होली मिलन के अवसर पर मीडिया एक्सिलेंसी अवार्डों से नवाजे गए पत्रकार

गाजीपुर पत्रकार एसोसिएशन उत्तर प्रदेश का होली मिलन कार्यक्रम समारोहपूर्वक सम्पन्न हुआ। ‘एक शाम काव्य संध्या के नाम’’ से आयोजित इस समारोह में जनपद में पत्रकारिता के क्षेत्र मे उल्लेखनीय कार्य करने वाले पत्रकारों को ‘प्रथम मीडिया एक्सलेन्सी अवार्ड’ से पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार विभिन्न श्रेणियों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले पत्रकारो को प्रदान किये गये। कार्यक्रम के प्रथम चरण में सिद्धपीठ भुड़कुड़ा के पीठाधीश्वर महन्त शत्रुधन दास व यश भारती से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार विजय कुमार के अलावा नगर पालिका अध्यक्ष विनोद अग्रवाल ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। इस अवसर पर कवि सम्मेलन का आयोजन भी किया गया। जिसमें पूर्वांचल के कोने-कोने से आये मूर्धन्य कवियो ने अपनी रचनाएं पेश कर लोगो की खूब वाह-वाही लूटी। वहीं भोजपूरी कवि विनय राय बबुरंग, कवि दबंग, अश्क गाजीपुरी, जफर गाजीपुरी ने उपस्थित लोगो के बीच अपनी कविताओं का खासा प्रभाव छोड़ा। होली मिलन के इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि वैभव परिवार के प्रबन्ध निदेशक राजेश राय ने अपने सम्‍बोधन में पूर्वांचल के विकास पर प्रकाश डालते हुए पत्रकारों की भूमिका की खूब सराहना की। इस अवसर पर सांसद राधे मोहन सिंह ने पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए कहा कि पत्रकार ही समाज का दर्पण है और विकास के लिए इस दर्पण का होना बहुत जरूरी है। उन्होने कहा कि जल्द ही पत्रकारो के लिए भवन के अलावा उनके रहने के लिए आवास की व्यवस्था पर माननीय नेता जी व मुख्यमंत्री जी से वार्ता की जायेगी। इसके बाद बेस्ट रिपोर्टिंग एक्सिलेंसी अवार्ड से नागेन्द्र पंकज(अमर उजाला), मीडिया एक्सिलेंसी अवार्ड से विनोद मिश्रा(हिन्दुस्तान) और आशीष कुमार सिंह(राष्ट्रीय सहारा), बेस्ट मीडिया ड्राफ्टिंग एक्सिलेंसी अवार्ड से चन्द्र कुमार तिवारी(श्रीन्यूज), बेस्ट एडवांस मीडिया एक्सिलेंसी अवार्ड से कृपा कृष्ण ‘केके’, मीडिया एप्रीसिएशन अवार्ड से आलोक त्रिपाठी(साधना न्यूज), बेस्ट कैमरामैन एक्सिलेंसी अवार्ड से संजीव कुमार, बेस्ट मीडिया एप्रीसिएशन अवार्ड से आदिल उस्मानी और बेस्ट मीडिया सपोर्टिंग अवार्ड से अमित चौबे को सम्मानित किया गया। सम्मान के इस क्रम में शिक्षा क्षेत्र के लिए डालिम्स सनबीन गाजीपुर के निदेशक राहुल सिन्हा को जहां सम्मानित किया गया वहीं समाजिक कार्यो के लिए ब्रजभूषण दूबे को सोशल एक्‍टीविटी मीडिया एक्सलेन्सी अवार्ड देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर गाजीपुर पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश दूबे ने मुख्य अतिथियो को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। वहीं काव्य गोष्ठी मे सम्मिलित कवियों को पत्रकार एसोसिशन के पदाधिकारियों द्वारा अंग वस्त्रम प्रदान कर उन्हे सम्मानित किया गया। इस अवसर पर अनिल उपाध्याय, सूर्यवीर सिंह, मनीष मिश्रा, अंजनी, राजेश खरवार, श्याम सिन्हा, अनिल कुमार, शशिकान्त, देवब्रत विश्वकर्मा, आर सी खरवार, गुलाब राय, आशीष शुक्ला, रविकान्त पाण्डेय, अशोक श्रीवास्तव, वी के राय, अविनाश प्रधान, विनोद सिंह, वेदू, बबलू, कमलेश, डब्बू, शशिकान्त सिंह, रविशंकर तिवारी, अजय तिवारी, विशाल, पंकज, अभिनव पाण्डेय, नरेन्द्रनाथ पाण्डेय, किशन, परवरिश सिन्हा, संजय सहित जिले के विभिन्न क्षेत्रो से आये सैकड़ो पत्र प्रतिनिधी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन दूरदर्शन के रिपोर्टर कमलेश राय व शिक्षा क्षेत्र से जुड़े भगवती तिवारी ने किया। कार्यक्रम के अन्त में अध्यक्ष राजेश दूबे ने आभार व्यक्त किया। – गाजीपुर से केके की रिपोर्ट, 9415280945

सहारा में सनसनी, विजय राय ने चैनल छोड़ा, मनोज मनु मेट्रो एडिटर बने

सहारा समय चैनल के दिग्गज विजय राय सहारा न्यूज से अलग हो गए हैं। विजय राय चैनल में कद्दावर थे और उनके पास सहारा न्यूज के ब्यूरो हेड की जिम्मेदारी थी। सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक विजय राय से इस्तीफा ले लिया गया है। हालांकि अभी तक इसका कारण पता नहीं लग पाया है। सूत्रों का कहना है कि विजय राय का जाना वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा है। राय पिछले काफी वक्त से सहारा में सक्रिय थे। एक अन्य खबर में मनोज मनु को मेट्रो एडिटर बना दिया गया है।

इससे पहले मनोज मनु सहारा नेशनल और एमपी चैनल के हेड थे। बाद में उनसे नेशनल की जिम्मेदारी ले ली गई थी। फिलहाल उनके पास एमपी की ही जिम्मेदारी थी,जिसे बढ़ाते हुए अब उन्हें मेट्रो एडिटर का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया है।

सहाराश्री के सचिवालय से चित्रा का इस्तीफा

चित्रा त्रिपाठी ने सहारा ग्रुप को बॉय बोल दिया है। चित्रा सहाराश्री के सचिवालय का हिस्सा थीं, जहां से वह अलग हो गई हैं। चित्रा पहले सहारा टीवी में एंकर थीं। मगर कुछ समय पहले उन्हें मुंबई में स्थित सहाराश्री के सचिवालय में भेज दिया गया था। तब से वह यहीं काम कर रही थी। सचिवालय में मुख्यधारा की मीडिया जैसा काम नहीं होने के कारण चित्रा ने यह निर्णय लिया है।

हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि चित्रा ने खुद नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया है बल्कि उन्हें जाने को कह दिया गया था। सूत्रों के मुताबिक चित्रा अब फिर से मुख्यधारा की पत्रकारिता से जुड़ने की जुगत में हैं।
 

थी..हूं..रहूंगी के लिए वर्तिका नंदा को ऋतुराज सम्मान

डॉ.वर्तिका नंदा को प्रतिष्ठित परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित किया गया है.  वर्तिका जी को यह सम्मान उनके कविता संग्रह 'थी.. हूं… रहूंगी' के लिए मिला। सम्मान समारोह दिल्ली में हुआ। यह कविता संग्रह महिला अपराध पर आधारित है। इस विषय पर लिखा जाने वाले यह अपने तरह का अनूठा कविता संग्रह है। हर साल यह सम्मान दिया जाता है। वर्तिका नंदा को पुरस्कार देने का निर्णय तीन सदस्यी निर्णायक मंडल ने की। इसमें राजनारायण बिसारिया, डा. अजित कुमार और डॉ. कैलाश वाजपेयी शामिल थे।

इससे पहले विजय किशोर मानव, डा. अनामिका, नरेश सक्सेना, बालस्वरूप राही, पवन करण व विष्णु नागर आदि परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। परंपरा ऋतुराज सम्मान के साथ एक लाख रुपये की राशि भी दी जाती है।  डॉ. वर्तिका नंदा इस कविता संग्रह को लेकर पिछले काफी वक्त से उत्साहित रही हैं. अपने कविता संग्रह के बारे में उन्होंने कहा कि, थी ..हूं..रहूंगी की कहानी अपने आप में एक अलग तरह की रचना है. बतौर वर्तिका, "पिछले साल एक मरजानी मर गई और तब यह लगा कि कई बार मरते-मरते कोई औरत जब बच जाती है, तो बदल जाती है। अपराध की रिपोर्टिंग ने यही सिखाया और बताया। इस लिए इस बार अनायास ही कविताएं एक नए भाव के साथ उग आईं। वर्तिका आईआईएमसी की छात्रा रही हैं। मीडिया में लंबे वक्त तक सक्रिय रहने के बाद उन्होंने पढ़ाने के लिए आईआईएमसी को चुना। यहां वह कई सालों तक विद्यार्थियों को टीवी पत्रकारिता पढ़ाती रही हैं।

पश्चिम भारत में भी पहुंचा सहारा समय

देश के तमाम हिस्सों में अपनी पहुंच बनाने के बाद सहारा समय ने पश्चिम भारत में भी दस्तक दे दी है। सहारा न्यूज़ नेटवर्क ने 15 अगस्त को  महाराष्ट्र और गुजरात से भी चैनल शुरू कर दिया है। सहारा इंडिया परिवार के मुख्य अभिभावक सहाराश्री सुब्रत रॉय सहारा ने राजधानी के एक पांच सितारा होटल में अनेक केन्द्रीय मंत्रियों, पूर्व केंद्रीय मंत्रियों व सैकड़ों अतिथियों की मौजूदगी में चैनल का शुभारंभ किया। इस दौरान, सहाराश्री ने अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

सहारा ने इस क्षेत्र में हिंदी भाषी दर्शकों की आबादी को देखते हुए कदम रखा है। सहारा को इस क्षेत्र में भी अपने चैनल के सफल होने की पूरी उम्मीद है। वरिष्ठ अधिकारियों की रणनीति लोकल विज्ञापनदाताओं के अलावा सरकारी विज्ञापन को भी ट्रार्गेट करने की है। इस दोनों राज्यों में सहारा के ब्यूरो और रिर्पोटर पहले से ही मौजूद हैं. इसको देखते हुए कंटेट के स्तर पर बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। चैनल के लांचिंग समारोह में केन्द्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय, चौ.अजित सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा,सलमान खुर्शीद, हरीश रावत, अजय माकन और राजीव शुक्ला, राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान, जैसे दिग्गज मौजूद थे।
 
 

मीडिया को पारदर्शी होना ही होगा

भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष के रूप में न्यायविद मार्कण्डेय काटजू का संभवत: पहला बयान भारतीय मीडिया और समूचे मीडिया-कर्म के लिए सीधी चुनौती है। इसके साथ ही यह आत्म-निरीक्षण और आत्म-विश्लेषण का कारण भी है। भारतीय प्रेस परिषद को ‘बिना दांत के शेर’ वाली भूमिका से आगे ले जाने के लिए यह वक्तव्य प्रस्थान बिंदु भी हो सकता है। जस्टिस काटजू ने कुरदने वाले तथ्य कहे हैं। लेकिन उनका वक्तव्य हकीकत का भी बयान है।

प्रेस परिषद देश की संसद द्वारा गठित भारतीय प्रेस की नियामक संस्था रही है। प्रेस यानी समाचार पत्रों और पत्रिकाओं से आगे अब भारतीय मीडिया की दुनिया वैश्विक हो गई है। रेडियो, टेलीविजन और न्यू मीडिया, सोशल मीडिया जैसे प्रभावी माध्यमों ने पूरे भारतीय मीडिया परिदृश्य को बदलकर रख दिया है।

जस्टिस काटजू जब यह कहते हैं, ‘देश में, देश के बुद्धिजीवियों, सरकार, प्राइवेट सेक्टर सभी में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि मीडिया का एक खास वर्ग अपने कार्य-व्यवहार में अत्यंत गैरजिम्मेदार हो गया है। वह गलत सूचनाएं देने, गलत रिपोर्टिग करने के साथ ही वस्तुस्थिति को सनसनी के रूप में पेश करता है’, तो यह बात बहुत से लोगों को काफी तथ्यपरक लगती है। साथ ही जस्टिस काटजू यह भी जोड़ देते हैं कि ‘मीडिया के लोगों के बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है। मुझे नहीं लगता कि उन्हें आर्थिक नीतियों, राजनीतिक सिद्धांतों, साहित्य और दर्शन शास्त्र की जानकारी होती है।’ ज्यादा विवाद उनके वक्तव्य के  इसी अंश को लेकर है।

जस्टिस काटजू की टिप्पणियों को लेकर उठा विवाद उनके इस ताजा बयान से चरम पर पहुंचना स्वाभाविक है, जिसमें उन्होंने कहा, ‘मीडिया अपने अंदर भी झांककर देखे। मीडिया लोगों तक सूचनाएं पहुंचाने और समाज की बुराइयों से परिचित कराने की अपनी भूमिका से विमुख हो चुका है। उसे अपना आत्म-मूल्यांकन करना चाहिए।’ इस पर एडीटर्स गिल्ड के महासचिव की प्रतिक्रिया भी काबिले गौर है, ‘काटजू उन लोगों के प्रति बहुत ही अपमानजनक रवैया अपना रहे हैं, जिनके साथ उन्हें अगले तीन वर्षों तक काम करना है।’ यह इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में प्रेस परिषद की भूमिका और कार्य कठिनाइयों से भरा हो सकता है।

काटजू का बयान सुर्खियों में है और उनके बयान को इंटरनेट सोशल मीडिया पर काफी समर्थन मिल रहा है। ऐसी ही यह एक टिप्पणी मीडिया के लिए सीधी चुनौती है, ‘मीडिया का बरताव जर्मनी के तानाशाह हिटलर की तरह है। वह बिना किसी पुख्ता जानकारी के कुछ भी प्रसारित कर देता है।’ समाचार चैनलों की स्व-नियामक संस्था नेशनल ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन के प्रमुख न्यायमूर्ति जेएस वर्मा ने प्रेस परिषद को ‘भावहीन और अपने मकसद में नाकामयाब’ करार देते हुए इसे बंद या भंग कर देने का सुझाव दिया है, जिसके दूरगामी भाव स्पष्ट हैं। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी ने तो इससे भी आगे बढ़कर कहा है कि मीडिया संबंधी काटजू की टिप्पणी ‘गहरे पूर्वाग्रह से प्रेरित है। काटजू का लोकतंत्र के चौथे खंभे के प्रति यह पूर्वाग्रह साफ झलकता है।’

केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री ने इस सिलसिले में बस इतना ही कहा है कि ‘सरकार की प्रेस की आजादी पर किसी तरह की रोक लगाने की कोई योजना नहीं है। सरकार मीडिया के लिए स्व-नियंत्रण व्यवस्था चाहती है, ताकि वह अधिक संवेदनशीलता से काम करे और मीडिया ट्रायल तथा व्यक्ति विशेष की निंदा से परहेज करे।’ पर प्रेस परिषद की भूमिका और भविष्य के बारे में सरकार का मत साफ न होना चिंता का विषय है।

मीडिया का एक वर्ग जस्टिस काटजू की टिप्पणियों को नकारात्मक, तो दूसरा, ‘जल्दबाजी में किया गया आकलन’ मानकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। एडीटर्स गिल्ड इन टिप्पणियों को ‘पत्रकारों पर की गई तथ्यहीन एकतरफा और पूर्वाग्रह से ग्रस्त करार’ दिया है, जो गंभीर विचार व बहस का मुद्दा होना चाहिए। प्रेस परिषद के अध्यक्ष की दृष्टि में मीडिया देश को सांप्रदायिक आधार पर बांटने का काम करता है, एडीटर्स गिल्ड इसे निराधार मानते हुए कहा है, ‘मीडिया ने देश को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।’ एडीटर्स गिल्ड की यह दृष्टि तार्किक है कि वस्तुत: ‘प्रेस की स्वतंत्रता सत्ता में बैठे लोगों के विरुद्ध जनता की शक्ति’ है। परंतु प्रेस परिषद को और अधिकार संपन्न बनाए जाने पर खुद मीडिया की पुरानी मांग को गिल्ड ने ‘सरासर गलत-अनावश्यक’ और ‘मीडिया में भय पैदा करने’ का प्रयास मानकर समूची बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। ‘बिना दांत का शेर’ एक बार फिर वैचारिक बहस के कठघरे में है।

इसके आगे भी प्रश्न अनेक हैं। साख और सरोकार पत्रकारिता की मूल थाती रही हैं और आज भी साख की पूंजी के बूते ही पत्रकारिता समाज व भारत जैसे लोकतंत्र की धुरी है। पत्रकारिता में कभी कुछ ‘पेड’ नहीं था, अब सब कुछ ‘पेड’ है। तथ्यों की सत्यता, भाषा के मानकों और दूसरे सवालों-सरोकारों से अलग ‘सबसे आगे’ रहने की होड़ ने उसकी साख को कठघरे में खड़ा किया है। उत्तर प्रदेश से एक उदाहरण लें। 1970-80 के दशक में एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ने लगातार एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी के बारे में उनके एक से अधिक पति होने की खबरें छापीं। जांच के बाद सारे तथ्य झूठ निकले। पत्र को अपने मुखपृष्ठ पर ‘सेकेंड लीड’ छापकर माफी मांगनी पड़ी। 1990 के दशक में ही वाराणसी का चर्चित संवासिनी कांड मीडिया द्वारा सृजित कांड साबित हुआ। इस कांड ने कितनों के घर बरबाद किए, कितनों को जेल भेजा और बाद में सीबीआई की जांच में सारा मामला ही गलत पाया गया। जिनकी, जो क्षति हुई, क्या उसकी भरपाई हुई?

इसी प्रकार दिल्ली के प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्र में एक सांसद के बारे में खबर छपी- ‘बिहार एमपी डज नॉट नो हाऊ  मेनी स्पाउसेस ही हैज’ यानी ‘बिहार के सांसद को पता नहीं कि उनकी कितनी पत्नियां हैं।’ बाद में इस खबर के लिए प्रथम पृष्ठ पर माफी मांगी गई और साथ ही उनके परिवार के लोगों, मित्रों तथा समर्थकों को हुए कष्ट के प्रति खेद व्यक्त किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने आरुषि मर्डर केस में भारतीय मीडिया को ‘सेंसेशनलिस्ट मीडिया’ करार दिया था।

जस्टिस काटजू ने जो सवाल उठाए हैं, उनका जवाब सिर्फ बयान से नहीं, बल्कि आत्म-निरीक्षण के बाद अपनी कार्य-प्रणाली को पारदर्शी बनाकर देना होगा। मीडिया जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा है। इसलिए कठोर समीक्षा और अग्निपरीक्षा के दौर से गुजरने के लिए खुद को तैयार करना ही होगा। इससे परहेज न तो किया जा सकता है, न किया जाना चाहिए।

लेखक राम मोहन पाठक पत्रकारिता के अध्‍यापक हैं. उनका यह लेख हिंदुस्‍तान में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लिया गया है.

भारत के सौ अमीरों में चार मीडिया घरानों के मालिक भी शामिल

मशहूर बिजनेस पत्रिका फोर्ब्‍स द्वारा सौ अमीर भारतीयों की सूची घोषित की गई है. इस लिस्‍ट में मुकेश अंबानी पहले पायदान पर हैं, जबकि लक्ष्‍मी निवास मित्‍तल दूसरे तथा अजीम प्रेमजी तीसरे नम्‍बर पर हैं. पर इन सबके बीच चार मीडिया मुगल भी सौ अमीर भारतीयों में अपना स्‍थान बनाने में सफल रहे हैं. इस सूची में सबसे ऊपर जी नेटवर्क के सुभाष चंद्रा का नाम है. सुभाष चंद्रा 22वें स्‍थान पर हैं. उनके ठीक बाद यानी 23वे स्‍थान पर पूर्व केंद्रीय मंत्री दयानिधि मारन के भाई और सन टीवी के कर्ताधर्ता कलानिधि मारन हैं.

इस सूची में हिंदुस्‍तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड की चेयरपर्सन शोभना भरतिया का भी नाम शामिल है. शोभना को इस सूची में 67वां स्‍थान मिला है. वहीं दैनिक भास्‍कर ग्रुप के मालिक रमेश चंद्र अग्रवाल भी 85वां स्‍थान पाकर टॉप हंड्रेड में आने में सफल रहे हैं. सौ अमीर भारतीयों की सूची नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके देखा जा सकता है.

सौ अमीर भारतीय