स्खलित चैनलों की शाम (6 से 11) : पासपोर्ट साइज मनुष्य… जुबान हिलाते… दिमाग का दही बनाते…

टीवी न्यूज़ चैनल बुरे दौर से गुजर रहे हैं… खर्च कटौती के दौर में खबरें गायब हो गयी हैं.. न्यूज़ चैनल खबरिया चैनल से बहसिया चैनल में तब्दील हो गए हैं.. बेअसर बहस से चैनल का स्तर लगातार गिर रहा है.. एक वक्त ऐसा भी था जब दिल्ली से न्यूज़ चैनल पर खबर चलती थी तो खबर की खनक से सोये मुख्यमंत्री भी जग जाते थे.. अब खबर का कोई असर नहीं.. मुख्यमंत्री भी सीधे चैनल मालिक या संपादक से बात कर रहा है.. रिपोर्टर की औकात भी ख़त्म हो गयी है…

हालात ये तक दिखलाई दे रहे हैं कि लगता है चंद लोग सरकार या देश चला रहे हैं.. उसी तरह चंद लोग, उन्हीं से सेटिंग कर, मीडिया तंत्र भी चला रहे हैं… जनता को क्या बताना है, ये भी हुक्मरान ही तय करने लगे हैं.. एक दिन रोबर्ट वडेरा चला.. एक दिन बंजाराय… उसके बाद ये खबरें मीडिया से गायब हो गयीं… कहाँ गए अन्ना हजारे -केजरीवाल? जिसके पीछे मीडिया दीवाना हुआ करता था.. क्या कॉरपोरेट, क्या सरकार के इशारे पर मीडिया से बाहर कर  दिए गए? अब सरकार और टीवी मीडिया ने सोशल मीडिया की खिलाफत शुरू कर दी है.. क्योंकि नौजवान तबके को पुराने मीडिया पर भरोसा नहीं रहा.. सरकार, राजनीतिक दल अब इसे भी अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं या कहें अपने हिसाब से चलाना चाहती हैं..   

उत्तराखंड समेत कई राज्यों में राज्य समाचार बुलेटिन में अब आधी खबरें है और आधी खबरें बनाकर उन्हें समाचार के रूप में परोसकर सरकार से बाकायदा पैसा वसूलने में रीजनल चैनल लगे हैं… चैनल की भी मजबूरी है, खर्च कहाँ से निकालें… विरोध करोगे तो कहीं के नहीं रहोगे… राष्ट्रीय चैनल अब स्ट्रिंगर से खबर नहीं ले रहे…  एएनआई से खबर ली… फ़ोनों स्ट्रिंगर के फ्री में कर लिए… खबर ब्रेक हो गयी… उत्तराखंड में तबाही आई.. हजारों मर गए.. केदार घाटी में अघोषित कर्फ्यू लगा रहा.. मीडिया चुप हो गया या कहें सरकार ने चुप करवा दिया.. राज्य में तबाही के बाद सरकार ने क्या किया? अब वहां क्या हालात है? आगे सर्दियों में लोग कैसे रहेंगे? किसी मीडिया तंत्र ने दिखाने की हिम्मत नहीं जुटाई…

अख़बार मोहल्ला संस्करण पहले ही हो गए.. वो पहले से ही बेजुबान हो गए थे… रीजनल चैनल ने खबर दिखा दी तो एक घंटे बाद वो भी बेअसर दिखती है.. पहले टीवी खबरों का, चैनल डेस्क पर पैकेज बनता था… स्क्रिप्ट पर काम होता था, जिम्मेदार अधिकारी, पक्ष-विपक्ष की बात सामने लायी जाती थी…खबर पर डेस्क इंचार्ज कांट-छांट, पूछ-ताछ करते थे, तब खबर ऑन एयर होती थी… खबर दिखते ही हलचल शुरू… फ़ोन पर फ़ोन आते थे. रिपोर्टर को खोजा जाता था… एक्शन होता था, खबर का असर होता था… पर क्या अब ऐसा होता है? जवाब खुद के पास ही नहीं है… सभी नेशनल चैनल्स एक ही ढर्रे पर हैं… कई चैनल्स से तो एंकर ही गायब हो गए… वो बहुत जरूरी हुआ तो किसी ब्रेकिंग न्यूज़ पर कुछ मिनटों के लिए दिख जायेंगे… नहीं तो उनका भी काम ख़त्म… कास्ट कटिंग का दौर है दोस्तों… हर किसी पर गाज गिर रही है… शाम छह बजे से रात ग्यारह बजे तक कोई खबर नहीं मिलेगी… वहां उस वक्त मिलेंगे पासपोर्ट साइज़ के फोटो में, जुबान हिलाते, दिमाग का दही बना देने वाले नेता.. उस बहस का कोई नतीजा न तो शासन तंत्र पर दिखता है और न ही सरकार पर… खबर तो गायब हो ही गयी, अब वीकेंड पर ऐसे शो आ गये जो बेहद ऊबाऊ हैं…

क्यों गिरा दिया टीवी चैनल्स ने अपना स्तर? खर्चा कम करने के लिए सभी चैनल्स ने अपने आप को खबरों से क्यों दूर कर लिया? क्या यहाँ भी मनमोहन सिंह की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी? चैनल से कई धुरंधरों को बाहर का रास्ता दिखला दिया गया है… एक बड़े चैनल से तीन सौ लोग बाहर कर दिये गये… एक तरफ कुमार मंगलम, अरुण पूरी के बीच सौदे ३५० करोड़ में होने की खबरें आती हैं तो साथ ही कई लोगों को चैनल की नौकरी ख़त्म होने की खबरें भी आती हैं… सन २००० के आसपास स्ट्रिंगर को खबर भेजने के पांच हज़ार रूपये मिलते थे जो अब घट कर पांच सौ रह गए… रिपोर्टर का वेतन कई गुना बढ़ गया… चैनल में बैठे कई लोग कहाँ से कहाँ पहुँच गए… क्या सभी ने ऐसी कोई नीति बना ली कि सरकार के खिलाफ मीडिया बेअसर दिखलाई दे? राहुल, सोनिया से बाहर भी कोई दुनिया है… मोदी से भी दूर भी कोई दुनिया है… आसाराम के अलावा भी कुछ भारत देश में घट रहा है… सूखा, पानी की कमी और हाँ देश भर में प्याज, रसोई गैस, महंगाई पर सरकार कुम्भ करण नींद में है… मीडिया सोया है.. उसे स्ट्रिंगर से खबर लेनी नहीं… टीवी न्यूज़ चेनल एक दूसरे की देखा देखी कर रहे हैं..

न्यूज़ चैनल से आम आदमी की खबर दूर हो गयी है… नेशनल न्यूज़ मीडिया मुबई, दिल्ली या एनसीआर तक सिमट कर रह गया है और वो भी खास तबके तक जहाँ विज्ञापनों का असर दिखलाई देता है… पिछले दिनों एक खबर पर किसी ने चर्चा की… उधम सिंह नगर (उत्तराखंड) में एक बिल्डर ने हेराफेरी करके लोगों को मकान की रजिस्ट्री नहीं करवाई… खबर बनी… बिल्डर कम्पनी का वर्जन लेना था.. कम्पनी प्रतिनिधि ने बोला कि वर्जन दिल्ली से मिलेगा.. दिल्ली संपर्क किया तो वहां बन्दे ने स्ट्रिंगर का नाम, फ़ोन नंबर पूछा. कुछ वक्त बाद चैनल से स्ट्रिंगर को फ़ोन आता है कि तुम क्यों उनसे पैसा मांग रहे हो..? चलो हटो वहां से. चैनल इनपुट हेड की रौबीली आवाज़ सुन स्ट्रिंगर ने जी सर कहा..  अपना सामान समेटा और पापी पेट के सवाल का उत्तर खोजता हुआ वहां से चलता बना.. खबर चलने से पहले ही मार दी गयी.. खबर असरदार बनती तो दर्जनों का भला हो जाता… यहाँ अब क्या कहेंगे? पहले स्ट्रिंगर किसी दफ्तर में जाते थे चाय पानी पूछा जाता था… अब बैठने को कुर्सी तक नहीं मिलती… अधिकारी अपनी सेटिंग से सब काम कर रहा है.. उसे भी मीडिया की परवाह नहीं… क्यों? स्पीड न्यूज़ का असर नहीं… उल्टा अधिकारी व्यंग्य कसने लगे हैं… खबर तो आपकी दिखती नहीं.. बात भी सही है… स्पीड न्यूज़ में बाईट दिखती नहीं तो फिर हम काहे टाइम ख़राब कर रहे हैं?

सवाल ये भी कि खबर की परिभाषा बदल गयी है… कब, क्यों, कहाँ ,कैसे, किसने, क्या… किताबों तक सिमट कर रह गया है? क्या अब केवल सूचना देना मात्र ही खबर है? बरहाल खबर फ़िलहाल समझ से दूर है और इस दूरी का फ़ायदा चैनल को नहीं, बल्कि भ्रष्ट शासन, नौकरशाही, सफ़ेदपोशों को मिल रहा है और समाज मीडिया को कोस रहा है… ये कह कर कि तुम भी मिल गए हो इन लूट घसोट करने वालों से.. ऐसा सुन कभी कभी दम घुटने लगता है, मन में बहुत कुछ है, भड़ास निकल रही है.. धीरे धीरे …

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं और एनडीटीवी से जुड़े हुए हैं.

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