छेड़छाड़, अदालत, आदेश, आटो, उम्र, जीवन और दर्शन…. ओ भोला भाई!

चालीस पार क्या हुआ, लगता है कि कई चीजों से पार होने लगा हूं, या यूं कहिए पार पाने लगा हूं. अपना स्वभाव रहा है कि जितना भी सोच जान समझ बूझ पाया, उस हिसाब से जो नतीजा निकाल पाया, सही या गलत, उसी पर अड़े रहने, बढ़े चलना, और इस गतिमान प्रक्रिया से मिलने वाले झटकों, विफलताओं, चिंताओं, मुश्किलों को एनालाइज करते, झेलते, भांपते, पकड़ते और नतीजा निकालते फिर आगे बढ़ चलना. तो इस तरह अनुभव दर अनुभव, समझ दर समझ, ज्ञान दर ज्ञान मिलता चला जा रहा. चालीस का इसी साल अगस्त महीने की 26 तारीख को हुआ. तीन महीने हुए होंगे चालीस के हुए. पर इन तीन महीनों में कम से कम तेरह ज्ञान मिला होगा.

कुछ प्रमुख बातों को शेयर करना चाह रहा, लिख देना चाह रहा, बता देना चाह रहा, ताकि खुद को मुक्त पा सकूं, खुद को अपग्रेड कर सकूं. आज यानि 26 नवंबर को छेड़छाड़ के एक मुकदमें से बरी हो गया. एक लड़की को चूम लेने की कोशिश का आरोप था. कड़कड़डूमा कोर्ट में यह मुकदमा करीब पांच वर्षों से चल रहा था. कई बार गैर-जमानती वारंट निकले, हाजिर न हो पाने के कारण. हर दो तीन महीने में एक बार पेशी.

जज साहिबा द्वारा लिखे गए फैसले की प्रति पर कोर्ट रूम के बाहर अपनी औपचारिकता पूरी करता कोर्ट में तैनात एक पुलिकर्मी. बगल में खड़े मुल्जिम (अब भूतपूर्व) यशवंत सिंह.


आज जब फैसला सुनाए जाने का दिन था. घर से निकला तो बड़ी मुश्किल से एक आटो वाला कड़कड़डूमा जाने को राजी हुआ. आटो चलने लगा तो ड्राइवर के गर्दन पर मेरी नजर ठहर गई. इस कदर मांस झूल रहा था जैसे कितना बूढ़ा हो. आंख फाड़ फाड़ कर देखता रहा. इतनी झूलती चमड़ी वाला आटो ड्राइवर मैंने आजतक न देखा था. रंग बिलकुल काला. मैंने अंदाजा लगाया, साठ के करीब होगा यह ड्राइवर. पूछ बैठा. उसने बताया 73 साल. मैं चौंक गया.

आटो रुकवाया. उतरा. ड्राइवर के चेहरे को सामने से गौर से देखा. फिर बैठा और चलने को कहा. उनसे जीवन, उम्र, सक्रियता, गरीब, अमीर आदि पर लंबी बात हुई, आटो के भर्रररर करते रहने के दौरान ही. याद आया. हाल में ही एक जहाज यात्रा के दौरान सीट के सामने जहाज कंपनी की तरफ से जो इनहाउस मैग्जीन रखी गई थी, उसमें लंबी उम्र लिए जी रहे लोगों पर कवर स्टोरी थी. दुनिया भर के सबसे ज्यादा जीने वाले लोगों को एनालाइज किया गया था. कई पन्नों का तथ्यपरक लेख था जिसमें जापान से लेकर अमेरिका, चीन, भारत आदि कई देशों के सवा सौ, डेढ़ सौ साल जीने वाले लोगों को एनालइज किया गया था. उनके रहन-सहन, सोच, खान-पीन, कल्चर समेत कई चीजों को पैमाना बनाया गया था. नतीजा ये बताया गया कि लंबी उम्र का एक ही राज है, सक्रियता. एक्सरसाइज से ज्यादा कारगर है एक्टिविटी.

आटो वाला मुझे बिलकुल वही शख्स लगा. अचानक सारे सवाल हल होते दिखे. आटो वाले ने जो कुछ कहा, जैसे लगा कि जहाज पर सवार कोई टीचर नुमा बुजुर्ग शख्स कवर स्टोरी पढ़ने के बाद मेरे मन में उपजे ढेर सारे सवालों को बेहद सरल शब्दों में कानक्लुड कर रहा हो, कहानी का मोरल बता रहा हो, आलेख का उपसंहार समझा रहा हो. गरीब का नंग धड़ंग बच्चा, बिना सुई, बिना दवा, बिना केयर, बिना संरक्षण सबसे ताकतवर तरीके से ग्रोथ पा रहा हो और सारी सुविधाओं से लैस एक साधन संपन्न घर का बच्चा हर जाड़ा-बरसात सारी सुविधाओं के बावजूद छींक पाद रो रहा हो. एक अमीर आदमी उम्र के पचास साठ होते ही अपने अंग दर अंग बदलवाने में लगा हो, हांफते हुए, अवसाद में जीते हुए दुनिया में दुख ही दुख देख रहा हो और अपने को खुश जवान यूथफुल दिखने बनाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हो. एक गरीब आटो वाला 73 साल का होते हुए भी नौजवानों सरीखा उत्साह, आवेग रखे हुए हो और उसके सारे अंग-प्रत्यंग अभी तक फर्स्टहैंड बने हुए हों, बिना दवा, बिना चीरफाड़, यहां तक कि आंख, नाक, कान सब सलामत, टनाटन्न.

कोर्ट पहुंचा. बरी हुआ. बाहर निकला, और अबकी पैदल लौटने लगा, पांच रुपये की मूंगफली तोड़ते, फांकते. गाड़ियों की रेलमपेल, चिल्ल-पों से बेपरवाह सड़क के किनारे किनारे चलता चला गया. सोचते-समझते-समझाते खुद से खुद को.

जीवन में मैंने हमेशा एक्स्ट्रीम पर जिया. तभी तो जिसे दोस्त माना उसे खुद पर पूरा अधिकार दिया. उसके लिए हर कुछ करने को तैयार रहा. पर जब मैंने अपने लिए कुछ मांगा तो दोस्त लगा सिद्धांत बताने. दोस्त नहीं माना तो नहीं माना. उसके अपने तर्क होंगे. उसके अपने तरीके होंगे. ये बीस साल पहले भी हुआ. पांच साल पहले भी हुआ. पांच रोज पहले भी हुआ. पर मैं ही क्यों जिसे दोस्त माना, करीबी माना, उसके लिए प्राण देने की हद तक तैयार रखे रहा. ऐसी मानसिकता क्यों बनाए रखा अब तक? तब भी जब देखा मैंने की मेरे मुश्किल वक्त में कोई काम न आया. जो थोड़े बहुत काम आए भी उनके योगदान को पहाड़ सरीखा माना. छेड़छाड़ का जो प्रकरण कोर्ट तक पहुंचा, उस घटनाक्रम के दौरान जाने कितने लोगों के कितने रंग देखे. जेल जब भिजवाया गया तो उस दौरान कितने रंग देखे सुने.

ऐसे जाने कितने बेहद संवेदनशील समय वक्त हालात से गुजरा… ऐसी विकट स्थितियों मेरे साथ मेरा मन व तन तक न था, ऐसा मुझे लगता रहा तब. लेकिन मैं खुद के उस मृत्यु और क्रियाकर्म के समय को देखते हुए जिंदा होने, राख को बटोर कर फिर से एक शक्ल सूरत तन मन तैयार करने में लग गया. लड़ना और रोना, जारी रहा. हारना और जीतना जारी रहा. मार खाना और पटकना जारी रहा. खुद से और दूसरों से युद्ध जारी रहा. चलता रहा. पर इस प्रक्रिया ने खुद से खुद को मुक्त करना शुरू कर दिया.

कुछ भी मन में नहीं रखा. पुराना जो बीत गया, दुख, सुख, गिले, शिकवे, आरोप, प्रत्यारोप, नाकामी, बदनामी, नाम, पहचान… सब कुछ को पीछे ही छोड़ता गया. जो क्षण सामने था, उसे भरपूर जीता गया, बिना दुनिया, समाज, नियम, कानूनों की परवाह किए, सिर्फ अपने मन-मुताबिक. शरीर ने, मन ने, तन ने, इंद्रियों ने जो जो कहा, करता गया. चुनौतियों ने, मुश्किलों ने, समय ने, परिवेश ने, हालात ने जो कुछ सामने खड़ा किया, उसे पार पाता गया. थका नहीं, क्योंकि थकना आता नहीं, थकान आती नहीं. खत्म नहीं हुआ, क्योंकि जब-जब टटोला खुद में तो भरपूर नयापन पाया, गजब की उदात्तता दिखी, अदभुद उर्जा महसूस किया. सो, नई चाल, नई यात्रा, नई गति पैदा होती रही और मैं हाहाकर समेटे पूरे आवेग से वो करता रहा जो करने को बिलकुल सही सही समझ में आता रहा. फैसले लेने में एक पल की देर नहीं. जाने क्या है, जाने कौन है भीतर जो हिचकने नहीं देता, सोचने नहीं देता, सब कुछ तैयार किए रहता है, पूरा नक्शा तैयार रखता है, पूरा होमवर्क किए रहता है.

कोई ऐसा वक्त नहीं गुजरा जब खुद को नई स्थिति में नहीं पाया. स्थितियों, हालातों, सुखों, दुखों, मुश्किलों, गतियों, रुकावटों.. ऐसे जाने लाखों करोड़ों अरबों जितने भी हों, सभी भावों को पल पल गहरे उतर कर उसके गहनतम अनुभवों को पकड़ा, कस के, फिर छोड़ा, बड़े आराम से. इससे खुद ही हर सवाल का जवाब पाता गया. हर सपने को यथार्थ देख पाया. हर यथार्थ का सपना समझ पाया. जैसे एक बूंद खून के टेस्ट से पूरे शरीर के अंग-प्रत्यंग की स्थिति को समझा जा सकता है, उसी तरह एक-एक सपने और एक-एक यथार्थ को पाकर, छोड़कर सपनों-यथार्थों और इनके बीच के उदात्त सच की एकात्मकता को महसूस किया जा सकता है. फिर क्या है अलग-थलग मेरे में. कुछ भी तो नहीं.

दिमाग की सीमाओं, बोलने की सीमाओं, लिखने की सीमाओं, शरीर की सीमाओं, जीने की सीमाओं, देशों की सीमाओं, धरती की सीमाओं, ब्रह्मांड की सीमाओं, प्रकृति की सीमाओं और इन सभी की उदात्तताओं का एकाकार समझ पाने का कभी कभी भ्रम जब होता है तो लंबी चुप्पी की चादर ओढ़ लेता हूं. सब रुक जाता है दिमाग में.

स्थिर, शांत, जड़वत हो जाता हूं. होने न होने सी स्थिति में पाता हूं. जब इस स्थिति से उबरता हूं तो सोचता हूं कि फिर अब काहें को कहूं, काहें को लिखूं, काहें को देखूं, काहें को खाऊं, काहें को सोऊं, काहें को जिऊं, काहें को मरूं, काहें को हंसूं, काहें को रोऊं, काहें को भागूं, काहें को बैठूं… कुछ भी काहें को…

अनिल यादव का लखनऊ से गायब होना और फिर उनका उत्तराखंड के पहाड़ों के आसपास पाए जाने की खबर का मिलना… उनके पहले शाश्वत जी का देश-दुनिया-दुनियादारी से अलग होकर एकांतवास की राह पर चल पड़ना और उसी में रमे रहना… अब न शाश्वत जी के लिए कोई है और न किसी के लिए शाश्वत जी हैं.. दुनिया वैसे ही हाय हाय वाह वाह कर रही है, जब अनिल यादव लखनऊ में काम पर हुआ करते थे और अब जब अनिल यादव लखनऊ में काम पर नहीं हैं… किसी एक के निष्क्रिय हो जाने से बाकियों के जीवन पर किस तरह का फरक पड़ता है?

सोचता रहा… चलता रहा.. मूंगफली के दाने तोड़ता रहा… सोचता रहा….

कई दिन तक का एकांत जीकर मैं भी लौटा हूं कल ही.. अरे एकांत कहां.. दिन भर एकांत और भड़ास का काम.. शाम होने पर खुद और खुद की पसंद के दो-चार साथी… फिर खाते पीते… पीते खाते… जब पेट से गले तक आया तब गाते खाते पीते… पीते खाते गाते… खाते गाते पीत… फिर गाते खाते पीते नाचते… सब नाचने लगे… मैं मस्त सब मस्त… दुनिया रुक गई जैसे… कष्ट मिट गए जैसे… समय थम गया जैसे… गले मिलने लगे… हंसने लगे रोने लगे… सोने लगे.. जगने लगे..

और अंततः फिर दुनिया सामने.. फिर कठिन सा सब कुछ सामने… यह दुनिया की कठिनाई है या दुनिया मेरे लिए कठिन है… यह सोचते हुए गुमसुम मुद्रा में दिनचर्या शुरू … गुड मार्निंग एवरबडी…

ओहो शाम आ गई… क्या बात क्या बात क्या बात… आजा मेरे भाई… सुन मेरे मितवा रे…. ओ भोला भाई… काहे तू भजन करे… खाते पीते गाते सोते जगते … ओ भोला भाई…. काहे तू भजन करे…. सुन मेरे मितवा रे… सुन मेरे बंधु… सज धज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी… कौन सी मौत की शहजादी आएगी? वो कोई अलग-थलग चीज नहीं जो आएगी और बताएगी कि देख मैं मौत हूं, जिसे तुम शहजादी करके गाते हो और अब चलो मेरे साथ, सोना-चांदी छोड़ कर… सब तो इसी दिनचर्या, जीवनचर्या में ही है यार… जीवन, मौत, मुश्किल, आसान, अच्छा, बुरा, रात, दिन, प्रकाश, अंधेरा, पाप, पुण्य, गीत, गद्य, भूख, भोजन…. ऐसे असंख्य भाव और इन भावों के बीच अपरिभाषित असंख्य भांय भांय… जिसने भावों, भावों के विरोध और भावों के बीच के इन असंख्य भांय भांय को समझ लिया, वो अदभुत है, अकथ्य है, अभाष्य है….

मूंगफली खत्म हो गई पर सड़कें अभी बाकी थीं… चौराहों को पैदल पार करना डरावना होता है, ये चौराहे पैदल वालों से बहुत सजगता, सतर्कता की अपेक्षता करती हैं.. क्योंकि हर मोड़ पर पहियाधारी मशीनें मनुष्यों को लादे खड़ी हैं या चल रही हैं… किसी न बोलने वाले सिग्नल के इशारे के मुताबिक. ऐसे में पैदल धारी को चुपचाप निकल भागना होता है इच्छित मोड़ की तरफ या इसी प्रक्रिया में कुचल जाना पड़ता है इच्छित मोड़ की तरफ जाते-भागते हुए.

मैं निकल गया… एक उंघते आटो पर सवार हुआ और घर चला आया… पता ही नहीं चला कि आटो पर कब बैठा और कब उतरा और कब कितना पैसा देकर विदा किया.. एहसास तक न हुआ… सोचता रहा…

दोस्ती, मुकदमा, काम, आराम, खाना, सोना, हंसना, चलना, जीतना, हारना, हांफना, चिल्लाना, गाना, बूझना, भूलना, उड़ना, बैठना, बताना, सुनना…. वो ये तुम हम आप इधर उधर कहां देखो लिखो चलो करो पाओ दो लो जाओ नहीं हां अच्छा ओके ऐसा तो बहुत मजमा मस्ती माहौल मुद्रा मुट्ठी मौन माया मजबूरी मर्द मुस्कान मतलब मकान सेक्स सत्ता सुधार सूत्र सूचना सुंदर सलामत मौत मरुस्थल मोटर पेड़ पौधे पहाड़ पक्षी जानवर खेत पौधे बच्चे धूप छांव जलेबी आंख हा हा हा हा …. उफ्फफफफ

जाने कितना कुछ है और जाने कितना कम है और जाने कितना रिपीट करता है यह सब बार बार…. धत्त तेरे की… फंसे हुए हैं तब भी…

आइए हम सब रिपीट-पुत्र रिपीट-रिपीट-रिपीट-रिपीट… होते रहें… और, जो न होने को तैयार हो तो अपनी समवेत रिपीटी रपटन में रपेट लें, स्साला… वो कैसे न फिर होगा

रिपीट… बड़ा मुश्किल है रिपीट न होना… बड़ा मुश्किल है रिपीट होते रहना….

जय हो….

बड़ा अजीब है वो जो मुझे मिल रहा है कुछ समय से.. बड़ा सही है वो जो महसूस हो रहा है कुछ दिनों से… लगता है मंजिल की तरफ जा रहा हूं… तभी तो ऐसा हाहाकार मचा है, अंदर-बाहर…

अब सच में न किसी से दोस्ती है, न किसी से दुश्मनी… अब सच में हर किसी से दोस्ती है और हर किसी से दुश्मनी…. अब सच में अपना घर है और हर किसी का घर है… अब सच में न अपना घर है और न किसी का घर है… अब सच में मुझसे किसी को न लेना है न देना है.. अब सच में हर किसी से मुझको लेना देना है… कैसे करुं शिकायत किसी की… कैसे करुं शिकायत खुद की… कैसे करूं तारीफ किसी की… कैसे करूं तारीफ अपनी…

अब बस चुप रहो.. अब बस बोलते रहो… मैं समझ गया हूं, सब समझ गया हूं… मैं नामसझ हूं, मैंने कुछ नहीं समझा… इतना समझदार… इतना नासमझ…

उफ्फ…

बस शांत … शांत ….. शांत…. थक गया हूं…. थोड़ा आराम… क्योंकि फिर हाहाकार होगा… फिर अशांति होगी… फिर चलना है….. तभी तो फिर शांति आएगी, फिर थकूंगा, फिर आराम करूंगा….

अरे मुझे अपनी सात साल पुरानी कार से कल फिर लड़ना है… सड़ चुके टायर ट्यूब एक एक कर बदलवा रहा हूं…. अब बैट्री बोल गई है… कल उसे देखना दिखवाना है… आरसी खो गई है… एनसीआर कटवा लिया है… ओएलएक्स पर बेचने का विज्ञापन लगा दिया है…. मेरठ चलकर डुप्लीकेट आरसी निकलवानी है… अनिल यादव के बारे में पता करना है…. शाश्वत जी से हालचाल लेना है… महीना पूरा हो रहा है किराया देना है… बच्चों को महीनों से घर से बाहर नहीं ले गया, माल में फिल्म दिखाकर बाहर ही खाना खिलाना है… दिसंबर में गांव में शादी में जाना है… वापसी का टिकट तो कनफर्म मिल गया लेकिन जाने का वेटिंग में है… कनफर्म हो पाएगा या नहीं… किसी रेल रिपोर्टर से जुगाड़ लगाना है…. सुबह मिलने आने वाले हैं वो लोग…. रात इतनी देर तक जगा हूं, कैसे उठ पाउंगा… अब सो जाना चाहिए.. पर फेसबुक पर जाने क्या लिख दिया है… देखना है कि किसने क्या कमेंट किया है… भड़ास के काम भी तो कई पेंडिंग हैं… अरे हां, तरुण तेजपाल प्रकरण से मैं जाने क्यों इतना हिला हुआ हूं… अब मान लेना चाहिए कि तरुण तेजपाल अलग आदमी हैं और मैं अलग…. वो चैनल वाले दिखा रहे हैं आप के खिलाफ… मान लेना चाहिए आप वाले अलग हैं और मैं अलग… वो दोस्त ना मेरा कहना नहीं माना…. मान लेना चाहिए दोस्त लोग अलग होते हैं और मैं अलग…. वो सब गलत बोल लिख कह चिल्ला रहे हैं.. मान लेना चाहिए गलत बोलना लिखना कहना अलगत होता है और मैं अलग… वो आटो वाला कितना दार्शनिक लग रहा था… मान लेना चाहिए वो अलग था और मैं अलग… वो पैसा जो उधार लिया है उसे लौटाना है, वो मांग नहीं रहे तो क्या मुझे खुद समय से लौटा नहीं देना चाहिए था… मुझे मान लेना चाहिए वो अलग हैं और मैं अलग हूं और पैसा अलग… वो एनजीसी हिस्ट्री18 डिस्कवरी जो देश दुनिया प्राणी एलियन समुद्र जंतु सेक्स टैबू मैजिक खोज सब दिखाता है…. मुझे मान लेना चाहिए सब कुछ को और सब कुछ में मुझे भी शामिल हो जाना चाहिए…

और, यह भी कि, जहां जहां मैं खुद को अलग मान रहा हूं, वहां वहां के लिए यह भी मान लेना चाहिए कि मैं खुद ही वहां वहां हूं…

मतलब? मतलब? मतलब?

छोड़ो यार… पका डाला… पक गए भी तुम..

हा हा हा

सुन मेरे मितवा रे… सुन मेरे बंधु… ओ भोला भाई.. काहे को भजन करे.. भांय भांय भांय..

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