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टीओआई वाले 119 कंपनियों के लिए पेड न्यूज छापते हैं

: कारपोरेट मीडिया का सच-2 : बहुत कम ही लोगों को जानकारी होगी कि 2005 में टाइम्स ऑफ इंडिया ने टाइम्स प्रायवेट ट्रीटीज (समझौता) के नाम से एक नई कंपनी खोल ली थी। असल में यह निवेशक कंपनी है, जो है तो बेनेट कोलमैन के तहत, लेकिन इसका काम चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों के शेयर खरीदना था। बदले में कोई पैसा नहीं दिया जाता, पर टाइम्स में इन घरानों के मुफ्त इश्तेहार छपते। साथ में इन कंपनियों की पसंद की खबरें (हाल ही में इन्हें पहचानकर पेड न्यूछ कहा गया) भी छपती रहीं।

: कारपोरेट मीडिया का सच-2 : बहुत कम ही लोगों को जानकारी होगी कि 2005 में टाइम्स ऑफ इंडिया ने टाइम्स प्रायवेट ट्रीटीज (समझौता) के नाम से एक नई कंपनी खोल ली थी। असल में यह निवेशक कंपनी है, जो है तो बेनेट कोलमैन के तहत, लेकिन इसका काम चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों के शेयर खरीदना था। बदले में कोई पैसा नहीं दिया जाता, पर टाइम्स में इन घरानों के मुफ्त इश्तेहार छपते। साथ में इन कंपनियों की पसंद की खबरें (हाल ही में इन्हें पहचानकर पेड न्यूछ कहा गया) भी छपती रहीं।

फिलहाल टाइम्स की प्रायवेट ट्रीटीज 119 कंपनियों के साथ है। यह प्रायवेट ट्रीटीज समाचारों के साथ किस तरह की छेड़छाड़ करती है, इसकी एक बानगी देखिए। 10 मई 2008 की दोपहर 2.30 बजे बेंगलुरु में 18 माले की एक निर्माणाधीन इमारत की लिफ्ट टूटकर नीचे जा गिरी। दो मजदूर मारे गए और 7 गंभीर रूप से घायल हुए। लेकिन टाइम्स ने अपनी खबर में बिल्डिंग बनाने वाले शोभा डेवलपर्स का नाम नहीं लिया, क्योंकि वह उनके प्रायवेट ट्रीटीज का हिस्सा है।

खबर यूं लगी : Times of India reported on 12th May 2008, that:

"Lift crash leaves 2 dead, 7 hurt

Two occupants in a lift died and seven others were injured on Saturday after the lift crashed to the lower basement at the construction site of a residential apartment on Bannerghatta Road."

इसी साल मई में टाइम्स ने कच्छा-बनियान बनाने वाली कंपनी डायकी ब्रांड प्रायवेट लिमिटेड के 49 फीसदी हिस्से‍दारी मुफ्त विज्ञापनों के बदले खरीदी है। दूसरी ओर टाइम्स की प्रतिद्वंद्वी एचटी मीडिया अपने क्लाइंट्स को मुफ्त विज्ञापन और पेड न्यूज का वादा नहीं करती। लेकिन प्रायवेट ट्रीटीज से वह भी दूर नहीं है। लेकिन 2008 में वॉल स्ट्रीट के ढहने से प्रायवेट ट्रीटीज के दायरे में आई कंपनियों को नुकसान हुआ और टाइम्स समूह पहली बार 1500 करोड़ के घाटे में आया। यह घाटा ऐसा था कि टाइम्स समूह अपने पाठकों को बता भी नहीं सका, क्योंकि सारा मामला अनैतिक था। सो प्रबंधन ने अपने रिपोर्टरों से कहा कि वे इस घटना को मंदी कहें। अब बताएं कि ऐसे में कोई रिपोर्टर भला अच्छी खोजपरक खबरें कहां से लाएगा?

अब आता है 2009 का साल। तब देश के तकरीबन सभी बड़े मीडिया घरानों ने अपने घाटे की भरपाई के लिए हर वो तरीके अपनाए, जो गलत थे। उन्होंने अपने एडीशंस को कोटा तक बांट दिया। मराठी अखबार सकाल के हर पत्रकार-गैर पत्रकार कर्मचारी को 700 रुपए कीमत वाली तनिष्का मैगजीन की 100 कॉपीज बेचने का कोटा दिया गया। इससे भी पेट नहीं भरा तो पेड न्यूज का सहारा लिया गया। असल में पेड न्यूज का पूरी तरह से पदार्पण तभी हो गया था। आप चाहें तो पेड न्यूज की पूरी कहानी को संसदीय स्थायी समिति की ऑनलाइन रिपोर्ट में देख सकते हैं।

–जारी–

जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ द्वारा विकास संवाद की तरफ से आयोजित मीडिया संवाद में दिए गए भाषण का अंश.

प्रस्तुति- सौमित्र राय


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