आयाराम गयाराम मुख्यमंत्रियों के चलते नौकरशाही हो रही बेलगाम

01 फरवरी 2014 को केंद्र सरकार में जल संसाधन मंत्री हरीश रावत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन गए। इस तरह 13 सालों में सत्तारूढ होने वाले वे आठवें मुख्यमंत्री हैं। 08 दिसम्बर को चार राज्यों के विधान सभा चुनावों में सूपड़ा साफ़ होने के बाद कांग्रेस में जो बेचैनी और उथलपुथल हुई, उसकी पदचाप दबे पाँव उत्तराखंड में भी सुनाई दे रही थी। उक्त चुनाव परिणामों के बाद दिल्ली व छत्तीसगढ़ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बदले गए और चर्चाओं के गर्म बाजार में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की विदाई तय बतायी जाने लगी थी। उत्तराखंड में ऐसी चर्चा होना कोई नयी बात नहीं है। बल्कि राज्य के बनने से लेकर आज तक, बीते तेरह सालों में ऐसी चर्चाएं आम तौर पर होती ही रही हैं। यही वजह है कि इन तेरह सालों में राज्य ने आठ मुख्यमंत्री बदलते देखे। मुख्यमंत्री बनाओ, मुख्यमंत्री हटाओ का यह खेल राज्य बनने के साथ ही शुरू हो गया था।

नौ नवम्बर 2000 को जब राज्य बना और भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार बनी तो मुख्यमंत्री के तौर पर नित्यानंद स्वामी के नाम की घोषणा होते ही भाजपा के भीतर से विरोध के स्वर भी उठाना शुरू हो गए। भगत सिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल निशंक ने तो मंत्री पद की शपथ तक लेने से इनकार कर दिया। बाद में इन्होने शपथ तो ली पर नित्यानंद स्वामी को हटाने का अभियान भी अंदरखाने चलता रहा। भाजपा के लोग ही प्रचारित करते रहे कि नित्यानंद स्वामी तो हरियाणा के मूल निवासी हैं। और आखिरकार नित्यानन्द स्वामी की मुख्यमंत्री पद से विदाई हो गयी। वे मुख्यमंत्री पद पर एक साल भी नहीं रह पाए थे कि भाजपा की अंदरूनी उठापटक के चलते उन्हें हटाकर भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। यह कामचलाऊ सरकार थी।

बाकी काम इसने चलाया हो ना चलाया हो पर दो मुख्यमंत्री जरूर चला दिए और साथ ही चला दी मुख्यमंत्रियों के आया राम-गया राम होने की परम्परा। 2002 में राज्य की विधानसभा का पहला चुनाव हुआ। कांग्रेस को बहुमत मिला। एनडी तिवारी मुख्यमंत्री बनाये गए। तिवारी के नाम के ऐलान के साथ ही देहरादून में कांग्रेसियों ने उनके पुतले जलाए। उस समय हरीश रावत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी थे। पांच साल के कार्यकाल में तिवारी की मुख्यमंत्री पद से विदाई की चर्चाएँ गाहे-बगाहे चलती रही। वे खुद भी बीच-बीच में पद छोड़ने का शिगूफा छोड़ते रहते और उन्हें राज्यपाल से लेकर उपराष्ट्रपति तक बनाये जाने के अफवाहनुमा चर्चाएँ भी राजनीतिक गप्पबाजों की महफ़िल से अखबार-टीवी के समाचारों तक उड़ती रहती।

2007 में विधानसभा का दूसरा चुनाव हुआ। उत्तराखंड क्रांति दल और निर्दलियों के समर्थन से भाजपा ने सरकार बनायी और भुवनचन्द्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा राज्य की पाँचों लोकसभा सीटें हार गयी। खंडूड़ी मुख्यमंत्री पद से हटाये गए और रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ मुख्यमंत्री बनाये गए। खंडूड़ी के मन में मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने की टीस, निशंक सरकार पर कुम्भ आदि कई मामलों में घोटालों के आरोप, देश में चलने वाले भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन और भाजपा के भीतर के उठापटक पृष्ठभूमि के कारण विधानसभा चुनावों के 6 महीने पहले सितम्बर 2011 में भुवन चन्द्र खंडूड़ी पुनः मुख्यमंत्री पद पर आरूढ़ हुए। विधानसभा चुनाव के बाद मार्च 2012 में उत्तराखंड क्रांति दल, बसपा और निर्दलियों के सहारे कांग्रेस ने सरकार बनाई। मुख्यमंत्री के तौर पर विजय बहुगुणा के नाम की घोषणा होते ही कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी खुलकर सामने आ गए। तब केंद्र में मंत्री हरीश रावत के समर्थक विधायक तो कई दिन तक विधान सभा में शपथ ग्रहण में तक नहीं गए। पहले पहल हरक सिंह रावत भी बागी तेवर अख्तियार किये रहे,बाद में उन्होंने मंत्री पद की शपथ ले ली। हरीश रावत को काबू में करने के लिए उनके समर्थकों को मंत्री पद, विधानसभा अध्यक्ष का पद और राज्यसभा की सदस्यता दी गयी। ऊपर से सब शांत हो गया। लेकिन हालिया नेतृत्व परिवर्तन ने साफ़ कर दिया कि उपरी तौर पर सब सामन्य होने का अहसास महज एक दिखावा था।

उत्तराखंड के तेरह सालों में मुख्यमंत्रियों बनने-बदलने की उपरोक्त दास्तान साफ़-साफ दर्शाती है कि राज्य में अब तक बना कोई एक भी मुख्यमंत्री ऐसा नहीं हुआ, जिसकी सर्वस्वीकार्यता रही हो। हर बार मुख्यमंत्री के नाम के ऐलान के साथ जो झगड़ा-रगड़ा शुरू होता है, वह सरकार का कार्यकाल ख़त्म होने पर ही निपटता है। राज्य में अब तक सत्ता की अदला-बदली कांग्रेस और भाजपा की बीच ही होती रही है। इस तरह देखें तो एक किस्म की स्थिरता है। देश के बाकी राज्यों में यदि कहीं सरकारें अस्थिर होती हैं तो इसलिए कि वहां किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता और जोड़तोड़ की सरकार बनती है। उत्तराखंड में कांग्रेस तथा भाजपा की सरकारों में शामिल रहे निर्दलीयों या उक्रांद या बसपा ने कभी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश नहीं की। बल्कि ये कांग्रेस-भाजपा की अंदरूनी उठापटक है जो मुख्यमंत्री की कुर्सी को हमेशा डांवांडोल किये रहती है।

लेकिन सवाल है कि ऐसा होता क्यूँ है? दरअसल कांग्रेस-भाजपा में आंतरिक लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है। यहाँ दिल्ली में बैठा हुआ ऊपर का नेतृत्व(जिसे ये हाईकमान कहते हैं) वही सब कुछ है। विधायक दल का नेता चुनना विधायकों का अधिकार है। लेकिन चुनाव होते ही विधायकों के इस अधिकार को हाईकमान बंधक बना लेता है और इन विधायकों से यह बयान भी दिलवा देता है कि “हाईकमान जिसे नेता चुन लेगा, वह हमें मंजूर होगा”। तो जाहिर सी बात है कि मुख्यमंत्री बनने के लिए विधायकों का समर्थन नहीं, हाईकमान का वरदहस्त ज्यादा आवश्यक है। उत्तराखंड में अब तक जितने भी मुख्यमंत्री बने, वे विधायकों द्वारा चुने हुए विधायक दल के नेता नहीं बल्कि हाईकमान के कमान से निकले हुए तीर थे, जिनमें या तो धार थी ही नहीं और जो थी, उसे भोथरा करने में उनके ही “अपनों” ने कोई कसर नहीं छोडी। इसलिए यह तय है कि हाईकमान के कमान से छोड़े गए तीर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक तो पहुँच जायेंगे परन्तु बाकि ये किसी काम के साबित ना होंगे।

राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर लगातार मचे रहने वाली इस रार को के पीछे एक वजह कांग्रेस-भाजपा के नेताओं की अति महत्वाकांक्षा भी है। इन पार्टियों में जनहित की राजनीति करने के लिए तो कोई भर्ती होता नहीं है। बल्कि ये तो कारोबार है, जिसमे लोग निवेश करते हैं तो सूद-ब्याज सहित निवेश वापस तो चाहते ही हैं, साथ ही सत्ता का डिविडेंड भी चाहते हैं। इसलिए इन पार्टियों में हालत यह है कि हर विधायक मंत्री बनना चाहता है और हर बड़ा क्षत्रप मुख्यमंत्री। परन्तु मंत्री बन सकते हैं केवल ग्यारह और मुख्यमंत्री मात्र एक। धंधे में घाटा कौन बर्दाश्त करेगा? सो जूतमपैजार मची रहती है, मुख्यमंत्रियों की कुर्सी डोलती रहती है। मुख्यमंत्री जाए या ना जाए पर आया राम-गया राम का जाप चलता रहता है।

इस अस्थिरता की सर्वाधिक मार तो राज्य की जनता पर ही पड़ती है। जनोन्मुखी विकास, पलायन से निजात, बेहतर शिक्षा रोजगार, स्वास्थ्य के अवसर, जैसे अलग राज्य आन्दोलन के दौरान देखे गए तमाम सपने धराशायी हो गए हैं। जब मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने की कोई गारंटी ना हो तो नौकरशाही का बेलगाम होना लाजमी है। राज्य बनने के बाद अब तक आम तौर पर इस राज्य का सर्वाधिक प्रत्यक्ष लाभ नौकरशाही को ही हुआ है। ऊपर से हिलते-डोलते मुख्यमंत्री के सिंहासन ने तो उनकी पौ बारह ही कर दी है। चौबीसों घंटे अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लगा मुख्यमंत्री नौकरशाही पर लगाम नहीं कस सकता है। नौकरशाही बेलगाम होगी तो आम जनता को अपने काम करवाने  के लिए नाकों चने चबाने पड़ते हैं। मुख्यमंत्री की लगातार डोलते गद्दी नौकरशाहों के लिए मनमानेपन और कामों में लापरवाही की छूट दे रही है। हालत यह है कि केंद्र से आने वाले नीतिगत और विधायी मामलों की जानकारी भी नौकरशाह सरकार तक नहीं पहुंचा रहे हैं, जिसके चलते सरकार की फजीहत होती रहती है। गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी तक को ईको सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने का राजपत्र भारत सरकार ने दिसम्बर 2012 में जारी कर दिया, लेकिन राज्य सरकार को इसकी जानकारी महीनों बाद अप्रेल 2013 में समाचार पत्रों के जरिये ही हो सकी। जाहिर सी बात है कि यह गजट नोटिफिकेशन नौकरशाही के पास तो पहुंचा ही होगा। या तो नौकरशाही ने केंद्र से आये इस राजपत्र को स्वयं ही नहीं देखा या फिर देखकर भी सरकार तक पहुंचाने की जहमत नहीं उठायी। दोनों ही स्थितियां नौकरशाही की लापरवाही और मनमानेपन को तो उजागर करती है। इसी तरह की स्थिति तब पैदा हुई जब अक्टूबर 2013 में उपलोकायुक्त नियुक्त करने की कोशिश विजय बहुगुणा सरकार ने की ऐन शपथ ग्रहण से पहले मालूम पडा कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के लिए गया लोकायुक्त विधेयक जो उत्तराखंड विधानसभा से 2011 में पारित हुआ था, राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होकर आ चुका था और उसमें उपलोकायुक्त का पद ही नहीं है। यह विधेयक भी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद उक्त शपथ ग्रहण की तिथि से डेढ़ महीने पहले ही आ चुका था और इसे सरकारी प्रेस में प्रकाशन हेतु भी भेज दिया गया था, लेकिन सरकार तक इसकी सूचना पहुंचाना नौकरशाही ने जरुरी नहीं समझा। इस बारे में प्रमुख सचिव(विधायी) के.डी.भट्ट का बयान नौकरशाही के मनमानेपन को साफ़ उजागर करता है। सरकार को सूचित ना करने की गलती स्वीकार करने के बजाय उन्होंने कहा कि उपलोकायुक्त की नियुक्ति से पहले विधि मंत्रालय से पूछा ही नहीं गया। साथ ही बेहद बेतकल्लुफ अंदाज में उन्होंने कहा कि भविष्य में इस तरह के प्रकरण सामने आयेंगे तो गजट नोटिफिकेशन से पहले सरकार की जानकारी में लाये जायेंगे।

राज्य में नौकरशाही के मनमानेपन की हालत यह है कि वो खुलेआम सरकार के आदेशों की अवहेलना तक कर लेते हैं। विजय बहुगुणा ने मुख्यमंत्री के अपने कार्यकाल में जब कुछ अधिकारियों के तबादले किये तो उक्त अधिकारियों ने पदभार ग्रहण करने से इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री के आदेशानुसार चमोली के जिलाधिकारी पद पर दीपक रावत की नियुक्ति हुई पर उन्होंने उक्त पद पर जाने से साफ़ इनकार कर दिया। बाद में उनकी यह नियुक्ति निरस्त कर उन्हें कुमाऊं मंडल विकास निगम का महानिदेशक नियुक्त किया गया तो उन्होंने खुशी-खुशी पदभार ग्रहण कर लिया। इसी तरह आईपीएस अधिकारी अभिनव कुमार की नियुक्ति तत्कालीन पौड़ी रेंज(अब यह रेंज समाप्त कर दी गयी है) में डीआईजी के तौर पर की गयी पर उन्होंने देहरादून से बाहर जाने से दो टूक शब्दों में इनकार कर दिया। अब वे डेपुटेशन पर केंद्र में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर के ओएसडी के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसी तरह एक अन्य अधिकारी को एसपी पौड़ी नियुक्त किया गया तो उन्होंने भी आने से इनकार कर दिया। आईएएस और आईपीएस अधिकारियों द्वारा इस तरह खुलेआम मुख्यमंत्री के आदेशों की नाफ़रमानी करने के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि मुख्यमंत्री के स्वयं अगले दिन अपने पद पर रहने की कोई गारंटी नहीं है। कमजोर राजा पर प्यादे आँखें तरेरेंगे ही।
   
ऐसे अस्थिर हालात में राज्य के लिए किसी दीर्घकालीन और सुचिंतित विकास के रोडमैप का बनना भी नामुमकिन है। जिनके लिए राजनीति निवेश कर लाभ कमाने का जरिया है, वे विकास की दीर्घकालीन और जनपक्षधर नीति वैसे भी नहीं सोच सकते। लेकिन चौबीसों घंटे अपनी कुर्सी बचाने के फेर में लगे हुए मुख्यमंत्री से तो ऐसी अपेक्षा करना बेमानी है। विरोधी गुटों को मैनेज करने से लेकर हाईकमान की गणेश परिक्रमा से फुर्सत मिले तो वो कुछ और सोचें। हरीश रावत के नाम के ऐलान से पहले गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज और उत्तराखंड सरकार ने कैबिनेट मंत्री उनकी पत्नी अमृता रावत ने जैसे तीखा विरोध किया, उसने ये  संकेत तो दे ही दिए हैं कि मुख्यमंत्री पद की रस्साकशी आगे भी जारी रहने वाली है।
   
हालांकि
विजय बहुगुणा की नौकरशाहाना कार्यशैली और पिछले साल जून में आई आपदा से निपटने में उनके संवेदनहीन रवैये के चलते जनता में भी उनको लेकर आक्रोश था। इसके अलावा अपने कार्यकाल के दौरान अधिकाँश समय वे दिल्ली में रहे, यहाँ तक कि भीषण आपदा के समय भी वे दिल्ली ही थे और आपदा के बचाव, राहत कार्यों की स्वयं निगरानी करने से बजाय उन्होंने दिल्ली दौरों को ही ज्यादा तवज्जो दी। लेकिन उन्हें हटाये जाने के कारणों में उनका यह जनविरोधी रवैया नहीं बल्कि कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक प्रमुख कारक है। यही बात अन्य मुख्यमंत्रियों पर भी लागू होती है कि उनके शासनकाल में जनता के प्रति संवेदनहीन रुख, सरकारी धन की बंदरबांट आदि तमाम बातें होने के बावजूद जब भी उन्हें हटाया गया तो जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का ठीक से निर्वहन न करने की सजा के तौर पर नहीं हटाया गया बल्कि पार्टी के भीतर विरोधी गुटों को ठीक से मैनेज न कर पाने के लिए ही हटाया गया।
 
लोकतंत्र को इस प्रहसन में 13 साल आठ मुख्यमंत्री और जनता के लिए नतीजा सिफर, यही उत्तराखंड का गणित है।

 

इन्द्रेश मैखुरी

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