गांव-गिरांव की चुनावी चर्चाः तब नेता होते थे अब लुक्खों की फौज है

16वीं लोकसभा चुनाव की रणभेरी क्या बजी, उसका असर शहर कस्बे से लेकर गांव-गिरांव तक दिखने लगा है। शहर के नुक्कड़, गांव गली-गलियारे व खेत खलिहान चारों तरफ एक अजीब सा रंग दिखने लगा है। चुनावी चर्चा और कयासबाजी तेज है। सियासत भी अजीब-सी होती है। चुनाव आयोग के ऐलान के बाद दलों ने उम्मीदवार सामने ला पटके। ले दही, ले दही….हमारा माल चोखा, हमारा माल चोखा है, नहीं, नहीं हमारा माल उससे भी बड़ा चोखा। लीजिए चखकर तो देखिए। चखने का कोई पैसा नहीं। एक अजीब सी नौटंकी।

बहुत पहले, बचपन में ग्रामोफोन पर एक गाना सुनने को मिलता था-‘माल बाटै बड़ा चोखा, करूजेऊ देबै ना धोखा।’ वो तो एक गाना था, पर राजनीति में तो धोखा ही धोखा है। नेता चुनने के बाद जनता को धोखा, टिकट देने में धोखा, टिकट कटते देख पार्टी को धोखा। चुनाव में हालत पतली देख क्षेत्र बदलने का धोखा। वादा कर उसे पूरा न करने का धोखा…। फिर एक गीत का मुखड़ा-‘बाबूजी धीरे चलना…जरा संभलना, बड़े धोखे हैं इस राह में।’ सियासत के इस धोखेबाजी वाले खेल-तमाशे के बीच जनता होशियार हो चुकी है। वो चुपचाप बगैर शोरगुल के निर्णय सुनाने के मूड में दिख रही है।

छह दशक से ज्यादा समय गुजर गया। कभी गरीबी हटाओ, कभी हरित क्रांति, कभी बेरोजगारी हटाओ, कभी मंदिर बनाओ, कभी मनुवाद हटाओ से लेकर न जाने किस किस को हटाने के नारे बुलंद हुए। नेता आए वोट मांगे, जीते तो हारे तो। चुनाव के बाद ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग। चुनाव खत्म, मुद्दे खत्म। फिर चुनाव आने के बाद कभी वही नेता कभी दल बदलकर आए तो कभी रूप-रंग बदलकर। ठगी-लुटी जनता इनको जहर के घूंट की तरह गले के नीचे उतारने को मजबूर हो जाती है। बहलाने, फुसलाने, गलतियों के लिए माफी मांगने, एक मौका और देने की मनुहार, लालच, प्रलोभन, जाति बिरादरी की दुहाई से लेकर डराने, धमकाने तक के हथकंडे प्रयोग कर किसी तरह वोट गिरवा लेने की कोशिश।

वोट डालने का अधिकार बताने वाले सरकारी प्रचार-प्रसार, राजनैतिक दलों, प्रत्याशियों, समर्थकों, अनुषांगिक संगठनों, वोट मांगने वाली टोलियों से लेकर फर्जी मतदान, बूथ कैप्चरिंग यानि सबको मिलाकर पचास फीसदी से भी कम होने वाली वोटिंग। सोंचिए अगर इतना ज्यादा प्रयास न किया जाए तो शायद पंद्रह फीसदी वोट पड़ना मुश्किल हो जाए। वह भी शायद दर्जनों की संख्या में चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी, विभिन्न दलों के नेता, पदाधिकारी, कार्यकर्ता, दलों के समर्थक, उनके रिश्तेदार-नातेदार, साड़ी, दारू, नोटों की नगदी, बंबा, खड़ंजा, बिजली; सोलर लाइट्स की लालच में वोट डालने को मजबूर लोगों के अलावा इनको वोट देगा कौन? यह दिनोंदिन वोटरों का वोट देने के प्रति घटता रूझान भविष्य के लिए किसी खतरनाक संकेत से कम नहीं है? इस सवाल का जवाब सोरांव तहसील क्षेत्र के बनई का पूरा गांव निवासी 87 वर्षीय बुजुर्ग जगदेव महतो देते हैं।

खेतिहर जगदेव महतो उन बुजुर्ग वोटरों में से हैं जिन्होंने पहली लोकसभा के लिए जवाहर लाल नेहरू को फूलपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद चुनकर भेजा था। उसके बाद भी जगदेव महतो ने यहां से डॉ. राम मनोहर लोहिया, विजय लक्ष्मी पंडित, प्रभुदत्त ब्रम्हचारी, वीपी सिंह, छोटे लोहिया के नाम से विख्यात जनेश्वर मिश्र आदि को चुनाव लड़ते और नेता बनते-बिगड़ते देखा है। अपना अनुभव बयां करते समय जगदेव जैसे किसी दूसरी दुनिया में खो जाते हैं। झुर्रीदार चेहरों के बीच बमुश्किल सुतली की डोरी से फंसे पावर चश्मे के गाढ़े शीशे के भीतर झांकती बेचैन-सी दिखती आंखों से दर्द उड़ेलते, टीस जाहिर करते हैं-वोट तो देना ही पड़ेगा, हम नहीं डालेंगे तो कोई बेईमानी से हमरा वोट डाल ही लेगा।

अनुभव साझा करने के दौरान अचानक हो चले भारी भरकम माहौल को सामान्य करने की गरज से हमें तंज करने को मजबूर होना पड़ा-दादा, सुतली से फंसाए गए चश्मे सरीखे कहीं आप भी तो नहीं फंसे हैं लोकतंत्र के इस उत्सव में। ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे गाने की बोल की तरह। सुनकर जगदेव महतो के साथ अगल-बगल बैठे अन्य लोग भी ठहाके लगाकर बोझिल माहौल को हल्का फुल्का कर लेते हैं। बातचीत का सिलसिला दुबारा शुरू होते ही अहम सवाल-अपने लंबे जीवन काल में तब के चुनाव और अब के चुनाव में किस तरह का फर्क देख रहे हैं? तड़ से जवाब मिलता है-तब नेता होते थे अब लुक्खों की फौज है। राजनीति का ककहरा न जानने वाले भी बड़के नेता बन वोट मांगने आ रहे हैं। महतो धीरे से बुदबुदाते हैं-ठगहार कहीं के। जगदेव महतो बताते हैं-तब साइकिल, बैलगाड़ी और इक्का पर चढ़कर नेता वोट मांगने आते और हम सब खुशी मन से वोट डालने भी जाते पर अब तो काफी कुछ बदल गया। महतो के शब्दों में-‘सब कुछ तेजी से बदलि गवा बेटवा। अब के नेता तो उन नेतवन के बार, बालद्ध भी नाहीं।’ जगदेव महतो बताते हैं-तब दो विरोधी प्रत्याशी भी अगर दरवाजे पर आ गए तो एकै खटिया पर दोनों साथ-साथ बैठते और अपनी बात कहते और खुशी मन से वापस लौटते। अब तो एक से बढ़कर एक झकाझक गाड़ी, अंदर बाहर उतने ही असलहाधारी जैसे जनता के प्रतिनिधि नहीं डकैतों का दल। बच्चे दूर से ही देखकर डर जावें।
 
बहरहाल, इस बार चर्चा केवल गांव-देहात की। गांव-गली-टोले-मोहल्ले, खेत खलिहान से लेकर हाट, बाजार, चाय-पान के अड्डों पर जहां देखो वहीं चुनावी चर्चा। जीत हार के तरह-तरह की कयासबाजी। किस बिरादरी का वोट किसके साथ। कहां लगेगी सेंध, किसके सिर बंधेगा जीत का सेहरा, कौन होगा चारो खाने चित्त, कौन प्रत्याशी कितना बड़ा रंगबाज, किसका ज्यादा भौकाल। किसके पास काली कमाई का भंडार, असलहे वाहनों का भारी भरकम बेड़ा। बहरहाल, कहीं फिल्मी हीरो-हीरोइन, क्रिकेटरो के ग्लैमर का छौंक है तो कहीं माफियाओं का ‘नेता-अवतार’ है, कहीं दलबदलुओं का सहारा है तो कहीं धन पशुओं काली कमाई वाली नोटों की लहराती गड्डी है। जनता के ‘जनसेवकों’ की बाढ़ आ गई है। चार साल तक जनता-जनार्दन से दूर, काले शीशे वाले वाहनों से मुंह छिपाकर बगल से गुजर जाने वाले नेता लोग नए रंग रोगन के साथ जनता के हितैषी बनने का स्वांग रचते हुए एक बार फिर से जनता के बीच हैं। चुन लीजिए, दुर्भाग्य से लोकतंत्र की सबसे बड़ी अदालत संसद में चुनकर भेजने के लिए यही हैं। इन्हीं दलबदलुओं, मौकापरस्त, जनता से आंख चुराकर मिलने वाले इन भाग्य विधाताओं में से ही किसी एक को सड़े गले टमाटर-अंडों की तरह चुनना है इस बार भी लोकतंत्र के तथाकथित लोक उत्सव में। काहे कि, राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है…।

 

लेखक शिवाशंकर पांडेय इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेखक दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान में रह चुके हैं। अब स्वतंत्र लेखन। संपर्कः 09565694757

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