पुलिस अधीक्षक ने कहा ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए मेरा स्टैनो पैसे मांगे तो मुझे बताएं

वर्ष 2012 में पुलिस अधीक्षक, जौनपुर के पद पर श्रीमती मंजिल सैनी ने अपने आशुलिपिक के भ्रष्टाचार से तंग आकर दिनांक 19.12.2012 को जनपद के सभी अधिकारियों/ थाना प्रभारियों को पत्र भेज कर कहा कि 'मेरे संज्ञान में आया है कि मेरे द्वारा जितने भी स्थानान्तरण/ नियुक्ति जनहित में या अन्य कारणों से किया जा रहा है, उसके लिए मेरे आशुलिपिक/ स्टेनो द्वारा अनावश्यक रूप से कर्मचारियों से अनुचित पैसे की मांग की जा रही है, जो कदापि अनुचित है तथा भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। मैं स्पष्ट करना चाहॅूंगी कि यदि किसी कर्मचारियों को इस तरह से प्रताड़ित किया जाता है तो मुझे व्यक्तिगत रूप से अथवा मेरे सीयूजी मोबाइल पर अवगत करायें। भविष्य में इस तरह मेरे स्टेनों द्वारा अनावश्यक रूप से प्रताड़ित किया जाता है तो मुझे तत्काल अवगत कराया जाय। कृपया सम्मेलन करके अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अवगत करा दें।'

 
पुलिस अधीक्षक के आदेश से यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आशुलिपिक द्वारा किस स्तर पर भ्रष्टाचार किया गया, जिसके परिणाम स्वरूप उक्त पत्र निर्गत करने हेतु पुलिस अधीक्षक बाध्य हुई होंगी। इस आशुलिपिक के सम्बन्ध में इस जनपद में एक वर्ष पूर्व से नियुक्त किसी भी अधिकारी/ कर्मचारी से पता किया जा सकता है। उक्त आदेश निर्गत होने के उपरान्त भी आशुलिपिक में कोई सुधार न आने पर माह फरवरी 2013 में उक्त आशुलिपिक को गोपनीय कार्यालय से हटा दिया गया। नवागन्तुक पुलिस अधीक्षक, जौनपुर के आने के तत्काल बाद उक्त आशुलिपिक अपनी जुगाड़ और सिफारिश के दम पर पुनः उसी स्थान पर पहुंच गया। एक इमानदार अधिकारी द्वारा हटाये गये आशुलिपिक को किन कारणों से पुनः पदस्थापित किया गया इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
 
इस के अतिरिक्त स्थानान्तण का एक नमूना है दिनांक 14.02.2014 को जौनपुर के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार 'खाकी को शर्मसार कर जमीन पर पड़ा रहा।' इस समाचार का असर यह रहा कि इस उप-निरीक्षक(बनारसी सिंह यादव) को जनपद जौनपुर की एक महत्वपूर्ण पुलिस चौकी धनियामऊ थाना बक्शा का प्रभारी बना दिया गया। इस चौकी पर निश्चित रूप से एक कर्मठ एवं मेहनती उ.नि. का होना आवश्यक है। इस उ.नि. के चौकी प्रभारी के रूप में नियुक्त किये जाने से यह स्पष्ट पता चलता है कि पुलिस-प्रशासन का अपराध नियंत्रण की ओर ध्यान नहीं है बल्कि कहीं और है।

पुलिस विभाग का प्रथम कर्तव्य होता है कि वह अपराध एवं अपराधियों पर नियंत्रण बनाये रखें। इस कर्तव्य को पूर्ण करने के लिए आवश्यक हो जाता है कि किस अधिकारी/ कर्मचारी को किस स्थान पर नियुक्त किया जाय जहां उसके द्वारा अपने कर्तव्यों के साथ विभाग की छवि को धूमिल न करें, परन्तु इस प्रकार की नियुक्ति से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने अधिकारों का सदुपयोग किया जा रहा है या दुरूपयोग? साथ ही मीडिया द्वारा किसी प्रकरण को उठाये जाने पर किस प्रकार का असर पड़ रहा है। यह बिन्दु भी विचारणीय है। इसके अतिरिक्त यह भी उल्लेखनीय है कि जनपद में ही अपराध एवं अपराधियों के प्रति अच्छी भूमिका निभाने वाले उ.नि. लाइन हाजिर या किसी थाने पर द्वितीय अधिकारी के रूप में नियुक्त किये गये है।

 

लेखक मधुकर तिवारी से संपर्क उनके ईमेल drmadhukartiwari@gmail.com पर किया जा सकता है।
 

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