गांव के सुख-दुख : विपदा, सड़कें, चुनाव और मीडिया

: गांव में चर्चा है इस बार एक बाहुबली प्रत्याशी प्रति वोट हजार-हजार के दो नोट का रेट खोलेगा : जब गांव पहुंचिए तभी पता चल पाता है कि खेती-किसानी में क्या चल रहा है अन्यथा हम शहरी तो खाली वक्त में कामेडी विथ कपिल को न्यूज चैनलों पर देख-देख के हंसते मटकते रहते हैं… कुछ और वक्त बचा तो अपने शहर की अखबारों में छपी शहरी चिंताओं से रूबरू हो पाते हैं… जिन जगहों, जमीनों से हम लोग आए हैं, वहां के हालात के बारे में अखबार और चैनल हम शहरियों से शायद साजिशन बातें नहीं करते…

अब जब गांव आया हूं तो चना-मटर भून कर खाने की अपनी आदिम इच्छा व्यक्त करने लगा तो पता चला कि अभी तो ये फसलें मौत के घाट से लंगड़ाते हुए वापस आई हैं और इन दिनों पुनर्जीवन प्राप्त कर फिर से फूल लेने, मोटाने, गोठाने में लगी हैं… कारण है बारिश, ओले, पत्थर पड़ना…

प्रकृति के बेमौसम रिमझिमाने से किसानों का मन किरकिराने लगा … इस कारण इस बार आलू, अरहर, मटर, चना आदि फसलों पर काफी बुरा असर पड़ा है। बहुत बर्बादी-तबाही हुई है। खुद किसानों को खाने के लिए इन अनाजों को खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है… इनके दाम बढ़ने, चढ़ने को लेकर किसान अभी से आशंकाएं व्यक्त कर रहे हैं। जब फसल ठीकठाक हो जाए तो दाम नहीं मिलते और जब प्रकृति फसल तबाह कर दे तो खूब महंगे दाम पर सब कुछ बिकने लगता है।

इस पूंजीवादी, कार्पोरेट, बाजारू युग की नई दलित कैटगरी का नाम किसान है। लगातार मेहनत करते जाना और इसके नतीजे में घाटा, नुकसान, अपमान, पीड़ा झेलते जाना इनकी नियति है…

मौसम पकने-कटने का है लेकिन प्रकृति पीड़ित मटर और चना अभी तक किशोर भी नहीं हो पाए हैं.. इस फसली गड़बड़ी की खबर ने अपने निजी ग्राम्य भ्रमण सुख में थोड़ी देर तक गड़बड़झाला पैदा किया लेकिन अवसाद को दूर भगाने के हजार तरीके जानने वाले हम शहरी चतुर सुजान के मन-मस्तिष्क ने तुरत फुरत एजेंडा बदल कर काट निकाल लिया… मटर-चना की गैर-मौजूदगी में गेहूं की बालियों पर रीझ गया… पूरा प्यार दिखाते हुए इनको नोचा, भूना और हाथों से रगड़ फूंक कर खा डाला.. सब उदरस्थ करने के बाद हाथ मुंह झाड़ते धोते हुए और कुछ लाइक-कमेंट बटोरू गंवई तस्वीरें फेसबुक के लिए खिंचाते हुए 'अहा गांव यात्रा' सार्थक मान दिल्ली लौटने की तैयारी कर रहा हूं, वाया बनारस…

लेकिन जो गांव में ही रह गया है, रुक गया है, फंसा है, वह जानता है कि गंवई जीवन कैसा है… उनमें संवाद गर्मियों में लंबे हो रहे दिन और पगलाए सोमारू काका के चूतियापों पर केंद्रित है… वरना कई जनों की आपसी मौजूदगी के बीच भी सन्नाटा पसरा रहता है, जैसे सबको सब कुछ पता है, कुछ भी शेष, अज्ञात नहीं.. जो तेरा दुख वो मेरा भी, जो मेरा सुख वो तेरा भी, तो तू क्या कुछ कहे और मैं क्या फिर वही सुनूं…

अहा और आह में बस उतना ही फासला है जितना दिल्ली और दिलदारनगर में। चूंकि अध्यात्म, मोक्ष और मुक्ति से पहले पापी पेट ध्यान भटकाता है और काफी कोलाहल मचाता है इसलिए परेशान हाल किसान अपनी दुर्दशा को लेकर इस अपने कहे जाने वाले देश के शासन, सिस्टम और नीतियों को कभी मन ही मन तो कभी खुल खुल कर गरियाता कोसता है… कोई विकल्प न होने के कारण वोट अंततः धर्म, जाति, शराब, नोट के आधार पर दे आता है… वो ऐलानिया कहता है- जो भी साला जीतता है, वह खुद का विकास करता है, इसलिए इन मादरों से उम्मीद क्या करना… भागते भूत की लंगोटी लीजिए, इनसे जो मिले समेट लीजिए…

कोई कह रहा था कि इस बार एक बाहुबली प्रत्याशी प्रति वोट हजार हजार के दो नोट का रेट खोलने वाला है… बीते विधानसभा में उसने प्रति वोट हजार का एक नोट का रेट खोला था लेकिन बस कुछ ही वोटों से हार गया था… मुझे यह सुनकर जाने क्यों लगा कि लोकसभा चुनाव हर छह महीने पर हो जाने चाहिए ताकि इसी तरह से कुछ धन गांवों में आ जाए और ब्लैकमनी योनि में फंसे धन की आत्मा को साल-दो साल के लिए शांति मिल जाए…
 
पूर्वांचल में सड़के चलने लायक नहीं हैं। चलने लायक न होना कह देना बड़ा सामान्य सा वाक्य लगता है लेकिन जब आप पूर्वी उत्तर प्रदेश की किसी सड़क पर निकलते हैं तो पसलियां और सिर न टकराने, चकराने और चड़चड़ाने लगें तो कहिएगा। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के गांव के इलाके की सड़कें हों या यूपी के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश सिंह के क्षेत्र का राजमार्ग… हर जगह सड़कों के नाम पर आए पैसे को उतारा, बांटा गया और सड़कों को धंसने के लिए छोड़ दिया गया… सड़कें धंस रही हैं, लगातार … सड़कें धूल-धुआं छोड़ उगल रही हैं, बेपनाह… सड़कों पर हम सब हिचकोले खा रहे हैं, हो रहे हैं तारतार….

सड़क बनाने वाले ठेकेदार ज्यादातर माफिया गिरोहों के हैं या इनसे ताल्लुक रखते हैं… और ये आपराधिक ठेकेदार नेता भी हैं, भाजपा या कांग्रेस या सपा या बसपा के झंडे इनके बोलेरो या सफारी या स्कार्पियो पर टंगे, नथे रहते हैं… इसलिए इनसे न तो कोई राजनीतिक पंगा ले सकता है और न ही सामाजिक। आखिर राइफलों, बंदूकों की नालें बड़ी चार पहिया रोबदार गाड़ियों के काले शीशों से झांकती-मुस्कराती जो रहती हैं तो आपको हमको भी मुस्कराकर सलाम ठोंकना पड़ता है इन्हें। ये नई सामाजिक व्यवस्था के हमारे नए बाभन-ठाकुर हैं… कौन पंगा ले और इनके खिलाफ कौन आवाज उठाए… नोटों से खेलने वाले ये ठेकेदार आवाज उठा सकने वाले अन्य माध्यमों यथा प्रेस, पुलिस, प्रशासन, पब्लिक में आपने आदमी बिठा लेते हैं या फिर इन्हें खरीद लेते हैं या मैनेज कर लेते हैं…. इस तरह पूरा लोकतांत्रिक जीवन शांतिपूर्ण तरीके से यथावत चलता रहता है…

मैं भी कहां इस पचड़े में पड़ गया… जिसे मरना है वो मरेगा, जिसे भोगना है वो भोगेगा… मैं तो भागा यहां से… तुम सब मरो किसानों, पूरबिहों, यात्रियों, आम आदमियों… और, तुम सब फिर चुन देना किसी सपाई, बसपाई, भाजपाई या कांग्रेस के आदमी को ताकि तुम्हारे दुख और गहरा सकें और इस तरह दुखों के चरम पर पहुंचकर तुम्हें मोक्ष, अध्यात्म, मुक्ति की तरफ मुड़ने की प्रेरणा मिल सके… तुम सब वैसे ही निष्क्रिय और शिथिल पड़े रहना जैसे तुम्हारे पुरखे पड़े हुए थे… तुम्हारी लड़ाई लड़ने एक न एक दिन जरूर हनुमान जी गदा लिए हुए आएंगे और पापियों का सर्वनाश कर तुम्हें मुक्ति दिलाएंगे… इसी उम्मीद में दाल भात पेट भर खाकर पसर कर पेड़ तले सोए जा और हनुमान चालीसा गाए जा…

जैजै

 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से

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