ समाचार चैनलों में लगी है, वह अब लोगों को अपनी जान देने पर भी मजबूर करने लगी है. इसी का एक उदाहरण है सामजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अनवर की दुर्भाग्यपूर्ण मौत….
टीआरपी की होड़ में पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को दरकिनार कर केवल मसाला खबरें बेचने की जो होड़ समाचार चैनलों में लगी है, वह अब लोगों को अपनी जान देने पर भी मजबूर करने लगी है. इसी का एक उदाहरण है सामजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अनवर की दुर्भाग्यपूर्ण मौत….
टीआरपी की खातिर 16 दिसंबर के माहौल को भुनाने के लिए इण्डिया टीवी ने खुर्शीद अनवर पर लगाए जा रहे कथित बलात्कार के आरोप पर मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया, जिसमें खुर्शीद का जमकर मानमर्दन किया गया. खुर्शीद पर जिस हद तक गिरकर आरोप लगाए जा सकते थे वे लगाये गये. परिणाम ये कि अवसाद में आकर खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली.
आत्महत्या इसलिए कहना पड़ेगा क्यूंकी खुर्शीद ने खुद अपनी जान ली लेकिन सवाल यह है कि महज आरोप लगने पर अपनी जान देने जैसा आत्मघाती कदम क्यूं उठाना पड़ गया खुर्शीद को?  इन गंभीर आरोपों के बाद उन्हें डर अपनी प्रतिष्ठा के धूमिल होने का था या फिर कारण कुछ और ही था? उन्हें अपनी जान देने के लिए मजबूर किसने किया? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो फिलहाल अनुत्तरित हैं.
न तो युवती ने पुलिस के समक्ष बलात्कार का आरोप लगाया था और न ही उसकी कोई मेडिकल जांच हुयी, यहां तक कि अब तक कोई ऐसा सबूत भी सामने नहीं आया था जोकि किसी भी प्रकार से खुर्शीद पर लगाये जा रहे बलात्कार के कथित आरोपों का समर्थन कर पाता किन्तु इसके बावजूद जिस प्रकार से इण्डिया टीवी द्वारा खुर्शीद का मीडिया ट्रायल शुरू कर उनका मानमर्दन किया गया, वह निंदनीय है. 
खुर्शीद के खिलाफ मोर्चा केवल इण्डिया टीवी की ओर से ही नहीं खोला गया बल्कि सोशल मीडिया का इस्तमाल करते हुए उनके मानमर्दन का यह सिलसिला पहले ही शुरू हो चुका हो था, जिसको लेकर ये सुनने में आया था कि अपने मानमर्दन से आहत खुर्शीद ने तीन लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई.अभी खुर्शीद सोशल मीडिया के इस वार से खुद को संभाल नहीं पाये थे कि इसी बीच 16 दिसंबर के माहौल को अपनी टीआरपी बढाने हेतु भुनाने के लिए इण्डिया टीवी के प्रयासों का वह शिकार बन गये और इस बार जो कुछ इनके साथ हुआ शायद उसके बाद उन्हें लगा कि दुनिया उनके लिए ख़त्म हो गयी, वर्षों के अथक प्रयासों से जो मान-सम्मान-प्रतिष्ठा उन्होंने अर्जित की वह सब धूमिल होने लगी और शायद इसी वजह से उन्होंने खुद को इस दुनिया से अलग कर लिया.
किसी व्यक्ति के दोषी होने अथवा न होने का निर्णय करना कानूनी मामला है, पुलिस और अदालत हैं इस काम के लिए. लेकिन इससे पहले कि यह फैसला कानून के अनुसार हो पाये मीडिया और सोशल मीडिया अपनी ओर से एकपक्षीय माहौल तैयार कर अपना फैसला सुना देता है, जोकि चिंताजनक है. दुर्भाग्यपूर्ण है यह सब…. इस प्रकार का गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाने से मीडिया को बचना चाहिये. वैसे इन दिनों न्यूज चैनलों का पूरा जोर केवल मसाला खबरों को बेचने पर ही दिखाई देता है.
पत्रकारिता को कभी मिशन कहा जाता था लेकिन पूंजीपतियों के बढ़ते दखल ने अब इसे पूर्ण व्यवसाय में बदल
दिया है, जनसरोकार कम ही दिखाई देता है यहां आत्महत्या का प्रयास अपराध की श्रेणी में आता है और आत्महत्या के लिये
उकसाना भी अपराध है. खुर्शीद अनवर की मौत ने मीडिया और सोशल मीडिया दोनों को ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है.
 
विनोद भारद्वाज
+91-9837074023
(लेखक विनोद भारद्वाज वरिष्ठ पत्रकार हैं| वे दैनिक जागरण आगरा के
सम्पादकीय प्रभारी/डीएनई एवँ 'ताज प्रेस क्लब' आगरा के अध्यक्ष रह चुके  हैं)
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