एसपी साहब टहल रहे थे तो पत्रकार ने कहा ‘साहब पांय लागी’, इसलिए पिट गया बेचारा

पांय लागी’ शब्द भारतीय दण्ड विधान की किस धारा के तहत जुर्म माना जायेगा? यह सवाल मेरी दाल-भात-तरकारी में कंकर-बालू की तरह पिछले दो महीनों से मुझे लगातार पीड़ा दे रहा है। इसका जवाब तलाशने के लिए सियासी मोहल्लों के संस्कार और नौकरशाही की शाहाना रवायतों पर भरपूर नजर डाली लेकिन वहां भी ‘पांव छुआई’ संस्कृति का सम्मान और दुलार देखने को मिला। रामायण, गीता, महाभारत जैसे महान ग्रंथों से भी पैर छूकर आशीर्वाद लेने की सीख, संस्कार मिले हैं। आज तो हिन्दुओं के अलावा अल्पसंख्यक समुदाय भी पैर छूने से गुरेज नहीं कर रहा। समूची भारतीय संस्कृति का शिष्ट आचरण ही है अपने से बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद लेना। पांव छूना अतिसम्मान का परिचायक है। फिर एक पुलिस अधिकारी ‘पांय लागी’ कहने पर किसी को कैसे पीट सकता है? अपने पुलिसवालों से कैसे पिटवा सकता है? समझ से परे है, लेकिन है सच।

घटना कुछ यूं है, 3 जनवरी, 2014 की सुबह सोनभद्र जिले के पुलिस कप्तान अपने पांच सिपाहियों के साथ रौप प्राथमिक विद्यालय के पास मुख्यमार्ग पर ‘मार्निंग वॉक’ पर थे। उसी रास्ते से विनय कुमार यादव ‘दैनिक जागरण’ हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के संवाददाता/अभिकर्ता अपने समाचार-पत्र को बांटते हुए साइकिल से गुजर रहे थे। पुलिस कप्तान को विनय यादव का साइकिल पर सवार होकर पास से गुजरना नागवार लगा। उन्होंने बाकायदा उसकी खुद पिटाई की, अपने सिपाहियों से पिटवाया फिर भी अहं नहीं संतुष्ट हुआ तो विनय यादव को चुर्क चौकी भेज दिया।

पत्रकार पिटा था। एक अभिकर्ता पिटा था। कई लोग उस दिन का अखबार नहीं पा सके, पढ़ सके। स्वाभाविक है, खोजबीन हुई। चश्मदीदों ने कई अखबारवालों को बताया। पत्रकारों की जमात पुलिस चौकी पहुंची फिर ‘दैनिक जागरण’ के ब्यूरोचीफ सहित कई पत्रकार पुलिस कप्तान से मिले तब कप्तान ने पत्रकारों से कहा, ‘यह एसपी साहब पांय लागी कह रहा था।’ यहां गौर करने लायक है कि पत्रकारों ने घटना का विरोध करने की जगह विनय यादव से एक माफीनामा लिखवाकर पुलिस चौकी से छुड़ा लिया। किस बात का माफीनामा लिखाया गया? जबकि विनय यादव को गम्भीर चोटें पैर व आँख पर आई हैं, ऐसा चिकित्सा प्रमाण पत्र में दर्ज है। यहां गौरतलब है कि विनय विकलांग भी है।

पत्रकार का पिटना, वह भी पुलिस से पिटना कोई अनहोनी नहीं है। पत्रकारों की बाकायदा हत्याएं हो रही हैं। पिछले साल देश भर में आठ पत्रकार मारे गए। पिटनेवालों की संख्या खासी है। पीटने वालों में पुलिस, साधु-संत, राजनेता सभी हैं वह भी जो पत्रकारों की लेखनी के मोहताज रहे हैं। वह भी जो मीडिया की गणेश परिक्रमा के लिए जाने गये। कई बार तो महज सवाल पूछने भर से पत्रकार को जेल की सजा भुगतनी पड़ी, मनहानी के मुकदमें तो आम बात है। अखबारों के मुखालिफ फतवे तो आये दिन दिये जाते हें। सरकारें अपनी आलोचना किये जाने पर बेतरह नाराज होती रहती हैं।

उप्र सरकार मीडिया से गाहे-बगाहे इसलिए नाराज हो जाती है कि वह सैफई पर सवाल उठा देता है, वह मुजफ्फरनगर दंगे पर सवाल उठा देता है, वह माधुरी दीक्षित पर सवाल उठा देता है, वह विधायकों, मंत्रियों के दल की विदेश यात्रा पर सवाल उठा देता है। यही नहीं चुनावी दौर-दौरे में भाजपा के ताजा चेहरे मोदी को अखबार के पन्नों व टीवी के पर्दे पर अधिक तरजीह मिलने पर सत्तादल के मुखिया खफा हो जाते हैं। तो स्वस्थ आलोचना अपराध की श्रेणी में दर्ज की जायेगी? यह सवाल बरसों से जस का तस है। इस बीच देश के जगमगाते शहर मुंबई में फोटो-पत्रकार लड़की के साथ बलात्कार हो जाता है। सुकुमा, छत्तीसगढ़ के पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या कर दी जाती है। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान पत्रकारों से बदसलूकी की जाती है। सुल्तानपुर में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में जिले के कप्तान पत्रकार को पीटने व शिकायती फोटो छीनने की बदतमीजी करते हैं। ऐसी सैकड़ों घटनाएं आये दिन पत्रकारों के साथ घटती हैं। गो कि पत्रकार का सच्चाई से अपना काम करना बेहद कठिन है।

पत्रकार, अखबार और आदमी के बीच उम्मीदों का पुल है और अखबार समस्या, पीड़ा, पर्व और सूचना का वेद है। दोनों के बगैर लोकतंत्र की ताकत कमजोर होगी। खासकर तब और भी जब दुर्योधनी ताकतों के लाखों ‘प्रिंट आउट’ सभ्यता की दीवारों पर चस्पा हों। ऐसे हालातों में पत्रकार पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों से, सच से कैसे मुंह मोड़ सकता है? यह सच है कि अखबारों की बड़ी जमात सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है और उनके पत्रकार सरकारी सुविधाओं के मोहताज। जाहिर है, इन हालातों में सरकार के या नौकरशाही के मुखालिफ लिखना या समीक्षा करना कठिन है। छोटी जगहों पर तो हालात और भी तकलीफ देह हैं, वहां अधिकारी, अपराधी और नेता का स्वाभाविक दबाव होता है। इससे भी बड़ा दबाव नये अखबार मालिकों का होता है जो सिर्फ अपने फायदे के लिए प्रेस को परचून की दुकान में तब्दील करने को बाजिद हैं। इनका साथ देने में तमाम छोटे अखबार और उनके संपादक-प्रकाशक भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। फिर पत्रकारों की बिरादरी भी अपने मालिकों के प्रति वफादारी दिखाने में पीछे नहीं है, तब भला आलोचना या सच की बात करना कितना नैतिक है?

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि सच के नातेदारों और आदमी के पैरोकारों की जमात से समाज का भरोसा उठ गया है, भरोसा आज भी बरकरार है, यदि ऐसा नहीं होता तो यह लाइने लिखते समय क़लम की रौशनाई सूख जाती। फिर उसी सवाल पर आते हैं कि पुलिस कप्तान ने विनय यादव को क्यों मारा? क्या वे किसी तनाव में थे या उनका दिमागी संतुलन कुछ क्षणों के लिए बिगड़ गया था? हिंसा पुलिस महकमें का बड़ा हथियार है या रोग? इसकी जाँच होनी चाहिए। इस पर शोध की आवश्यकता है।
    
सरकार को इस ओर गम्भीरता से सोंचने की जरूरत है। हालांकि मुख्यमंत्री उप्र ने पिछले दिनों खुद कहा है कि पुलिस ही बनाती बिगाड़ती हैं सरकार की छवि। पुलिस अपनी छवि सुधारे। इससे भी बड़ा प्रश्न है कि जिले के पत्रकारों ने महज धरना प्रदर्शन और मोमबत्ती जुलूस के बीच विनय की पीड़ा, अपमान और सुरक्षा को दरकिनार कर दिया? तो क्या यह खुद पर हमला कराने का दावतनामा तैयार कर रहे हैं पत्रकार बन्धु? जो भी हो पुलिस कप्तान के हिंसात्मक आचरण को कतई नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

 

लेखक राम प्रकाश वरमा लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक प्रियंका के सम्पादक हैं। उनसे संपर्क editor.priyanka@gmail.com द्वारा किया जा सकता है।

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