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मीडिया की भूमिका और बदलते चश्मे

समुन्नत प्रजातंत्र में संस्थाएं एक-दूसरे पर दबाव डालती हैं। इसका लाभ यह होता है कि हर संस्था में एक स्वसुधारात्मक प्रक्रिया स्वत: जन्म लेती है। लेकिन कई बार इस दबाव में संस्थाओं को इतना नीचा दिखाना शुरू किया जाता है जिससे उसके अस्तित्व व उपादेयता पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है। जटिल सामाजिक व्यवस्था में संस्थाओं में निरंतर पुनर्परिभाषित करने की एक होड़ होती है।

समुन्नत प्रजातंत्र में संस्थाएं एक-दूसरे पर दबाव डालती हैं। इसका लाभ यह होता है कि हर संस्था में एक स्वसुधारात्मक प्रक्रिया स्वत: जन्म लेती है। लेकिन कई बार इस दबाव में संस्थाओं को इतना नीचा दिखाना शुरू किया जाता है जिससे उसके अस्तित्व व उपादेयता पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है। जटिल सामाजिक व्यवस्था में संस्थाओं में निरंतर पुनर्परिभाषित करने की एक होड़ होती है।

जैसे-जैसे समाज में शिक्षाजनित तर्कशक्ति बेहतर होती है वैसे-वैसे इन संस्थाओं को अपनी भूमिका बदलनी पड़ती है ताकि नई अपेक्षाओं के अनुरूप अपने को ढाला जा सके। मीडिया पर फिर से इस तरह के दबाव पड़ रहे हैं जिनमें कुछ सार्थक व तार्किक हैं जबकि कुछ में कुतर्क का सहारा लिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया था कि मीडिया स्वयं ही आरोपकर्ता, जांचकर्ता व जज बन जाती है जबकि एक आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक अदालत उसे सजा न दे दे। भट्टा पारसौल में पुलिस-ग्रामीण झड़प के दौरान पी.ए.सी के जवानों ने गांव की महिलाओं से बलात्कार किया, यह आरोप कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लगाया। कुछ दिन बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार की टीम ने कहा कि यह आरोप ग़लत है। उसके कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रीय महिला आयोग का दल गया, उसने ऐलान किया कि बलात्कार हुआ है। इस बीच प्रदेश सरकार लगातार कहती रही कि कोई बलात्कार नहीं हुआ है, जबकि केंद्र सरकार की मंत्री अंबिका सोनी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार की रिपोर्ट पर संदेह जताते हुए कहा कि महज एक रिपोर्ट के आधार पर सभी आरोप खारिज नहीं किए जा सकते। “वहां जाकर हालात का जायज़ा लेने वाली अन्य एजेंसियों ने पुष्टि की है कि महिलाओं के साथ इस तरह का व्यवहार किया गया है। हम सब इसके ख़िलाफ हैं, देखना होगा कि इसके विपरीत रिपोर्ट कहां से आयी है”।

इस पूरे प्रकरण में शुरू के दो दिन छोंड़ दें तो किसी भी प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस ख़बर को लेकर पूरा संयम बरता क्योंकि महिलाओं के सम्मान का सवाल था। अभी पिछले हफ्ते इस मामले में अदालत के सख्त आदेश के बाद 16 पी.ए.सी जवानों, जिसमें एक कमाण्डर भी है, के से ख़िलाफ मुकदमा दायर हुआ है और वह भी तब जबकि राज्य सरकार को हाईकोर्ट तक कोई राहत नहीं मिली। मीडिया अगर प्रधानमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री की सलाह माने तब न तो यह ख़बर देनी चाहिए, न ही टूजी घोटाले में फंसे ए.राजा की खबर। और अगर जाती भी तो सिर्फ वह यह कि (अ) केंद्र के एक मंत्री पर टूजी स्पेक्ट्रम के तथाकथित घोटाले में शामिल होने का आरोप है; (ब) कि तथाकथित घोटाले के आरोप में एक मंत्री जेल में है और (स) कि एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री की बेटी जो कि सांसद भी है वह भी जेल में है। उसी तरह भट्टा पारसौल के बलात्कार के मामले में अगर राहुल गांधी और उनके तत्काल बाद उनकी सरकार की मंत्री अंबिका सोनी या फिर महिला आयोग की बात मानी जाए तब ख़बर यह बनती है कि बलात्कार हुआ। लेकिन तब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट को नज़रअंदाज करना पड़ेगा।

डिक्शनरी और साहित्य में अंतर होता है। डिक्शनरी ज़्यादा सत्य होती है। साहित्य में सत्य का अंश कम विवेचना का अंश ज़्यादा होता है लेकिन डिक्शनरी पाठ्यक्रम में नहीं होती, साहित्य होता है। मीडिया अगर प्रेस नोट पर आधारित खबर होती तो दूरदर्शन या आकाशवाणी से अधिक कुछ न होती। अब मान लीजिए कि मुकदमा क़ायम हो जाता है लेकिन निचली अदालत साक्ष्य के अभाव में या कमज़ोर प्रॉशिक्यूशन के कारण अभियुक्तों को बरी कर देती है तब राहुल गांधी और मंत्री महोदया क्या कहेंगी? और अगर मान लीजिए कि ऊपरी अदालत ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए मुकदमा सही पाया और सज़ा दी तब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग क्या कहेगा?

यह भी कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किसी भी बम-विस्फोट की घटना के तत्काल बाद आए किसी ई-मेल, जिसमें कि दावा किया गया है कि जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर ने घटना की ज़िम्मेदारी ली है, को तत्काल दिखाना शुरू कर देती है और नतीज़ा यह होता है कि भारत के एक सम्प्रदाय के सभी लोगों को आतंकवादी बना दिया जाता है। इस वाक्य में तार्किक दोष है। जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर का मतलब किसी सम्प्रदाय विशेष के सारे लोगों से नहीं होता, उसी तरह जिस तरह गाय जानवर होती है लेकिन हर जानवर गाय नहीं होता। दूसरा, चैनल यह नहीं कहता जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर ने यह किया है बल्कि वह यह कहता है कि उसे एक ई-मेल प्राप्त हुआ है जिसमें यह दावा किया गया है।

एक अन्य आरोप लगा कि जिस देश में 80 प्रतिशत गरीबी व अभाव में जी रहा है उस देश में मीडिया एक फिल्म अभिनेता की पत्नी को एक बच्चा होगा या जुड़वा होंगे यह दिखा रहा है, लैक्मे फैशन शो दिखा रहा है जबकि विदर्भ में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। पहला यह कि भारतीय मीडिया अगर गरीबी को न दिखा रही होती तो शायद समाज के सुविधाभोगी और शक्तिसंपन्न वर्ग को शायद इसका पता भी न चलता। दूसरा, मीडिया ने इस तरह की खबरें दिखाईं तो कितनी बार अवमानना की शक्ति से सम्पन्न न्यायपालिका में बैठे लोगों ने अपनी तरफ से (सुओ मोटो) उसका संज्ञान लिया और कितनी बार कार्यपालिका ने उसे तरजीह दी? विश्व का कोई अन्य प्रजातांत्रिक देश नहीं है जिसमें कि मीडिया के एक स्टिंग ऑपरेशन से 12 सांसद निकाल दिए जाएं। टूजी स्पेक्ट्रम की खबर जब 2007 में कुछ मीडिया संस्थाओं ने दी तब इसका संज्ञान नहीं लिया गया लेकिन जब एक विश्वसनीय सी.ए.जी ने इस राज से परदा उठाया तब मीडिया का स्वर ऊंचा हुआ और अन्य संस्थाओं ने संज्ञान लेना शुरू किया।  

मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की बात फिर जोर-शोर से उठी है। पत्र-सूचना कार्यालय की वेबसाइट पर आज भी दो हफ्ते पहले हुआ मंत्रिमण्डल का फैसला देखा जा सकता है। इस फैसले के तहत अगर किसी चैनल ने प्रोग्राम संहिता का पांच बार से ज़्यादा का उल्लंघन किया तो दस साल के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस का पुनर्नवीनीकरण नहीं होगा। अब ज़रा कैबिनेट के इस फैसले का व्यावहारिक पक्ष देखें। अगर कोई चैनल पहले ही साल पांच बार इस संहिता का उल्लंघन करे तब भी अगले नौ साल तक यह फैसला उसे उल्लंघन करने की इजाज़त देता रहेगा। दूसरा, अगर मान लीजिए कि उसने चार बार उल्लंघन किया तो क्या यह डर नहीं है कि पांचवे उल्लंघन की धमकी देकर सरकार उससे जो चाहे करवाए खास करके अगर उसका दसवां साल चुनाव का वर्ष है। तीसरा, अगर तथाकथित संहिता के उल्लंघन के तहत सरकारी अमले ने उसका लाइसेंस दोबारा जारी नहीं किया लेकिन अगले दो साल में वह कोर्ट से बरी हो जाता है तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा?

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

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