दक्षिणा प्राप्त टीवी चैनल्स की कृपा के बाद भी मोदी काशी से हार गए तो?

राजनीति में बड़ी मेहनत लगती है और किसी राष्ट्रीय पार्टी से टिकट पाने में तो मुद्दतों बाद मौक़ा मिलता है। गांधी परिवार को छोड़ कर बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो बहुत कम राजनीतिक सफ़र में बड़ा मुक़ाम हासिल कर लें। मगर नरेंद्र मोदी उस पायदान पर, आज, खड़े हैं। महज़ 15-20 साल में। आडवाणी जी जैसे तो 50 साल बाद भी "दिल की तमन्ना दिल में रहेगी" गुनगुनाते रह गए और उनके चेले, नरेन्द्र मोदी, आज प्रधानमंत्री पद की रेस में सबसे ऊपरी पायदान पर हैं।

बरसों मुल्क़ की खाक़ छानने की बजाय, मीडिया की पीठ पर सवार होकर मोदी ने थोड़े समय में खूब नाम कमाया और अब काशी/ वाराणसी/ बनारस से 2014 लोकसभा का चुनाव लड़ेंगें। मोदी राजनीति के अच्छे जानकार भले ही न हों, मगर, शातिर राजनीतिक चालों के मसीहा हैं। उनका मीडिया विंग बड़ा धाँसू है। ढेर सारे बुद्धिजीवी, मोदी को भारत का भाग्य-विधाता बता रहे हैं। इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के देवाधि-देव महादेव की नगरी काशी से, भारत भूमि के तथाकथित "विधाता", नरेन्द्र-मोदी, अपनी किस्मत आजमाने जा रहे हैं। वाराणसी के वर्तमान सांसद, मोदी के सीनियर, मुरली मनोहर जोशी को ज़बरदस्ती कानपुर धकिया दिया गया है। उनकी जगह मोदी को दी गयी। काशी में मोदी का स्वागत है। वाराणसी यानि काशी यानि बनारस, आध्यात्मिक जगत का सिरमौर भले ही हो मगर सांसारिक विकास की दृष्टि से बदहाल है।

पत्रकार बंधू जाकर इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि कांग्रेस के डॉ. राजेश मिश्रा और भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने शहर के विकास में बतौर सांसद क्या भूमिका अदा की। जवाब मिलेगा कि दोनों किसी काम के नहीं। पिछले 1 दशक में दोनों सांसद महज़ औपचारिक प्रतिनिधी बने रहे। विकास से सरोकार ना के बराबर। ऐसी स्थिति में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का बनारस से चुनावी ताल ठोंकना बेहद जोखिम भरा फैसला है। भाजपा-कांग्रेस-बसपा के अलावा समाजवादी पार्टी की भी इस शहर में गहरी पैठ है।

यहाँ मुक़ाबला तो कड़ा होगा ही, परिणाम भी चौंकानें वाले होंगें। मोदी भक्त मीडिया, इस बात को ख़ास तवज्जो नहीं दे रहा है। "जीवन जब तक है – मस्ती से जियो " – ये काशीवासियों का शायद अनुवांशिक अंदाज़ है। लखनवी तहज़ीब से बेख़बर ये शहर अपने अंदाज़ में जीता है, मगर इसका खामियाज़ा भी इसी शहर के लोग उठाते हैं। यहाँ की बदहाल व्यवस्था से बेख़बर यहाँ के जनप्रतिनिधि दिल्ली-लखनऊ में ज़्यादा वक़्त ज़ाया करते हैं और भोलेनाथ के भरोसे इस शहर को छोड़े रहते हैं। पर बदलते वक़्त के साथ यहाँ के लोगों का मिजाज़ भी बदला है, लिहाज़ा इस सीट को अपने लिए "सुरक्षित" मानना दुस्साहस होगा। ये बात इसी शहर की कभी तहसील रहे चंदौली (जो अब जिला है) क्षेत्र के राजनाथ सिंह बखूबी जानते हैं।

"दक्षिणा" प्राप्त कई टीवी चैनल्स पूरे देश में भाजपा की आंधी भले ही चला रहे हों पर खुद भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने गृह क्षेत्र से चुनाव लड़ने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाये, क्योंकि वो टीवी स्टूडियो में बैठ कर लफ्फाज़ी करने वाले पत्रकार नहीं बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त से रु-ब-रू नेता हैं। ऐसी स्थिति में मोदी बनारस से चुनाव लड़ रहे हैं। रिस्क ले रहे हैं। मोदी का राजनीतिक और मीडिया प्रबंधन भी इस शहर से चुनकर उन्हें दिल्ली का तख्तो-ताज़ सौंपना चाहता है। मगर क्या पता एक युवा गुमनाम उम्मीदवार, मोदी को हराकर भाजपा और "दक्षिणा" प्राप्त कई टीवी चैनल्स के नमो-कैम्पेन को शर्मसार कर दे।

प्रधानमंत्री पद के लिए तो राज्यसभा का भी रास्ता है, मगर मुल्क़ के सबसे ताक़तवर पद की नुमाइंदगी कर रहा शख्स, गर जन-प्रतिनिधी यानि जनता द्वारा ही चुना गया हो तो ज़्यादा मुनासिब होगा। मोदी जीते या हारें, भाजपा गर बहुमत पाती है तो प्रधानमंत्री पद मोदी की झोली में ही जाएगा। पर ख़ुदा-न-ख़ास्ता मोदी अपनी सीट हार गए तो? क्या नैतिकता के आधार पर मोदी शर्मसार होंगें? क्या मोदी प्रधानमंत्री का पद, अपने गुरू लाल कृष्ण आडवाणी की झोली में डाल देंगें या फिर राजनीति को ता-उम्र अलविदा कह देंगें? ज़मीनी कसौटी पर कसे ये ऐसे अनसुलझे सवाल हैं जो हाइपोथेटिकल तो बिलकुल ही नहीं कहे जा सकते हैं। कहते हैं काशी दुनिया का सबसे पुराना शहर है। देवादि-देव महादेव का शहर, काशी, जीने की ज़िंदादिली और मौत के नज़ारे को बेहद क़रीब से समेटा रहता है। मोदी नाम का शख्स, राजनीतिक मौत के नज़ारे से बे-ख़बर, राजनीति की शातिर ज़िंदादिली का जलवा दिखाने आया है। ख़ुदा ख़ैर करे।

 

नीरज…..'लीक से हटकर'। संपर्कः journalistebox@gmail.com

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