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सत्ता वर्ग की छुई-मुई मानसिकता और सोशल मीडिया

पिछले जनवरी से जून महीने तक भारत ने गूगल से 358 विषय-सामग्रियां हटाने की “अपील” की। इनमें से 255 यानि 75 प्रतिशत ऐसी सामग्री थी जिनमें सरकार की आलोचना की गयी थी। भारत के अलावा दुनिया में सिर्फ तीन अन्य देश हैं जिन्होंने इस तरह की अपील गूगल से की थी। जरा सोचें प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भी अगर कोई सरकार अपनी आलोचना के प्रति इतनी असहनशील हो तो उस प्रजातंत्र की गुणवत्ता कैसी होगी।

पिछले जनवरी से जून महीने तक भारत ने गूगल से 358 विषय-सामग्रियां हटाने की “अपील” की। इनमें से 255 यानि 75 प्रतिशत ऐसी सामग्री थी जिनमें सरकार की आलोचना की गयी थी। भारत के अलावा दुनिया में सिर्फ तीन अन्य देश हैं जिन्होंने इस तरह की अपील गूगल से की थी। जरा सोचें प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भी अगर कोई सरकार अपनी आलोचना के प्रति इतनी असहनशील हो तो उस प्रजातंत्र की गुणवत्ता कैसी होगी।

एक बात औऱ गौर करें। अगर इस सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित करने के निर्बाध अधिकार हों तो क्या यह “अपील” सरकारी तंत्र के डंडा-शक्ति में नहीं बदल जाएगी? चूंकि यह अपील गूगल ने नहीं सुनी लिहाज़ा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल इसे डंडा-शक्ति में बदलना चाहते हैं।

भंवरी देवी केस में सी.बी.आई की चार्जशीट में पेज नं. दस पर एक क्षेत्रीय चैनल का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि जैसे ही इस चैनल ने भंवरी देवी और एक मंत्री की सेक्स सी.डी होने की खबर दी वैसे ही मंत्री ने “अपने आदमियों से मामले का निपटारा करने संबंधी विचार-विमर्श किया”। एक तर्क यह हो सकता है कि अगर यह खबर न दी गयी होती तब भंवरी का अपहरण न होता और हत्या की आशंका न होती। दूसरा तर्क यह हो सकता है कि अगर यह खबर न दिखायी होती तब एक मंत्री प्रजातंत्र में कितना खतरनाक चरित्र रख सकता है, यह उजागर न होता। सोशल नेटवर्क की भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में एक बड़ी भूमिका रही है, लेकिन अगर कुछ नेताओं के खिलाफ की गयी टिप्पणी या फोटो नकारात्मक हैं तो क्या सोशल मीडिया को नियंत्रित किया जाना चाहिए?

तकनीकि ज्ञान को जब व्यवहार में लाया जाता है तब उसके प्रयोग की एक शर्त होती है। वह यह कि प्रयोग करने वाला उसे पूरी तरह समझता है और उपभोक्ता उसके सकारात्मक व नकारात्मक पहलू से पूरी तरह वाकिफ है। तेज़ रफ्तार की गाड़ी चलाने से दुर्घटना होती है, इस तर्कवाक्य की यह परिणति नहीं हो सकती कि मोटर-चलित वाहनों को बंद कर दिया जाए। परमाणु तकनीकि का इस्तेमाल ऊर्जा पैदा करने में होता है। यह ऊर्जा बिजली के रूप में विकास के लिए इस्तेमाल की जा सकती है और विस्फोट के लिए भी। सिब्बल का अंतर्राष्ट्रीय इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों को बुलाकर धमकाना, दुर्घटना की वजह से सड़क पर मोटर-चलित वाहनों को बंद करने जैसा है।

संभ्रान्तवर्गीय चरित्र की यह विशेषता है कि वह अपने बारे में सकारात्मक बातें ही सुनना पसंद करता है। नकारात्मक बातों से उसे व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह, प्रजातंत्र के खिलाफ साजिश व संपूर्ण मानवजाति के खिलाफ अपराध नज़र आने लगता है। ब्रिटेन में सन 1275 में स्कैंडलम-मैग्नेटम क़ानून पास किया गया था जो कि आज के मानहानि क़ानून का समूचे विश्व में उद्गम स्त्रोत रहा है। उस समय भी इसके पक्ष में दो तर्क दिए गए। पहला, संसद राष्ट्र के बेहतरीन आदमियों को अपमान से बचाना चाहता है और दूसरा कि अनियंत्रित आलोचना के डर से अच्छे लोग जनसेवा के कार्यों में नहीं आएंगे। पर हक़ीकत यह थी कि उस समय ब्रितानी क्राउन यानि सरकार कत्तई नहीं चाहती थी कि प्रजातंत्र के नाम पर ‘घटिया’ आम जनता राजा के सम्मान में गुस्ताखी करे। तब से लेकर आज तक मानहानि या अवमानना अपने विभिन्न स्वरूपों में दुनिया के तमाम देशों में काबिज़ है। कपिल सिब्बल का गुस्सा उनके संभ्रान्तवर्गीय चरित्र को बताता है।

भारत में मानहानि का क़ानून दफा 499 में आपराधिक श्रेणी में आता है। हालांकि दुनिया के तमाम देशों ने मानहानि को अपराध की श्रेणी से हटा लिया है लेकिन भारत में आज भी यह दीवानी व फौज़दारी दोनों श्रेणियों में रखा गया है। यह सही है कि कई बार जनअभिव्यक्ति समसामयिक सामुदायिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरती और तब लगता है इसे नियंत्रित करने की ज़रूरत है लेकिन नियंत्रण की वकालत करने वाले एक मूल अवधारणा को भूल जाते हैं। इस तरह के फोरम उपलब्ध करा कर आप एक ओर समाज में तर्कशक्ति को बेहतर करते हैं और दूसरी ओर अभिजात्य वर्ग को भी छुई-मुई की संकीर्ण मानसिकता से बचाते हैं। कपिल सिब्बल को याद रखना होगा न्यूयॉर्क टाइम वर्सेज सुलीवन में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का क्रांतिकारी फैसला, और साथ ही भारत में भी मशहूर नकीरन व ऑटोशंकर केस में सुप्रीमकोर्ट के फैसले। इन फैसलों में स्पष्ट रूप से कहा गया कि जननेता को मानहानि के कानून की सुरक्षा कम मिलती है क्योंकि उसे यह मानकर चलना चाहिए कि सामान्य मानहानि के आरोपों को झेलने की क्षमता ही उसे जनता के बीच लायी है और साथ ही उसे अपनी बात कहने के लिए जनसंचार के माध्यम सहज उपलब्ध हैं। 

अमेरिका जो कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अगुआ माना जाता है, इस स्वतंत्रता के पीछे तीन मुख्य अवधारणाओं की मदद ली गयी है। पहला, खुला संवाद विचारों का एक मार्केट प्लेस तैयार करता है। एक ऐसा मार्केट प्लेस जो प्रतिस्पर्धी विचारधाराओं के मंथन के बाद सत्य तक पहुंचता है। दूसरा, जनता को मुद्दों पर जितनी ही ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतना ही हम तार्किक स्वशासन की तरफ बढ़ेंगे। तीसरा, निर्बाध अभिव्यक्ति से जनता में एक आत्मतोष आता है जो कि प्रजातंत्र के प्रति विश्वास को बढ़ाता है। यही वजह है कि यूनिवर्सल डिक्लेयरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स के आर्टिकल 19 की व्याख्या करते हुए कार्यकारी निदेशक एन्ड्र्यू ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कोयले की खदान वाली उस चिड़िया की संज्ञा दी है जो कि खदान में ज़हरीले गैस की पूर्व सूचना देती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को उनमुक्त छोड़ना समाज के उस ज़हर को बाहर निकालने का काम करता है।

कई बार मुद्दों पर उठे विवाद की सामयिकता देखी जाती है। कपिल सिब्बल की नाराज़गी से यह ध्वनि निकलती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उभरे जनाक्रोश, जिसे न केवल इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया बल्कि सोशल मीडिया ने भी पूरी तरह उभारा, एक आक्रोश का कारण है। सरकार को पहले भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से इस मुद्दे को लेकर भारी नाराज़गी थी अब सोशल मीडिया भी इनके गुस्से का शिकार बन रहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस मुद्दे को इस समय उठाना सरकार की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है। इन्दिरा गांधी ने भी इमरजेंसी लगाने के एक दिन पहले जनता को कहा था- चूंकि वह ग़रीबों के लिए काम कर रही हैं इसलिए अभिजात्य वर्ग नाराज़ है लिहाज़ा आपातकाल लगाना मजबूरी हो गयी है। आज कपिल सिब्बल भी उसी भाव में आते हुए यह बता रहे हैं कि सोशल मीडिया में इस तरह की उन्मुक्त अभिव्यक्ति से साम्प्रदायिक सौहार्द पर खतरा हो सकता है।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

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