केरल तिरूअनंतपुर से एक खास खबर है कि ‘‘दलित रिटायर हुआ तो रूम को गोमूत्र से धोया’’ जिसे इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिण्ट मीडिया ने दबा दिया और इसे प्रमुखता से प्रकाशित या प्रसारित करने लायक ही नहीं समझा. कारण कोई भी समझ सकता है. मीडिया बिकाऊ और ऐसी खबरों को ही महत्व देता है जो उसके हितों के अनुकूल हों, दलितों के अपमान की खबर के प्रकाशन या प्रसारण से मीडिया को क्या मिलने वाला है?
शायद इसीलिये मीडिया ने इस खबर को दबा दिया या बहुत ही हल्के से प्रकाशित या प्रसारित करके अपने फर्ज की अदायगी कर ली, लेकिन यह मामला दबने वाला नहीं हैं. खबर क्या है पाठक स्वयं पढ़कर समझें. खबर यह है कि देश के सामाजिक दृष्टि से पिछड़े माने जाने वाले राज्यों में किसी दलित अधिकारी का अपमान हो जाए तो यह लोगों को चौंकाता नहीं है, लेकिन सबसे शिक्षित और विकसित केरल राज्य में ऐसा होना हैरान करता है. यह सोचने को विवश करता है कि सर्वाधिक शिक्षित राज्य के लोगों को प्रदान की गयी शिक्षा कितनी सही है?
खबर है कि केरल राज्य के तिरूअनंतपुरम में एक दलित अधिकारी के सेवानिवृत्त होने के बाद उसकी जगह आए उच्च जातीय अधिकारी ने उसके कक्ष और फर्नीचर को शुद्ध करने के लिए गोमूत्र का छिड़काव करवाया. दलित वर्ग के एके रामकृष्णन 31 मार्च को पंजीयन महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. उन्होंने उक्त बातों का पता लगने पर मानव अधिकार आयोग को लिखी अपनी शिकायत में कहा है कि उनके पूर्ववर्ती कार्यालय के कुछ कर्मचारियों ने मेज, कुर्सी और यहां तक कि कार्यालय की कार के अंदर गोमूत्र छिड़का है. इस घटना की जांच की मांग करते हुए उन्होंने मानव अधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया है.
रामकृष्णन ने कहा, ”कार्यालय और कार का शुद्धिकरण इसलिए किया गया, क्योंकि वह अनुसूचित जाति (दलित वर्ग) से हैं और यह उच्च जातीय व्यक्ति द्वारा जानबूझकर किया गया उनके मानव अधिकार एवं नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों का खुला उल्लंघन है.” दलित वर्ग के एके रामकृष्णन की याचिका के आधार पर मानव अधिकार आयोग ने मामला दर्ज कर राज्य सरकार के कर-सचिव को नोटिस भेजा है. इसका जवाब सात मई तक देना है.
दलित वर्ग के एके रामकृष्णन का कहना है, ”मैं इस मामले को सिर्फ व्यक्तिगत अपमान के तौर पर नहीं ले रहा हूँ. यह सामाजिक रूप से वंचित समूचे तबके का अपमान है. यदि एक सरकारी विभाग में शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है तो निचले पायदान पर रहने वाले आम लोगों की क्या हालत होगी?” उन्होंने बताया कि पंजीयन महानिदेशक के पद पर पिछले पांच साल का उनका अनुभव बहुत खराब रहा है.
इस मामले में सबसे बड़ा और अहम सवाल तो यह है कि नये पदस्थ उच्च जातीय अधिकारी को गौ-मूत्र से कार्यालय की सफाई करने के लिये कितना जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्योंकि उन्होंने तो वही किया जो उन्हें उसके धर्म-उपदेशकों ने सिखाया या उन्हें जो संस्कार प्रदान किये गये. ऐसे में केवल ऐसे अधिकारी के खिलाफ जॉंच करने, नोटिस देने या उसे दोषी पाये जाने पर दण्डित करने या सजा देने से भी बात बनने वाली नहीं है.
सबसे बड़ी जरूरत तो उस कुसंस्कृति, रुग्ण मानसिकता एवं मानव-मानव में भेद पैदा करने वाली धर्म-नीति को प्रतिबन्धित करने की है, जो गौ-मूत्र को दलित से अधिक पवित्र मानना सिखाती है और गौ-मूत्र के जरिये सम्पूर्ण दलित वर्ग को अपमानित करने में अपने आप को सर्वोच्च मानती है. इस प्रकार की नीति को रोके बिना कोई भी राज्य कितना भी शिक्षित क्यों न हो, अशिक्षित, हिंसक और अमानवीय लोगों का आदिम राज्य ही कहलायेगा.
लेखक डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ प्रेस पालिका के संपादक, होम्योपैथ चिकित्सक एवं मानव व्यवहारशास्त्री, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।












संदीप
April 11, 2011 at 9:01 am
दरअसल , मीडिया सिर्फ जाति और आरक्षण से जुड़े मामलों में पूर्वाग्रह से ग्रसित नजर आता है…और उसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि मीड़िया में 99 फीसदी लोग सवर्ण तबके से आते हैं…योगेंद्र यादव जी ने बाकायदा इस मुद्दे पर एक सर्वे भी किया था…लेकिन अपनी कमियों को स्वीकार करने के बजाय, मीडिया ने उन पर ही हल्ला बोल दिया…इस बात में कोई दो राय नहीं कि जितनी तवज्जो और कवरेज ऐसे मुद्दों को मिलनी चाहिए…वो कभी नहीं मिलती…
अमित रजा
April 11, 2011 at 10:17 am
निरंकुश जी, आपसे आग्रह है कि आप उस अधिकारी की गौ भक्ति का अर्थ दलितों के नफरत के तौर पर न लगायें. अब अगर मेरी टिपण्णी से ख़राब हुए अपने दीमाग की मरम्मत कोई कूकूर मूत्र यानि कुत्ते के पेशाब से करना चाहे तो मुझे नहीं लगता कि किसी को कोई परेशानी होनी चाहिए.
मदन कुमार तिवारी
April 11, 2011 at 11:40 am
मीणा जी अधिकारी सिर्फ़ अधिकारी होता है जो पैसा कैसे ्कमाया जाय जानता है। हां यह अलग बात है की आपसी खुंदस निकालने के लिये इस तरह का आरोप लगाना सबसे आसान तरीका है । कोई अधिकारी किसी दुसरे दलित अधिकारी का अपमान करे इतनी उसकी औकात कहा हैं। हां एक और बात यह मामला भी केरल का और मानवाधिकार के आयोग बालाकर्ष्णन भी केरल के । उनके बेटा और भाई पर भी भ्रष्टाचार का मुकदमा चल रहा है । मैने भी मुकेश -अनिल गैस विवाद में उनके खिलाफ़ लिखा है । थोडा केरालावाद के नजरिये से भी इस मामले को देखियेगा ।
jasbir Chawla
April 11, 2011 at 12:57 pm
U.P.ke bhootpruve mukhayamantry Sampurnanand ke statue ko Brahmin samaj ne Gangajal se shudha kiya tha kayonkee statue ka anawaran Dalit Jagjeevanram ke haathon se huaa tha.Sawal mansikta badlne ka hai,prtikriya me galigaloj ka nahin.
अशोक
April 11, 2011 at 4:21 pm
मीडिया में किस हद तक सवर्णवाद है, यह यहीं पर साफ दिख रहा है. एक महोदय केरलावाद नजरिए से चीजों को देखने के लिए कहते हैं तो दूसरे महोदय ‘कूकूर मूत्र’ की बात कर रहे हैं. अब इनके खराब हुए दिमाग को किस चीज से पवित्र और ठीक किया जाए?
अराजन डोम
April 12, 2011 at 7:45 am
केरल के उस नए अधिकारी की जात के बारे में जानकारी नहीं है. लेकिन, उनके बारे में ये जानकारी है कि वह इमानदार और दलितों का हमदर्द रहा है. जबकि रिटायर्ड हुए अधिकारी के खिलाफ मामलों की शिकायत पर जाँच कमिटी गठित हो चुकी है. हो सकता है कि नए अधिकारी ने बुरे प्रभावों का संक्रमण रोकने के लिए गौमूत्र से कुर्सी का शुद्धिकरण किया हो. वैसे तथ्य बताते है कि अबतक ज्यादातर गैरदलित नेता, अधिकारी, लेखक या पत्रकार ही दलितों का सच्चा हमदर्द साबित हुआ है. प्रेमचंद ने दलितों की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया था. मार्क्सवादी नेता नम्बुदरीपाद ने ब्रह्मण होते हुए दलितों की जीतनी सेवा की, दान में जमीनें बांटी उतना किसी दलित नेता ने नहीं किया. गैरदलित नेताओं की अगुवाई में भाकपा माले या माओवादियों ने बिहार में जमीनें सवर्णों से छीन कर दलितों के बीच ही बांटी. ऐसा कम रामविलास या मायावती ने नहीं किया. बाबा साहेब आंबेडकर दलितों के शायद हमदर्द इसलिए हुए कि उनके दादा गायकवाड और पिता सतपाल थे. मालूम हो कि महाराष्ट्र में गायकवाड क्षत्रिय होते हैं…..
एक दलित पत्रकार