ज़ी न्यूज़ ने किए एक तीर से दो शिकार

ज़ी न्यूज़ और नमो की दोस्ती किसी से छुपी नहीं है। कुरुक्षेत्र में 'ज़ी न्‍यूज' के मालि‍क सुभाष चंद्रा ने नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा किया था और कहा था कि 'मैं भी हरि‍याणा का सूं, यो ज़ी चैनल भी समझो थारा ही सै।' ज़ी न्यूज़ और कांग्रेस के बीच छत्तीस का आंकड़ा नवीन जिंदल के चलते है।

नमो का हिमायती होने के कारण चैनल अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा था। अचानक मुरली मनोहर जोशी के साथ फिक्स इंटरव्यू न करने की बात कहकर चर्चा में आया जी न्यूज अपनी विश्वसनीयता वापस लाने की कोशिश में है। लेकिन साथ ही साथ, नरेंद्र मोदी को न पसंद करने वाले नेता मुरली मनोहर जोशी का पत्ता काटने की कोशिश कर रहा है, जो वाराणसी छोड़कर कानपुर से चुनाव लड़ रहे हैं।

मोदी की सबसे बड़ी रणनीति है कि बीजेपी की तमाम बड़े लीडर इस बार चुनावों में हार जाएं, लेकिन बीजेपी को बहुमत मिले मिले। आज अगर चुनावी स्थलों पर नजर दौड़ाएं तो विंदिशा में सुषमा स्वराज अकेली पड़ रही है। गांधीनगर में एलके आडवाणी के साथ दूसरे नंबर की नेता आनंदीबेन पटेल नजर नहीं आ रही है। पंजाब के अमृतसर से अरुण जेटली को चुनाव मैदान में उतारकर नवजोत सिंह सिद्धू और उसके प्रशंसकों को नाराज कर, वहां समीकरण बदल दिए।

राजनाथ सिंह लखनऊ से लड़ रहे हैं, लेकिन उनको भी टोपी पहननी पड़ रही है। अटल बिहारी जैसी छवि का प्रचार करवाना पड़ रहा है। राजनाथ सिंह राज ठाकरे के समर्थन को सिरे से खारिज करते हैं तो नरेंद्र मोदी चुप्पी साधे रहते हैं। नरेंद्र मोदी को पता है कि अगर दिल्ली का रास्ता साफ करना है तो बीजेपी के सीनियर लीडरों को किनारे करना होगा। शिवसेना एलके आडवाणी पर ठप्पा लगाती है। जेडीयू भी पुन:समर्थन देने की बात कहती है, लेकिन एलके आडवाणी की अगुवाई में, इसके अलावा सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी, अरुण जेटली एक ही खेमे से आते हैं। जसवंत सिंह रेस से बाहर हो ही चुके हैं।

 

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

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