दैनिक जागरण, मेरठ के दफ्तर पहुंचे टीम अन्ना के सदस्य, देखें तस्वीरें

टीम अन्ना कल मेरठ में थी. यूपी में जनसभाओं के क्रम में ये लोग मेरठ पहुंचे थे. टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, किरण बेदी और कुमार विश्वास शुक्रवार को दैनिक जागरण मेरठ के न्यूज़रूम में पहुंचे. वहां इन लोगों ने अखबार के कामकाज को देखा और दैनिक जागरण की टीम से मुलाकात की. इन लोगों का स्वागत दैनिक जागरण के निदेश तरुण गुप्ता ने किया.

संपादकीय प्रभारी मनोज झा ने टीम अन्ना के सदस्यों को अखबार के कामकाज से अवगत कराया. अखबार से जुड़े कुछ लोगों ने इस मौके की तस्वीरें फेसबुक पर सबसे साझा की हैं. उन्हीं में से दो तस्वीरों का यहां प्रकाशन किया जा रहा है.

ये वीडियो देखने के बाद भी आप कहेंगे कि भारत में कानूनराज है?

: मुंबई पुलिस की क्रूरता का वीडियो : मुंबई से एक साथी ने यह वीडियो भड़ास4मीडिया के पास भेजा है. कुछ मिनट के इस वीडियो के जरिए आप देखकर जान सकते हैं कि अपनी भारतीय पुलिस कितनी बर्बर और अराजक है. दुनिया भर में पुलिसिंग को जनपक्षधर बनाने और न्यूनतम हिंसा के जरिए संचालित किए जाने के प्रयास जोरों पर है. लेकिन अपने देश में पुलिस ने जैसे तय कर रखा हो कि उसे तो सिर्फ डंडे के जरिए ही पुलिसिंग करनी है, बाकी कोई फंडा नहीं सीखना.

वीडियो देखने से पता चल रहा है कि एक कम उम्र के लड़के को मुंबई के पनवेल इलाके के पुलिस वाले बेतरह मार रहे हैं. दो पुलिस वालों ने उसके हाथ-पैर पकड़ कर उल्टा कर रखा है और दो-तीन अन्य पुलिस वाले लड़के की पीठ पैर आदि पर पट्टों, फट्टों, लाठियों के जरिए मारे जा रहे हैं. जब लड़का बुरी तरह चीखने लगता है तो उसे कुछ देर के लिए छोड़ते हैं और वह लड़का जाने क्या क्या बोलता रहता है. संभव है, जो युवक इन पुलिस वालों की क्रूरता का शिकार हो रहा है, उसका किसी मामले में कोई अपराध हो और पुलिस उससे कुछ पता लगाने का काम कर रही हो लेकिन क्या यही एक तरीका है पता लगाने का? और, क्यों यह पिटाई का हथियार ही गरीब लोगों पर अप्लाई किया जाता है जबकि कोई अमीर आदमी या बड़ा माफिया पकड़ा जाता है तो यही पुलिस वाले थाने में बिठाकर उसको चाय-पानी पिलाने लगते हैं. क्या पुलिस वालों का डंडा भी अमीर-गरीब के हिसाब से ही चलते हैं?

इस देश में मानवाधिकार आयोग समेत कई ऐसे संस्थान, प्रतिष्ठान, संगठन आदि हैं जो पुलिस उत्पीड़न के शिकार लोगों के लिए काम करते हैं पर ज्यादातर मामलों में गरीब व अशिक्षित लोग इन संगठनों तक पहुंच ही नहीं पाते. इसी कारण पुलिस वाले गरीबों पर अपने डंडों का बेखौफ प्रयोग करते रहते हैं. इस वीडियो के डिटेल्स नहीं पता हैं. कोई पत्रकार साथी अगर वीडियो में दिख रहे युवक व पुलिस वालों व संबंधित प्रकरण के बारे में बता सके तो इस मामले को विस्तार से जाना जा सकता है और न्याय के लिए पहल की जा सकती है. फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि हम भारत में रहते हुए पाकिस्तान-अफगानिस्तान में अराजक हालात को देखकर जिस तरह चिंतित होते हैं और फिर शुक्र मनाते हैं कि हम भारत में हैं जहां ऐसा कुछ नहीं होता, वह सब सिर्फ दिल को खुश रखने का खयाल भर है. अपने भारत में भी आम जन का बहुत भयंकर शोषण व उत्पीड़न होता है और अपराधी-आरोपी किस्म के पुलिसवालों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता.

वीडियो देखने के लिए क्लिक करें- मुंबई में पनवेल पुलिस का कारनामा

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

संपर्क- yashwant@bhadas4media.com

भड़ासी चुटकुला (25)

अलग अलग लड़कों की गर्ल फ्रेंड अपने बॉय फ्रेंड से इस प्रकार लड़ रही थीं:-

पायलट की गर्ल फ्रेंड:- ज्यादा उड़ मत, समझा!!!

टीचर की गर्ल फ्रेंड:- मुझे सिखाने की कोशिश मत करो!!!

डेंटिस्ट की गर्ल फ्रेंड:- तुम्हारा जबड़ा तोड़ दूंगी!!!

सीए की गर्ल फ्रेंड:- तुम ज़रा हिसाब में रहना सीख लो!!!

पत्रकार की गर्ल फ्रेंड:- पहले नौकरी तो ढूंढ ले फिर बात करना!!!


(यह चुटकुला हमें सचिन के सौजन्य से प्राप्त हुआ है. आप भी मीडिया पर केंद्रित किसी चुटकुले को हम तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं. भेजने वाले अगर अपना नाम पहचान गोपनीय रखना चाहेंगे तो उनके अनुरोध का सम्मान किया जाएगा.)

इससे पहले के 24 भड़ासी चुटकुलों को सुनने के लिए क्लिक करें- भड़ासी चुटकुले

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रेस काउंसिल द्वारा छह सदस्यीय उपसमिति गठित

Hyderabad, November 21: The Press Council of India (PCI) has appointed six member Sub-Committee to examine the larger issue of “Safety of Journalists in discharging their duties” with Mr. K Amarnath, Secretary of the Indian Journalists Union (IJU) and member of the Press Council as Convener on a representation of the Indian Journalists Union (IJU) and some others.

The other members of the Sub-committee are: Mr. Sanjay Dina Patil, MP (LS), Mr. Anil Jugal Kishore Agrawal, Mr. Arvid S Tengse, Mr. Sanjay Gupta and Dr. R I Lakshmipathi.  In a letter to the Chairman of the Press Council of India on August 11, the President S N Sinha and Secretary-General Devulapalli Amar of Indian Journalists Union requested for appointment of a Sub-committee of the Press Council of India to examine Safety and Protection of Journalists in the country and to suggest national wide special law for that purpose.

In the letter the IJU said “The Working Journalists in the country are worried over lack of their safety and protection while discharging their duties. The sense of disquiet and apprehension is heightened after the cold blooded murder of Mr. Jyothirmoy Dey, Editor, Special-Investigations, of the Mid Day daily in Mumbai on 11th June 2011. Several other incidents in the country where the journalists are at the receiving end, underline the need for urgent action by the professional and overseer-body for the freedom of the press. They are vulnerable in several parts of the country from attacks from various mafias including in the North East and Kashmir. Such situation does not augur well for the freedom of the press in the country.”

In separate but identical statements, the Indian Journalists Union (IJU) President Mr. S N Sinha, Secretary-General Devulapalli Amar and Andhra Pradesh Union of Working Journalists (APUWJ) President D Somasundar and General Secretary Y Narender Reddy expresses happiness over the appointment of a Sub-committee to go into the issue of safety of journalists in the country with IJU representative Mr. K Amarnath as Convener. They hoped that the Sub-committee would go into the whole gamut of the issue and suggest ways and means including a national for the protection of journalists in the country. PRESS NOTE

Help sought for ailing journalist

Guwahati: A middle aged journalist is suffering from cancer appeals for help from his colleagues. Kishore Kirat, who used to work  for ‘Purbanchal Prahari’  and ‘Dainik Purvoday’ was diagnosed with gland cancer  five year back and he still fighting with the disease. Taking a break for few years, Kishore, 40,  had almost recovered after his prolonged treatment. Six months ago,  he took the responsibility of the editor of Nepali magazine from Guwahati.

But he was once again diagnosed with lung cancer (Malignant tumor of non small cell carcinoma) last month  and now he is undergoing treatment at B Barua Cancer Institute. Now he needs immediate treatment,  but his blood count has reduced drastically and the attending doctors have advised him to take sufficient rest and also nutritious food so that he can withstand the after affect of the treatment. Meanwhile, Kishore who hails from a remote village in northern bank of Brahmaputra in central Assam, has resigned form his job (as editor of Nepali Magazine) due to his poor health status. Kishore has the determination to fight the disease and he needs some financial supports from is well wishers.

Anyone who wants to extend financial supports (whatever the amount may be) to Kishore Kirat, may kindly contact him at 09401996234. Support in the form of cash may also be deposited to the office of Guwahati Press Club for the next 15 days. The contribution to Kishore Kirat will be declared officially later, stated in a press release.

press release/statement/appeal

जबसे अखबार लोकार्पित हुआ, तबसे सेलरी नहीं मिली!

: टीवी99 में भी तनख्वाह नहीं, कैसे मनेगी दीवाली :  पिछले दिनों राजस्थान में एक समाचार पत्र के दैनिक संस्करण का लोकार्पण समारोह धूमधाम से आयोजित किया गया था. बहुत बड़ी-बड़ी बातें इस अखबार के लिए कही गयी थी. इस समाचारपत्र को लेकर अनुमान लगाए गए थे कि भविष्य में राजस्थान में इस अखबार के जरिये जाट समाज को प्रचारित किया जायेगा.

थोड़े दिनों में ही दैनिक अम्बर नाम का ये अख़बार, अम्बर से सीधे ज़मीन पर आ गिरा है. यहाँ काम कर रहे लोगों को उम्मीद के मुताबिक ऐसा कुछ नहीं मिला जिनके दावे अखबार प्रबन्धन ने किये थे. जबसे अखबार लोकार्पित हुआ है उसके बाद से कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है. इस बार की दीवाली कैसे मनेगी, ये सोचकर कर्मचारी चिंतित हैं. कुछ ऐसा ही हाल राजस्थान के पहले सैटेलाईट चैनल का दावा करने वाले टीवी99 का है.

इस चैनल के बारे में पहले भी काफी जानकारी B4M पर आ चुकी है. ये चैनल 25000 हजार रुपये लेकर चैनल आईडी (लोगो) देने के लिए पूरे देश में बदनाम है. अब इसी चैनल से खबर है कि चैनल के आनरोल कर्मचारी भी वेतन का पिछले कई महीनों से इन्तेजार कर रहे हैं. चैनल प्रबन्धन हमेशा की तरह उन्हें नित नए बहाने करके बहला रहा है. उसे इस बात की कोई चिंता नहीं की उसके कर्मचारी इस बार  दीवाली कैसे मनाएंगे.

धन्यवाद
राहुल
जयपुर जर्नलिस्ट
jaipur.journalist@gmail.com

‘खोज इंडिया’ से टेक्निकल हेड जीएस गौतम और पंकज पांडेय का इस्तीफा

बड़ा सवाल खड़ा हो गया है गुड़गांव सिथत खोज इंडिया न्यूज चैनल के लिए। अव्यवसिथत माहौल और कुप्रबंधन की वजह से चैनल को एक और बड़ा झटका लगा, जब चैनल के टेकिनकल हेड जीएस गौतम ने इस्तीफा दे दिया। इसके साथ साथ चैनल के सीनियर करेस्पांडेंट पंकज पाण्डेय ने भी अपना इस्तीफा सौंप दिया। सीनियर कैमरामैन की तौर पर संस्थान से जुड़े जीएस गौतम ने अपनी मेहनत, लगन और काबिलियत के दम पर चैनल में उस खास मुकाम को पाया था।

पूरी इमानदारी के साथ चैनल से जुड़े रहे। चैनल की हर एक बारिकियां से अवगत गौतम हर जगह मौजूद होते थे, अच्छे बुरे मौके पर हमेशा प्रबंधन के साथ कदम से कदम मिला कर चलते रहे। कर्इ मौकों पर दूसरों की गलतियों का ठीकरा भी उन पर मढ़ा जाता था। जीएस गौतम ने निजी तौर पर संस्थान में अच्छा माहौल और प्रोफेशनलिज्म लाने की काफी कोशिश की थी। लेकिन अपनी कोशिश को नाकामायाब होता देख अंतत: चैनल को छोड़ने में ही अपनी भलार्इ समझी। करीब एक दशक से मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े जीएस गौतम साथ ही पंकज पाण्डेय का चैनल छोड़ना इस बात का गवाह है कि चैनल में किस कदर तानाशाही और अकर्मण्यता छायी हुर्इ है। अब तो रब ही पार लगाए खोज इंडिया, भारत के कल आज कल को।

एक मेल पर आधारित.

एक शार्टफिल्म : सुसाइड करने का नया तरीका- मीडिया ज्वाइन कर लो

सुसाइड…. एक शॉर्ट फिल्म है, जिसे हम मीडियाकर्मियों ने मीडिया में अपने अनुभवों के आधार पर बनाया है। हममें से सभी कुछ ना कुछ ख़्वाब या कुछ मक़सद को लेकर इस क्षेत्र में आते हैं। जब आप कॉलेज में पढ़ते हैं तो वो दुनिया और आदर्श अलग होते हैं, और जब आप फील्ड में उतरते हैं तो ये दुनिया अलग ही होती है। जो आप पढ़कर-सीखकर आते हैं, प्रैक्टिकल करते हुए उन सब बातों के मायने बदल जाते हैं।

याद है… जब कॉलेज में मासकॉम की पहली क्लास थी तो टीचर ने पूछा, “आप मीडिया में क्यों आए?” सबसे ज्यादा जवाब यही था, “मैं समाज के लिए कुछ करना चाहता या चाहती हूं इसलिए मीडिया में आया या आई हूं।” लेकिन आपके ये आदर्श तब तक ही होते हैं जब तक आप किताबों में मीडिया की पढ़ाई करते हैं। लेकिन जब आप मीडिया में उतरते हैं तो आपकी नहीं बल्कि बाज़ार की चलती है। आप तो महज़ बाज़ार के हाथों मजबूर कठपुतली की तरह काम करते हैं। आज का मीडिया टीआरपी या आगे बढ़ने की होड़ में जो परोस रहा है, वो शायद अश्लीलता, सनसनी और अंधविश्वास से ज्यादा नज़र नहीं आता।

ख़बरों का तो जैसे अकाल पड़ गया है। हमनें ‘सुसाइड’ के ज़रिए मीडिया के वर्तमान गैर-ज़िम्मेदाराना माहौल में एक आदर्शवादी या फिर एक आम संवेदनशील मीडियाकर्मी का दर्द दिखाने की कोशिश की है। ये एक ऐसे शख्स की कहानी है, जो मीडिया की चिल्लमचिल्ली और तथाकथित बेबुनियाद ख़बरों के बीच अपने आदर्शों का गला घुटता महसूस करता है। जो मीडिया में अपनी मौजूदगी को एक मज़दूरी से ज्यादा कुछ और नहीं समझ पाता। ये फिल्म वास्तव में मीडिया में आए हर उस नौजवान के अनुभवों की कहानी है, जो कुछ करगुज़रने का माद्दा तो रखता है लेकिन उसे करने की स्वतंत्रता नहीं। लेकिन फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि कभी ना कभी एक नया सवेरा ज़रूर होगा, जो सोई हुई पत्रकारिता को फिर से जगा देगा। और साथ ही सभी नौजवान पत्रकारों की तरफ से हम कहना चाहते हैं-

“लाख चाहे बांध लो ज़ंजीर से
वक़्त पर निकलेंगे फिर भी तीर से”

शार्ट फिल्म देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- सुसाइड

शुक्रिया

पुनीत भारद्वाज और टीम

हिंदुस्तान, गया एडिशन के संपादकीय प्रभारी बने प्रगति मेहता

प्रगति मेहता: लांचिंग की तैयारियां पूरी : दैनिक हिन्दुस्तान ने बिहार में गया संस्करण निकालने के लिए तकरीबन सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं. गया संस्करण की कमान युवा पत्रकार प्रगति मेहता को सौंपी गई है. प्रगति इससे पहले दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण में प्रिंसिपल कॉरेस्पॉन्डेंट के रूप में काम कर रहे थे. प्रगति मेहता को हिन्दुस्तान के प्रमुख संपादक शशिशेखर का करीबी माना जाता है.

दैनिक हिन्दुस्तान से ही पत्रकारिता करियर शुरू करने वाले प्रगति कलम के धनी हैं. करीब ग्यारह साल से पत्रकारिता में हैं प्रगति. वे शशिशेखर के निर्देशन में अमर उजाला में भी काम कर चुके हैं. शशिशेखर के हिन्दुस्तान ज्वॉयन करने के कुछ दिनों के बाद प्रगति भी अमर उजाला छोड़कर हिन्दुस्तान आ गए थे. इन्होंने पटना, मुजफ्फरपुर, दिल्ली और नोएडा जैसे शहरों में काम किया. गया संस्करण का संपादकीय प्रभारी बनाकर हिन्दुस्तान प्रबंधन ने युवाओं पर ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी देने के अपने इरादे को जताया है.

लोकमत समाचार का उत्कृष्ट साहित्य वार्षिकी ‘दीप भव’, लोकार्पण 22 को दिल्ली में

महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित समाचार पत्र समूह लोकमत मीडिया लिमिेटेड के हिंदी दैनिक लोकमत समाचार द्वारा प्रकाशित कला साहित्य वार्षिकी दीप भव-2011 का लोकार्पण 22 अक्टूबर को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के मल्टीपरपस हॉल में शाम 6.30 बजे होगा। लोकार्पण करेंगे प्रख्यात साहित्यकार कृष्णकुमार। कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे कवि और श्रेष्ठ आलोचक अशोक वाजपेयी।

कार्यक्रम में ‘हमारी स्थिति’ विषय पर परिचर्चा भी होगी। परिचर्चा में प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मानसिंह, वरिष्ठ चित्रकार जतिन दास, वरिष्ठ रंगकर्मी कीर्ति जैन, आलोचक अपूर्वानंद तथा कुलदीप कुमार भाग लेंगे। लोकमत मीडिया लिमिटेड के चेयरमैन विजय दर्डा तथा संयुक्त प्रबंध निदेशक ऋषि दर्डा भी मौजूद रहेंगे. लोकमत समाचार के इस बेहतरीन कला साहित्य वार्षिकी दीप भव-2011 के अतिथि संपादक की भूमिका निभाई है फिल्मी पर्दे पर तीखे तेवर निभाने वाले नाना पाटेकर ने। लोकमत मीडिया लिमिटेड के चेयरमैन विजय दर्डा कहते हैं कि नाना की बहुमुखी प्रतिभा व व्यक्तित्व का चुंबकत्व दीप भव-2011 में एक राग की तरह निनादित है। इस कला साहित्य वार्षिकी का नामाकरण संस्कार किया है सांस्कृतिक व्यक्त्वि अशोक वाजपेयी ने। दीप भव के संपादक हैं गिरीश मिश्र और प्रकल्प निदेशक हैं पीयूष दईया।

लोकमत मीडिया लिमिटेड का हिंदी में इस तरह का यह पहला लेकिन परिपक्व प्रयास है. गागर में सागर की तरह है यह साहित्य वार्षिकी। इसमें मकबूल फिदा हुसैन की आत्मकथा भी है और मल्लिकार्जुन मंसूर की रस यात्रा भी। कुमार गंधर्व, पंडित भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल पर विशेष सामग्री भी है। अशोक बाजपेयी, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, राजेश जोशी, आस्तीक वाजपेयी, गीत चतुर्वेदी, शिरीष ढोबले, हेमंत शेष, सिद्धार्थ त्रिपाठी की कविताएं हैं तो गीतांजलि श्री, सारा राय, अर्चना वर्मा, अखिलेश और बहुत से लेखकों की कहानियां भी. प्रियदर्शन ने बताया है गांधी और अन्ना के बीच का फासला। और भी बहुत कुछ है इस कला साहित्य वार्षिकी में। 288 ग्लेज्ड पृष्ठों की यह कला साहित्य वार्षिकी वाकई लाजवाब है। लोकमत समाचार के प्रोडक्ट हेड मतीन खान कहते हैं कि देश भर के प्रमुख स्टॉल्स पर दीप भव उपलब्ध है। केवल 100 रुपए मूल्य का यह वार्षिकी पढ़ने के लिए भी है और सहेजने के लिए भी। प्रेस रिलीज

सौरभ मालवीय को पीएचडी की उपाधि

सौरभ मालवीयभोपाल : माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल ने सौरभ मालवीय को उनके शोधकार्य ‘हिंदी समाचार-पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन’ विषय पर डाक्टर आफ फिलासिफी की उपाधि प्रदान की गयी। श्री मालवीय ने अपना शोधकार्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला के मार्गदर्शन में संपन्न किया है।

लखनऊ में अरविंद केजरीवाल पर चप्पल फेंकने वाला युवक जालौन निवासी जितेंद्र पाठक है

फिर हुआ टीम-अण्‍णा पर हमला। प्रशांत भूषण के बाद अब अरविंद केजरीवाल पर हमला हो गया है। लखनऊ के झूलेलाल पार्क में चल रही एक जनसभा में उन पर चप्‍पल से हमला हुआ। हमलावर जालौन का निवासी जितेंद्र पाठक है। हमलावर जितेंद्र पाठक को पकड़कर लोगों ने धुना और पुलिस के हवाले कर दिया। अरविंद केजरीवाल लखनऊ में देर शाम एक जनसभा में आये थे।

इस सभा का आयोजन इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन की ओर से आयोजित किया गया था।  अरविंद केजरीवाल अभी बोलने के लिए खड़े ही हुए कि भीड़ में शांति से बैठे एक युवक ने उनकी ओर चप्‍पल खींच कर दे मारी। मंच समेत पूरे सभास्‍थल पर भगदड़ सी मच गयी। इसके पहले कि वहां मौजूद पुलिसवाले कुछ समझ पाते, एक झुंड उस युवक की ओर बढ़ा और जमीन पर पटक कर उस युवक को रौंदना शुरू कर दिया।

लात-घूंसों से उसकी पिटाई हुई और उसके कपड़े भी फाड़ दिये गये। बाद में पुलिस ने हस्‍तक्षेप करके उसे बचाया और अपनी हिरासत में ले लिया। इस घटना से पूरे सभास्‍थल का माहौल तनावग्रस्‍त हो गया। पुलिस हमलावर युवक को थाने ले जाकर पूछताछ कर रही है। भाजपा, सपा और कांग्रेस समेत कई दलों ने इस घटना को दुर्भाग्‍यपूर्ण बताते हुए इसकी कड़ी निन्‍दा की है। राजद के अध्‍यक्ष लालू प्रसाद ने इस हादसे को डिस-एप्रूव करते हुए कहा है कि टीम-अण्‍णा को भी अपनी जुबान पर लगाम देनी चाहिए।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की इस रिपोर्ट के लिए भड़ास4मीडिया टीम आभारी है.

चर्चाएं महज अफवाह, मैं एक प्रोजेक्ट के लिए महीने भर की छुट्टी पर हूं : आशुतोष

आईबीएन7 न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष को लेकर दिल्ली की मीडिया में कई तरह की चर्चाएं और अफवाहें फैली हुई हैं. जितने मुंह उतनी बातें सामने आ रही हैं. कोई कह रहा कि आशुतोष को अन्ना हजारे के ज्यादा कवरेज करने के कारण सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी के इशारे पर राजदीप ने फोर्स लीव पर भेज दिया है. किसी का कहना है कि वह सहारा ग्रुप ज्वाइन करने वाले हैं और उनकी एक मीटिंग सहारा में हो चुकी है.

किसी का कहना है कि वे प्रभु चावला का कार्यक्रम तीखी बात आईबीएन7 पर शुरू किए जाने से नाराज होकर छुट्टी पर चले गए हैं. इन सारी अफवाहों के बारे में जब भड़ास4मीडिया ने आशुतोष से संपर्क किया तो उन्होंने इसे महज अफवाह बताया और कहा कि उनका महीने भर का अवकाश लेना पहले से तय था. वे एक अक्टूबर से लेकर माह के अंत तक अवकाश पर हैं. एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. पहली नवंबर से वे फिर आईबीएन7 में अपना काम संभाल लेंगे. आशुतोष के मुताबिक उन्हें यह जानकर अचंभा हो रहा है कि उनको लेकर कितनी बातें बनाई कही जा रही हैं. उधर, सूत्रों का कहना है कि आशुतोष इन दिनों अवकाश लेकर अन्ना पर एक किताब लिखने में जुटे हुए हैं.

बताया जाता है कि आईबीएन7 से प्रबल प्रताप सिंह का इस्तीफा देकर आजतक न्यूज चैनल ज्वाइन करना और आशुतोष का अवकाश लेने के कारण आफिस न आना, ये दोनों घटनाक्रम मिलकर बड़ी चर्चाओं का कारण बन गए. वैसे भी बड़े पदों पर बैठे लोगों को लेकर मीडिया में बातें बनाने-फैलाने और अफवाहबाजी करने का चलन पुराना है.

जी न्यूज के क्राइम रिपोर्टर रहे प्रदीप राय का निधन

प्रदीप रायएक दुखद समाचार है. गाजीपुर जिले के निवासी और जी न्यूज, दिल्ली में क्राइम रिपोर्टर के तौर पर तीन वर्षों तक सेवा देने वाले युवा पत्रकार प्रदीप राय का निधन हो गया है. उन्होंने अंतिम सांस बनारस के एक अस्पताल में ली. बताया जाता है कि प्रदीप की किडनी और लीवर में प्राब्लम थी जिसका इलाज चल रहा था.

प्रदीप को बनारस के भोजूबीर स्थित अलकनंदा अस्पताल में भर्ती कराया गया था. बताया जाता है कि प्रदीप अल्कोहल लेने के आदी थे. बीच में उन्हें जांडिस की शिकायत हुई पर डाक्टरी सलाह के बावजूद जांडिस में भी मदिरा सेवन करते रहे. प्रदीप ने करियर की शुरुआत गाजीपुर जिले से स्टार न्यूज के स्ट्रिंगर के बतौर की थी. बाद में उन्होंने बनारस में जी न्यूज ज्वाइन कर लिया. फिर जी न्यूज ने उन्हें दिल्ली आफिस बुला लिया और उन्हें रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी दी गई. उन्होंने तीन वर्षों से ज्यादा समय तक जी में क्राइम रिपोर्टर के रूप में काम किया.

प्रदीप की पहचान अच्छे रिपोर्टर के तौर पर थी. उनकी उम्र 30 वर्ष थी. वर्ष 2009 के दिसंबर महीने में प्रदीप की शादी हुई थी और उन्हें हाल ही में एक बिटिया हुई. बिटिया के जन्म के बाद वे गांव चले गए थे. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उन्होंने जी न्यूज से किन्हीं वजहों से इस्तीफा देने के बाद अपने गांव का रुख कर लिया था. प्रदीप के निधन की सूचना देर में दिल्ली तक पहुंची. उनको जानने-चाहने वाले प्रदीप के अचानक चले जाने से स्तब्ध और दुखी हैं.

अगर प्रदीप से जुड़ा कोई संस्मरण आपके पास हो तो तस्वीर समेत भेज सकते हैं, भड़ास की मेल आईडी bhadas4media@gmail.com है.

अब चुप क्यों हैं सिद्दीकी, हेमंत और प्रभात?

: काहे फट गया यूपी के मुखर पत्रकारों का नगाड़ा : यशवंत सर, नमस्‍ते। आपके भड़ास पर लखनऊ के पत्रकारों की करतूतों पर खूब लिखा गया है। भड़ास पर छपे कई ऐसे महान पत्रकारों ने भी अपनी लेखनी तोड़ी है, जिसमें क्रांति की ज्‍वालाएं भड़कती दिखी हैं। उनके लेखों से साफ लगता था कि अब पत्रकारों की दलाली पर लखनऊ के पत्रकार चुप नहीं रहेंगे और आग लगा कर सारा कुछ स्‍याह-सफेद कर देंगे।

इसकी शुरूआत की थी आपने हिसामुल इस्‍लाम सिद्दीकी के उस लेख से जिसमें उन्‍होंने कई धाकड़ पत्रकारों की इस करतूत का खुलासा किया था जिन्‍होंने हजरतगंज के सौंदर्यीकरण की योजना में करोड़ों रूपये पी लेने का आरोप लगाया था। इसके जवाब में शरद प्रधान ने उन्‍हें कांग्रेस का दलाल करार दे दिया। इसके बाद दसियों साल से बेरोजगारी में दारू-मुर्गा-मालपुआ नोंच रहे हेमन्‍त तिवारी को जोश आया और उन्‍होंने भी बेइमानों के खिलाफ ताल ठोंकने का ऐलान किया। बोले थे कि पत्रकारों की जन अदालत लगायेंगे और उनसे उनकी हैसियत और दलाली के आरोपों की कैफियत पूछेंगे। मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार एसोसियेशन के पिछले चुनाव में जमकर दुलत्‍ती खा चुके हेमन्‍त तिवारी का दावा था कि वे यह सारा काम 15 सितम्‍बर से पहले करेंगे ताकि पत्रकारिता के चेहरे पर लगी कालिख को दूर कर सकें।

इसके बाद पितरपक्ष में किन्‍हीं प्रभात त्रिपाठी ने अपना नाड़ा बांधा कि वे दलाल पत्रकारों की कलई खोलेंगे और यह काम करने का दायित्‍व उन्‍होंने पितरपक्ष के बाद नवरात्रि में करने का दावा किया। बड़ी हवा-हवाई तलवारबाजी करते हुए वे बोले थे कि उनके पास ऐसे-ऐसे पत्रकारों की दलाली और बेइमानी के ऐसे-ऐसे सबूत हैं कि पूरा यूपी थर्रा उठेगा। लेकिन हैरत की बात है कि इन सभी तलवारबाज जमूरों ने केवल हवा में ही तलवारें भांजीं, नतीजा कुछ नहीं निकला। जरा इनसे पूछिये तो सही कि आखिर इन लोगों ने अपना इरादा क्‍यों त्‍याग दिया। कहीं ये लोग ही तो सबसे बड़े दलाल नहीं हैं और इसीलिए अब खुद ही चुप्‍पी साध गये हैं। मेरा अनुरोध है कि मेरे नाम या ईमेल पते को आप सार्वजनिक न करें।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

अमिताभ का लग गया काम, बाकी नूतन बताएंगी हाल-ए-धाम

: एक कमरे में चार आईपीएस अफसरों की तैनाती : बिना किसी इंट्रो और भूमिका के, केवल एक बात सूचनार्थ बताना चाहूंगा, उनको जिन्हें नहीं पता है कि ये अमिताभ कौन हैं. अमिताभ एक आईपीएस हैं. यूपी कैडर के हैं. पहले उनका नाम अमिताभ ठाकुर हुआ करता था. लेकिन उन्होंने अपने किसी आदर्शवादी जिद के कारण जाति-उप-नाम को निजी और सरकारी तौर पर त्याग दिया.

लेकिन त्यागने वालों को ज्यादा सितम झेलना पड़ता है, उसी अंदाज में उनका तबादला कर दिया गया. इसलिए नहीं कि उन्होंने जातिनाम बदला. इसलिए क्योंकि वे सच-सच और साफ-साफ को क्यों करना-कहना-जीना चाहते हैं. इस घटनाक्रम के पहले उनके झेलने और परेशान रहने की लंबी दास्तान है, सो उन बातों पर फिर कभी. फिलहाल जो ताजी बात है वो ये कि अमिताभ को लखनऊ से बेहद दूर भेजना भी मायावती सरकार को रास नहीं आया क्योंकि अमिताभ दूर बैठकर भी समाज के असामाजिक लोगों की खबर ले रहे थे. और कई ऐसे बड़े असामाजिक उनके फंदे में आ गए कि मायावती सरकार के कारिंदों को एक्शन लेना पड़ा. डीजीपी बृजलाल ने अपनी जादू की छड़ी घुमाई और बंदा ये गयो को वो गया.

अमिताभ को मेरठ के आर्थिक अनुसंधान अपराध शाखा के पुलिस अधीक्षक पद से हटाकर लखनऊ स्थित पुलिस विभाग के आफिस रुल्स एंड मैनुवल्स में भेज दिया गया है. उन्हें एक मिनट का भी मौका नहीं दिया गया कि वे अपने आफिस के कागजात सहेज सकें या उन पर अंतिम टिप्पणी दर्ज कर सकें. समझ सकते हैं आप इसका मतलब. सो, उन्हें लखनऊ भेज दिया गया. लखनऊ तो प्रदेश की राजधानी है पर उस राजधानी में कई डंपिंग ग्राउंड भी हैं जहां ढेर सारे क्रिएटिव आईएस-आईपीएस इसलिए पड़े हुए हैं क्योंकि वे ईमानदार हैं और नेताओं-अफसरों के कुत्तेपने के सांठगांठ को नहीं झेल सकते.

सो, उस मौजियल ग्राउंड में अमिताभ को भी भेज दिया गया.  लखनऊ जाना तरक्की कहा जाना चाहिए क्योंकि लखनऊ में अमिताभ का अपना घर है और वे मेरठ में रहते हुए अपने घर से बेहद दूर रहे थे. पर इसका दूसरा पक्ष है कि यूपी में सत्ता-सिस्टम ने अब तय कर लिया है कि अमिताभ को बहुत दूर की पोस्टिंग देना भी खतरनाक है, क्योंकि बंदा वहां भी ऐसे लोगों को अपने कार्यकाल में पकड़ सकता है जो सिस्टम के भ्रष्टाचार को खाद-पानी देने के लिए लाइन लगाए बैठे हों पर वह अपनी मनमानी करने की लोकल स्तर पर छूट जाहता हो. आए दिन चिट-फंड कंपनियां ऐसे ही माहौल में घपले-घोटाले करके हजारों लोगों के अरबों-खरबों रुपये डुबो देती हैं क्योंकि उन पर कोई अंकुश नहीं होता, न उपर से और न स्थानीय स्तर पर. इस बारे में बात फिर कभी.

जाहिर है, अमिताभ के लखनऊ जाने की परिघटना पर कहने वाले इसे डिमोशन ही कहेंगे. वजह? वो ये कि अमिताभ मेरठ में ईओडब्ल्यू के एसपी के पद पर भी एक तरह से डिमोशन के ही पद पर थे क्योंकि उनके बैच का हर कोई यूपी में डीआईजी या समतुल्य हो चुका है लेकिन अमिताभ अभी तक एसपी के पद पर सेवा दे रहे थे. ये यूपी की न्याय प्रणाली है. ये बृजलाल का न्याय है. और जाहिर है, ये पूरा न्याय मत्थे मढ़ा जाएगा मायावती के, जो सीएम हैं और सबकी चीफ हैं.

सो, बृजलाल का एक और गंदा डंडा अमिताभ पर पड़ा है और अमिताभ आ चुके हैं उसी लखनऊ में जहां वे पिछले कई साल से लड़-मर-जी-जग-उठ-रो रहे हैं. वे कई वर्षों से सिस्टम से अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. सिस्टम हर मोड़ पर उन्हें निराश और हतप्रभ कराने पर आमादा है लेकिन अमिताभ जाने किस मिट्टी के बने हैं कि वे अभी हारे नहीं हैं. वे हर हालात में सिस्टम में रहते हुए सिस्टम की दिक्कतों और चिरकुटई पर बात करना चाहते हैं, अदालत से, अपने सिस्टम से, अपने समय की राजनीतिक कार्यप्रणाली से… और कई अन्य चीजों से भी, जिसके बारे में बात करते हुए, सोचते हुए कई आईपीएस निजी जिंदगी के अकेले क्षणों में कांप जाया करते हैं, ताकि कोई ईमानदार आदमी अपना काम करते हुए कभी किसी से डरे नहीं, झुके नहीं और दुखी न होये.

अमिताभ ने लखनऊ में नया पद, नया कार्यभार संभाल लिया है. पहले एक दो दिनों में उन्होंने क्या देखा-महसूस किया, नए कार्यबार को लेकर, उन्होंने घर आकर हाल-ए-दिल बयान किया, और उसे बता रही हैं उनकी पत्नी, सोशल एक्टिविस्ट, आरटीआई एक्टिविस्ट और स्वतंत्र पत्रकार नूतन ठाकुर. पेश है डा. नूतन ठाकुर का लिखा आलेख. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


एक कमरे में चार आईपीएस अफसर

-नूतन ठाकुर-

एक फूल दो माली वाली बात तो हम सभी लोगों ने सुनी है पर एक कमरे में चार आईपीएस अफसर वाली बात कभी-कभार ही सुनने को मिलती है. मैंने यह बात आज उस समय सुनी जब मेरे पति अमिताभ अपने नए दफ्तर में ज्वायन करने के बाद शाम को घर आये. स्वाभाविक उत्सुकतावश मैंने जब उनसे दफ्तर का हाल पूछा तो मालूम चला कि रूल्स और मैनुअल के इस नए दफ्तर में, जहां उनका तबादला ईओडब्ल्यू मेरठ से हुआ है, कुल दो कमरे हैं और कुल पांच आईपीस अधिकारियों की वहाँ तैनाती है. इनमे एक डीजी, दो डीआईजी और दो एसपी हैं. इनमे एक कमरा तो डीजी साहब के लिए है और बाकी चार आईपीएस अधिकारी एक छोटे से कमरे में बैठेंगे. इस तरह एक कमरे में चार वरिष्ठ आईपीएस अफसर इकठ्ठा बैठ कर क्या काम करेंगे, यह बात आसानी से समझी जा सकती है.

मैंने एक आईपीएस अफसर की पत्नी के रूप में इस दफ्तर से जुडी उन बुनियादी सुविधाओं के बारे में पूछा जिससे हर अफसर की पत्नी को सीधे मतलब होता है. मालूम हुआ कि इस पद पर उन्हें घर के कामकाज के लिए कोई कर्मचारी नहीं मिलेंगे क्योंकि वहाँ इस कार्य के लिए कोई कर्मचारी बचे ही नहीं हैं. जितने अधिकारी पहले से हैं उन्हें ही घर के लिए कर्मचारी नहीं मिले हैं, अब नए आने वाले अधिकारी को क्या मिलेगा. यह भी तब जब उत्तर प्रदेश में प्रत्येक आईपीएस अफसर को गृह कार्यों में मदद के लिए दो कर्मचारी मिलने का नियम है, जिन्हें सरकारी भाषा में फॉलोअर (या अनुचर) कहते हैं.

मैं नहीं कह रही कि यह बहुत अच्छी व्यवस्था है. मैं इसकी कोई बहुत बड़ी समर्थक नहीं हूँ और पिछले लगभग तीन सालों से, जब से अमिताभ आईआईएम लखनऊ गए थे, हम लोग वैसे भी बिना फॉलोअर के ही आराम से रह रहे हैं और मेरे घर के सारे काम-काज आराम से हो रहे हैं. यहाँ तक कि अमिताभ के मेरठ में ईओडब्ल्यू की तैनाती के दौरान भी हमारे पास फॉलोअर नहीं थे. तकलीफ तो बस इस बात की होती है कि जहां इसी विभाग में एक-एक अफसर तो आठ-आठ, दस-दस फॉलोअर इसीलिए रखे हुए हैं क्योंकि वे सरकार के महत्वपूर्ण लोगों को खुश कर के ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए हैं लेकिन चूँकि मेरे पति ने इससे अलग अपना रास्ता तय करने की सोच ली है इसीलिए वरिष्ठ अधिकारी होने के बावजूद हमें बुनियादी सहूलियतें भी जानबूझ कर नहीं दी जा रही हैं.

तो जो हाल मेरठ में था, वही लखनऊ में भी रहेगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि फॉलोअर नहीं होने के कारण मित्रों को घर पर खाना नहीं खिलाउंगी. सभी मित्रों का हमेशा घर पर स्वागत है और उनकी मर्जी के अनुसार खाना भी स्वयं बना कर खिलाने में पीछे नहीं हटूंगी. मैं तो यह बात मात्र हक की लड़ाई और सरकारों द्वारा की जाने वाली बेईमानी के उदाहरण के तौर पर कर रही हूँ. मेरठ से लखनऊ में रूल्स और मैनुअल में अचानक ट्रांसफर भी तो इसी कारण से हुआ था. ईओडब्ल्यू विभाग के कुछ चोटी के बड़े अधिकारियों द्वारा की जा रही बेईमानियों का विरोध मेरे पति ने किया और इस के कारण अचानक मिड-सेशन में उनका ट्रांसफर कर दिया गया था.

दूसरी बात मैंने गाडी की पूछी तो यहाँ भी बात वही पायी. विभाग में गाडी नहीं है और इसीलिए अमिताभ अपनी ही गाडी से दफ्तर आया-जाया करेंगे. यदि सच पूछा जाए तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है क्योंकि करोड़ों लोग तो इसी तरह से निजी अथवा सार्वजनिक वाहनों से दफ्तर आते-जाते हैं. कष्ट बस इसी कारण से होता है क्योंकि यह सब कुछ जान-बूझ कर एक अधिकारी को परेशान करने के लिए किया जाता है, क्योंकि वह व्यवस्था की गुलामी नहीं कर रहा. जब गाडी नहीं, फॉलोअर नहीं, तो सरकारी फोन आदि कहाँ से होंगे.

लेकिन इससे कई गुणा ज्यादातर गंभीर बात यह है कि यह विभाग तो बना दिया गया है, पांच-पांच आईपीएस अफसर भी तैनात कर दिये गए हैं पर काम कुछ नहीं है. आगे शायद यही होने वाला है कि दफ्तर गए, दिन भर दफ्तर की हवा खायी और शाम होने पर घर लौट आये. ऐसा इसीलिए कि जब काम ही कुछ नहीं है तो कोई करेगा ही क्या. शायद दफ्तर बनाया ही इसीलिए गया है कि यह “डम्पिंग ग्राउंड” का काम करे और सरकार या उसके ताकतवर नुमाइंदों को जिससे नाराजगी हो जाए, उसे यहाँ शीत घर में ठंडा होने और अपनी औकात जान लेने के लिए भेज दिया जाए.

पांच आईपीएस अधिकारियों के नीचे लगभग नहीं के बराबर स्टाफ है- एक स्टेनोग्राफर हैं जो सभी अधिकारियों के साथ लगे हैं. इस तरह उस विभाग में, जहां सिद्धान्ततया नियम बनाने का ही काम हो, इस काम में अफसरों की मदद करने के लिए किसी सहायक को नहीं लगाया गया है. कारण भी बहुत साफ़ है- आखिर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पुलिस से सम्बंधित क़ानून और नियम बनवाना ही कौन चाहता है. ये अफसर तो बस इसीलिए यहाँ तैनात कर दिये गए हैं क्योंकि सरकार को एक डम्पिंग ग्राउंड चाहिए था. इस तरह कई लाख रुपये का सरकारी पैसा इन अधिकारियों पर खर्च तो हो रहा है पर इनसे कोई भी काम लेने की सरकार को कोई दरकार नहीं दिख रही. क्या ऐसी ही सोच से उत्तर प्रदेश और उसके विभाग का कोई भला हो सकना संभव है?

चूँकि आज के समय सरकारें और उनके अधिकारी अपने किसी काम के लिए उत्तरदायी नहीं हैं और उनकी जेब से कुछ नहीं जा रहा इसीलिए वे जो मनमानी चाहें करते रहें. अन्यथा यदि वास्तव में क़ानून का राज होता और ये अधिकारी भी अपने कुकर्मों के लिए जिम्मेदार बन पाते तो इस तरह की गैरजिम्मेदार कार्यवाही के लिए उनके जेब से इन अधिकारियों को दिये जा रहे पैसे की वसूली होनी चाहिए थी. अमिताभ यहाँ चले तो गए हैं पर चूँकि वे स्थिर और शांत रहने वाले प्राणियों में नहीं हैं, इसीलिए मैं यही सोच रही हूँ कहीं ऐसा ना हो कि कहीं वे ऐसे शांत पड़े महकमे को भी गरम ना कर दें जिससे उन्हें यहाँ से भी हटाने की नौबत आ जाए.

डॉ नूतन ठाकुर आरटीआई एक्टिविस्ट और स्वतंत्र पत्रकार के बतौर सक्रिय रहने के साथ-साथ सम-सामयिक और बेहद निजी व पारिवारिक मुद्दों पर भी खुलकर लिखती-बोलती रही हैं. नूतन का मानना है कि संविधान-कानून में उल्लखित अपने अधिकारों का हम लोग समुचित उपयोग करते रहें तो पूरे देश से ज्यादातर बुराइयां खत्म हो जाएंगी और फिर वाकई अपने देश का लोकतंत्र दुनिया का सबसे महान लोकतंत्र माना जाएगा.

मुख्‍यमंत्री के सचिव ने हड़काया तो ‘हुआंहुआं चैनल’ का भौकाल प्रमुख करने लगा भुपभुप

: सचिव ने कहा- बदतमीज कहीं के, लतिया कर बाहर कर दूंगा : इसके पहले यूपी भवन में भी औकात दिखायी जा चुकी है कथित भौकाली को : नई दिल्‍ली : चैनल मार्केट के कबाड़ी बाजार में एक चैनल है, जो अब ‘था’ होने जा रहा है। नाम है, मान लीजिए ”हुआंहुआं” चैनल। यह चैनल अभी कुछ ही दिन पहले तक कई राज्‍यों में अपने जोबन-नचाऊ अंदाज में खूब दिखता था।

इस सफलता के चलते इसके मालिक को लगा कि यह उसके दिमाग की जीत है, न कि कर्मचारियों की हाड़तोड़ मेहनत का नतीजा। बस फिर क्‍या था, दंदफंद में माहिर सत्‍संगप्रेमी मालिक ने कर्मचारियों को औकात में लाना शुरू कर दिया। वो चाहता था कि पत्रकारों को पतुरिया की तरह व्‍यवहार करना सिखाया जाए। लेकिन पत्रकार टाइप यह लोग भड़ुआ तक बनने को तो तैयार थे, लेकिन पतुरिया बनने को राजी नहीं हुए। नतीजा, इस नवधनाढ्य बनिया ने एक-एक करके सबकी रोजी-रोटी पर लात मार कर ठिकाने लगाया और अपनी ही तरह के, धंधाबाजी में, उस्‍ताद लोगों को गोद में बिठाने के लिए भारी रकम पर ले आया। उसे लगा कि उसके बेटे-पोतेनुमा यह बच्‍चे उसका नाम रौशन करेंगे। लेकिन अब पता चल रहा है कि घर को ही आग लग गयी घर के चिराग से।

अपने नये मालिक के लिए यह नये भड़ुए बाकायदा पतुरियापने पर उतारू हो गये। मालिक को और क्‍या चाहिए था, वह अपने निजी सत्‍संग में जुट गया। हालांकि उसकी हालत आजकल काफी पतली चल रही है। शुरू में तो देश की हर भाषा और बोली में इस चैनल को लांच करने के अपने गुब्‍बारेनुमा दावों में हवा खूब भरी गयी, लेकिन अब उस हवा को सीटी मारने के अंदाज में छोड़ा जा रहा है। ऐसी हालत में जाहिर है माहौल बदबूदार हो चला है।

तो ताजा खबर यह है कि इन पतुरियों की करतूतों से अब इनके पितामहनुमा रहनुमा का दिल फट गया है। कारण है इन पतुरियों का बड़बोलापन और केवल दिखावे के स्‍तर का अक्‍खड़वाद। चाटुकारिता के चलते इन नव-पतुरियावादियों ने अपने स्‍वामी को बताया कि वे ये कर सकते हैं, वो कर सकते हैं। हेन कर सकते हैं, तेन कर सकते हैं। इस नेता की टेंट ढीली कर सकते हैं, उस कुबेर का खजाना खुलवा सकते हैं। लेकिन वे दरअसल क्‍या कर सकते हैं, इसकी तो थाह ही नहीं लग पा रही थी। जबकि मालिक की निगाह में इनका कद बढ़ता जा रहा था।

यह सब जानते हैं कि विज्ञापन वाले यानी सेल्‍स डिपार्टमेंट के लोग काफी बड़े खिलाड़ी और पूरे वाले घाघ होते हैं। उन्‍होंने मामला ताड़ लिया और इस दो सदस्‍यीय पतुरिया गिरोह के सिजरा के अध्‍ययन में जुट गये। पता चला कि इनमें से एक पतुरिया, जो झूठ बोलने और भौकाल पेलने में माहिर है, खुद को यूपी के मुख्‍यमंत्री के एक ताकतवर सचिव का बहुत करीबी बताते हुए अपनी दुकान चलाता फिरता है। बस, फिर क्‍या था। सेल्‍स वालों ने इसे बेचने का तरीका खोज लिया। दरअसल, इस समेत कई चैनलों के उत्तर प्रदेश में प्रसारण न होने के चलते वहां के विज्ञापन नहीं मिल रहे थे। बढिया मौका ताड़कर सेल्‍सवालों ने मालिक के पास अर्जी लगायी कि चूंकि फलां राज्‍य से विज्ञापन नहीं मिल रहे हैं, इसलिए इस पतुरिया के वहां ऊंचे सम्‍पर्कों का सहयोग ले लिया जाए। मालिक ने सेल्‍स के इस प्रस्‍ताव पर हामी भर दी।

हुक्‍म जारी हो गया तो गिरोह को जैसे जुलाब का असर हो गया। घेराबंदी बढ़ते देख मजबूर होकर इस छोटे प‍तुरिया ने एक दिन उस राज्‍य के स्‍टेट गेस्‍ट हाउस में सेल्‍स के लोगों को उस सचिव से मिलाने के लिए बुला लिया। सेल्‍स के लोग पहुंचे तो उन्‍हें भीतर ही नहीं घुसने दिया गया। सुरक्षाकर्मियों ने पतुरिया को बाहर ही खड़ा किये रखा था। तीन घंटे की प्रतीक्षा के बाद सचिव निकले तो, लेकिन पतुरिया के सलाम का जवाब केवल हाथ हिला कर ही दिया और कार में बैठ कर फुर्र हो गये। पतुरिया का चेहरा फक्‍क हो गया और लगा पुकपुक भुपभुप टाइप से हिलने-डुलने। बेचारे भौकाल प्रमुख उर्फ झुट्ठाधिराज का सेल्‍सवालों के सामने किरकिरी जो हो गयी, सो अलग।

खबर है कि इसके कुछ दिन बाद इस पतुरिया का आमना-सामना उस सचिव से हुआ, तो अपने चिंटुओं पर रूतबा झाड़ने के लिए उसने सचिव से अपनापा दिखाते हुए बात की। बताते हैं कि इस अंदाज पर सचिव का मूड खराब हो गया और उसने इस बदतमीजी पर कसकर झाड़ लगाते हुए यहां तक धमका दिया कि अभी लतिया-धकिया कर बाहर निकलवा दूंगा, सारी अकड़ निकल जाएगी। यह बात आम होते ही इन पतुरियाओं की नौकरी पर खतरे के बाद मंडराने लगे हैं। सुनते हैं कि इन सभी ने अपना बोरिया-बिस्‍तरा पैक कर लिया है। न जाने कब खर्रा पकड़ा दिया जाए कि निकलो बाहर, अब तुम्‍हारी जरूरत नहीं रही। हालांकि कहने वाले कहते हैं कि चैनल मालिक पहले इन लोगों के हाथों सारे पाप कुकर्म करा लेगा फिर आखिर में इन लोगों के पिछवाड़े लात मारेगा, जैसा कि चलन है।

कानाफूसी कैटगरी की खबरें सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होती हैं जिनमें सच्चाई संभव है और नहीं भी. जो व्यक्ति इसमें सौ फीसदी सच्चाई तलाशेगा वो अपनी मूर्खता के लिए खुद जिम्मेदार होगा. वैसे ‘स्टे फुलिस’ में कोई खास दिक्कत नहीं है क्योंकि स्टीव जाब्स कह गए हैं… आप अपनी मूर्खता या विद्वता का प्रदर्शन नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए कर सकते हैं.

”बड़ा घटिया निकला मनोज बाजपेयी और अजय ब्रह्मात्मज”

किन्हीं सज्जन ने खुद को अनाम रखते हुए swarup.raunak@gmail.com मेल आईडी से पिछले दिनों यमुनानगर में हुए फिल्म महोत्सव के बारे में काफी कुछ लिख भेजा है. इस मेल के जरिए उन सज्जन ने अपनी भड़ास कई लोगों के खिलाफ निकाली है. एक्टर मनोज बाजपेयी, फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज और ब्लाग संचालक अविनाश दास पर कई आरोप लगाए हैं. लंबे शिकायती पत्र के केवल उन अंशों को प्रकाशित किया जा रहा है जिसमें आरोप हैं.

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”अजय ब्रह्मात्मज मुंबई से दिल्ली आए, दैनिक जागरण द्वारा आयोजित जागरण फिल्म फेस्टिवल में शामिल होने के लिए। उन्होंने सारी सुविधा और किराया-भाड़ा जागरण से लिया। इस बीच अजीत राय उन्हें यमुनानगर के लिए आमंत्रित करते रहे और अजयजी देखते हैं-आते हैं, करते रहे जैसा कि कोई बड़ा आदमी करता है। अजयजी फिर यमुनानगर गए और सिर्फ अपनी उपस्थिति के कारण मुंबई से आने-जाने के किराये की मांग कर दी जो कि कुल अठारह हजार रुपये थे। वैसे मुंबई से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई का का किसी भी फ्लाईट में इतना किराया नहीं होता है। अजयजी जिस डीएवी गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल के काम की सराहना कर रहे हैं और दूसरी तरफ अजीत राय की कोशिशों को आपसी फायदे और जान-पहचान का हिस्सा बता रहे हैं, उनसे लोगों को पूछना चाहिए कि आपने एक ही जगह आने-जाने के लिए जागरण और यमुनानगर फिल्मोत्सव से पैसे कैसे ले लिए? क्या ऐसा करना आपके लिए नैतिक रूप से सही था? इस फिल्मोत्सव में आपसे भी बहुत बड़े-बड़े नाम आते हैं लेकिन वे फिल्मोत्सव और कॉलेज की क्षमता के अनुसार पैसे की मांग और सुविधाएं लेते हैं लेकिन आपने तो इतना अधिक लिया -जिसके लायक आप हैं भी नहीं। क्या आप जैसे लोगों की इस घिनौनी कुचेष्टा के बाद भी यह फिल्मोत्सव अन्तर्राश्ट्रीय बन पाएगा,जिसके लिए अजीत राय सहित कॉलेज के लोग प्रयासरत हैं? यमुनानगर में इतनी बड़ी रकम एक आदमी के लिए दिए जाने से दिक्कतें हुई और अजयजी को कॉलेज की इज्जत और अठारह हजार के बीच चुनना था और उन्होंने अठारह हजार चुना।”

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”यमुनानगर फिल्मोत्सव के प्रबंधन ने अविनाश दास से कहा कि उन्हें मनोज वाजपेयी की कोई दरकार नहीं है। लेकिन अविनाशजी को अपना अस्तित्व खतरे में नजर आया और बार-बार अजीत राय पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि ऐसा न करें, वाजपेयी का कार्यक्रम हर-हाल में होना चाहिए। अविनाशजी और अजयजी से पूछा जाना चाहिए कि क्या इस तरह जबरदस्ती मनोज वापजपेयी को घुसाकर भी फिल्मोत्सव को अन्तर्राष्ट्रीय होने में मदद मिली? मनोज वाजपेयी को वैसे भी दिल्ली अपने पारिवारिक काम से आना था और रुकना था। अविनाशजी ने मनोज वाजपेयी का खर्चा बचाने और अपनी पीआर मजबूत करने के लिए इस कार्यक्रम को फेस्टीबल में फिट करा दिया। जो मनोज वाजपेयी अदाकारी के आधार पर ही हम सबका हीरो है, इस पूरे मामले में इतना घटिया निकला कि उसने अपनी और अपनी पत्नी की बिजनेस क्लास की टिकट ली और करीब 80 हजार रुपये अविनाशजी के साथ मनोज वाजपेयी के लिए इस पूरे कार्यक्रम में प्रबंधकों के फुंक गए। यमुनानगर फिल्मोत्सव आपसे सहयोग और मदद से चलनेवाला कार्यक्रम है। मजबूरी में आयोजकों को वहां के एक सह्दय से मदद लेनी पड़ गयी। सवाल है कि इस काम के लिए मजबूर किसने किया? वही अविनाशजी और हमारे मनोज वाजपेयी हीरो ही न जो कि भ्रष्टाचार मुक्त सुंदर समाज बनाने का ढोंग करते रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में आखिर फिल्मोत्सव और डीएवी कॉलेज, यमुनानगर का क्या फायदा हुआ? उनकी तो एक रिपोर्ट तक अविनाश ने प्रकाशित नहीं की और आज अजय ब्रह्मात्मज ने लिखा भी तो पूरी अपनी खुंदक निकाल दी। क्या उनमें इस बात का साहस है कि वे लोगों के सामने स्वीकार करें कि एक ही जगह से आने-जाने के लिए उन्होंने दो अलग-अलग आयोजकों से पैसे लिए? अगर ऐसा वे स्वीकार लेते हैं या फिर उनकी पोस्ट लगाते वक्त अविनाशजी लिख देते कि यह अजयजी के निजी विचार हैं, तब भी शायद कुछ ईमानदारी बची रह जाती। वैसे भी 15 दिन बाद की इस पोस्ट में शक की सुइयां अपने आप ही उठती रहती है। दैनिक जागरण के नाम पर अजयजी ने जो निजी लाभ लेने की कोशिश की है, वह कितनी ओछी घटना है, इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है।”

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सवाल हिसार में कांग्रेस की गई या बची ज़मानत का नहीं

: हरियाणा को गुजरात हुआ समझिए : सवाल हिसार में कांग्रेस की गई या बची ज़मानत का नहीं, हरियाणा में नेस्तनाबूद हुई अस्मत का है. जैसे उसने कभी महाराष्ट्र में मराठों, यूपी में ब्राह्मणों और पंजाब में सिखों को खोया वैसे ही उसने हरियाणा में जाटों और गैरजाटों दोनों को खो दिया है. हिसार के चुनाव और उसके परिणाम को मतदाताओं के जातिगत तौर पर हुए बंटवारे के रूप में देखिए.

जैसा मैंने पहले भी लिखा संगोत्र विवाह के मुद्दे पर उन से हुए व्यवहार के बाद पहले तो जाटों की खापें ही खफा थीं. आरक्षण के मुद्दे पर जाट कांग्रेस से समाज के तौर पर भी नाराज़ थे. खापों और जाटों के कांग्रेस के खिलाफ फतवे उस जिले रोहतक से भी आ रहे थे जो खुद मुख्यमंत्री का गृहजिला है. उन्हीं के रोहतक के करीब जला गोहाना अभी बुझा नहीं था कि मिर्चपुर में खुद दलित ही जिंदा जले दिए गए. जले हुए ताज होटल में फिल्मकार रामू को साथ ले जाने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को हटा देने वाली कांग्रेस ने हरियाणा के मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई कारवाई तो क्या कोई जांच तक नहीं बिठाई. नतीजा कि दलित भी गए उसके हाथ से.

वो भी चलो एक आपराधिक घटना थी. और घटनाएं हो भी जाया करती हैं. लेकिन उसके बाद? उसके बाद जो भी हुआ वो सारी की सारी प्रशासनिक विफलता थी. इस हद तक कि देश की सर्वोच्च अदालत तक को आपकी प्रशासनिक व्यवस्था पे कोई भरोसा नहीं रहा. मिर्चपुर का मुक़दमा हरियाणा से बाहर दिल्ली ट्रांसफर हो गया. आपने तब भी अपनी नैतिक पराजय स्वीकार नहीं की. और फिर आपने एक के बाद एक राजनीतिक भूल भी की. कांग्रेस की सब से बड़ी राजनीतिक भूल तो ये थी कि उसने सन 2005 में नब्बे में से चौसठ सीटें लाकर देने वाले भजन लाल को तब भी दरकिनार कर दिया कि जब वो ताबड़तोड़ बहुमत साफ़ तौर पर हरियाणा की तीन चौथाई गैरजाट जनता के कांग्रेस के साथ आ जाने का परिचायक था.

उस भूपेंद्र सिंह हुड्डा को तब भी मुख्यमंत्री बना देने का फैसल कांग्रेस ने किया जिसे उसने खुद विधानसभा का चुनाव नहीं लडवाया था इस डर से कि अगर उनके मुख्यमंत्री हो सकने का शक जनता को हो गया तो कांग्रेस हार भी सकती है. और फिर अगर भजन लाल को किसी भी वजह से सही, किनारे करने का मन कांग्रेस ने बनाया भी तो मौका तब तक लगातार पांच बार विधानसभा चुनाव जीत चुके किसी कैप्टन अजय यादव को नहीं बनाया. चौटाला के जाटों में ज़बर न हो जाने के डर से जाट ही अगर ज़रूरी था हुड्डा से बहुत सीनियर बिरेन्द्र सिंह को भी नहीं बनाया. उस ने फिर हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाया कि जब वे अगले चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं दिला सके.

कांग्रेस गलती पे गलती करती रही. वो तब भी नहीं चेती कि जब भाजपा ने हिसार उपचुनाव से पहले कुलदीप बिश्नोई से गठबंधन किया. उस भाजपा ने गैरजाटों में जिसकी जितनी भी सही पैठ के कारण देवीलाल जैसा महानायक और बंसीलाल भी गठबंधन करते और हर बार सरकार बनाते रहे. फिर इस बार तो भाजपा उन भजन लाल के बेटे के साथ आई जिन्हें खुद कांग्रेस भी हरियाणा के गैरजाटों का निर्विवाद नेता मानती रही. खापें नाराज़ थीं. गोहाना और मिर्चपुर हो ही चुके थे. कांग्रेस को जरा ख्याल नहीं आया कि अगर बचे खुचे गैरजाट भी चले गए तो क्या होगा. उसने आरक्षण को लेकर सरकार को नाकों चने चबवा चुके जाटों के सामने जाट मुख्यमंत्री के भरोसे एक जाट उम्मीदवार झोंक दिया. ये कांग्रेस में हुड्डा विरोधियों की किसी चाल में आ कर किया तो और अगर जैसे तैसे जाटों को खुश रख करने के लिए तो भी घातक सिद्ध हुआ. जाट जो साथ थे. वो भी जाते रहे.

शुद्ध वोट बैंक की बात करें तो कांग्रेस नंगी हो गई. हिसार परिणाम ने साबित कर दिया कि न उसके साथ जाट, न दलित, न पंजाबी, न बनिए. मकसद अगर हुड्डा के उम्मीदवार को हरवा कर हुड्डा को हटाने का बहाना खोजना था तो इसकी क्या ज़रूरत थी. वैसे ही हटा देते. और मकसद अगर पोलराइज़ेशन रोकना था तो फिर कुलदीप की काट किसी गैरजाट उम्मीदवार से क्यों नहीं की? सोचा होगा कि गैरजाट को लाएंगे तो सारे के सारे जाट चौटाला ले जाएंगे. ये शायद बेहतर होता. चौटाला का बेटा जीत जाता तो कुलदीप से ज्यादा बेहतर होता. दो कारणों से. एक कि अजय लोकसभा में होते भी तो ऐसे किसी तीसरे मोर्चे में होते जिसका कि आज कोई वजूद नहीं है. और दो कि भाजपा हरियाणा की आबादी में तीन चौथाई गैरजाटों को लामबंद करके आपको कल को हरियाणा की दस की दस सीटों पे टक्कर देने की हालत में न होती.

बहरहाल, पार्टियां अपने तरीके से सोचती हैं और कई बार उनकी सोच पत्रकारों से अलग भी होती है. वे अक्सर बहुत अलग नज़रिए से देखती हैं. लेकिन जो अब हरियाणा में दरअसल किसी अंधे को भी दिख रहा है वो ये कि इस जीत से उत्साहित भाजपा हरियाणा को गुजरात बनाएगी. हिंसा या दंगों के सन्दर्भ में नहीं. वोटगत राजनीति के अर्थ में. वो कहेगी तो छत्तीस बिरादरी मगर लामबंद करेगी गैरजाटों को. आखिर तीन चौथाई से भी ज्यादा हैं गैरजाट हरियाणा में. गैरजाट वो ये मान कर चलेगी कि जब तीं चौथाई की सरदार वो बन गई तो बहुत से एक चौथाई वाले भी साथ आ लेंगे अपनी ज़रूरतों की वजह से. इस तरह का पोलराइज़ेशन कुलदीप को भी सूट करता है. राष्ट्रीय और प्रदेश के स्तर पर भाजपा जैसी किसी पार्टी के साथ चलना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी है. सो, हुड्डा को इतिहास और हरियाणा को देर सबेर गुजरात हुआ समझिए.

चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला का विश्लेषण.

लफंगों की आखिरी शरणस्थली होती है देशभक्ति

आनंद प्रधानदेश में पत्रकारिता छात्रों को तैयार करने वाले प्रीमियर इंस्टीट्यूशन इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन (आईआईएमसी) के प्रोफेसर आनंद प्रधान की हिम्मत की दाद देनी चाहिए. शिक्षण जैसे पेशे में और खासकर पत्रकारिता जैसे पेशे के लिए नौनिहाल तैयार करने वाले काम में वर्तमान में इस कदर खरी-खरी बोलने और लिखने वाले अध्यापक बेहद कम हैं.

आनंद प्रधान ने प्रशांत भूषण पर हमले का बहुत बुरा माना और इसके कारण इन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले की विचारधारा रखने वालों को फेसबुक पर लताड़ने और अपने फ्रेंडलिस्ट से बाहर करने का ऐलान कर दिया. कई लोगों को उन्होंने अनफ्रेंड किया जो दक्षिणपंथी फासिस्ट विचारधारा रखते हैं. आनंद यहीं नहीं रुके. उन्होंने लगातार अपने तर्कों के जरिए यह बताने-समझाने की कोशिश शुरू कर दी है कि आखिर दुनियाभर में वे कौन लोग हैं जो देशभक्ति की आड़ में हमारे आपके जीवन, मनुष्यता, अस्तित्व को नष्ट करने पर आमादा हो जाते हैं.

आनंद के इस जनपक्षधर और मनुष्यता व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति अगाध आस्था के नजरिए का भड़ास4मीडिया भी सपोर्ट करता है और इसे आगे बढ़ाने की हर किसी मुहिम में शामिल होने का ऐलान करता है. यहां बताते चलें कि आनंद बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई और शोध के दौरान भी समाज और देश के कई ज्वलंत मसलों पर सक्रिय हस्तक्षेप करते रहे हैं और तत्कालीन छात्रों के प्रिय वक्ता और नेतृत्वकर्ता रहे हैं. आनंद प्रधान ने फेसबुक पर जो ताजा स्टेटस अपडेट किया है, वो इस प्रकार है.

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‘देशभक्ति, लफंगों की आखिरी शरणस्थली होती है’ – लगभग सवा दो सौ साल पहले की गई सैमुअल जानसन की यह टिप्पणी आज के भारत में बजरंग दल, श्रीराम सेने से लेकर शिव सेना जैसे लम्पट सांप्रदायिक संगठनों और भगवा ‘देशभक्तों’ पर बिलकुल सटीक बैठती है. देशभक्ति सिर्फ आड़ है. इनकी ‘देशभक्ति’ की हकीकत तहलका, विकीलीक्स और ताबूत घोटाले में खुल चुकी है. इसलिए प्रशांत भूषण पर हुआ हमला कोई अपवाद नहीं है. हिटलर के नाजी अर्द्धसैनिक गैंग स्टोर्मत्रुपर्स (एस.एस) भी देशभक्ति की आड़ लेकर विरोधी विचार रखनेवाले बुद्धिजीवियों पर ऐसे ही हमले करते थे, जैसे आज शिव सेना-मनसे और भगवा गैंग के गुंडे करते हैं. कभी बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों और फिल्मकारों पर और कभी आम गरीबों जैसे रेहडी-पटरी, टैक्सी और टेम्पोवालों और कभी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाता है.

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…इस मसले पर आनंद प्रधान के कुछ अन्य फेसबुकी स्टेटस..

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कहते हैं कि असहमति देशभक्ति का सर्वोच्च रूप है.. लेकिन भारत के भगवा गुंडे देशभक्ति की आड़ में असहमति को दबाने और कुचलने की कोशिश कर रहे हैं.. लौह पुरुष नरेंद्र मोदी के राज में और क्या हो रहा है? असहमति की हर आवाज़ को कुचला और दबाया जा रहा है…इन्हें असहमति से इतना डर क्यों लगता है? क्या देशभक्ति की जमीन इतनी भुरभुरी है कि एक प्रशांत भूषण के बयान से भरभरा के ढह रही है…या, बहुत परिश्रम से गढ़ी जा रही लौह और विकास पुरुष और ईमानदारी की असलियत सामने आने का डर है?

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अभी-अभी प्रशांत भूषण पर हमले को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे एक महोदय को मित्र सूची से बाहर किया है..जो भी इस हमले का समर्थक है और मेरे मित्र सूची में है, उसे तुरंत अन्फ्रेंड करूँगा…जो अब हमले का विरोध लेकिन कश्मीर पर प्रशांत भूषण के बयान पर हमले करके इस हमले को अप्रत्यक्ष तरीके से जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भी मित्र सूची से बाहर करने में देर नहीं करूँगा…अच्छा होगा कि ऐसे लोग अपने मित्र सूची से खुद ही मुझे अन्फ्रेंड कर दें…हिंदू तालिबानियों से बहस की गुंजाइश नहीं है और उनसे बहस करके समय बर्बाद नहीं करना चाहता…

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प्रशांत भूषण पर हमले की सख्ती से भर्त्सना की जानी चाहिए…लेकिन हमलावर कुछ सिरफिरे भर नहीं थे बल्कि वे भगवा सांप्रदायिक-फासीवादी राजनीति से प्रेरित थे…साथ ही, हमलावरों की सांप्रदायिक-फासीवादी-अंधराष्ट्रवादी राजनीति की उससे भी अधिक भर्त्सना होनी चाहिए…इस राजनीति के कारण देश में असहिष्णुता और फासीवादी गुंडागर्दी बढ़ रही है..इसका वैचारिक तौर पर मुंहतोड जवाब दिया जाना चाहिए.

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फेसबुक पर आनंद प्रधान से दोस्ती करने के लिए और उनके उनके अन्य स्टेटस को जानने-पढ़ने के लिए उनके नाम के इस लिंक पर क्लिक करके जा सकते हैं- फेसबुक पर आनंद प्रधान

प्रतिष्ठित लेखक श्रीलाल शुक्ल की तबीयत बिगड़ी, लखनऊ के अस्पताल में भर्ती

सिर्फ एक लाइन की सूचना आई है. वो ये कि हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक और लखनऊ निवासी श्रीलाल शुक्ल की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है. उन्हें अभी लखनऊ में गोमती नगर स्थित सहारा हास्पिटल में भर्ती कराया गया है. उनके जानने-चाहने वाले उनके स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं. लखनऊ के कई साहित्यकारों ने टिप्पणी की है कि श्रीलाल जी हम सभी के साझी विरासत और धरोहर हैं. आइए, हम सब लोग उनके जल्द स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना करें.

दीवाली के वक्त न्यूज चैनलों में बड़े उठापटक का दौर

एक दूसरे को टीआरपी में पटखनी देने के चक्कर में जुटे न्यूज चैनलों के बीच बेहतर स्टाफ रखने को लेकर उथल-पुथल मची हुई है. कई लोग इधर-उधर आ जा रहे हैं और कई लोगों से बातचीत अंतिम दौर में पहुंच चुकी है. सहारा समय में लंबे समय तक कार्यरत संजय ब्राग्टा को इंडिया टीवी ने अपने यहां ज्वाइन कराया तो आईबीएन7 में कार्यरत प्रबल प्रताप सिंह आजतक न्यूज चैनल में जाने की तैयारी कर चुके हैं.

खबरें इसके आगे भी हैं. चर्चा है कि आजतक मैनेजमेंट अपनी टीम को बेहतर करने की प्रक्रिया में कुछ ऐसे लोगों को अपने यहां लाने के प्रयास में है जो कभी उनके यहां चर्चित चेहरे हुआ करते थे और आज भी जहां हैं अपने काम के बल पर अपना स्थान बनाए हुए हैं. भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि स्टार न्यूज में वरिष्ठ पद पर कार्यरत दीपक चौरसिया पर आजतक प्रबंधन डोरे डाल रहा है. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि दीपक से बातचीत करीब करीब फाइनल है पर इस बात की पुष्टि दीपक और स्टार न्यूज के करीबी सूत्र नहीं कर रहे हैं.

पर मीडिया जगत में ताजी बड़ी चर्चा दीपक को लेकर ही है. सूत्रों के मुताबिक सुप्रिय प्रसाद की आजतक में वापसी के बाद आजतक मैनेजमेंट सुप्रिय की सलाह पर कई लोगों से संपर्क कर रहा है. प्रबल प्रताप के नाम पर मुहर के बाद अब बारी दीपक चौरसिया की है. देखना है कि दीपक आने वाले दिनों में आजतक के साथ जुड़ जाते हैं या फिर स्टार न्यूज के साथ ही बने रहते हैं.

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि स्टार न्यूज के एक अन्य पत्रकार से आजतक मैनेजमेंट की बातचीत चल रही है. इस पत्रकार का अतीत कुछ चीजों को लेकर विवादास्पद रहा है पर उनके बेहतरीन काम को देखते हुए आजतक प्रबंधन उन्हें फिर से वापस बुलाने पर विचार कर रहा है. सूत्रों के मुताबिक दीवाली तक पिक्चर क्लीयर हो जाएगी कि कौन कौन कहां से इस्तीफा देकर दूसरे संस्थानों को ज्वाइन कर रहे हैं.

हरिवंश की कलम से- ‘कहां गइल मोर गांव रे’

पर इस बार 11 अक्तूबर को जेपी के जन्मदिन पर गांववालों ने अनुभव सुनाये. कहा मीडियावाले तो ऐसे-ऐसे सवाल पूछ रहे थे, मानो यूपी-बिहार के गांव ‘भारत-पाक’ जैसे दो देश हों. जेपी का जन्म कहां, घर कहां? वगैरह-वगैरह. गांववालों ने कहा, हमने तो इसके पहले जाना ही नहीं कि हमारा गांव, दो राज्यों और तीन जिलों में है. हम तो एक बस्ती हैं. एक शरीर जैसे. उसे आप बांट रहे हैं, ऊपर से बता या एहसास करा रहे हैं.

गांववालों की बात सुन कर मंटों की मशहूर कहानियां याद आयीं. भारत-पाक बंटवारे सीमा से जुड़ीं. कहा, आधुनिक राजकाज, हुकूमत, प्रशासन की अपनी सीमाएं या बंधन है. दस अक्तूबर की रात थी. शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी. टह-टह चांद चमक रहा था. चौदहवीं का चांद. आधी रात के आसपास नींद खुली. घर से बाहर आया. पिशाब करने. देखा वही बड़े पेड़. मीलों-मीलों तक खुले खेत. निर्जीव स्तब्धता. ऊपर से शीतल-स्निग्ध चांदनी रात. संवेदनशील कवियों ने अंजुरी भर भी ऐसी चांदनी पी लेने, उससे आत्मसात हो जाने की कल्पनाएं की हैं. पर, 40 वर्षो पहले छूट गये इस गांव की ऐसी बातें या दृश्य कहां भूल पाया? शायद यही कारण है कि गांव आने-जाने का सिलसिला नहीं टूटा.

घर बंद ही रहता है. पर ये यादें शायद खींच लाती हैं. दरवाजे के आगे वही विशाल पाकड़ या पकड़ी का पेड़, जिसके नीचे बचपन व कैशोर्य गुजरा. पर वह पेड़ टूट कर आधा रह गया है. दरवाजे के आगे वही कुआं. जिसके ओट पर गर्मियों में सोना होता था. गर्मी से राहत मिलती. स्कूल के छात्र थे, हम. हमारे अध्यापक सुरेश कुमार गिरी रात एक-डेढ़ बजे रोज जगाते. पढ़ने के लिए. कहते आंख धोकर, पहले बाहर पांच मिनट घूमो. नींद नहीं आयेगी. मन-ही-मन उन्हें कोसते हम ऐसा ही करते. उन्हीं दिनों बिना पढ़े, बताये, देख कर जाना, समझा कि चांदनी रात या पूर्णिमा का सौंदर्य क्या है? घोर देहात, गांव या घर के आगे, निछान चंवर. मीलों-मील पसरे-फ़ैले खेत. सब कुछ सोया, शांत. अंधेरी रात में तारों की वह अद्भुत चमक. डर भी रहता भूतों का, सांपों का, बिच्छू का (सांप-बिच्छू तब तक काट चुके थे), फ़िर भी उन रातों में मिलती ब्रह्मांड की झलक की यादें कितनी सजीव हैं. आज भी,

चार दशक बाद.तब सचमुच गरीबी थी. दो नदियों का घेरा. विशाल दरियाव (नदियों का पाट) पार करना होता. घाघरा पार रिविलगंज (छपरा बहुत बाद में देखा) ही सबसे बड़ा शहर लगता. न सड़क, न अस्पताल. न बिजली, न फ़ोन. चार-पांच महीने पानी में ही डूबे-घिरे रहना पड़ता.. बाढ़ के वे दिन, वेग से चलती हवाओं से उठती लहरें, दरवाजे पर बंधी नावों से यात्रा के वे दिन, आज रोमांचक लगते हैं. पर तब कितने कठिन थे. अज्ञेय के भाव में कहें, तो भोक्ता की पीड़ा, वही जान सकता है.वरदान रहा कि उस बियाबान जंगल या दीयर या दोआब (दो नदियों के बीच गांव) में जेपी पैदा हो गये. चंद्रशेखर जी ने उसका उद्धार आरंभ किया. और बिहार के हिस्से के गांवों की सूरत बदली नीतीश कुमार ने. अब बिजली है. सड़क है. यूपी इलाके में सड़क टूटी-फ़ूटी है, बिजली पहले से है. पहले की तरह घंटों-घंटों नावों से (बयार या मौसम पर निर्भर नाव यात्रा) और फ़िर रेत पर लंबी पैदल यात्रा तो नहीं करनी पड़ती. 27 टोले का यह गांव है. यूपी-बिहार के तीन जिलों में बंटा. बलिया, आरा, छपरा. अधिकतर हिस्सा या टोले बलिया में हैं.

पर इस बार 11 अक्तूबर को जेपी के जन्मदिन पर गांववालों ने अनुभव सुनाये. कहा मीडियावाले तो ऐसे-ऐसे सवाल पूछ रहे थे, मानो यूपी-बिहार के गांव ‘भारत-पाक’ जैसे दो देश हों. जेपी का जन्म कहां, घर कहां? वगैरह-वगैरह. गांववालों ने कहा, हमने तो इसके पहले जाना ही नहीं कि हमारा गांव, दो राज्यों और तीन जिलों में है. हम तो एक बस्ती हैं. एक शरीर जैसे. उसे आप बांट रहे हैं, ऊपर से बता या एहसास करा रहे हैं. गांववालों की बात सुन कर मंटों की मशहूर कहानियां याद आयीं. भारत-पाक बंटवारे सीमा से जुड़ीं. कहा, आधुनिक राजकाज, हुकूमत, प्रशासन की अपनी सीमाएं या बंधन है. मीडिया के ऐसे सवालों को इसी रूप में लें.पर एक और बड़ी उल्लेखनीय बात. कह सकता हूं कि वह सिताबदियारा गांव (27 टोले) वह नहीं रहा, जो था. वह गरीबी नहीं दिखती. हालांकि अभी भी कई टोलों के लोगों की पूरी की पूरी जमीन कटाव में चली गयी है. गंगा-घाघरा के कटाव में.

खेतिहर भूमिहीन में बदल गये हैं. फ़िर भी वह पुरानी गरीबी नहीं दिखती. पर वह पुराना ‘गांव’, जो 40 वर्षो पहले छूटा, वह भी नहीं दिखता.कई छोटे-मोटे बाजार खुल-बन गये हैं. गांवों की भदेस भाषा में चट्टी कहते हैं. इन्हें देख कर या इनके बारे में जान कर कहावत याद आती है कि मुक्ति की राह बाजारों से तय होती है. ये चट्टी या मामूली बाजार, शहरीकरण की आरंभिक सीढ़ियां हैं. ये सीढ़ियां, गांवों के पुराने ताने-बाने को छिन्न-भिन्न और नष्ट कर देती हैं. तुरहा-तुरहिन, कुम्हार, हजाम, धोबी, छोटे दुकानदार धीरे-धीरे गायब या नष्ट होते हैं. ‘इंटरप्रेन्योरशिप’ (‘उद्यमशीलता’) के नये-नये उदाहरण भी मिलते हैं.

आर्थिक गतिविधियां बढ़ने-पनपने लगती हैं. बिजली, पानी सप्लाई, फ़ोन टावर वगैरह से नये छोटे रोजगार पनपने लगते हैं, सड़कों से ठेका मिलता है. सरकारी स्कीमों के प्रभाव व काम के असर दीखते हैं. इस तरह एक फ़सल पर जीवन जीनेवालों के लिए अनेक नये अवसर उपजे हैं. इससे समृद्धि आयी है. या समृद्धि की जगह कहें कि वह भयावह गरीबी-दुर्दिन अब नहीं रहे, तो शायद ज्यादा सही अभिव्यक्ति होगी. राजनीति भी धंधा बन गयी है. हर दल के सक्रिय कार्यकर्ताओं के अपने रुतबे-हैसियत हैं. गांव पंचायतों की गतिविधियों से सूरत बदल रही है. सत्ता और पैसे के वे नये केंद्र बन गये हैं.पर अपने गांव को इस बार देखते हुए अंगरेज कवि ओलिवर गोल्ड स्मिथ की कविता की एक पंक्ति याद आयी ‘वेल्थ एक्युमुलेट्स एंड मेन डिके’ (संपन्नता आती है, पर मनुष्य का क्षय होता है) यह 1770 में लिखी गयी. तब गरीब इंग्लैंड का औद्योगिकीकरण हो रहा था.

वह गरीबी का चोला उतार कर संपन्न बन रहा था. यही हाल अपने गांव का पाया. गांव में देसी शराब, कुटीर उद्योग बन गयी है. पहले 1970 में रिविलगंज से एक आदमी दो घड़ा (दू घइला) ताड़ी लेकर दीयर में उतरा. हमारे चाचा चंदिका बाबू (जेपी के सहयोगी) ने संबंधित टोलों के बुजुर्गो को खबर (बिहार के इलाके) करायी, वह ताड़ी जस की तस, फ़िर घाट पर वापस गयी. इस हिदायत के साथ कि दोबारा इस पार न आये. आज शराब के बाजार का विस्तार हो गया है. दशकों तक उस घटना की चर्चा हम सुनते रहे. एक बुजुर्ग या नैतिक इंसान का पूरा गांव आदर करता. पंचों का फ़ैसला सर्वमान्य होता. आज बाप को बेटा सुनने के लिए तैयार नहीं. पहले एक बुजुर्ग की अवहेलना 27 गांव नहीं कर पाता था. नैतिक बंधन की यह बाड़, गरीबी का चोला उतारते गांव ने तोड़ दिया है. पहले रामायण, कीत्तर्न, भजन, सत्संग, साधु-संत सेवा में लोग मुक्ति तलाशते थे, अब शराब, ठेकेदारी और राजनीति मुक्ति के नये आयाम हैं.

सबसे बड़ा फ़र्क रिश्तों-संबंधों में आया है. बचपन में कई विधवाओं को देखा है, अकेले झोपड़ी डाल कर रहते-गुजारा करते. लोग-समाज ऐसे लोगों का ध्यान रखते थे. पूरे सम्मान-स्वाभिमान के साथ ऐसी गरीब विधवाओं को जीते देखा. बूढ़े-बुजुर्गो का सम्मान था. वे बोझ नहीं थे. हमारे घर में, हमारे किसान पिता अधिकतर बाहर रहते. अभिभावक की भूमिका में थे, घर के बुजुर्ग नौकर भिखारी भाई (यादव). किसी में साहस नहीं था, एक शब्द उनकी अवहेलना करे. वह गार्जियन थे. वैसे भी तब पिता लोग अपने बेटों का ध्यान नहीं, भतीजों को खुला स्नेह अधिक करते थे. हमसे भी चाचा लोग. (एक चाचा, जिन्हें हम लाला कहते थे. वह संत थे.) यानी, मैं, मेरी बीवी, मेरे बच्चों का दौर नहीं आया था. कैसे-कैसे उदार चरित्र और बड़े मन के लोग थे. रासबिहारी भईया, राधामोहन बाबा, ओस्ताद बाबा, श्यामा बाबा, चंद्रमन यादव, दाई..गांव के अन्य बड़े बुजुर्ग, जिनसे रक्त का रिश्ता नहीं, पर वे अपने थे. कई अपढ़ थे, पर ज्ञानियों से अधिक मानवीय-समझदार. निस्वार्थ स्नेह, मदद और अपनत्व की वह छायावाला गांव कहां खो गया? अब अधिसंख्य पढ़े-लिखे हैं, पर रिश्तों में हिसाब-किताब है.

बिहार के पूर्व मंत्री एवं अर्थशास्त्री प्रो. प्रभुनाथ सिंह पारिवारिक मित्र थे. हर वर्ष संक्रांत में वह भी मेरे घर (गांव) आते. भोजपुरी के जाने-माने लेखक कवि भी थे. दस वर्षो पहले उन्होंने गांवों-घरों के छीजते आत्मकेंद्रित संबंधों को लेकर एक लंबी कविता लिखी थी. अत्यंत मार्मिक. ‘कहां गइल मोर गांव रे?’चौदहवीं की चांदनी में बचपन में देखे-निहारे उस गांव को इस बार भी चौदहवीं के चांद की रोशनी में ही देखा. लक्ष्मी की खनक ने उस गरीबी को मलिन किया है. पर गांव का वह पुराना मन, मिजाज और संबंध भी दरक गया है.

इस बदलते गांव का चेहरा-प्रोफ़ाइल, साहित्य में देखने की ललक है. 60-70 के दशकों में बदलते गांवों को फ़णीश्वर नाथ रेणु के ‘मैला आंचल‘ या ‘परती परिकथा‘ या राही मासूम रजा के ‘आधा गांव‘ या शिवप्रसाद की ‘अलग-अलग वैतरणी‘ या श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी‘ में जिस तरह पढ़ा था, आज के बदलते गांव के बारे में वैसा साहित्य पढ़ने की ललक. किसी भी समाजशास्त्री ने इतने बेहतर ढंग से 60-70 के बदलते गांवों के बारे में इतना बेहतर नहीं बताया, जितना इन चार उपन्यासकारों-साहित्यकारों ने. मौजूदा सृजन में लगे लोगों के लिए यह चुनौती है.

लेखक हरिवंश बिहार-झारखंड के सबसे चर्चित और जन सरोकारी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका लिखा प्रभात खबर से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

न्यूज चैनलों के लिए क्रांतिकारी हो सकता है एनालॉग से डिजिटल की ओर का सफर

केंद्रीय मंत्रिमंडल का यह फैसला न्यूज़ चैनलों के लिए क्रांतिकारी हो सकता है। सरकार ने तय किया है कि वह केबल आपरेटरों को अनिवार्य रूप से डिजिटल तकनीक अपनाने के लिए अध्यादेश लाएगी। हमारे देश में अस्सी फीसदी टीवी उपभोक्ता केबल नेटवर्क के ज़रिये चैनलों को ख़रीदते हैं। जिसके लिए वो महीने में दो सौ से तीन सौ रुपये तक देते हैं। अभी एनालॉग सिस्टम चलन में है।एनालॉग सिस्टम में कई तरह के बैंड होते हैं।

बैंड का स्पेस सीमित होता है। टीवी सेट भी बैंड के हिसाब से होने चाहिए। कई टीवी सेट में पचास से ज़्यादा चैनल नहीं आते। इसीलिए पहले पचास में आने के लिए चैनल केबल आपरेटर को भारी मात्रा में कैरेज फीस देते हैं। इस मांग और आपूर्ति का उपभोक्ता से कोई लेना देना नहीं है। एनालॉग सिस्टम में होता यह है कि एक चैनल एक नंबर पर आता है और दूसरा किसी और नंबर पर। अगर आप टाटा स्काई ऑन करें तो न्यूज़ चैनल एक जगह मिलेंगे, स्पोर्टस एक कैटगरी में। लेकिन एनालॉग में आपको पूरा सौ नंबर तक जाकर अपने पंसद के चैनल ढूंढने पड़ते हैं। इसीलिए न्यूज़ चैनलवाले भारी रकम केबल आपरेटर को देते हैं ताकि वो पहले दस या पहले बीस में चैनल को दिखाये।

कोई न्यूज़ चैनल अगर सौ करोड़ रुपये खर्च करता है तो उसमें से पचास से साठ करोड़ रुपये केबल कैरिज फीस से के रूप में चला जाता है। बीस पचीस करोड़ रुपये मार्केटिंग में और कांटेंट पर सबसे कम बीस करोड़ के करीब। यही वजह है कि कांटेंट सस्ता और चलताऊ होता जा रहा है। सारा पैसा मार्केट में दिखने के लिए खर्च हो जाता है। केबल आपरेटरों के डिजिटल होने से बहुत राहत मिलने की बात कही जा रही है। एक तो यह है कि आपका चैनल किसी भी नंबर पर आएगा, साफ सुथरा ही दिखेगा। धुंधला नहीं। तो पहले दस और पचीस को लेकर मार खत्म।

इसके लिए बताया जा रहा है कि केबल जगत को तीस हज़ार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। अब यह देखना होगा कि केबल जगत इस खर्चे की भरपाई कैसे करता है। उपभोक्ता से कितना वसूलता है। क्या अस्सी फीसदी उपभोक्ता इसके लिए तैयार होंगे? एक दलील यह भी दी जा रही है कि डिजिटल होने से केबल वाले चैनलों के स्पेस की मार्केंटिग खुद कर सकेंगे। जैसे अमुक चैनल के ब्रेक में पटना में अलग एडवरटीज़मेंट दिखेगा और लखनऊ में अलग। अभी तो केबल वाला यह करता है कि अमुक चैनल को हटा देता है। उससे जबरन ज्यादा पैसा मांगता है। उपभोक्ता कुछ नहीं कर सकता। उसे मजबूरन अपने पंसद का चैनल छोड़ उस नंबर पर दूसरा चैनल देखना पड़ता है।

यह एक ज़रूरी कदम है। वर्ना न्यूज़ चैनलों की आर्थिक हालत खराब होती जा रही है। न तो नए लोग आ रहे हैं न नया चैनल न नया प्रोग्राम जिसमें बहुत सारे प्रयोग हों। पर यह प्रक्रिया कैसे लागू होगी और कब तक लागू होगी इसे आप सिर्फ डेडलाइन देकर तय नहीं कर सकते। ज्यादातर केबल नेटवर्क राजनीतिक लोगों के हाथ में हैं। इसलिए जब हो जाए तभी ताली।

लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी इंडिया से जुड़े हुए हैं. समकालीन टीवी न्यूज पत्रकारिता के चर्चित नाम हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

दो बड़े मीडिया संस्थानों के पीछे क्यों पड़ी हुई है केंद्र सरकार

इस वक्त सरकार के निशाने पर देश के दो बड़े मीडिया संस्थान हैं। दोनों संस्थानों को लेकर सरकार के भीतर राय यही है कि यह विपक्ष की राजनीति को हवा दे रहे हैं और सरकार के लिये संकट पैदा कर रहे हैं। वैसे मीडिया की सक्रियता में यह सवाल वाकई अबूझ है कि जिस तरह के हालात देश के भीतर तमाम मुद्दों को लेकर बन रहे हैं उसमें मीडिया का हर संस्थान आम आदमी के सवालों को अगर ना उठाये, तो फिर उस संस्थान की विश्वनीयता पर भी सवाल खड़ा होगा।

लेकिन सरकार के भीतर जब यह समझ बन गयी हो कि मीडिया की भूमिका उसे टिकाने या गिराने के लिये ही हो सकती है, तो कोई क्या करे? इसलिये मीडिया के लिये सरकारी एडवाईजरी में जहां तेजी आई है, वहीं जिन मीडिया संस्थानो पर सरकार निशाना साध रही है उसमें निशाने पर वही संस्थान हैं, जिनका वास्ता विजुअल और प्रिंट दोनों से है।  साथ ही उन मीडिया संस्थानो के दूसरे धंधे भी है। दरअसल, सिर्फ मीडिया हाउस चलाने वाले मालिकों को तो सरकार सीधे निशाना बना नहीं सकती क्योंकि इससे मीडिया मालिकों की विश्वनीयता ही बढ़ेगी और उनकी सौदेबाजी के दायरे में राजनीति आयेगी। जहां विपक्ष साथ खड़ा हो सकता है। फिर आर्थिक नुकसान की एवज में सरकार को टक्कर देते हुये मीडिया चलाने का मुनाफा भविष्य में कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है।

लेकिन जिन मीडिया हाउसों के दूसरे धंधे भी हैं और अगर सरकार वहां चोट करने लगे तो फिर उन मीडिया हाउसों के भीतर यह सवाल खड़ा होगा ही कि कितना नुकसान उठाया जाये या फिर सरकार के साथ खड़े होना जरुरी है। और चूकिं यह खेल राष्ट्रीय स्तर के मीडिया घरानों के साथ हो रहा है तो खबरें दिखाने और परोसने के अंदाज से भी पता लग जाता है कि आखिर मीडिया हाउस के तेवर गायब क्यों हो गये? दरअसल पर्दे के पीछे सरकार का जो खेल मीडिया घरानों को चेताने और हड़काने का चल रहा है,उसके दायरे में अतीत के पन्नों को भी टटोलना होगा और अब के दौर में मीडिया के भीतर भी मुनाफा बनाने की जो होड है, उसे भी समझना होगा।

याद कीजिये आपातकाल लगाने के तुरंत बाद जो पहला काम इंदिरा गांधी ने किया वह मीडिया पर नकेल कसने के लिये योजना मंत्रालय से विद्याचरण शुक्ल को निकालकर सूचना प्रसारण मंत्री बनाया और मंत्री बनने के 48 घंटे बाद ही 28 जून 1975 को विद्याचरण शुक्ल ने संपादकों की बैठक बुलायी। इसमें देश के पांच संपादक इंडियन एक्सप्रेस के एस मुलगांवकर, हिन्दुस्तान टाइम्स के जार्ज वर्गीज, टाइम्स आफ इंडिया के गिरिलाल जैन, स्टैट्समैन के सुरिन्दर निहाल सिंह और पैट्रियॉट के विश्वनाथ को सूचना प्रसारण मंत्री ने सीधे यही कहा कि सरकार संपादकों के काम से खुश नहीं है, उन्हें अपने काम के तरीके बदलने होंगे।

चेतावनी देते मंत्री से बेहद तीखी चर्चा वहां आकर रुकी जब गिरिलाल जैन ने कहा ऐसे प्रतिबंध तो अंग्रेजी शासन में भी नहीं लगाये गये थे। इस पर मंत्री का जवाब आया कि यह अग्रेंजी शासन नहीं है, यह राष्ट्रीय आपात स्थिति है। और उसके बाद मीडिया ने कैसे लडाई लड़ी या कौन कहां, कैसे झुका यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन 36 बरस बाद भ्रष्ट्राचार के कटघरे में खड़े पीएमओ, कालेधन को टालती सरकार और मंहगाई पर फेल मनमोहन इक्नॉमिक्स को लेकर देश भर में सवाल खडे हुये और 29 जून 2011 को जब प्रधानमंत्री ने सफाई देने के लिये संपादकों की बैठक बुलायी।

और प्रिंट मिडिया के पांच संपादक जब प्रधानमंत्री से मिलकर निकले, तो मनमोहन सिंह एक ऐसी तस्वीर पांचों संपादको ने खींची जिससे लगा यही कि देश के बिगड़ते हालात में कोई व्यक्ति सबसे ज्यादा परेशान है और कुछ करने का माद्दा रखता है, तो वह प्रधानमंत्री ही है। यानी जो कटघरे में अगर स्थितियां उसे ही सहेजनी हैं, तो फिर संपादक कर क्या सकते हैं या फिर संपादक भी अपनी बिसात पर निहत्थे हैं। यानी लगा यही कि जिस मीडिया का काम निगरानी का है वह इस दौर में कैसे सरकार की निगरानी में आकर ना सिर्फ खुद को धन्य समझने लगा, बल्कि सरकार से करीबी ही उसने विश्वनीयता भी बना ली।

लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन को जिस तरह मीडिया ने हाथों हाथ लिया उसने झटके में सरकार के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया कि जिस मीडिया को उसने अपनी छवि बनाने के लिये धंधे में बदला और बाजार अर्थव्यवस्था में बांधा अगर उसी मीडिया का धंधा सरकार की बनायी छवि को तोड़ने से आगे बढने लगे, तो वह क्या करेगी। क्या सत्ता इसे लोकतंत्र की जरूरत मान कर खामोश हो जायेगी या फिर 36 बरस पुराने पन्नों को खोलकर देखेगी कि मीडिया पर लगाम लगाने के लिये मुनाफा तंत्र बाजार के बदले सीधे सरकार से जोड़ कर नकेल कसी जाये। अगर सरकार के संकेत इस दौर में देखें तो वह दोराहे पर है।

एक तरफ फैलती सूचना टेक्नॉल्जी के सामने उसकी विवशता है, तो दूसरी तरफ मीडिया पर नकेल कस अपनी छवि बचाने की कोशिश है। 36 बरस पहले सिर्फ अखबारों का मामला था तो पीआईबी में बैठे सरकारी बाबू राज्यवार अखबारों की कतरनों के आसरे मंत्री को आपात स्थिति का अक्स दिखाते रहते, लेकिन अन्ना हजारे के दौर में ना तो बाबुओं का विस्तार टेक्नॉल्जी विस्तार के आधार पर हो पाया और ना ही सत्ता की समझ सियासी बची। इसलिये आंदोलन को समझ कर उस पर राजनीतिक लगाम लगाने की समझ भी मनमोहन सिंह के दौर में कुंद है। और राजनीति भी जनता से सरोकार की जगह पैसा बनाकर सत्ता बरकरार रखने की दिशा को ज्यादा रफ्तार से पकड़े हुये है।

यानी सियासत की परिभाषा ही जब मनमोहन सिंह के दौर में आर्थिक मुनाफे और घाटे में बदल गयी है तो फिर मीडिया को लेकर सरकारी समझ भी इसी मुनाफा तंत्र के दायरे में सौदेबाजी से आगे कैसे बढ़ेगी। इसलिये जिन्होंने अन्ना हजारे के आंदोलन को प्रधानमंत्री की परिभाषा संसदीय लोकतंत्र के लिये खतरा तले देखा, उन्हें सरकार पुचकार रही है और जिस मीडिया ने अन्ना के अन्ना के आंदोलन में करवट लेते लोकतंत्र को देखा, उन्हें सरकार चेता रही है। लेकिन पहली बार अन्ना आंदोलन एक नये पाठ की तरह ना सिर्फ सरकार के सामने आया बल्कि मिडिया के लिये भी सड़क ने नयी परिभाषा गढ़ी। और दोनों स्थितियों ने मुनाफा बनाने की उस परिभाषा को कमजोर कर दिया जिसके आसरे राजनीति को एक नये कैनवास में मनमोहन सिंह ढाल रहे है और मीडिया अपनी विश्वसनीयता मनमोहन सिंह के कैनवास तले ही मान रही है।

मीडिया ने इस दौर को बेहद बारीकी से देखा कि आर्थिक विकास के दायरे में राजनीति का पाठ पढाने वाले मनमोहन सिंह के रत्नों की चमक कैसे घूमिल पड़ी। कैसे सत्ता के गुरूर में डूबी कांग्रेस को दोबारा सरोकार कि सियासत याद आयी। कैसे कांग्रेस की बी टीम के तौर पर उदारवादी चेहरे को पेश करने में जुटी बीजेपी को राजनीति का 36 बरस पुराना ककहरा याद आया। और कैसे तमाशे में फंसा वह मिडिया ढहढहाया जो माने बैठा रहा कि अन्ना सडक से सासंदो को तो डिगा सकते है लेकिन न्यूज चैनल के इस मिथ को नहीं तोड़ सकते कि मनोरंजन का मतलब टीआरपी है।

असल में मीडिया के अक्स में ही सियासत से तमाशा देखने की जो ललक बाजार व्यवस्था ने पैदा की उसने अन्ना के आंदोलन से पहले मिडिया के भीतर भ्रष्ट्राचार की एक ऐसी लकीर बनायी जो अपने आप में सत्ता भी बनी और सत्ता चलाने वालों के साथ खड़े होकर खुद को सबसे विश्वसनीय मानने भी लगी। लेकिन अन्ना के आंदोलन ने झटके में मीडिया की उस विश्वनियता की परिभाषा को पलट दिया जिसे आर्थिक सुधार के साथ मनमोहन सिंह लगातार गढ रहे थे। विश्वसनीयता की परिभाषा बदली तो सरकार एक नही कई मुश्किलों से घिरी। उसे मीडिया को सहेजना है। उसे अन्ना टीम को कटघरे में खड़ा करना है। उसे संसदीय लोकतंत्र का राग अलापना है। उसे लाभ उठाकर विपक्ष को मात देने की सियासत भी करनी है। उसने किया क्या?

मीडिया से सिर्फ अन्ना नहीं सरकार की बात रखने के कड़े संकेत दिये। लेकिन इस दौर में सरकार इस हकीकत को समझ नही पा रही है कि उसे ठीक खुद को भी करना होगा। प्रणव मुखर्जी न्यूयार्क में अगर प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद यह कहते हैं कि दुर्गा पूजा में शामिल होने के लिये उन्हें 27 को बंगाल पहुंचना जरूरी है और दिल्ली में पीएम से मुलाकात संभव नहीं हो पाती इसलिये मुलाकात के पीछे कोई सरकार का संकट ना देखे। तो समझना यह भी होगा कि मीडिया की भूमिका इस मौके पर होनी कैसी चाहिये और हो कैसी रही है। और सरकार का संकट कितना गहरा है जो वह मीडिया का आसरे संकट से बचना चाह रही है। यानी पूरी कवायद में सरकार यह भूल गयी कि मुद्दे ही सरकार विरोध के हैं। आम लोग महंगाई से लेकर भ्रष्ट्राचार मुद्दे में अपनी जरूरतों की आस देख रहे हैं। ऐसे में जनलोकपाल का आंदोलन हो या बीजेपी की राजनीतिक घेराबंदी वह सरकार का गढ्डा खोदेगी ही। तो क्या मनमोहन सिंह के दौर में राजनीति से लेकर मीडिया तक की परिभाषा गढ़ती सरकार अपनी ही परिभाषा भूल चुकी है। और अब वह मीडिया को बांधना चाहती है।

लेकिन इन 36 बरस में कैसे सरकार और मीडिया बदले है इसपर गौर कर लें तो तस्वीर और साफ होगी। उस दौर में इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा चापलूसो ने कहा। अब अन्ना टीम की एक स्तम्भ ने अन्ना इज इंडिया और इंडिया इज अन्ना कहा। उस वक्त इंडिया दुडे के दिलिप बाब ने जब इंदिरा गांधी से इंटरव्यू में कुछ कडे सवाल पूछे तो इंदिरा ने यहकहकर जवाब नहीं दिया कि इंडिया दुडे तो एंटी इंडियन पत्रिका है। तब इंडिया दुडे के संपादक अरुण पुरी ने कवर पेज पर छापा। इंदिरा से इंडिया एंड एंटी इंदिरा इज एंटी इंडिया। और वहीं से इंडिया दुडे ने जोर पकडा जिसने मिडिया को नये तेवर दिये। लेकिन अब 17 अगस्त को जब संसद में पीएम मनमोहन सिंह ने अन्ना के आंदोलन को संसदीय लोकतंत्र के लिये खतरा बताया तो कोई यह सवाल नहीं पूछ पाया कि अगर अन्ना इज इंडिया कहा जा रहा है तो फिर सरकार का एंटी अन्ना क्या एंटी इंडियन होना नहीं है।

असल में 36 बरस पुराने ढोल खतरनाक जरूर हैं लेकिन यह कोई नहीं समझ पा रहा कि उस ढोल को बजाने वाली इंडिरा गांधी की अपनी भी कोई अवाज थी। और इंदिरा नहीं मनमोहन सिंह हैं। जो बरसों बरस राज्यसभा सदस्य के तौर पर संसद की लाइब्रेरी अक्सर बिजनेस पत्रिकाओं को पढकर ही वक्त काटा करते थे। और पड़ोस में बैठे पत्रकार के सवालों का जवाब भी नहीं देते थे। यह ठीक वैसे ही है जैसे 15 बरस पहले जब आजतक शुरू करने वाले एसपी सिंह की मौत हुई तो दूरदर्शन के एक अधिकारी ने टीवीटुडे के तत्कालिक अधिकारी कृष्णन से कहा कि एसपी की गूंजती आवाज के साथ तो हेडलाईन का साउंड इफैक्ट अच्छा लगता था। लेकिन अब जो नये व्यक्ति आये हैं उनकी आवाज ही जब हेडलाइन के धूम-धड़ाके में सुनायी नहीं देती तो फिर साउंड इफैक्ट बदल क्यों नहीं देते। और संयोग देखिये आम लोग आज भी आजतक की उसी आवाज को ढूंढते हैं क्योंकि साउंड इफैक्ट अब भी वही है। और संकट के दौर में कांग्रेस भी 36 बरस पुराने राग को गाना चाहती है।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी टीवी के जाने-माने चेहरे हैं. अपनी बात को बेबाक तरीके से रखने के लिए जाने-जाते हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

अहमदनगर से दैनिक दिव्य मराठी का प्रकाशन शुरू

औरंगाबाद. दैनिक भास्कर समूह के मराठी अखबार दैनिक दिव्य मराठी के महाराष्ट्र में चौथे संस्करण का शनिवार को अहमदनगर में लोकार्पण हुआ। देश के सबसे बड़े समाचार पत्र समूह का यह 64 वां संस्करण है। गौरतलब है कि समूह का विस्तार 13 राज्यों में है और यह चार भाषाओं में समाचार पत्र प्रकाशित करता है। भास्कर समूह ने इसी साल मई में मराठवाड़ा की राजधानी कहे जाने वाले औरंगाबाद से मराठी भाषा में अखबार का प्रकाशन शुरू किया।

यहां दैनिक दिव्य मराठी पहले दिन से ही प्रसार संख्या में अपने प्रतिद्वंद्वी अखबार से आगे है। इसके बाद उत्तर महाराष्ट्र के प्रमुख शहर नासिक से इसका दूसरा संस्करण जुलाई में शुरू हुआ। यहां भी भास्कर पाठकों की पहली पसंद बना हुआ है। यही सिलसिला स्वर्ण नगरी के नाम से ख्यात खानदेश क्षेत्र के जलगांव में भी जारी रहा जहां सितम्बर से दैनिक दिव्य मराठी प्रकाशन के पहले दिन से ही अपने प्रतिस्पर्धियों से काफी आगे है। अहमदनगर में प्रकाशन की शुरुआत के साथ ही दिव्य मराठी ने पश्चिमी महाराष्ट्र में अपना कदम रख दिया है। साभार : दैनिक भास्कर

क्या पत्रकार जेडे के दाऊद से रिश्ते थे?

मुंबई. वरिष्‍ठ पत्रकार ज्‍योतिर्मय डे (जेडे) की हत्‍या मामले की जांच में जुटी मुंबई पुलिस ने काफी दिनों बाद एक ऐसा बयान दिया है जिससे हत्याकांड की जांच नई दिशा में मुड़ गई है. मुंबई पुलिस के एक सनसनीखेज खुलासे में कहा गया है कि पत्रकार जेडे के माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम से रिश्‍ते हो सकते हैं. पुलिस के मुताबिक संभव है कि जेडे ने बीते अप्रैल में लंदन में दाऊद के सहयोगी इकबाल मिर्ची से मुलाकात की.

मुंबई में जेडे की उनके घर के सामने हत्‍या के बाद पुलिस शुरुआत में इन सवालों का जवाब ढूंढने में जुट गई थी कि क्‍या जेडे ने अपनी लंदन यात्रा के दौरान इकबाज मिर्ची उर्फ इकबाल मेमन से मुलाकात की थीय हालांकि पुलिस लंदन में मेमन की मौजूदगी की पुष्टि नहीं कर सकी थी. हाल में लंदन में मिर्ची की गिरफ्तारी के बाद पुलिस इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्‍या जेडे अपनी लंदन यात्रा के दौरान मेमन के संपर्क में आए थे. एक सीनियर पुलिस अधिकारी का इस बारे में कहना है कि हमारी जांच से संकेत मिले हैं कि जेडे अप्रैल में लंदन यात्रा के दौरान मेमन से मिले हो सकते हैं. छोटा राजन को लगा कि जेडे ने दाऊद के सहयोगी मेमन को उसके बारे में कुछ सूचना दी इसके बाद उसने पत्रकार को मारने का हुक्‍म दिया.

ज्ञात हो कि मुंबई स्थित एक अखबार में पत्रकार रहे जे डे की बीते 11 जून को पावई इलाके में मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। पुलिस के अनुसार जे डे की हत्या के पीछे छोटा राजन का हाथ है और उसने ही हमलावरों को 5 लाख की सुपारी दी थी।

दैनिक जागरण से दुखी अरुणेश पठानिया ने अमर उजाला ज्वाइन किया

खबर है कि दैनिक जागरण, मेरठ से दैनिक जागरण, देहरादून के लिए ट्रांसफर किए गए तेजतर्रार पत्रकार अरुणेश पठानिया ने इस्तीफा दे दिया है. अरुणेश के बारे में खबर है कि वे अब अमर उजाला, देहरादून के साथ नई पारी की शुरुआत करेंगे. उन्हें अमर उजाला, देहरादून में स्टेट ब्यूरो में रखे जाने की संभावना है. सूत्रों के मुताबिक दैनिक जागरण, मेरठ में अरुणेश पठानिया की नियुक्ति विजय त्रिपाठी के कार्यकाल के दौरान में हुई थी.

विजय त्रिपाठी तब दैनिक जागरण, मेरठ के एडिटर हुआ करते थे. विजय और अरुणेश, दोनों दैनिक भास्कर, चंडीगढ़ में भी साथ रहे हैं. विजय के दैनिक जागरण, मेरठ से जाने के बाद अरुणेश पर दैनिक जागरण में कार्यरत स्थानीय पत्रकारों द्वारा बेवजह का दबाव बनाया जाने लगा और तरह-तरह के आरोपों में फंसाने की साजिशें रची जाने लगीं. इस सबसे आजिज आकर अरुणेश ने प्रबंधन से अपने तबादले की गुहार लगाई. इसी दौरान अरुणेश से अमर उजाला प्रबंधन ने संपर्क किया और अरुणेश की योग्यता पर मुहर लगाते हुए उन्हें अमर उजाला, देहरादून के स्टेट ब्यूरो में रखने जाने की संस्तुति की. इसी के बाद अरुणेश ने बजाय दैनिक जागरण, देहरादून ज्वाइन करने के, दैनिक जागरण से इस्तीफा दे देना ही उचित समझा.

विनोद कापड़ी-साक्षी जोशी प्रकरण : आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी

विनोद कापड़ी-साक्षी जोशी की निजी तस्वीरें व निजी मेल इनकी मेल आईडी हैक करके पब्लिक डोमेन में डालने व प्रकाशित करने के प्रकरण में नया मोड़ आ गया है. सहारनपुर में साक्षी जोशी द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमें की पुलिस जांच पिछले साल कंप्लीट हो गई. फाइनल रिपोर्ट पर कोर्ट में सुनवाई जारी है.

लेकिन तारीख दर तारीख पड़ने के बावजूद आरोपी एक बार भी कोर्ट में पेश नहीं हुए. इस कारण अब अदालत ने अब गंभीर रुख अपनाते हुए आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया है. इस बाबत सहारनपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने नोएडा के एसएसपी को एक पत्र लिखकर आरोपियों को पकड़कर अगली तारीख पर कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है. इस पत्र की एक प्रति भड़ास4मीडिया के पास भी है जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है. इस मामले में आरोपी टोटल टीवी में रहे ऋषि पांडेय, इंडिया टीवी में रहे संदीप चावला आदि हैं.

ज्ञात हो कि साश्री जोशी जिन दिनों इंडिया टीवी में कार्य करती थीं, उन दिनों उनका मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी से प्रेम प्रसंग चल रहा था और इन दोनों में मेल के जरिए पत्राचार होते रहते थे. कुछ लोगों ने इनकी मेल आईडी हैक कर इनकी सारी निजी तस्वीरें और मेल अपने कब्जे में ले लिया और दोनों को बदनाम करने की नीयत से इसका वितरण ढेर सारे लोगों के बीच मेल के जरिए कर दिया.

कुछ ब्लागों-पोर्टलों ने विनोद-साक्षी की निजी तस्वीरें और निजी मेल्स को प्रकाशित भी कर दिया. इसी के बाद नाराज साक्षी जोशी ने सहारनपुर में मुकदमा दर्ज करा दिया. बताते हैं कि सहारनपुर साक्षी जोशी का गृह जिला है. कुछ लोग यह भी कहते हैं कि मामला सहारनपुर में इसलिए दर्ज कराया गया क्योंकि वहां का तत्कालीन एसपी और तत्कालीन जांच अधिकारी विनोद-साक्षी का परिचित और फ्रेंडली था.

जो भी हो, इस प्रकरण में कई लोगों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हो जाने के बाद अब इन लोगों की मुसीबत बढ़ गई है. इस प्रकरण में बाद में विनोद कापड़ी और साक्षी जोशी ने शादी करके अपने विरोधियों व आलोचकों के मुंह पर करारा तमाचा मारा और यह सीख भी दी कि किसी की निजी जिंदगी को खबर या तमाशा बनाने से बचो. सहारनपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के एसएसपी को लिखा गया पत्र इस प्रकार है-

1800 दो, साल भर अखबार लो और फ्री में 3600 का विज्ञापन छपाओ!

: कंपनी बुकिंग से आने वाले पैसे को मार्केट में पांच फीसदी ब्याज पर उठाएगी : देश के बड़े अखबार वालों ध्यान दो. आगरा से जल्द एक अखबार निकलने वाला है जिसका नाम है- द सी एक्सप्रेस. इस अखबार को लाने वाली कंपनी की योजना देख लो. इसका फिलहाल कोई तोड़ नहीं दिख रहा है. शायद इस छोटे ग्रुप से बड़े ग्रुप सीख ले सकते हैं. कंपनी की सभी के लिए एक योजना है.

योजना है कि- 1800 रुपया में एक साल के लिए अखबार बुक कराओ और उस पर 3600 रुपया का विज्ञापन फ्री में छपवाओ. अब सोचो, इसमें ऐसी क्या बड़ी बात हैं जिसके आगे बड़े बड़े ग्रुप फ़ेल हैं. कंपनी की योजना है कि लगभग 20000 कॉपी बुकिंग हो ही जाएगी. तो अगर साल भर के लिए एक अखबार को कोई पाठक लेता है तो बदले में 1800 रुपये देता है. अगर पाठक संख्या 20000 हो जाती है तो दोनों का गुणा कर देने पर लगभग पैसा हो जाएगा दो करोढ सोलह लाख रुपये. चूंकि अखबार लाने वाली कंपनी का मूल धंधा ब्याज का कारोबार करना है इसलिए कंपनी जो पैसा अखबार की बुकिंग से हासिल होगा उसे 5 प्रतिशत ब्याज पर मार्केट में चला देगी.

इस तरह ब्याज ही सिर्फ ग्यारह लाख रुपये के करीब हाथ में आ जाएगा जिससे कंपनी अखबार का खर्चा शुरू में ही निकाल लेगी. इसके बाद इवेंट और अन्य धंधे भी होते हैं जिससे अखबार को आराम से चलाया जा सकता है. उसके बाद अगर अखबार को डीएवीपी की मंजूरी मिल जाती है तो सरकारी विज्ञापनों के पैसे अलग से मिलेंगे. कंपनी ने यह सब करके पीसीसी सर्वे आदि कराने का खर्च भी बचा लिया है. आगरा के हाकर भी बहुत खुश हैं क्योंकि बुक कराये प्रति अखबार पर सवा रुपये कमीशन मिल रहा है. कंपनी ने एंप्लाइज को भी टारगेट दे दिया है. एक आदमी कम से कम 100 कॉपी की बुकिंग कर के ले आए. देखना है कि आगरा मार्केट में अखबारों की बीच जो जंग होने वाली है, उसमें कौन गिरता है और कौन सफल हो जाता है.

आगरा से अभिषेक की रिपोर्ट

ईडी अफसर राजेश्वर सिंह नाटक कर रहे हैं : सुबोध जैन

: प्रवर्तन निदेशालय भ्रष्टाचार के आरोपी अफसरों को संरक्षण दे रहा है : राजेश्वर को ईडी में प्रतिनियुक्ति भी नियमों में छूट देकर दी गई : प्रवर्तन निदेशक अरुण माथुर और आईजी राजीव कृष्ण के आफिसों से फोन करके मुझे धमकाया जा रहा है : करप्शन के खिलाफ कंप्लेन करने वाले की नौकरी गई, जिसकी शिकायत की उसके अधिकार बढ़ गए :

यशवंत जी, मैंने 4 अक्टूबर को आपके पोर्टल पर प्रकाशित लेख पढ़ा। इसमें प्रवर्तन निदेशालय के सहायक निदेशक श्री राजेश्वर सिंह का साक्षात्कार था। श्री सिंह का कहना है कि मैंने उनके खिलाफ विभिन्न मंत्रालयों में दर्जनों शिकायतें कर रखी हैं, जिनका जवाब देते हुए वह परेशान हो चुके हैं। इसलिए वे 2जी मामले की जांच से हटना चाहते हैं। दरअसल यह एक ऐसा नाटक है जिसे श्री सिंह ने काफी सोच समझकर किया है। श्री सिंह का कहना है कि मैंने उनके खिलाफ न्यूज टेलीकास्ट कराने का प्रयास इसलिए किया था क्योंकि वह सहारा ग्रुप के खिलाफ कार्रवाई करने जा रहे थे। हालांकि हकीकत कुछ और ही है।

वास्तविकता यह है कि मैंने श्री सिंह के भ्रष्ट कारनामों की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय में सहारा ग्रुप में आने से पहले से कर रखी थी। मेरे पत्रकार मित्र इस बात से वाकिफ हैं कि मैं आरटीआई के क्षेत्र में करीब पांच वर्ष से कार्य कर रहा हूं। इसी माध्यम से मैंने श्री सिंह के कारनामों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए वित्त मंत्रालय में पांच आवेदन भी किए थे। लेकिन इन सभी आवेदनों को मंत्रालय के राजस्व विभाग ने प्रवर्तन निदेशालय को स्थानांतरित कर दिया। निदेशालय ने शेडयूल-2 का हवाला देकर कहा कि निदेशालय सूचना अधिकार कानून से बाहर है। अतः सूचना नही दी जा सकती। हालांकि हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार के मामलों में मांगी गई जानकारी देने के लिए निदेशालय भी बाध्य है। मगर फिर भी सूचना इसलिए नहीं दी गई क्योंकि निदेशालय के कई बड़े अधिकारी श्री सिंह को संरक्षण दे रहे हैं।

हैरानी की बात है कि वित्त मंत्री ने न्यूजपेपर्स में बयान दिया था कि सुबोध जैन की शिकायतें काफी गम्भीर हैं, लिहाजा उनकी जांच कराई जा रही है। इतना ही नहीं, महामहिम राष्ट्पति, उप राष्ट्पति, प्रधानमंत्री, कानून मंत्री सहित कई मामनीय सांसदों ने मेरी शिकायतों को गंभीर मानते हुए वित्त मंत्रालय से जांच कराने के लिए पत्र लिखे हुए हैं। लेकिन मंत्रालय के राजस्व विभाग में तैनात कुछ अधिकारी इन शिकायतों को दबाकर बैठ गए। मैंने इस संबंध में उन अधिकारियों की भी शिकायतें की तो फाईल आगे बढी। लेकिन प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक श्री अरूण माथुर ने विभाग द्वारा कई बार लिखने के बाद भी उन पत्रों पर अपनी टिप्पणियां नहीं दी।

हैरानी की बात तो यह है कि उन्होंने श्री सिंह के खिलाफ गंभीर शिकायतें होने के बाद भी उन्हें सतर्कता शाखा का काम सौंप दिया। इतना ही नहीं, एक अन्य सहायक निदेशक श्री शरद चैधरी को निदशालय में समाहित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी। जबकि उनके खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामलों में जांच हो रही है। इससे साफ है कि निदेशालय भ्रष्टाचार के आरोपी अफसरों को संरक्षण दे रहा है। मैंने इस बात की शिकायत भी प्रधानमंत्री महोदय से की है।

श्री सिंह एक ओर तो खुद को बेदाग बता रहे हैं दूसरी और उनके जीजा और मेरठ जोन के पुलिस महानिरीक्षक श्री राजीव कृष्ण तथा प्रवर्तन निदेशक श्री अरूण माथुर के कार्यालय से फोन करके मुझे और मेरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी जा रही है। इसकी शिकायतें मैंने उत्तर पूर्वी दिल्ली के उस्मानपुर थाने के अलावा सीबीआई, गृह मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय तक में की हुई हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय एवं सीबीआई ने मेरी शिकायतों को पुलिस आयुक्त के पास कार्रवाई के लिए भेज दिया है। इससे साफ है कि श्री सिंह और उन्हें संरक्षण दे रहे सरकारी सेवा में कार्यारत कुछ गुंडे किस औछी हरकत पर उतर आए हैं।

श्री सिंह का यह कहना कि वह 2जी मामले की जांच नहीं कर पा रहे हैं। यह साफ करता है कि वह सरकारी प्रक्रिया से किस कदर भाग रहे हैं। कल को कोई और भी कह सकता है कि उसके खिलाफ चल रही जांच के कारण वह अपना काम नहीं कर पा रहा है तो क्या उस व्यक्ति के खिलाफ जांच बंद कर दी जाएगी? श्री सिंह ने पिछले दिनों माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी लगाकर गुहार लगाई कि सुबोध जैन की शिकायतों के कारण उनके खिलाफ चल रही जांच बंद करने का आदेश दिया जाए। अजीब बात है कि श्री सिंह एक ओर तो खुद को बेदाग बता रहे हैं दूसरी ओर न्यायालय से यह आदेश पारित कराना चाहते हैं कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच न हो।

मेरा माननीय न्यायालय से अनुरोध है कि 2जी मामले की जांच के बाद श्री सिंह के खिलाफ अपनी निगरानी में समयबद्ध ढंग से जांच कराए। ताकि देश की जनता को पता लग सके कि भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त अधिकारी 2जी की जांच कितनी ईमानदारी से कर रहा था। आपको यह जानकार भी हैरानी होगी कि श्री सिंह को प्रवर्तन निदेशालय में प्रतिनियुक्ति भी नियुक्ति नियमों में छूट देकर मिली थी। यह बात आरटीआई के माध्यम से खुद वित्त मंत्रालय ने प्रदान की है।

जहां तक जांच के कारण प्रभावित होने की बात है तो इस मामले में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का सबसे ज्यादा नुकसान मुझे हुआ है। सहारा ग्रुप ने मेरा साथ देने के स्थान पर मुझे नौकरी से निकाल दिया। क्या श्री सिंह के साथ भी ऐसा कुछ हुआ है? उन्हें तो और ज्यादा अधिकार मिल रहे हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद सतर्कता विभाग का जिम्मा मिलना तो यही बताता है कि अफसरों के कृपापात्र यहां कुछ भी कर सकते हैं। उनके भ्रष्ट कारनामों को देखने वाला कोई नहीं है।

सुबोध जैन

सुबोध जैन

स्वतंत्र पत्रकार

दिल्ली

संपर्क- subodhjain75@gmail.com

यह लिखित प्रतिक्रिया सुबोध जैन ने भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित जिस खबर पर दी है, उसे पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें- सहारा की गुंडई से त्रस्त ईडी अफसर ने खुद को 2जी जांच से हटाने की मांग की

एनसीआर के मीडियाकर्मियों के लिये निःशुल्क चिकित्सा कार्यक्रम 19 अक्टूबर को

ओस्टियोपोरोसिस एवं आर्थराइटिस सहित हड्डियों और जोड़ों की बीमारियों के बारे में जागरूकता कायम करने के उददेश्य से भारतीय महिला प्रेस क्लब अर्थात इंडियन वीमेन प्रेस कोर्प्स (आई डव्ल्यू पी सी) में इस सप्ताह बुधवार (19 अक्तूबर) को मीडियाकर्मियों एवं उनके परिवारजनों के लिये निःशुल्क चिकित्सा एवं परामर्श कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।

यह कार्यक्रम विश्व ओस्टियोपोरोसिस दिवस की पूर्व संध्या पर 19 अक्तूबर को आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन (एसीएफ) तथा मेडी मीडिया की ओर से फोरम फार इंकलकेशन आफ रैशनल एंड साइंटिफिक टेम्पेरामेंट (फर्स्ट)] मीडिया क्लब आफ इंडिया एवं अन्य संगठनों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। इंडियन वीमेन प्रेस कोर्प्स नयी दिल्ली में अशोक रोड 5 विंडसर प्लेस पर शांगरिला होटल के सामने स्थित है।

यह कार्यक्रम दोपहर 12 बजे से लेकर अपराह्न चार बजे तक होगा जिस दौरान पत्रकारों एवं मीडिया तथा जनसंचार के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों एवं उनके परिवारजनों को ओस्टियोपोरोसिस, आर्थराइटिस तथा जोड़ों की विभिन्न समस्याओं के बारे में लिये निःशुल्क चिकित्सकीय परामर्श उपलब्ध कराया जायेगा। इस दौरान आहार एवं जीवन शैली के बारे में भी परामर्श दिये जायेंगे ताकि अपाहिज बना देने वाली इन बीमारियों से बचा जा सके।

हड्डियों एवं जोड़ों की समस्याओं के बारे में चिकित्सकीय परामर्श जाने-माने अस्थि चिकित्सा विशेषज्ञ डा. राजू वैश्य एवं उनकी टीम की ओर से दिया जायेगा। इस कार्यक्रम के दौरान सवाल-जवाब सत्र एवं हडिडयों की समस्याओं पर जागरूकता व्याख्यान भी आयोजित किये जायेंगे। इस कार्यक्रम के बारे में विशेष जानकारी तथा पंजीकरण के लिये इन नम्बरों पर संपर्क किया जा सकता है – 9718119289] 9891414433 एवं 9968939756

प्रेस विज्ञप्ति

रथी नेताओं के खर्च पर पल-चल रहे पत्रकारों की रिपोर्टिंग उर्फ भांडगिरी

: भांडों के शब्दों का जनता पर कोई असर नहीं होने वाला : मीडियाकर्मियों के चरित्र पर हमेशा चर्चा होती रही है। नेता और अफसर लोग भी मीडियावालों के चाल-चेहरे की आलोचना  करते रहे हैं जिससे कोई खास अंतर पड़ने वाला नहीं। लेकिन दु:खद यह है कि अब आम आदमी भी मीडियाकर्मियों के बारे में नकारात्मक सोचने लगा है। मीडियाकर्मियों ने समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो आम आदमी उनसे घृणा भी करेगा।

और इस तरह देर-सबेर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका स्वत: ही समाप्त हो जायेगी। यह नई बात नहीं है, पर इस समय ध्यान इसलिए आ गयी कि उत्तर प्रदेश में चल रही यात्राओं को लेकर मीडिया कर्मी भांडगीरी करते नजर आ रहे हैं। यह भांड छोटे संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों को निशाना बना कर स्वयं को हरिश्चंद की श्रेणी में रखते रहे हैं, लेकिन छोटे संस्थानों में काम करने वाले कभी इतने गिर कर काम नहीं करते, साथ ही छोटे संस्थानों के पत्रकार सही से खबरें तक लिखना नहीं जानते। वह जो लिखते हैं, उनका लिखा हुआ जनता के पास तक पहुंचता भी नहीं है, जिससे उनके लिखे का सामाजिक स्तर पर कोई असर नहीं होने वाला। छोटे संस्थानों के पत्रकार या मालिक अखबार धंधे के रूप में निकाल रहे हैं और उनकी नजर इसी पर रहती है कि किसी तरह उनकी दाल-रोटी चलती रहे। हालांकि उनकी इस सोच से भी गरिमा गिर रही है, फिर भी वह इतने बड़े दोषी नहीं कहे जा सकते।

उत्तर प्रदेश में  लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह व अखिलेश यादव की यात्रायें चरम  पर हैं। इन यात्राओं का  उद्देश्य सिर्फ राजनीतिक स्तर पर चर्चा में बने रहना ही है, इससे जनता का परोक्ष या अपरोक्ष कोई लाभ नहीं होने वाला, फिर भी संस्थानों को लगता है कि इन नेताओं की आवाज जनता तक पहुंचना बेहद जरूरी है, तो उन्हें अपने स्तर से इन नेताओं की कवरेज करानी चाहिए, लेकिन यह देख कर दु:ख हो रहा है कि अधिकांश संस्थानों के वरिष्ठ रिपोर्टर नेताओं के खर्च पर नेताओं के साथ ही चल रहे हैं और उनके पक्ष में बड़ी-बड़ी खबरें लिख रहे हैं। यह भांड गीरी नहीं तो और क्या है?, लेकिन इससे भी बड़े दु:ख की बात यह है कि इस भांड गीरी को सम्मान का प्रतीक माना जाता है। यह भांड अपनी फाइल बना कर रखते हैं कि उन्होंने अमुक नेता के साथ कभी भांड गीरी की थी और निंदा करने की बजाये बाकी रिपोर्टर भी उन्हें इसलिए सम्मान देने लगते हैं कि वह किसी खास के लिए भांड गीरी कर चुके हैं। नेताओं या अधिकारियों से संबंध होना अलग बात है, पर उनके लिए भांड बन जाना मेरी समझ से परे है।

भांड गीरी करने वाले यह भूल गये हैं कि उन्होंने  पहले भी जमकर भांड गीरी की थी, जिसका जनता पर विपरीत असर हुआ है और दुष्परिणाम के रूप में उत्तर प्रदेश की जनता मायावती के कुशासन को झेल रही है, क्योंकि आम जनता जान गयी है कि इन भांडों से किसी के बारे में कुछ भी लिखबाया जा सकता है, इसलिए वह अब अखबार में लिखे पर शब्दों पर विश्वास नहीं करती। समझदार जनता पढ़ते समय ही लिखने वाले भांड को गाली देती नजर आती है, लेकिन इन भांडों पर कोई असर होता नहीं दिख रहा। अब जनता के पास  अपनी बात समझाने का यही विकल्प है कि इन भांडों को पकड़े और मुंह काला कर सड़कों पर दौड़ाये, पर यह भांड इतना अच्छा नसीब लेकर पैदा हुए हैं कि जनता की पहुंच इन भांडों तक नहीं है और जनता चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकती। इसलिए इस देश की तरह ही मीडिया का भी भगवान ही मालिक है।

स्वतंत्र पत्रकार बी.पी. गौतम का विश्लेषण

भाकपा (माले) लिबरेशन का दसवां यूपी राज्य सम्मेलन : कुछ गप्प-शप्प

दिनकर कपूरआमतौर पर कम्युनिस्ट पार्टियां अपने सम्मेलन में अपनी उपलब्धियों के साथ अपनी कमी कमजोरियों की शिनाख्त करती हैं और भविष्य के कार्यभार को तय करती हैं। लेकिन कुछ सम्मेलन गप्प शप्प के लिए भी होते हैं। ऐसा ही राज्य सम्मेलन भाकपा (माले) लिबरेशन उत्तर प्रदेश का है, जो 19 से 21 सितम्बर 2011 को गोरखपुर में सम्पन्न हुआ।

इस सम्मेलन में की गयी गप्पबाजी पर गौर कीजिए…

गप्प नम्बर एक- रिपोर्ट में कामरेड अखिलेन्द्र के बारे में लिखा गया है कि ‘‘वे एकदम स्वतंत्र एवं निहायत व्यक्तिगत तरीके से इलाके का अध्ययन करने के बहाने पार्टी जनाधार को तोड़ने, पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध कतारों को हतोत्साहित करने व पार्टी से अलग मोर्चा/संगठन बनाने की जी तोड़ कोशिश में लग गए। चंदौली, सोनभद्र, मिर्जापुर व बलिया के कुछेक पाकेट में उन्होंने कार्यकर्ताओं को तोड़ने में सफलता भी हासिल की। खासकर चंदौली व सोनभद में कामकाज के प्रमुख क्षेत्रों में पार्टी केन्द्रक एवं कई एक कार्यकर्ता मोर्चा राजनीति से प्रभावित होकर पार्टी छोड़कर चले गए। कुछेक क्षेत्रों – दुद्धी व नियमताबाद में पार्टी जनाधार का अच्छा-खासा हिस्सा मोर्चा राजनीति से प्रभावित होकर चला गया।”

इन महानुभावों से कोई पूछ सकता है कि कामरेड अखिलेन्द्र को यदि तोड़-फोड़ ही करना होता तो अध्ययन का बहाना लेने की उन्हें जरूरत क्या थी, वे अपने राजनीतिक मत को लेकर सीधे कार्यकर्ताओं में जा सकते थे। केन्द्रीय कमेटी और राज्य कमेटी के सदस्यों के बीच में क्या उन्होंने कभी पीछे से गोलबंदी करने की कोशिश की या किसी भी कार्यकर्ता को अपने पक्ष में ले आने के लिए प्रयास किए। माले महासचिव बखूबी इस तथ्य को जानते हैं कि पार्टी में विभाजन का कोई भी प्रयास कामरेड अखिलेन्द्र ने कभी नहीं किया। इसका सबसे बड़े उदाहरण खुद मौजूदा राज्य सचिव हैं जो अखिलेन्द्र जी की कार्यशैली के बारे में भली भांति परिचित हैं। इसलिए इस तरह का लेखन परले दर्जे की लफ्फाजी और गप्पबाजी के सिवा कुछ नहीं है। हमने कम्युनिस्ट दिशा और कार्यक्रम के तहत पिछले तीन वर्षो में राष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिस्ट कोआर्डिनेशन टीम और जन राजनीतिक मंच खड़ा करने में सफलता हासिल की और कभी भी सार्वजनिक तौर पर भाकपा (माले) की राजनीतिक अपरिपक्वता की आलोचना नहीं की। कथित विलोपवाद के नाम पर लड़ने वाले विलोप हो रही पार्टी की राजनीतिक कार्यदिशा पर बहस कर अराजकतावाद से मुक्त होते तो शायद उनका भला होता।

गप्प नम्बर दो- रिपोर्ट में कहा गया कि ‘‘इलाहाबाद का पुस्तक केन्द्र ‘सबद’ न सिर्फ पार्टी नियंत्रण से बाहर चला गया है, बल्कि अब वह दलत्यागियों के कब्जे में पार्टी विरोधी विचारों का अड्डा बन गया है।’’ इससे बड़ा झूठ और कुछ नहीं हो सकता। जो महिला कामरेड सबद चला रही हैं, वे जब हम लोग माले से अलग हुए उस समय और उसके बाद भी माले में ही बनी रहीं। जब उन्हें सबद से हटाने की कोशिश की गयी तो उन्होंने प्रतिवाद किया। वह अपनी लड़ाई खुद लड़कर वहां रह रही हैं और यह माले का निहायत आंतरिक मामला रहा है और इसका जन संघर्ष मोर्चा से क्या लेना-देना। लेकिन गप्पबाजों को गप्पबाजी से कौन रोक सकता है।

गप्प नम्बर तीन- रिपोर्ट कहती है कि ”वामपंथ के हित में ‘बेहतर संदेश देने के लिहाज से’ सीपीएम-सीपीआई से सम्बंध बनाने की कोशिश की गयी लेकिन इन दलों ने सकारात्मक रूख नहीं दिखाया।” वामपंथी एकता के इन पैरोकारों से कोई पूछे कि राबर्ट्सगंज में चुनाव बहिष्कार या चंदौली में अराजक प्रत्याशी का जन संघर्ष मोर्चा के खिलाफ समर्थन किस वामपंथी धारा का प्रतिनिधित्व करता है।

गप्प नम्बर चार- रिपोर्ट में मजदूर मोर्चे पर लिखते हुए कहते हैं कि ”विलोपवाद के खिलाफ चलाये गए संघर्ष में पिछले राज्य सम्मेलन के बाद तत्कालीन एक्टू सचिव व एक कार्यकारणी सदस्य को निकाला गया।”

आखिर यह विलोपवाद था क्या, हम तो इस विचार के साथ थे कि देश में कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एक आईपीएफ जैसे जन राजनीतिक मंच की जरूरत है। बहरहाल यह तो माले के अंदर की बहस थी और एक जनसंगठन के नाते इस बहस से एक्टू का कोई लेना देना नहीं था। मैं तो एक्टू के राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारियों में लगा हुआ था। तभी ज्ञात हुआ कि एक्टू से मुझे निकाल दिया गया। किसने निकाला, कब निकाला, कुछ पता नहीं। सम्मेलन में पार्टी और जनसंगठनों के सम्बंध में मौजूद इस तरह के संकीर्ण, अराजकतावादी चितंन की गम्भीर आत्मालोचनात्मक समीक्षा की जगह गप्पबाजी करते हुए कहा जा रहा है कि हम बढ़ रहे हैं। ऐसी ही गप्पबाजी आपको रिपोर्ट में जगह-जगह दिखायी देगी।

कम्युनिस्ट कोआर्डिनेशन टीम, उ. प्र. के प्रभारी का. दिनकर कपूर द्वारा दिनांक 16 अक्टूबर 2011 को जारी प्रेस विज्ञप्ति

भाजपा मीडिया प्रभारी ने लखनवी पत्रकारों को भंडारे में खाना खिलवाया

आडवाणी की जनचेतना यात्रा में पत्रकारों को नोट बांटने और बिजली का अवैध कनेक्शन लेने का मामला जोरों पर मीडिया में उछल रहा है. इसी बीच राजनाथ और कलराज की जनस्वाभिमान यात्रा में हुए एक वाकए ने पत्रकारों में भाजपाइयों की मानसिकता को उजागर कर दिया है. राजनाथ की यात्रा कवर करने गए लखनऊ के पत्रकारों को मीडिया प्रभारी नरेंद्र सिंह राणा ने कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में चल रहे भंडारे में खाना खिलवाया.

प्रकरण 13 अक्टूबर का है. हमको राणा जी माफ करना गल्ती म्हारे से हो गई… कुछ यही कहकर राजधानी लखनऊ के भाजपा कवर करने वाले पत्रकार इन दिनों मीडिया प्रभारी नरेन्द्र सिंह राणा के साथ पार्टी के आयोजनों में जाने से तौबा कर रहे हैं. राणा की शिफत यह है कि वे जब कभी कार्यसमिति की बैठक या रथयात्राओं जैसे आयोजनों में लखनऊ से पत्रकारों की टीम को लेकर जाते हैं तो उन्हें वे खाने पिलाने के बजाय रामायण और महाभारत के प्रसंग सुनाकर उनको जीवन का यथार्थ समझाते हैं. जब गंतव्य पर पहुंचते हैं तो वे पहले यह पता करते हैं कि वहां किस पदाधिकारी का बेहतर होटल या गेस्ट हाउस है. यदि है तो उसी में ले जाकर सारे पत्रकारों के रहने, खाने का मुफ्त में जुगाड़ कर देते हैं. यदि जुगाड़ नहीं बना तो पता करते है कहां सस्ती धर्मशाला या कोई औसत दर्जे का होटल है, वहीं पर ले जाकर सबको टिका देते हैं.

यदि उनके साथ कहीं मथुरा, अयोध्या या फिर वाराणसी जाने का मौका लगे तो यह तय जानिए कि हर पत्रकार को भंडारे का भोजन करना पड़ेगा. 13 अक्टूबर को जनस्वाभिमान यात्रा के कवरेज के लिए लखनऊ छपने वाले लगभग सभी प्रमुख अखबारों के पत्रकार मथुरा गए थे. अपनी चिरपरिचित शैली में राणा जी ने मथुरा में एक पदाधिकारी के गेस्ट हाउस में पत्रकारों को ठहराया. दिन में पदाधिकारियों के साथ पत्रकारों को आधा अधूरा खाना खिलवाया. रात में जब कृष्ण जन्मभूमि का दर्शन कराने ले गए वहां भी चल रहे सामूहिक भंडारे में सारे पत्रकारों को खाना खिलवा दिया. कुछ लोगों का कहना है कि क्या भाजपा जैसी पार्टी का यूपी प्रदेश मुख्यालय पत्रकारों के लाने, ले जाने, खाने-पीन पर बजट जारी नहीं करता. अगर करता है तो वह कहां जाता है?

ऐसे में कई पत्रकार दबी जुबान से आपस में बतियाते हैं कि खाने पीने के नाम पर पार्टी मुख्यालय से जो नगद मिला, सब कहां गया, ये तो राणा जी जाने. यह कोई पहला मौका नहीं था. इससे पहले भी जब कभी लखनऊ के पत्रकारों को अयोध्या जाना होता है तो उन्हें खाना किसी मंदिर में चल रहे भंडारे का नसीब होता है. राणा जी की इस प्रवृत्ति से पत्रकार अब कहने लगे हैं कि राणा जी माफ करना गल्ती हम्हीं लोगों से हो गई। राणा की इस कारगुजारी से इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार उनके बुलावे पर कहीं जाना पसंद नहीं करते हैं.

लखनऊ के एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अमर उजाला से फोटोग्राफर संदीप का इस्तीफा, दैनिक भास्कर में बरूण को प्रमोशन

अमर उजाला, हरिद्वार के फोटोग्राफर संदीप शर्मा नें अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. संदीप शर्मा पिछले 23 सालों से अमर उजाला में इस पद पर कार्यरत थे. उनका प्रेस फोटोग्राफर के रूप मे एकनिष्ठ करियर अमर उजाला में ही रहा है तथा स्थानीय अखबारी दुनिया में उनका सम्मान रहा है. संदीप शर्मा के इस्तीफा देने की वजह ब्यूरो प्रमुख अजय चौहान के साथ उनके मतभेद बताये गये हैं.

लम्बे समय से अजय चौहान के साथ उनका मतभेद चल रहा था जिसका एकमात्र वजह अजय चौहान की स्वेच्छाचारिता बताई जाती है.  अजय की कार्यशैली से असंतुष्ट होकर उन्होंने अपनी इस्तीफा दिया है. खबर यह भी है कि कल अमर उजाला कार्यालय में दो सीनियर रिपोर्टर आपस में ही हाथापाई और गाली-गलौच पर उतर आये. बाद में बड़ी मुश्किल से साथियों के द्वारा बीच बचाव करके मामला शांत कराया गया. जिले में कार्यरत अमर उजाला के रिपोर्टरों में असंतोष बढ रहा है.

बरुण श्रीवास्तव को दैनिक भास्कर, रायपुर संस्करण के सिटी भास्कर का हेड बनाया गया है. वे पिछले २ सालो से संस्थान से जुड़े हैं. इसके साथ ही उनका प्रमोशन करके सीनियर सब एडिटर से चीफ सब एडिटर कम चीफ रिपोर्टर बना दिया गया है. बरुण रीडर्स कनेक्ट और न्यूज़ प्लानिंग में दक्ष हैं. माना जा रहा है कि काम की वजह से उनकी स्टेट एडिटर से बेहद करीबी है. बरुण ने अपनी टीम में पुराने लोगों को ही रखा है.

वेस्ट बंगाल में पत्रकार भोला पासवान ने आत्महत्या की

जामुड़िया (बर्द्धमान) : पश्चिम बंगाल के बर्द्धमान जिले के अंडाल थाना के बनबहाल फाड़ी अंतर्गत प्योर जामबाद निवासी पत्रकार भोला पासवान 30 ने गुरुवार की रात आत्महत्या कर ली। पोस्टमार्टम किए जाने के बाद पांडेश्वर शमशान घाट पर दाह संस्कार किया गया।

दाह संस्कार के पूर्व कोयलांचल प्रेस क्लब के सचिव नीलोत्पल राय चौधरी ने माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान आरएसपी नेता जमुना पासवान समेत बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित थे। वहीं कोयलांचल प्रेस क्लब के सदस्यों ने शोक में शनिवार को काला बैच पहना। मृतक अपने पीछे पत्‍‌नी संतोषी देवी, बेटा राकी पासवान और विक्की पासवान को छोड़ गए हैं।

अनिल अब्राहम की सहारा में वापसी से संबंधित सहाराश्री का ‘शासनादेश’ पढ़ें

अनिल अब्राहम की सहारा में वापसी से संबंधित अफवाह सच निकली. सहाराश्री सुब्रत राय के हस्ताक्षरों से जारी एक पत्र सहारा मीडिया के सभी कार्यालयों में चस्पा कर दिया गया है. उसकी एक प्रति भड़ास4मीडिया के पास भी है. इस पत्र के मुताबिक अनिल पर जो आरोप लगे थे, वे झूठे पाए गए. उन पर लगे आरोपों की जांच पूरी होने और आरोप निराधार होने के बाद उन्हें फिर से पुराने पद पर ससम्मान वापस किया जा रहा है. पत्र ये है-

करप्शन विरोधी अभियान को न्यूज चैनलों के समर्थन से डरी सरकार ने निकाला डंडा

: लाइसेंस रिन्यूअल के फंडे को डंडे की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति : काटजू ने नई नीति त्यागने की अपील की : केन्द्र सरकार ने न्यूज चैनलों पर अंकुश लगाने की तैयारी कर ली है. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने न्यूज चैनलों के लिए जो नई गाइडलाइन जारी की है उसमें इन अंकुश का उल्लेख है. कहा गया है कि अगर कोई न्यूज चैनल पांच से अधिक बार न्यूज व विज्ञापन के लिए तय नियमावली का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.

यह कार्रवाई उनके लाइसेंस को रीन्यू न किए जाने के रूप में भी हो सकती है. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपलिंकिंग/डाउनलिंकिंग संबंधी जो संशोधित नीतिगत दिशा निर्देश तैयार किया था, उसे केन्द्रीय कैबिनेट ने पहले ही मंजूर कर लिया है. इस नए अंकुश लगाने वाले प्रावधान का न्यूज चैनलों के संपादकों और मीडिया संगठनों ने विरोध करना शुरू कर दिया है. दरअसल केंद्र सरकार काफी समय से न्यूज चैनलों पर लगाम लगाने के बारे में सोच रही थी और अब जाकर उसने लाइसेंस रीन्यू न किए जाने का डंडा मारने का अधिकार अपने हाथ में ले लिया है. बहाना बनाया है टीआरपी के चक्कर में न्यूज चैनलों द्वारा गलत-सलत, भड़काउ-सनसनीखेज व नान-न्यूज टाइप के आइटमों को दिखाना. पर जानकारों का कहना है कि सरकार न्यूज चैनलों द्वारा अन्ना और रामदेव को भरपूर सपोर्ट किए जाने और करप्शन के इशू पर आंदोलन को समर्थन दिए जाने से घबराई है और चाहती है कि भविष्य में ऐसी स्थितियों में न्यूज चैनलों को धमकाकर काबू में किया जा सके.

इस बीच, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के चेयरमैन जस्टिस (सेवानिवृत्त) मार्कंडेय काटजू ने प्रसारण आचारसंहिता का उल्लंघन करने वाले टीवी न्यूज चैनलों के लाइसेंस के नवीनीकरण के नियमों में संशोधन करने संबंधी फैसले को टालने का आग्रह केंद्र सरकार से किया है.  जस्टिस काटजू ने कहा कि मीडिया के खिलाफ ऐसे सख्त कदम केवल अंतिम स्थिति में ही उठाए जाने चाहिए. इस बात में शक नहीं कि यदि मीडिया अगर अपने दायित्व को ठीक से नहीं निभा रहा तो उसके खिलाफ कठोर उपाय किए जाएं, लेकिन इसे अंतिम उपाय के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए, हमें पहले मुद्दे को चर्चा, परामर्श और आत्म नियंत्रण के जरिये सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए. लोकतंत्र में शुरुआती तौर पर ऐसा रास्ता अख्तियार किया जाना चाहिए. मैं केंद्र सरकार से आग्रह करता हूं कि वह न्यूज चैनल के लाइसेंस से संबंधित अपने हाल के फैसले पर अमल को टाल दे ताकि हम इस मुद्दे पर भलीभांति विचार कर सुधारात्मक उपाय लागू कर सकें.

करियर ग्रोथ मीटर- चेक ह्वेयर यू स्टैंड!

यह भी एक तस्वीर की कहानी है. मेल के जरिए आए दिन दिलचस्प तस्वीरें इधर-उधर बलखाती टहलती रहती हैं. उसी में एक तस्वीर यह भी है. कहानी सिंपल है. गरीब आदमी का पेट नहीं निकलता क्योंकि वह खटने में ज्यादा वक्त गंवाता है, ठीक से खाने-पीने में कम. और बड़े पद पर बैठे साहब सुब्बा लोग खा-पी कर डकार मारते हुए कुर्सी तोड़ते रहते हैं सो उनका लाद (पेट) निकल जाता है.

देखिए, आप इस तस्वीर के पैमाने पर कहां ठहरते हैं. हालांकि मेरे कई लखनवी और अन्य शहरों के मित्रों के लाद इसलिए निकल गए हैं कि वे गरीबी में भी पर्याप्त मदिरा-मांस का सेवन करते रहते हैं, यह सोचकर कि निकले हुए को अंदर करने की मुहिम कभी शुरू कर दी जाएगी लेकिन जो निकल जाता है वो अंदर कहां आता है भला. मैं भी आजकल इसी चिंतन प्रक्रिया से गुजर रहा हूं कि जो निकला है उसे कैसे समाया जाए 🙂 -यशवंत, भड़ास4मीडिया

आईबीएन7 के पत्रकार राजेश बाजपेयी का जलवा देखिए

वैसे तो संतोष भारतीय और राहुल देव जैसे पत्रकार खुद की शक्ल को यदा कदा होर्डिंग्स, विज्ञापनों आदि में प्रकाशित कराते रहते हैं पर जिले स्तर पर किसी पत्रकार द्वारा खुद की तस्वीर मय परचिय होर्डिंग्स पर प्रकाशित कराना नहीं सुना गया है. ऐसा सुकर्म किया है उन्नाव के पत्रकार राजेश बाजपेयी ने. राजेश उन्नाव के दबंग पत्रकार माने जाते हैं. कई अखबारों-चैनलों में काम कर चुके हैं.

वे इन दिनों आईबीएन7 में हैं, जैसा कि होर्डिंग पर उनकी तस्वीर के नीचे लगे परिचय में बताया गया है. राजेश शहर के अन्य लोगों के साथ शहरवासियों को दिवाली और नए साल की एडवांस में बधाई दे रहे हैं, शुभकामनाएं दे रहे हैं. कई पत्रकारों को मिल गया मौका राजेश के खिलाफ भड़ास निकालने का. सो, होर्डिंग की तस्वीर खींचकर साथ में एक विष भरा पत्र अटैच कर भड़ास के पास भेज दिया. लेकिन भड़ास4मीडिया ऐसे विघ्नसंतोषियों के झांसे में नहीं आने वाला, सो वह विष भरा पत्र यहां प्रकाशित नहीं किया जा रहा है, सिर्फ फोटो और यह परिचय छापकर काम चलाया जा रहा है. भड़ास4मीडिया की तरफ से राजेश बाजपेयी और अन्य पत्रकार साथियों को दीवाली व नए साल की अग्रिम शुभकामनाएं 🙂

वैसे भी राजेश ने कोई गलत काम तो किया नहीं है. उन्होंने अगर अपने शहर वासियों को विश किया है तो किया है, इसमें गलत क्या है. और जब अपनी तस्वीरें बड़े पत्रकार होर्डिंग आदि पर छपवा सकते हैं तो जिले स्तर के बड़े पत्रकार यह काम क्यों नहीं कर सकते? अब आप नैतिकता और सरोकार आदि की बातें कहेंगे तो फिर बात काफी लंबी हो जाएगी और अंततः इसका कोई हल निकलता दिखेगा नहीं इसलिए हम तो यही कहेंगे कि राजेश भाई में दम है तो दिख रहे हैं, जो ग़म में हों तो हुआ करें :):) -यशवंत, भड़ास4मीडिया

गासिप- राज चेंगप्पा लेंगे एमजे अकबर की जगह!

भाई लोग लगता है एमजे अकबर को इंडिया टुडे से विदा करा के ही मानेंगे. एक सज्जन ने भड़ास4मीडिया को एक मेल भेजकर लगभग भविष्यवाणी कर दी है कि एमजे अकबर की जगह इंडिया टुडे के नए एडिटर इन चीफ के रूप में राज चेंगप्पा ज्वाइन करने वाले हैं. राज चेंगप्पा पहले भी इंडिया टुडे में वरिष्ठ पद पर रहे हैं. इन दिनों वे द ट्रिब्यून, चंडीगढ़ के एडिटर हैं.

पत्र भेजने वाले ने अपना नाम न छापने को कहा है, इसलिए उनके नाम की जगह एक्सवाईजेड लिख दिया गया है. पत्र पढ़िए लेकिन उसके पहले यह जान लीजिए कि एमजे अकबर अभी भी इंडिया टुडे में हैं और कहा जा रहा है कि इस अक्टूबर महीने में उनका एक महीने का कांट्रैक्ट खत्म होने वाला है. अगर प्रबंधन रीन्यू कर देता है तो समझिए गासिप खत्म, एमजे का इंडिया टुडे में राज जारी. और, अगर रीन्यू नहीं होता है तो समझिए गासिप के सिर-पैर थे. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

Yaswantzee

I, xyz, am a regular reader of your website. I got a lot from your venture. This is quite helpful for those who r seeking career in Media. As per my information it is likely that Raj Chengappa will replace M J Akbar as the India Today editor. Raj Chengappa was with the India Today till Prabhu Chawla was there. Currently Raj Chengappa is the Editor of the Chandigarh based newspaper the Tribune. He is one of the five Editors alongwith Alok Mehta, M K Razdan, Kumar Ketkar, T N Ninan who met the Prime Minister in his first interaction with the editors.

I hope this is an important story for the Bhadas4media.com. This information is from reliable source. If possible then skip my name.

Thanx

Awaiting

xyz

प्रबल प्रताप सिंह और अनिल अब्राहम के बारे में सूचनानुमा अफवाहें

दो सूचनानुमा अफवाहें हैं. पहली यह कि सहारा मीडिया से भगाए गए अनिल अब्राहम फिर दुल्हन बनाकर इसी विंग में लाए जा रहे हैं. उनसे पहले स्वतंत्र मिश्रा भी भगाए गए थे पर उनकी भी फूलमालाओं के साथ आश्चर्यजनक तरीके से वापसी कराई गई. और, स्वतंत्र मिश्रा के आने के कई माह बाद उसी अंदाज में अनिल को भी सहारा मीडिया में ले आया गया है. कहने वाले कहते हैं कि वापसी से संबंधित सूचनार्थ कागजात सहारा मीडिया के आफिसों में चस्पा हो गए हैं, पर हम यही कहेंगे कि यह तो अफवाह है, पता नहीं सच है या नहीं.

दूसरी खबर आईबीएन7 में कार्यरत प्रबल प्रताप सिंह के बारे में है. वो यह कि प्रबल जल्द ही आईबीएन7 से इस्तीफा देकर नई पारी की शुरुआत आजतक न्यूज चैनल के साथ करने वाले हैं. ऐसी संभावनानुमा आशंका है. प्रबल प्रताप की पहचान आजतक न्यूज चैनल में काम करने के दौरान ही बनी थी. वे अफगानिस्तान गए और वहां के बम-कट्टों-तोपों के बीच खुद को बचते-बचाते दिखाकर बड़े आदमी बन गए.  फिर वे वहीं से चैनल7 चले आए जो बाद में आईबीएन7 बन गया. हालांकि खुद प्रबल भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहते हैं कि ये खबर भरपूर झूठ से भरी है लेकिन टीवी वाले कई बड़े लोग हैं कि मानते ही नहीं कि ऐसी चर्चा गलत है. देखना है कि यह अफवाहनुमा खबर भविष्य में सच होती है या आए दिन धड़ाम-बड़ाम होती मार्केट, टीआरपी और जिंदगी की तरह ही झूठासच या सच्चाझूठ हो जाती है.

कानाफूसी कैटगरी की खबरें सच भी होती हैं और पूरी तरह झूठ भी. इसलिए इसे अपनी इच्छा व स्वभाव के अनुरूप पढ़ें. इन खबरों को जो भरोसेमंद मानकर पढ़ेगा और कोर्ट-कचहरी की बातें करेगा वो वाकई मूर्ख होगा. अपनी मूर्खता या विद्वता प्रदर्शित करने के लिए आप नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com पर सीधे मेल कर सकते हैं. हम आपके लिखकर भेज देने की हिम्मत की एडवांस में सराहना करते हैं.

24, पुष्प मिलन, वार्डन रोड, मुंबई-36 के सिरहाने से झांकती ग्यारह अक्टूबर की सुबह

आलोक श्रीवास्तव: मुंबई से लौटकर आलोक श्रीवास्तव की रिपोर्ट : ऐसे भी जाता नहीं कोई… :  जबसे जगजीत गए तब से क़ैफ़ी साहब के मिसरे दिल में अड़े हैं – ‘रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।’ और दिल है कि मानने को तैयार नहीं। कहता है – ‘हम कैसे करें इक़रार, के’ हां तुम चले गए।’

’24, पुष्प मिलन, वार्डन रोड, मुंबई-36.’ के सिरहाने से झांकती 11 अक्टूबर की सुबह। अपनी आंखों की सूजन से परेशान थी। इस सुबह की रात भी हम जैसों की तरह कटी। रो-रो कर। सूरज को काम संभाले कोई दो घंटे गुज़र चुके थे। जगजीत जी के घर ‘पुष्प मिलन’ के सामने गाड़ियों का शोर मचलने लगा, मगर चेहरों की मायूसी, आंखों की उदासी और दिलों के दर्द पर कोई शोर, कोई हलचल, कोई हंगामा तारी नहीं हो पा रहा था। जिस आंख में झांकों, वही कह रही थी – ‘ग़म का फ़साना, तेरा भी है मेरा भी।’

चेहरों की बुझी-इबारत पढ़ता-बांचता, पैरों में पत्थर बांधे मैं जैसे-तैसे दूसरे माले की सीढ़ियां चढ़ पाया। ग़ज़ल-गायिकी का जादूगर यहीं सो रहा था। ’24, पुष्प मिलन’ का दरवाज़ा खुला था। भीतर से जगजीत की जादुई आवाज़ में गुरुबानी महक रही थी। म्यूज़िक रूम का कत्थई दरवाज़ा खोला तो सफ़ेद बर्फ़ की चादर में लिपटा आवाज़ का फ़रिश्ता सो रहा था । मुझे देखते ही विनोद सहगल गले लग गए और सिसकते हुए बोले – ‘थका-मांदा मुसाफ़िर सो रहा है, ज़माना क्या समझ के रो रहा है।’ मगर दिल इस दर्द से आंसूओं में बदल गया कि दुनिया के ज़हनो-दिल महकाने वाली एक मुक़द्दस आवाज़ ख़ामोश सो गई है। अब कोई चिट्ठी नहीं आने वाली। अब प्यार का संदेस नहीं मिलने वाला। अब दुनिया की दौलतों और शोहरतों के बदले भी बचपन का एक भी सावन नहीं मिलने वाला। न काग़ज़ की कश्ती दिखने वाली और न बारिश का पानी भिगोने वाला। अब न ग़ज़ल अपनी जवानी पर इतराने वाली और न शायरी के परस्तार मखमली आवाज़ के इस जादूगर से रूबरू होने वाले।

‘हमें तो आज की शब, पौ फटे तक जागना होगा / यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ।’ किसी सितारे को टूटते देखना कभी। आसमान के उस आंचल को पलटकर कर देखना, जहां से वो सितारा टूटा है। उस टूटे हुए सितारे की जगह झट से कोई दूसरा तारा ले लेता है। जगमगाने लगता है उस ख़ला में, जहां से टूटा था कोई तारा। मगर चांद को ग़ायब होते देखा कभी? उसकी जगह अमावस ही आती है बस। अमावस तो ख़त्म भी हो जाती है एक दिन। मगर ये अमावस तो ख़त्म होने रही- कमबख़्त।

जगजीत सिंह, जिन्हें कबसे ‘भाई’ कह रहा हूं, याद नहीं। एकलव्य की तरह कबसे उन्हें अपना द्रौणाचार्य माने बैठा हूं बताना मुश्किल है। कितने बरस हुए जबसे मुरीद हूं- उनका, गिनना चाहूं भी तो नहीं गिन सकता। हां, एक याद है जो कभी-कभी बरसों की धुंधलाहट पोंछकर झांक लेती है और वो ये कि उनकी परस्तारी दिल पर तबसे तारी है जब ईपी या एलपी सुन-सुन कर घिस जाया करते थे। ग्रामोफ़ोन की सुई उनकी आवाज़ के किसी सुरमयी सिरे पर अक्सर अकट जाया करती थी और टेपरिकॉर्डर में ऑडियो कैसेट की रील लगातार चलते-चलते फंस जाया करती थी।

थोड़ा-थोड़ा ये भी याद है कि तब हमारी गर्मियों की छुट्टियां और उनकी तपती दोपहरें आज के बच्चों की तरह एसी कमरों में टीवी या कम्प्यूटर के सामने नहीं बल्कि जगजीत-चित्रा की मखमली आवाज़ की ठंडक में बीता करती थीं। उन दिनों किताबों के साथ-साथ इस तरह भी शायरी की तालीम लिया करते थे। लफ़्ज़ों के बरताओ को यूं भी सीखा करते थे। अपने अंदर एकलव्य को पाला पोसा करते थे।

भाई की किसी ग़ज़ल या नज़्म का ज़हनो-दिल में अटके रह जाने का टोटका हम अक्सर बूझते मगर नाकाम ही रहते। इस तिलिस्म का एक वरक़ तब खुला जब डॉ. बशीर बद्र की ग़ज़ल भाई की आवाज़ में महकी। ‘दिन भर सूरज किसका पीछा करता है / रोज़ पहाड़ी पर जाती है शाम कहां।’ मैंने फ़ोन लगाया और पूछा – ‘ये ग़ज़ल तो बड़ा अर्सा हुआ उन्हें आपको दिए हुए। अब गाई?’ जवाब मिला – ‘ग़ज़ल दिल में उतरती है तभी तो ज़ुबान पर चढ़ती है।’ ..तो ग़ज़ल को अपने दिल में उतारकर, फिर उसे करोड़ों दिलों तक पहुंचाने का हुनर ये था.! तब समझ में आया। अर्से तक गुनगुनाते रहना और फिर गाना तो छा जाना। ये था जगजीत नाम का जादू।

कोई पंद्रह बरस पहले की बात होगी। मुंबई में जहांगीर आर्ट गैलरी से सटे टेलीफ़ोन बूथ से उन्हें फ़ोन लगाया। अपने दो शे’र सुनाए – ‘वो सज़ा देके दूर जा बैठा / किससे पूछूं मेरी ख़ता क्या है। जब भी चाहेगा, छीन लेगा वो / सब उसी का है आपका क्या है।’ आसमान से लाखों बादलों की टोलियां गुज़र गईं और ज़मीन से जाने कितने मौसम। मगर ये दो शे’र भाई की यादों में धुंधले नहीं पड़े। तब से इस ग़ज़ल को मुकम्मल कराने और फिर एलबम ‘इंतेहा’ में गाने तक मुझे जाने कितनी बार उनसे अपने ये शे’र सुनने का शरफ़ हासिल हुआ। चार शे’र की इस ग़ज़ल के लिए चालीस से ज़्यादा शे’र कहलवाए उन्होंने। और मतला। उसकी तो गिनती ही नहीं। जब जो मतला कह कर सुनाता, कहते – ‘और अच्छा कहो।’ ग़ज़ल को किसी उस्ताद की तरह 24 कैरेट तक संवारने का हुनर हासिल था उन्हें। आप उनसे किसी ग़ज़ल के लिए या किसी ग़ज़ल में से, ख़ूबसूरत अश्आर चुनने का हुनर बख़ूबी सीख सकते थे।

‘अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं / रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं। वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से / किसको मालूम कहां के हैं किधर के हम हैं।’ ठीक। माना। मगर इस फ़िलॉसफ़ी के पीछे भी एक दुनिया होती है। दिल की दुनिया। जहां से एक उस्ताद, एक रहनुमा और एक बड़े भाई का जाना दिल की दो फांक कर देता है। जिनके जुड़ने की फिर कोई सूरत नज़र नहीं आती। समेटना चाहो तो सैकड़ों एलबम्स, हज़ारों कॉन्सर्ट्स और अनगिनत सुरीली ग़ज़लें-नज़्मे। इतने नायाब, ख़ूबसूरत और यादगार तोहफ़ों का कभी कोई बदल नहीं हो सकता। ‘जाते-जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया / उम्र भर दोहराऊंगा ऐसी कहानी दे गया।’

जिसने अपनी आवाज़ के नूर से हमारी राहें रौशन कीं। हम जैसों को ग़ज़ल की इबारत, उसके मआनी समझाए। उसे बरतना और जीना सिखाया। शायरी की दुनिया में चलना सिखाया। उसे आख़िरी सफ़र के अपने कांधों पर घर से निकालना ऐसा होता है जैसे – ‘उसको रुख़सत तो किया था मुझे मालूम न था / सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला।’ जग जीत कर जाने वाले जगजीत भाई हम आपका क़र्ज़ कभी नहीं उतार पाएंगे।

लेखक आलोक श्रीवास्तव चर्चित युवा शायर और साहित्यकार हैं. बतौर टीवी जर्नलिस्ट वे इन दिनों आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत हैं. आलोक की यह रचना उनके ब्लाग ‘आमीन’ से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. उनसे संपर्क 09899033337 के जरिए किया जा सकता है.

हिसार में खामखा वाहवाही लूटेंगे अन्नावाले

जगमोहन फुटेला: क्योंकि हिसार कभी कांग्रेस का था ही नहीं : मैंने एक न्यूज़ चैनल पे देखा. सी वोटर के एग्जिट पोल के सहारे वो बता रहा था कि हिसार में अन्ना टीम के हक़ में फैसला आता है या कांग्रेस के! ये अन्ना आन्दोलन की प्रशंसा है तो ठीक हैं. भक्ति है तो भी ठीक है और चमचागिरी हो तो तब भी उनकी मर्ज़ी. लेकिन ये व्यावहारिक नहीं है. ये सच नहीं है.

बल्कि मैं कहूँगा कि ये जिम्मेवार पत्रकारिता नहीं है. एक पत्रकार के नाते जब आप किसी का दोष किसी और के माथे नहीं मढ़ सकते तो किसी और का श्रेय भी किसी और को कैसे दे सकते हो? वैसे भी ये जो पब्लिक है वो सब जानती है. ज़मीनी सच्चाई इस न्यूज़ चैनल की जानकारी और अब हो रहे इस प्रचार से अलग है. खुद टीवी में स्ट्रिंगर से सम्पादक तक के अपने अनुभव से मैं ये कह सकता हूँ कि ज़मीनी सच्चाई या जन-धारणा के खिलाफ आप जब रिपोर्ट करते हो तो अपनी ही विश्वसनीयता और यों टीआरपी (अगर वो कोई है) तो उसका नुकसान करते हो.

मुझे अन्ना के आन्दोलन या उनके लोगों को कोई क्रेडिट जाता भी हो तो इस पर ऐतराज़ नहीं है. लेकिन मुझे दुःख होगा ये जान कर कि अगर वे या उनके साथी भी किसी ऐसी घटना के लिए वाहवाही बटोरते हैं जो उनके आगमन से बहुत पहले और उनके बिना भी घट ही रही थी. मुझे लगता है कि खुद अकेले अन्ना पर छोड़ दिया जाए तो वे शायद हिसार परिणाम का कोई श्रेय नहीं लेना चाहेंगे. इसके कारण हैं. हिसार या तो भजन लाल का था या ओमप्रकाश जिंदल का. कांग्रेस का तो वो कभी था भी नहीं. चौटाला के उम्मीदवार के रूप में सुरेन्द्र बरवाला और खुद अब कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में लड़े यही जयप्रकाश भी यहाँ से सांसद रह चुके हैं.

तो पहली बात तो ये मान के चलिए कि हिसार भी किसी ग्वालियर या रायबरेली की तरह पार्टियों से अधिक व्यक्तियों का संसदीय क्षेत्र रहा है. इसे विशुद्ध पार्टी के नज़रिए से अगर देखें भी तो वो शायद चौटाला की पार्टी का तो रहा हो सकता है (दो बार जीती उनकी पार्टी यहाँ से). लेकिन कांग्रेस का वो कभी नहीं रहा. कांग्रेस के साथ कभी वो रहा तो इस लिए कि भजन लाल उसके साथ थे. हिसार अगर कांग्रेस की ही जागीर होती तो हिसार के रहने वाले नवीन जिंदल भी कुरुक्षेत्र से जा के चुनाव न लड़ते होते. तो सबसे पहली बात ये कि हिसार न कांग्रेसी कभी था. न हिसार से पिछला सांसद ही कांग्रेस से था.

दूसरी बात. हिसार में कांग्रेस जीतती तो वैसे भी नहीं रही. मगर इस बार उसकी हार तो तभी हो गई थी जब से हरियाणा में ये आम धारणा बनी कि मौजूदा मुख्यमंत्री हुड्डा को हरियाणा में सिर्फ रोहतक दिखाई देता है. पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा के बिना भी चौटाला का 90 में से 32 (एक अकाली समेत) सीटें जीत जाना इसका प्रमाण है. हरियाणा का इतिहास गवाह है कि चौटाला की पार्टी ने जब जब भी भाजपा के साथ मिल के चुनाव लड़ा है, हरियाणा में सरकार बनाई है.

पिछली बार वे मिल के लड़े होते तो उनकी सीटें हो सकती थीं साथ के पार और कांग्रेस शायद बीस के नीचे. इस न्यूज़ चैनल समेत जिन मेरे पत्रकार बंधुओं ने कभी हरियाणा देखा, सुना या पढ़ा न हो उन्हें बता दें भाजपा के ऐन वक्त पे इनेलो-भाजपा गठबंधन और उधर जनहित कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन टूट जाने से मिली ज़बरदस्त मदद के बावजूद कांग्रेस 90 में से महज़ 40 सीटें ही जीत पाई थी. दोनों विपक्षी गठबन्धनों में से कोई एक भी बचा रहता और सिर्फ दो तीन सीटें भी इधर की उधर हो गईं होतीं तो हरियाणा में आज कांग्रेस की सरकार नहीं होती.

पर, कोई कह सकता है कि बुआ के अगर मूंछें होतीं तो क्या वो तय न होती?..ठीक. माना कि राजनीति में काल्पनिक कुछ नहीं होता. जो होता है वही होता और जो होता है वो ही दिखता है. अब अगर इस आधार पर भी देखें तो अब हिसार का श्रेय अन्ना को देने वालों को जाटों की खापों का वो आन्दोलन क्यों नहीं दिखता जो उन्होनें संगोत्र विवाह के खिलाफ कानून बनाने के लिए चलाया था? उसके बाद आरक्षण के लिए उनक वो आन्दोलन क्यों दिखता मेरे इन पत्रकार मित्रों को जिसकी वजह से कोई तीन हफ्ते तक उत्तर भारत की रेल सेवाएं बाधित रहीं थीं. जाट कांग्रेस से बहुत दूर जा चुके मित्रो. ठीक वैसे ही जैसे कमलापति त्रिपाठी, ललित नारायण मिश्र और शुक्ल बंधुओं के पतन के बाद यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश के ब्राह्मण चले गए थे. और आपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद किसी हद तक सिख आज भी हैं.

ऊपर से इस सब कारणों का बाप, मिर्चपुर. हरियाणा के दलित तो सन 96 मायावती के उफान पे होने के बावजूद एक अकेले जगन्नाथ की वजह से बंसीलाल की हविपा के साथ भी चले गए थे. वे किसी मायावती या कांग्रेस को नहीं, अपना हित अहित देखते हैं. वैसे भी आम तौर पर धारणा ये है कि हरियाणा में आमतौर पर जाटों को पोषित करने वाली पार्टी या नेता के साथ दलित जाते नहीं हैं. ऐसे में हुड्डा वाली कांग्रेस के साथ दलितों के जा सकने की कोई संभावना बची थी तो वो मिर्चपुर में जल कर स्वाहा हो गई थी.

कोई समझता हो या न समझता हो, अरविंद केजरीवाल ये बखूबी समझ रहे थे. वैसे भी वे हरियाणा के ही हैं. उन ने दिमाग लगाया. सोचा कि कांग्रेस जब हिसार में लुढ़क ही रही है तो क्यों उसका श्रेय बटोर लें. वे कांग्रेस नहीं तो फिर क्या जैसे सवालों में घिरे. सफाई देते फिरे कि उनके समर्थकों ने उन्हीं की तरह एक सवाल खड़ा करने वाले को क्यों पीटा. मेरी समझ से हिसार के क्रेडिट बटोरने के चक्कर में टीम अन्ना अपने मुख्य एजेंडे से भटकी, जाने अनजाने उस पे भाजपा समर्थित और समर्थेक होने के आरोप लगे, छवि कुछ तो संदिग्ध हुई. इसके चर्चा फिर कभी.

लेकिन एक बात तय है कि कांग्रेस का विरोध करने जब गई हिसार में अन्ना टीम तो वो बस यूं ही नहीं चल दी होगी. मैं तारीफ़ करूंगा उनकी कि उन्होंने हिसार संसदीय क्षेत्र की वोटगत ज़मीनी सच्चाई को ठीक से समझा और फिर अपनी रणनीति के तहद कांग्रेस की पहले जर्जर और ढहती हुई दीवार में एक लात मारने का प्रयास उन्होंने भी किया. लेकिन हिसार में कांग्रेस उनकी वजह से तीसरे नंबर पे आ ही रही है तो वो उन्हीं की वजह से कतई नहीं आ रही है.

सो, मेरे पत्रकार मित्रो, आप अन्ना के कसीदे पढो मगर हरियाणा में जाटों और दलितों दोनों के आन्दोलनों और कांग्रेस से विमुख होने के असल कारणों से मुंह न मोड़ो. सिर्फ आपके कह देने से वो तबके आप से सहमत नहीं हो नहीं हो जाएंगे जो अन्ना के आन्दोलन के भी बहुत पहले से आन्दोलन की राह पे और कांग्रेस से नाराज़ हैं. रही अन्ना के कांग्रेस के खिलाफ जाने की बात तो वे जाएँ. बेशक ये तर्क दे के कि सरकार उसकी है तो जन लोकपाल बिल पास करना उसी की जिम्मेवारी है.

लेकिन मेरा मानना ये है कि वैचारिक द्रष्टिकोण से कांग्रेस अन्ना की राजनैतिक विचारधारा के ज्यादा नज़दीक होनी चाहिए. इसे हम प्रशांत भूषण पर हमला करने वाली फासीवादी शक्तियों के सन्दर्भ में देखें तो और भी बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. फिर भी वे करें कांग्रेस का विरोध तो करते रहें. लेकिन पकी पकाई दाल पर हरा धनिया छिड़क भर देने से जैसे कोई कुक नहीं हो सकता, वैसे ही हिसार में पहले से तय कांग्रेस की पराजय उन ने कराई इसका कोई तुक भी नहीं हो सकता.

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लेखक जगमोहन फुटेला हरियाणा की राजनीति और पत्रकारिता के जानकार हैं. फुटेला ने चंडीगढ़ समेत कई जगहों पर रहते हुए कई बड़े अखबारों के लिए बड़े पदों पर काम किया है. इन दिनों न्यू मीडिया के साथ पूरे तन-मन-धन से सक्रिय हैं. जगमोहन फुटेला अपने बेबाक विश्लेषण और व्यवहार के लिए जाने जाते हैं.

हिसार में अन्ना टीम की जीत तभी मानें जब कांग्रेस की जमानत जाए

विनोद मेहता: अगर कुलदीप हारे तो समझो ट्रक पंचर था : हिसार उपचुनाव के परिणाम से पहले दो बातों की चर्चा खूब है. कुलदीप जीत गए और अन्ना फैक्टर काम कर गया. पहले अन्ना फैक्टर की बात करे. अन्ना फैक्टर का असर उस सूरत में नजर आता है जब कांग्रेस की जमानत जब्त होती है. लेकिन ये नही हो रहा. सीएम कांग्रेस की जमानत बचाने में कामयाब हो गए हैं.

कुलदीप जीत गए, ये हिसार की हवा में तैर रहा है, लेकिन चुनाव विश्लेषण के सारे पैमानों को खोलकर देखें तो अजय सिंह चुनाव जीतते हैं, कुलदीप एक ही सूरत में अजय सिंह पर भारी पड़ते हैं, जब वो आदमपुर से 30000 वोटों से अजय सिंह को पराजित करें और हिसार और हांसी से 25000 से करें, जिसकी संभावना बहुत ही कम है. उधर, नारनौंद, उचाना और उकलाना में अजय सिंह ने अपने लक्ष्य को हासिल किया है.

बूथ मैनेजमेंट की ताकत से बवानीखेड़ा, बरवाला और नलवा में अजय सिंह हार के अंतर को कम करने में सफल हुए हैं. इन तीनों हल्कों में कांग्रेस ने अनुमान से अधिक प्रदर्शन किया है. इन तीनों हल्कों में कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरना कुलदीप के लिए  हानिकारक है. दुर्भाग्यपुर्ण है कि लोग थोक में वोट कुलदीप को देना चाहते थे. लेकिन थोक के माल के लिए जिस कार्यकर्ता की जरूरत होती है वो कुलदीप की सेना के पास नहीं था. अगर कुलदीप हारे तो समझो ट्रक पंचर था और गिरा हुआ माल अजय चौटाला के लोगों ने खींच लिया.

टोटल टीवी के पूर्व निदेशक विनोद मेहता का विश्लेषण.

मैंने क़सम ली- मैं फासिस्ट राजनीति और उसके कारिंदों के खिलाफ कुछ नहीं लिखूंगा

शेष नारायण सिंहप्रशांत भूषण की पिटाई के बाद इस देश की राजनीति ने करवट नहीं कई, पल्थे खाए हैं. जिन लोगों को अपना मान कर प्रशांत भूषण क्रान्ति लाने चले थे, उन्होंने उनकी विधिवत कुटम्मस की. टीवी पर उनकी हालत देख कर मैं भी डर गया हूँ. जिन लोगों ने प्रशांत जी की दुर्दशा की, वही लोग तो पोर्टलों पर मेरे लेख पढ़कर गालियाँ लिखते हैं.

लिखते हैं कि मेरे जैसे देशद्रोहियों को देश से निकाल दिया जाएगा… मार डाला जाएगा… काट डाला जाएगा…. कुछ ऐसी गालियाँ लिखते हैं जिनका उल्लेख करना असंभव है. मुझे मुगालता था. मैं समझता था कि यह बेचारे किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी में नौकरी करते हैं जिसको हमारी बातें कभी नहीं अच्छी लगीं. उसी पार्टी को खुश करने के लिए इस तरह की बातें लिखी जा रही हैं. मुझे इस बात का बिलकुल अंदाज़ नहीं था कि यह लोग बाकायदा तशरीफ़ लाकर शारीरिक रूप से कष्ट भी दे सकते हैं. प्रशांत भूषण की पिटाई का मेरे ऊपर यह असर हुआ है कि अब मैं फासिस्ट राजनीति के खिलाफ कुछ नहीं लिखूंगा. मैं दहशत में हूँ. यह भाई लोग कभी भी पहुंच सकते हैं और धुनाई कर सकते हैं. मुझे ऐसा इसलिए लगता है कि प्रशांत जी की कुटाई कोई हादसा नहीं था. बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से उन्हें घेरकर लतियाया गया था. यह भी हो सकता है कि जिस टीवी चैनल वाले उनसे बात कर रहे थे, वहां भी इन मारपीट वालों का कोई बंदा रहा हो जिसने पिटाई वाली सेना को एडवांस में खबर कर दी हो.

अब यहाँ यह कहकर कि जिन लोगों ने पिटाई की वे सब आरएसएस के अधीन संगठनों से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं, मैं अपनी शामत नहीं बुलाना चाहता हूँ. लेकिन जिन लोगों को पिटने का डर नहीं है, वे यह बात खुलेआम कह रहे हैं. मेरी हिम्मत तो नहीं है कि मैं लिख सकूं लेकिन बताने वाले बता रहे हैं कि पिटाई करने पहुंचे लोग बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ भी अक्सर फोटो खिंचवाते रहते थे. और उनके बहुत भरोसे के बन्दे थे. श्री राम सेना के कर्नाटक राज्य के अधिपति श्री प्रमोद मुथालिक ने भी कहलवा भेजा है कि प्रशांत भूषण को पीटने वाले लोग उनके अपने बन्दे नहीं थे. उन्हें तो प्रमोद जी ने केवल टेक्नीकल ज्ञान मात्र सिखाया था. वह भी खुद प्रमोद जी का इन योद्धाओं से कुछ लेना देना नहीं था. उनके किसी मातहत अफसर ने दिल्ली की श्रीराम सेना को फ़्रैन्चाइज़ी दी थी जिसकी जानकारी मुथालिक श्री को नहीं थी. भगत सिंह के नाम पर धंधा कर रहे भारतीय जनता युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य का बीजेपी या उसकी किसी सहयोगी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है. वह कभी भी बीजेपी में नहीं था क्योंकि अगर वह बीजेपी में कभी भी रहा होता तो उसे अपने पराये की पहचान होती और अपनी ही पार्टी के पूर्व सदस्य के बेटे को सरेआम देश की सबसे बड़ी अदालत के आसपास इतनी बेरहमी से न पीटता. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो आरएसएस के विरोधी लिख रहे हैं लकिन अपनी हिम्मत नहीं है कि मैं यह लिख दूं कि जिन लोगों ने प्रशांत भूषण को पीटा वे आरएसएस या उसके अधीन काम करने वाले किसी संगठन से किसी तरह से सम्बंधित रहे होंगे.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की पिटाई का मैं अपनी पूरी ताक़त से विरोध करता हूँ. उनके बहुत सारे विचारों से सहमत नहीं हुआ जा सकता लेकिन विचारों से असहमत होने पर किसी को पीटना बिकुल गलत है. इसलिए मेरे अलावा जो भी चाहे, उन लोगों की भरपूर भर्त्सना कर सकता है. वैसे सही बात यह है कि उन लोगों की जितनी निन्दा की जाए कम है. पिटाई करने वाले निंदनीय लोग हैं.  जिन लोगों ने “मैं अन्ना हूँ” की टोपी पहनकर नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में टीवी कैमरों को धन्य करने की कोशिश की, उनकी पिटाई करने वालों की भी सभी निंदा कर ही रहे हैं. वह निंदा बिलकुल सही है. लेकिन मैं उन लोगों की कोई निंदा नहीं कर सकता. क्योंकि कई बार मैं भी पटियाला हाउस कोर्ट के बगल वाली पुराना किला रोड से अपने घर जाता हूँ. लेकिन प्रशांत भूषण को भी आरएसएस प्रायोजित किसी आन्दोलन में शामिल होने के पहले यह सोच लेना चाहिए था कि अगर वे अन्ना हजारे के साथ आरएसएस वालों के आन्दोलन का संचालन करने के प्रोजेक्ट में शामिल हो रहे हैं तो उन्हें आरएसएस की हर बात को मानना पड़ेगा.

आरएसएस के कई बड़े नेताओं ने बार बार बताया है कि वे लोग बहुत ही लोकतांत्रिक सोच के लोग हैं, लोगों के विरोध करने के अधिकार को सम्मान देते हैं लेकिन वे यह बात कभी नहीं बर्दाश्त कर सकते कि अपना कोई बंदा उनकी मंज़ूर शुदा राजनीतिक लाइन से हटकर कोई बात कहे. इसका सबसे पहला शिकार प्रो. बलराज मधोक बने थे. किसी ज़माने में वे पार्टी के बहुत बड़े नेता थे. भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे. पं. दीन दयाल उपाध्याय के साथ पार्टी को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन कुछ मंचों पर उन्होंने अपने विचार रख दिए और पार्टी से निकाल दिए गए. यह जो अपने डॉ सुब्रमण्यम स्वामी हैं. बड़े विद्वान हैं. नानाजी देशमुख जैसा बड़ा नेता उनको अमरीका से पकड़ कर जनसंघ में लाया था. १९७४ में उत्तर प्रदेश में जो विधानसभा का चुनाव हुआ था, उसमें इनकी खासी भूमिका थी. बहुत ही सुरुचिपूर्ण पोस्टर बनाए गए थे. आज़ादी के छब्बीस साल के बाद कांग्रेस की नाकामियों को बहुत ही अच्छे तरीके से उभारा गया था लेकिन निकाल दिए गए. केएन गोविन्दाचार्य की बात तो बहुत ही ताज़ा है. उनको राजनीति के दूध और मक्खी वाले चैप्टर के हवाले से सारी बारीकियां समझा दी गयीं. बेचारे आजकल व्यवस्था परिवर्तन की राजनीति के मैदान में फ्रीलांसिंग कर रहे हैं. हाँ, यह लोग प्रशांत भूषण से ज्यादा भाग्यशाली थे क्योंकि इनको टीवी कैमरों के सामने बैठाकर पीटा नहीं गया.

इसलिए प्रशांत भूषण को समझ लेना चाहिए था कि अगर वे आरएसएस वालों से घनिष्ठता जोड़ रहे हैं तो उन्हें बाकी जीवन बहुत आनंद रहेगा, बशर्ते वे संघ की हर बात को अपनी बात कहकर प्रचारित करते रहते. देश के कई बड़े अखबारों के पत्रकारों ने भी आरएसएस की शरण ग्रहण कर ली है. हमेशा मौज करते रहते हैं. लेकिन उनको मालूम है कि अगर बीच में पत्रकारिता की शेखी बघारेंगे तो वही हाल होगा जो प्रशांत भूषण का हुआ है. ऐसा कुछ पत्रकारों के साथ हो चुका है. प्रशांत जी को भी चाहिए था कि वे अगर आरएसएस वालों के साथ जुड़ रहे थे तो बाकी ज़िंदगी उनके कानूनी विशेषज्ञ बने रहते और मौज करते. लेकिन उन्होंने अन्य बुद्धिजीवियों की तरह अपनी स्वतंत्र राय का इज़हार किया तो उनके नए आका लोग इस बात को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे.

हाँ आजकल ज़माना ऐसा है कि कुछ छिपता नहीं. यह संभव नहीं है कि आप किसी पार्टी या संगठन के साथ गुपचुप काम करने लगें और बात में फायदा उठा लें. लालू प्रसाद यादव ने सबको बता दिया कि किरण बेदी चांदनी चौक से टिकट के चक्कर में हैं. कांग्रेस वाले दिग्विजय सिंह भी बहुत गलत आदमी हैं, उन्होंने सारी दुनिया को बता दिया कि अपने अन्ना जी राष्ट्रपति बनना चाहते हैं. दिग्विजय सिंह को पता ही नहीं है कि देवतास्वरूप अन्ना जी की पोल खोल कर उन्होंने देश और समाज का बहुत नुकसान किया है. हालांकि यह भी सच है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम ने भी देश के साथ दग़ा किया है. भ्रष्टाचार से त्राहि त्राहि कर रही देश की जनता सड़कों पर आने का मन बना रही थी.

शासक वर्गों का वही हाल होने वाला था जो चेकोस्लोवाकिया में १९९० में हुआ था, या चिली के तानाशाहों के खिलाफ जनता ने मैदान ले लिया था. जनता तो उस मूड में थी कि वह सत्ता के सभी दलालों को हमेशा के लिए खत्म कर देती लेकिन शासक वर्गों की कृपा के साथ साथ कांग्रेस और बीजेपी के सहयोग से अन्ना हजारे ने रामलीला मैदान में जनता के बढ़ रहे तूफ़ान को मोड़ दिया. अब पता नहीं इतिहास के किस मोड़ पर जनता इतनी तैयारी के साथ भ्रष्टाचार को चुनौती दे पायेगी.  लेकिन २०११ वाला जनता का गुस्सा तो निश्चित रूप से अन्ना वालों ने दफ़न कर दिया है. और अब हिसार में उस भजनलाल की राजनीति को समर्थन दे रहे हैं जिसने भ्रष्टाचार के तरह तरह के प्रयोग किये थे. या उस चौटालावाद को बढ़ावा दे रहे हैं जो हरियाणा में भ्रष्ट राजनीति के पुरोधा के रूप में किसी सूरत में भजनलाली परंपरा से कम नहीं हैं. जहां तक कांग्रेस की बात है वह तो पिछले चुनाव में भी वहां तीसरे स्थान पर थी, और इस चुनाव में भी तीसरे पर ही रहेगी. वहां भी लगता है कि अन्ना के चेला नंबर वन राजनीतिक सपने देखने की तैयारी कर रहे हैं.

मैं अपने पूरे होशो हवास में घोषणा करता हूँ कि ऊपर जो कुछ भी लिखा है, उसे मैंने बिलकुल नहीं लिखा है. यह सारी बातें सुनी सुनायी हैं और अगर कोई भगवा वस्त्रधारी मुझे पीटने आया तो मैं साफ़ कह दूंगा कि यह सब बकवास मैंने नहीं लिखी है.

लेखक शेष नारायाण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.

शराबी के प्रवचन पर अपुन का प्रवचन

: मृत्यु है क्या, जीवन का अंत, या प्रारंभ, या कि स्वयं शाश्वत जीवन? : हमारे रोने में एक आह थी, एक प्रार्थना थी, जो सभी ईश्वरों से थी : यश जी प्रणाम, आपका आलेख पढ़ा. पढ़ के आनंद हुआ. मैं ये कहूँगा कि दुःख स्थायी भाव नहीं है. सुख भी नहीं. कोई भाव स्थायी हो ही नहीं सकता. सिर्फ वे भाव जो हमारी कल्पना में हैं, वे ही हमारी प्रतीति में स्थायी हो सकते हैं.

जीवन तो रंगीन है. अनेकानेक भावों का समुच्चय है. और जीवन? कोई अर्थ है इसका. नहीं. इसका तो कोई अर्थ ही नहीं. निरपेक्ष. एक तारों भरी रात में आकाश की ओर सर उठाना ही काफी है. कितना विस्मय भर जाता है मन में, अस्तित्व में. मेरा जीवन कितना अकेला, कितना निरपेक्ष है ये. जो चाहो अर्थ दे दो इसे. कितने ही अर्थ दिए गए हैं इसे, सदियों से. कितने ही और दिए जायेंगे आने वाली सदियों में. परन्तु अर्थ दे देने मात्र से सत्य का उद्घाटन नहीं होता. अर्थ सापेक्ष हैं. अर्थो से निर्मित जीवन बाह्य हैं. हमने इन्ही अर्थो से एक जीवन पथ का निर्माण किया है.

एक सिरे पे जीवन और अंतिम छोर पे मृत्यु. बहुत कम लोग हुए, और आने वाले समय में भी कम ही होंगे, जो अंतिम छोर को जान पाए. उसके पार देख पाए. दोनों छोरों में सामंजस्य कर पाए. सबकी अपनी प्रतीति, अपने अनुभव हैं. सबका अपना सफ़र है. बाकी सब दर्शक मात्र हैं. कोई पथ के प्रारंभ में या मध्य में मृत्यु को प्राप्त हो तो हम विचलित हो जाते हैं. दुःख होता है. जीवन-चक्र अभी पूरा नहीं हुआ. सफ़र बाकी था. हमने जैसा जीवन गढ़ा है वैसा तो अभी जिया ही नहीं गया. इसलिए दुःख है.

जब मेरे पिता जी की मृत्यु हुई तब मुझे बहुत दुःख हुआ. जीवन में असमय एक रिक्ति हुई. उनके चले जाने से जीवन में एक अनिश्चितता पैदा हुई उसका भी भय था. हमने स्थिति से समझौता किया. स्वीकारा. और जीवन आगे चल पड़ा. लम्बा समय गुज़रा 2011 आया. ये वर्ष बहुत अजीब रहा. मानो एक लम्बी गफलत भरी नींद टूटी. मेरा २१ वर्षीय मौसेरा भाई एक अल्प-बीमारी के बाद चल बसा. पिता की मृत्यु दुखदायी थी.

मौसेरे भाई की मृत्यु से एक आन्तरिक पीड़ा हुई, जिससे मै अभी भी गुज़र रहा हूँ. एक बालक जिसे मैंने गोद में खिलाया. एक हँसता-खेलता बालक जो मोबाइल कंप्यूटर जैसे आधुनिक उपकरणों से खेलता रहता था. अचानक चला गया. मोबाइल कंप्यूटर आई-पॉड सी-डी सब अपनी जगह रह गए अपनी खूबियों के साथ. क्या एप्पल क्या माइक्रोसोफ्ट क्या गीत क्या गजलें. सब रह गया. जो उपयोग करता था वो मौन साध गया. फिर बड़ी चाची गयीं. फिर बड़ी बुआ.

मृत्यु सत्य है. विचित्र है. पर मृत्यु है क्या. जीवन का अंत. या प्रारंभ. या के स्वयं शाश्वत जीवन. फिर एक निज अन्वेषण. निज अनुभव. निज सत्य. हम जितना जानना चाहेंगे, जान लेंगे. फिर भी बहुत कुछ रह जाएगा अबूझा. अनजान. क्योकि जीवन के नए अर्थो का उद्घाटन शेष है. जीवन की गतिशीलता इसे और आगे ले जाएगी. जो प्रतिति मुझे आज होती है तारो भरा आकाश देख के. यही हज़ारों साल पहले भी हुई होगी. यही हज़ारों साल बाद भी होगी. अब शब्द नहीं हैं. मौन है. आप इसको सुन नहीं सकते. जान नहीं सकते. पर ये मेरे और आपके जीवन में उतर सकता  है. उतर रहा है. अब आनंद होगा.

मेरे एक मित्र चमत्कारों में यकीन करते हैं. जब तक के उनका निज फायदा हो. ऐसा ज्यादातर लोग करते हैं. मित्र का यकीन उनके भय के कारण है. एक बार उनकी माताजी बहुत बीमार हुईं. डाक्टरों ने दिल्ली ले जाने की सलाह दी. मित्र रो पड़े. और *** बाबा को पुकारा. प्रार्थना की. अगली सुबह माताजी के स्वास्थय में लाभ हुआ. घटना मुझे बताई और बोले तू सबको एक डंडे से ना हांका कर. *** बाबा में बात है. वे सच्चे थे. मैंने कहा निसंदेह वे सच्चे थे, पर ये बता क्या अपनी माता के प्रति तेरे प्यार और विश्वास और तेरे पिता का तेरी माता के प्रति प्यार और विश्वास क्या ये किसी प्रार्थना से कम थे. और तुमने ये कैसे जान लिया कि माता में अब जीने की इच्छा ख़त्म हो गयी थी. वे नहीं माने और एक जयकारा लगाया.

मैंने कहा तुम्हे याद हो जब मेरे पिता की मृत्यु हुई थी तब हम सब बहुत रोये. मैं. छोटे भाई- बहन, माताजी. हमारे रोने में एक आह थी एक प्रार्थना थी. जो सभी ईश्वरों से थी. सभी देवों से. सभी पैगम्बरों से. सभी बाबाओं से थी. के पिताजी जी उठें. पर कोई चमत्कार नहीं हुआ. शायद उन अर्थों में कोई चमत्कार् नहीं होता जिन अर्थों में हम उन्हें देखना चाहतें हैं. जो गया वो गया. वो अपने साथ अपनी पूरी दुनिया ले गया. अपना चाँद ले गया. सूरज ले गया. सितारे ले गया. हो सकता है वो फिर से आये  अपनी नयी दुनिया के साथ. पर ये दुनिया तो छोड़ गया. कालजयी कोई नहीं. कोई हुआ ही नहीं. जो पीछे रह गए और जो आने वाली पीड़ियाँ हैं वे उपयोगिता के आधार पे किसी को भी कालजयी बना सकती है. पर क्या सभी कुछ वैसा ही हो सकता है जैसा आप चाहें. नहीं. आप राम को कालजयी बनायेंगे रावण अपने आप कालजयी हो जायेगा.

मृत्यु किसी की हो एक रिक्ति पैदा करती है. दुःख देती है. अपनों को, चाहने वालों को. पर निराशा किसी बात का हल नहीं. ना ही शराबनोशी. आवशकता इस जीवन को सुन्दर बनाने की है. आइये अपने  अपने स्तर से छोटे छोटे प्रयास जारी रखें. सुख हो. शांति हो. प्रेम हो. थोड़े से बहकते हुए कदम हों. आनंद हो.

दुश्मनों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना के साथ….

कुशल प्रताप सिंह

बरेली
मोबाइल- +91-9412417994
मेल- kpvipralabdha@gmail.com

राजीव वर्मा और शशि शेखर को टका-सा मुंह लेकर लौटना पड़ा खंडूरी के यहां से!

आजकल जिन मीडिया घरानों के पास कथित रूप से पत्रकारिता का ठेका है, वे पत्रकारों को पत्रकार नहीं बल्कि दलाल बनाने में लगे हुए हैं. वे अपने संपादकों को संपादक कम, लायजनिंग अधिकारी ज्यादा बनाकर रखते हैं. ताजा मामला हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े मीडिया हाउस का है. बिड़ला जी के इस मीडिया घराने की मालकिन शोभना भरतिया हैं. उनके हिंदी अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर हैं.

पिछले दिनों शशि के कंधे पर शोभना भरतिया ने एक बड़ा टास्क रख दिया. जब मालकिन ने कोई काम कह दिया तो भला संपादक कैसे ना-नुकूर करे. शोभना का आदेश मिलते ही हवा की वेग से शशि शेखर देहरादून पहुंच गए. अब जान लें कि मालकिन ने काम क्या सौंपा. दरअसल निशंक जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने मौखिक रूप से यह ऐलान कर दिया था कि राज्य में एचटी ग्रुप को डीम्ड यूनिवर्सिटी खोलने का मौका प्रदान किया जाएगा. संभवतः निशंक की कैबिनेट ने इसे पारित भी कर दिया था और अब इसे विधानसभा में पास होना था. निशंक से हिंदुस्तान, देहरादून के स्थानीय संपादक दिनेश पाठक का गहरा याराना था. दिनेश पाठक को उन दिनों सीएम निशंक के दाएं-बाएं मंडराते हुए अक्सर देखा जा सकता था. निशंक से प्रेम का फायदा दिनेश पाठक ने हिंदुस्तान अखबार को नाना रूपों में दिलवाया जिसमें एक रूप विवि खोलने की अनुमति देना भी था. और, निशंकप्रेम से अत्यधिक प्रेम के चक्कर में दिनेश पाठक ने खंडूरी से भी पंगा ले लिया था, उन दिनों खंडूरी के खिलाफ खूब खबरें छापीं.

खंडूरी ने सीएम की कुर्सी संभालते ही निशंक के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की पहल करते हुए उनके फैसलों की समीक्षा का ऐलान कर दिया. एचटी वालों को डीम्ड यूनिवर्सिटी खोलने की अनुमति देने के कैबिनेट के प्रस्ताव का अध्ययन करने के लिए एक आईएएस अधिकारी के नेतृत्व में कमेटी बना दी. बात दिल्ली तक, शोभना भरतिया तक पहुंच गई कि उत्तराखंड में एचटी के प्रस्तावित विश्वविद्यालय पर खंडूरी सरकार पानी फेर सकती है. इसके बाद शोभना भरतिया ने अपने सीईओ राजीव वर्मा और संपादक शशि शेखर को ”आपरेशन खंडूरी” में लगा दिया. कई दिनों तक राजीव वर्मा और शशि शेखर देहरादून में पड़े रहे. इनकी दो बार मीटिंग भी खंडूरी के साथ हुई पर खंडूरी टस से मस नहीं हुए. उन्होंने कहा कि वे वही करेंगे जो राज्य के हित में होगा और नीतियों के अनुरूप होगा. उन्होंने अलग से कोई छूट या अनुशंसा करने से मना कर दिया. इसके बाद राजीव वर्मा और शशि शेखर टका सा मुंह लेकर लौट गए.

सूत्रों का कहना है कि जिस कमेटी को विवि के प्रस्ताव पर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया, उसने इतनी कमियां प्रस्ताव में पाई हैं कि इसका नीति के तहत पास होना संभव ही नहीं है. पर शशि शेखर जुटे रहे कि वह किसी तरह से खंडूरी को मना कर काम करा लेंगे पर ऐसा हो न सका. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान दिनेश पाठक बिलकुल हाशिए पर चले गए. सूत्रों का कहना है कि शशि शेखर की मीटिंग तक दिनेश पाठक नहीं रखवा पाए क्योंकि उनका खंडूरी व उनके लोगों से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. इस कारण निशंक के कार्यकाल के दौरान हिंदुस्तान, देहरादून में हाशिए पर रखे गए अविकल थपलियाल को सामने लाया गया. अविकल ने अपने स्तर पर पहल कर खंडूरी से शशि शेखर की मीटिंग फिक्स कराई. इससे दिनेश पाठक की लायजनिंग के मामले में नंबर कम हो गए. वैसे दिनेश पाठक सीएम बदलने के बाद से खंडूरी की जय जय करने में भी खूब लगे हैं और सरकार परस्त खबरों को छाप छाप कर ज्यादा से ज्यादा तेल-मक्खन लगाकर खूब नंबर बटोरने की फिराक में लगे हैं पर उनकी दाल गल नहीं पा रही.

अविकल के आगे आने और ”आपरेशन खंडूरी” के कई स्टेप्स संभालने से दिनेश पाठक की कुर्सी पर खतरा मंडरा गया है. एचटी प्रबंधन को समझ में आ गया है कि जब तक दिनेश पाठक देहरादून में हिंदुस्तान की कुर्सी पर आसीन रहेंगे, खंडूरी का गुस्सा शांत नहीं होने वाला. इस तरह नए संपादक की तलाश शुरू हो गई है पर कोई ‘सूटेबल ब्वाय’ अभी नहीं मिला है. शशि शेखर और राजीव वर्मा की खंडूरी से मीटिंग और टका सा मुंह लेकर वापस लौटने की घटना की देहरादून के वरिष्ठ पत्रकारों के बीच खूब चर्चा है. जितने मुंह उतनी बातें सुनाई पड़ रही हैं. बीसी खंडूरी के कुछ करीबी लोगों से जब भड़ास4मीडिया ने बात की तो उन्होंने शशि शेखर और राजीव वर्मा के देहरादून आने व खंडूरी से मिलने की पुष्टि की और साथ ही यह भी जानकारी दी कि ये लोग विश्वविद्यालय के मसले पर ही मिलने आए थे.

उधर, एक चर्चा और भी है. लोग कह रहे हैं कि उमाकांत लखेड़ा ने शशि शेखर से अच्छा बदला लिया. उमाकांत लखेड़ा दिल्ली में हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ थे और शशि शेखर के कारण उन्हें हिंदुस्तान छोड़ना पड़ा था. अब लखेड़ा सीएम खंडूरी के मीडिया एडवाइजर हैं. उन्होंने अपने लेवल पर भी भरसक यह कोशिश की होगी कि शशि शेखर के काम किसी भी हालत में सीएम के लेवल से पास न हो जाएं ताकि शशि शेखर को एहसास हो सके कि मीडिया की दुनिया वाकई छोटी है और कोई छोटे पद वाला जर्नलिस्ट भी उनके सामने शेर जैसी ताकत वाला बन सकता है. शह-मात के इस खेल में फिलहाल बुरी स्थिति शशि शेखर की है. कई लोग यह भी कह रहे हैं कि खंडूरी को न पटा पाना शशि शेखर के करियर के लिए भारी पड़ सकता है. शोभना भरतिया कई मसलों के कारण शशि शेखर से नाराज चल रही हैं और अब वे नए दौर के लिहाज से नए संपादक की तलाश में हैं जिसके तहत उनकी कई लोगों से मुलाकात व बातचीत भी शुरू हो गई है. तो लोग यह मानने लगे हैं कि छह महीने या साल भर में शशि शेखर के राज का खात्मा संभव है. फिलहाल शशि शेखर के लिए देहरादून की हार एक बड़ी हार है जिसका घाव भरते भरते वक्त लगेगा.

पर ऐसे वक्त में शशि शेखर को कौन समझाए कि उन्होंने जिस तरह की अवसरवादी पत्रकारिता अबतक के अपने करियर में की है, उसका अंजाम कुछ इसी तरह का होना था. प्रधान संपादक की कुर्सी पर बैठ जाने और पीएम के साथ कई देश घूम आने से लोग महान बन जाते या बड़े पत्रकार कहलाते तो इस देश में ऐसे कृत्य करने वाले हजारों पत्रकार हो चुके हैं पर उनका कोई नामलेवा नहीं है. हां, ये जरूर है कि उन्होंने इतना पैसा कमा लिया और दिल्ली में घर-दुकान बना लिया कि उनकी कई पीढ़ियां आराम से उनके जाने के बाद भी जी-खा सकती हैं. पर यह काम तो लाला लोग भी करते हैं, किराना वाला भी करता है, फिर उनमें और पत्रकार में फर्क क्या. दरअसल दिक्कत ये है कि आजकल के बाजारू दौर में पत्रकारिता के असली मतलब को पत्रकार लोग भूल गए हैं. कोई संपादक भी नहीं जानना चाहता कि संपादक होने के असली मतलब क्या होता है. वह तो मालिक और मालकिनों का मुंह देखता रहता है कि वे क्या कहें और हम तुरंत उसके अनुपालन में लग जाएं. एक जमाने में जो काम टाइपिस्टों, पीए, चाकरों आदि का होता था, वह अब प्रधान संपादकों का हो गया है.

इसी कारण आजकल के संपादक दोहरे व्यक्तित्व को लेकर जी रहे हैं. आफिस में दलाली और समझौते की बातें करते हैं और मंचों पर, पन्नों पर नैतिकता व सरोकार की. इसी के चलते संपादकों के खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं. इस बात को जानते तो सब हैं और इसके प्रामाणिक उदाहरण भी आए दिन मिल जाते हैं. इस खाने-दिखाने वाले दांतों के अलग-अलग होने को नए जमाने के संपादक लोग गर्व से मल्टीटास्किंग वाला प्रोफेशनल एट्टीट्यूड कहकर स्वीकारते-बताते हैं और यह सब कहते हुए उन्हें लाज-शरम भी नहीं आती.

पर इन्हें कौन फिर से पढ़ाए कि संपादक और पत्रकार होने का मतलब आधा बागी होना होता है, होलटाइमर सरीखे जीवन को जीना होता है, मिशनरी एप्रोज से जनहित में लिखना-लड़ना होता है. जो सत्ता और सिस्टम के द्वारा हाशिए पर फेंके गए लोग हैं, जिनका कोई सुनने वाला नहीं है, जिनकी आवाज को दमदारी से उठाने वाला कोई नहीं, वैसे वंचितों-दलितों-दरिद्रों का नेता बनने, अगुवा होने, आवाज उठाने, लड़ने का काम होता है पत्रकारों का. शासन और सत्ता के करप्शन, कारोबार, जनहित विरोधी कार्यों का खुलासा करते हुए दो-दो हाथ करना होता है पत्रकारों का काम.

इस प्रक्रिया में जितने संकट आए, मुश्किल आए, उससे निपटना होता है पत्रकार का काम क्योंकि ईमानदारी व सरोकार को जीने वाले संघर्षों और मुश्किलों के संग-संग ही जीवन को जी पाते हैं और इसी में संतुष्टि पाते हैं. तो यह काम वही कर सकता है जो आत्मा और दिल से बागी हो. जिनके अंदर बिकने और झुकने की लेशमात्र भी लालसा, इच्छा न हो. जिन्हें भौतिक सुख-सुविधाएं न लुभाती हों. जो पत्रकारिता को धंधा और बिजनेस न मानते हों. तो ऐसे होते हैं असली पत्रकार लेकिन दुर्भाग्य यह कि जो पत्रकार कहे जाते हैं आजकल, वही सबसे बड़े सुविधाभोगी बनने की ओर उन्मुख हैं. जो संपादक कहे जाते हैं आजकल वही सबसे बड़े पीआर एजेंट बनने की ओर उन्मुख हैं. इसी कारण हमारे दौर में राडियाओं का काम आसान हो जाता है कि क्योंकि उसके एक फोन पर बड़े बड़े संपादक लायजनिंग और पीआर के अनमोल बोल बोलने बकने लगते हैं.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट. तथ्यों से असहमति और प्रतिवाद की इच्छा की स्थिति में नीचे दिए गए कमेंट बाक्स या bhadas4media@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं.

हमले की निंदा लेकिन कश्मीर पर मेरी राय प्रशांत से अलग : डा. कुमार विश्वास

उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य श्री प्रशांत भूषण पर हुए असभ्य शारीरिक हमले की मैं कठोर शब्दों में निंदा करता हूँ. भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में वैचारिक असहमति प्रकट करने के अनेक समाज-स्वीकृत एवं संविधान प्रदत्त उपकरण उपलब्ध हैं. मैं विचार की विभिन्नता और उसे उचित स्थान दिए जाने का सदैव पक्षधर रहा हूँ.

किन्तु कल प्रशांत भूषण जी द्वारा व्यक्त उनके एक निजी विचार के विरोध में कुछ युवको ने जो हिंसक कार्रवाही की, वह सांस्कृतिक, सामाजिक और संवैधानिक, तीनो रूप से अमान्य हैं. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजता के दायरे में यह अधिकार है की वह आप से सहमत हो या असहमत हो. किन्तु अपनी असहमति के चलते वह हिंसा का सहारा ले, यह किसी भी प्रकार से स्वीकृत नहीं है.

अन्ना के अनशन के दौरान संपूर्ण भारत और भारत की सीमाओं से बाहर एक विराट जन-शक्ति ने जिस शालीनता के साथ अहिंसक आन्दोलन को प्रासंगिक बनाया है, वह पूरी दुनिया में अपने आप में एक अलग उदाहरण है. ऐसे हिंसक युवको को इस आन्दोलन से सीख लेनी चाहिए. संविधान के द्वारा दिए गए विचार की स्वतंत्रता के अपने मौलिक अधिकार का उपयोग करते हुए मैं यहाँ अपना यह निजी  विचार व्यक्त करना आवश्यक समझता हूँ कि कश्मीर भारत का अक्षुन्न, अविछिन्न, अविभाज्य तथा आवश्यक अंग है. कश्मीर समस्या हमारे कुछेक राजनीतिक दलों के राजनैतिक नेताओं कि स्वार्थी राजनीति तथा भ्रामक दुष्प्रचार के साथ-साथ नीतिगत दुष्प्रवृत्तियों का घातक प्रतिफल है.

श्री प्रशान्त भूषण द्वारा कश्मीर समस्या का समाधान जनमत संग्रह द्वारा कराये जाने के विचार को मैं अव्यावहारिक, अवैधानिक, अनावश्यक तथा अनुचित समझता हूँ. कई लाख नागरिकों को बलपूर्वक तथा असह्य आतंक के साए में देश के अन्दर ही शरणार्थी बनाने को बाध्य करने, सहस्त्रो निर्दोषों की जघन्य हत्या करने तथा समस्त राज्य की शान्ति व्यवस्था नष्ट किये जाने के उपरांत जनमत संग्रह का विचार अतार्किक व पूर्णतः अव्यावहारिक है. अतः मेरे विचार में कश्मीर समस्या का हल ढूँढने के लिए समस्त राजनैतिक दलों, बुद्धिजीवियों , सभ्य समाज की संस्थाओ, संचार माध्यमो, तथा सामाजिक प्रशासनिक माध्यमो को समवेत विमर्श एवं प्रयास करने होंगे.

डा. कुमार विश्वास

3/1084, वसुंधरा, गाज़ियाबाद

09868220488

82 वर्षीय कामरेड पेरिन दाजी की किताब ‘‘यादों की रोशनी में’’ विमोचित

: संघर्षों के रास्ते पर फैलता वामपंथ का उजियारा : इंदौर। आमतौर पर राजनेताओं की स्थिति यह रहती है कि जब तक वे सत्ता में रहते हैं, लोगों की भीड़ उनके इर्द-गिर्द मंडराती रहती है। सत्ता से दूर होकर उनके आसपास का दायरा सिमटकर कुछ चमचों तक सिमट जाता है जो धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है। और यदि राजनेता सक्रिय राजनीति से ही संन्यास ले ले तो उसकी पूछ-परख सिर्फ़ कुछ आयोजनों में अध्यक्षता आदि तक सिमट जाती है।

कुछ लोगों को उनके सक्षम-संपन्न परिवार वाले कुछ समय तक याद करते हैं और धीरे-धीरे वहाँ भी रौनक घटती जाती है। लेकिन 2 अक्टूबर 2011 को इंदौर प्रेस क्लब के राजेन्द्र माथुर सभागृह में अटाटूट लोग जिस नेता की याद में आयोजित सभा में इकट्ठे थे वह न कभी सत्ता में रहा और न ही बरसों से राजनीति में सक्रिय था। फिर भी न केवल हाल में क्षमता से ज़्यादा लोग मौजूद थे बल्कि बाहर लगी स्क्रीन पर भी लोगों की भीड़ जमा थी। और यह सब तब था जब कार्यक्रम स्थल की क्षमता देखते हुए ज़्यादा लोगों को बुलाने की कोशिशों को धीमा करना पड़ा था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की इंदौर ज़िला परिषद् द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में इकट्ठे हुए विभिन्न तबक़ों के लोगों के दिलों में कामरेड होमी दाजी का नाम सिर्फ़ इसलिए नहीं था कि वे दो बार विधायक रहे और एक बार सांसद। बल्कि इसलिए कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने चुनावी राजनीति का इस्तेमाल जनता के हक़ में किया और इस पूँजीवादी लोकतंत्र के भीतर, अधिक संसाधन न होते हुए भी जनता का विश्वास कैसे अर्जित किया जाता है, यह करके दिखाया। उन्होंने मज़दूर वर्ग की राजनीति को इतना प्रभावी बनाया कि मेहनतकशों को ये ताक़त महसूस हुई कि ‘‘ये सेठ व्यापारी रजवाड़े, दस लाख तो हम दस लाख करोड़।’’ उनमें ये हिम्मत पैदा हुई कि वे ही हैं जो दुनिया बनाते और बदलते हैं। आज भले ही नयी आर्थिक नीतियों को लागू कर संगठित उद्योगों को  सिलसिलेवार ख़त्म किये जाने से मज़दूर तबक़े की रीढ़ पर ज़बर्दस्त चोट पहुँची हो लेकिन वह अपनी ताक़त के दिनों को भूला नहीं है। बताते हैं कि होमी दाजी जब स्वस्थ और सक्रिय थे तो लोग उन्हें पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ ‘जनता का शेर’ कहते थे।

यही नहीं, होमी दाजी के संक्षिप्त राजनीतिक दौर ने बाद की राजनीति व राजनीतिज्ञों पर भी ऐसा असर छोड़ा जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। इसीलिए विरोधी राजनीतिक दलों के लोग भी दाजी का नाम सम्मान से लेते हैं और सिर्फ़ एक बार सांसद रहने के बावजूद आज भी संसद में उनका नाम विशिष्ट कार्यों के लिए लगा हुआ है। दो अक्टूबर के कार्यक्रम में भी श्रोताओं में मज़दूरों के बीच ही सांसद, पूर्व सांसद, विधायक, पूर्व विधायक एवं अन्य राजनेता भी बैठे थे जिन्होंने दो घंटे के कार्यक्रम में सिर्फ़ श्रोता की हैसियत से शिरकत की। न वे मंचासीन हुए और न ही उनके लिए अलग कुर्सियों की व्यवस्था की गई थी।

मंच पर जो थे, उन्हें अगर होमी दाजी देख पाते तो ख़ुश हो जाते। कामरेड अमरजीत कौर जो एटक में कामरेड दाजी की युवा साथी थीं जब दाजी एटक के राष्ट्रीय महासचिव थे; कामरेड पेरिन दाजी जो ज़िंदगी के साठ वर्ष दाजी के साथ रहीं और घर से लेकर राजनीति तक दाजी का साथ देती रहीं; महेंद्र कुमार शेजवार जो फल का ठेला लगाते हैं और दाजी को रोज़ घर आकर दो केले देकर जाते थे जिससे दाजी को दवा लेनी होती थी; और श्रीमती मसीना हीरालाल जिन्हें दाजी ने कभी नहीं देखा लेकिन जिनके पति हीरालाल को दाजी प्यार से राजाबाबू कहते थे। हीरालाल की जूते-चप्पल सुधारने व पालिश करने की गुमटी दाजी के आफ़िस के सामने ही थी। पिछले दिनों हीरालाल का भी निधन हो गया था। एक कम्युनिस्ट का ख़्वाब आख़िरकार उन्हें इज़्ज़त भरी ज़िंदगी और हक़ दिलाना ही तो होता है जो मेहनत करते हैं।

और ये मंच क्यों सजा था? क्योंकि 2009 में जब होमी दाजी नहीं रहे तो उनकी जीवनसंगिनी पेरिन ने हीरालाल के कहने पर दाजी की ज़िंदगी के बारे में एक किताब लिखनी शुरू की थी जिसका विमोचन था 2 अक्टूबर को। कामरेड पेरिन दाजी से अनेक बड़े-बड़े नेता, अधिकारी और कामरेड्स कहा करते थे कि दाजी के जीवन पर आप लिखो लेकिन वे उन बातों को कभी गंभीरता से नहीं लेती थीं। एक दिन हीरालाल ने उनसे कहा कि बाबूजी, यानी दाजी की ज़िंदगी और उनके विचारों के बारे में लोगों को जानना चाहिए कि उनका दिल कैसे ग़रीबों के लिए प्यार और इज़्ज़त से भरा हुआ था। हीरालाल की बातों से द्रवित पेरिन दाजी ने ठाना कि भले ही उन्हें अच्छी साहित्यिक भाषा न आती हो लेकिन वे हीरालाल जैसे लोगों के लिए दाजी के बारे में लिखेंगी। और इस तरह 82 वर्ष की आयु में पेरिन दाजी ने अपने भीतर की लेखिका को प्रकट किया। जब किताब पूरी की तो हीरालाल को बताने गईं। पता चला कि वह भी नहीं रहा। तो उसका घर ढँढ़कर उसकी पत्नी से कहा कि हीरालाल को समर्पित इस किताब का विमोचन तुम्हें ही करना है। और ग़रीबी, उम्र व ज़िल्लत के बोझ से दोहरी हो गईं दलित हीरालाल की बेवा श्रीमती मसीना को इस पूरे सभ्य समाज के सामने पूरी इज़्ज़त के साथ मंच पर अपने बराबर बिठाया।

इप्टा इंदौर की सारिका श्रीवास्तव, पूजा त्रिवेदी, सुलभा लागू व रुचिता श्रीवास्तव ने ‘‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कह दो देश क्या आज़ाद है’’ और ‘‘रुके न जो झुके न जो दबे न जो मिटे न जो, हम वो इंक़लाब हैं जु़ल्म का जवाब हैं’’ जनगीतों के साथ सभा का स्वागत कर श्रोताओं को एक वाम माहौल में शामिल कर लिया। विमोचित किताब ‘‘यादों की रोशनी में’’ पर साहित्यकार-कवि श्री ब्रजेश कानूनगो ने अपनी पाठकीय टिप्पणी देते हुए कहा कि ये केवल भावुकतापूर्ण यादों की किताब भर नहीं है बल्कि इसकी भाषा, शैली आदि तत्व इसे साहित्य की भी एक उत्कृष्ट कृति बनाते हैं। ये किताब आम लोगों के साथ-साथ साहित्य के पाठकों और नये रचनाकारों के लिए भी ज़रूरी है। इसका संपादन कर विनीत तिवारी ने एक अच्छी किताब और एक अच्छी लेखिका हिंदी साहित्य को दिए हैं।

विमोचन के पूर्व ही किताब के एक अंश की एकल नाट्य प्रस्तुति डा. यामिनी ने दी जिसका निर्देशन विनीत तिवारी ने ही किया था। उस संक्षिप्त किन्तु शानदार ब्रेष्टियन प्रस्तुति ने दर्शकों को पूरी किताब पढ़ने की तीव्र उत्सुकता से भर दिया। इसके उपरांत कामरेड पेरिन दाजी ने कहा कि फल के ठेलेवाले महेंद्रकुमार के केलों के पैसे तो वे चुका सकती हैं लेकिन उस प्यार का कोई मूल्य नहीं जो इन जैसे लाखों मेहनतकश लोगों ने दाजी को दिया और जिसकी वजह से अनेक तकलीफ़ों के बावजूद दाजी को आख़िरी साँस तक ज़िंदगी से प्यार रहा। उनके संक्षिप्त किंतु भावुक संबोधन से सभी उपस्थितों की आँखों में आँसू भर आये।

यूँ तो भारत में वामपंथ की विभिन्न धाराएँ मौजूद हैं लेकिन ये भी सच है कि कामरेड दाजी जैसे लोग सभी धाराओं में इसलिए आदर से याद पाते हैं क्योंकि उन्होंने हर क्षण और सिद्धांत का इस्तेमाल वंचित वर्ग के भले के लिए ही किया। कामरेड होमी दाजी तब वामपंथ के प्रखर प्रतिनिधि थे जब भारत में वामपंथ चरमपंथ और संसदीय लोकतंत्र के बीच अपनी जगह तलाश कर रहा था। उस वक़्त सक्रिय कामरेड्स की जमात ने ये सिखाया कि संसदीय लोकतंत्र अपनाने के बावजूद वामपंथ को धारदार और संघर्षशील कैसे बनाये रखा जा सकता है।

यही सोचकर कामरेड दाजी की याद में आयोजित इस कार्यक्रम में ‘‘मौजूदा जनसंघर्ष और वामपंथ की भूमिका’’ विषय पर एटक और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जुझारू राष्ट्रीय सचिव कामरेड अमरजीत कौर का व्याख्यान भी साथ रखा गया था। उनका विस्तृत परिचय दिया एटक के ज़िला सचिव कामरेड रुद्रपाल यादव ने। कामरेड दाजी की व्यावहारिक राजनीति पर पकड़ और अपने माक्र्सवादी सिद्धांतों पर अविचल अडिग बने रहने की खूबी की याद करते हुए कामरेड अमरजीत ने देशभर के जनसंघर्षों का एक व्यापक कैनवास प्रस्तुत किया।

ज़मीनी और ज़मीन की लड़ाइयों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने पास्को, नारायणपुर, उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि के भीतर चल रहे संघर्षों और अगली कतारों में लड़ रहे वामपंथियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि नेहरू के ज़माने में खड़े किए गए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेचने की मनमोहन सिंह सरकार की साज़िशों के ख़िलाफ़ भी वामपंथियों ने ही मोर्चा संभाला चाहे वह बाल्को का मसला रहा हो या नाल्को का। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के सरकारी आतंक का जवाब देने में, महाराष्ट्र के जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाकर मछुआरों और किसानों की ज़मीनों को हड़पने के ख़िलाफ़ हो रहे संघर्ष में, झारखण्ड, उड़ीसा से लेकर असम, मणिपुर, त्रिपुरा आदि जगहों पर जनता के संघर्षों में वामपंथी ही अपनी जान हथेली पर रख कर लड़ रहे हैं।

देशभर में किसानों की आत्महत्याओं ने किसानी संकट को उजागर किया है। सरकार खेती को कार्पोरेट के लिए मुनाफ़ा कमाने की ज़मीन बनाना चाहती है। उसे परवाह नहीं कि किसान मरें या जियें। यहाँ भी वामपंथी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ डटे हैं। उन्होंने कहा कि आजकल भ्रष्टाचार की बहुत चर्चा हो रही है और अण्णा हजारे के आंदोलन का भी मीडिया ने खूब प्रचार किया है। लेकिन भ्रष्टाचार तो इस पूँजीवादी व्यवस्था का एक ज़रूरी उत्पाद है। अण्णा के आंदोलन को यही पूँजीवादी मीडिया इसलिए जगह देता है क्योंकि यह आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन की बात नहीं करता। वह कार्पोरेट के भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ नहीं बोलता। कार्पोरेट मीडिया भी इन आंदोलनों को इसीलिए समर्थन दे रहा है क्योंकि इनसे व्यवस्था को कोई ख़तरा नहीं महसूस होता। इससे काफ़ी भ्रम भी फैला है। हमें ऐसे आंदोलनों और जनसंघर्षों के बीच के अंतर को समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि असली लड़ाई अमीरी और ग़रीबी की खाई को पाटने की, भूमिसुधार करने की, श्रम क़ानूनों के उल्लंघन को रोकने की है। आज हालत यह है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं व शिक्षकों को न्यूनतम से भी कम वेतन में काम करना पड़ रहा है। हमें किसानों, गरीबों, वंचितों व बेरोजगारों के हक में अपना संघर्ष जारी रखने की ज़रूरत है। होमी दाजी को याद करने का मतलब भी यही है कि हम इस संघर्ष को आगे बढ़ाएँ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता की भाकपा जिला परिषद के सदस्य व प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के उपाध्यक्ष श्री एस. के. दुबे ने और भाकपा जिला परिषद के सदस्य एडवोकेट ओमप्रकाश खटके भी मंच पर मौजूद थे। कार्यक्रम  का संयोजन व संचालन किया प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य महासचिव कामरेड विनीत तिवारी ने। काॅमरेड पेरिन दाजी की किताब के संपादक भी वही हैं। यह किताब भारतीय महिला फ़ेडरेशन की केन्द्रीय इकाई व प्रगतिशील लेखक संघ की इन्दौर इकाई द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित की गई है। कविता पोस्टरों व होमी दाजी के चित्रों की प्रदर्शनी भी इस मौके पर इप्टा इंदौर के सचिव श्री अशोक दुबे ने लगायी थी जो काले-सफ़ेद चित्रों के साथ अतीत के एक चमकदार दौर की याद दिला रही थी और उस दौर को वर्तमान में हासिल करने के लिए उकसा रही थी। कार्यक्रम के दौरान और कार्यक्रम के बाद लगते ‘‘कामरेड होमी दाजी को लाल सलाम’’ के जोशीले नारे बुजुर्ग कामरेडों की आँखों में उम्मीद की एक चमक पैदा कर रही थीं।

भारतीय महिला फेडरेशन, इंदौर शाखा की सचिव सारिका श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

सुब्रत राय सहारा, आपके मीडियाकर्मियों को भी फोर्स की जरूरत है

सुब्रत राय बड़ा दाव खेलना जानते हैं. वे छोटे मोटे दाव नही लगाते. इसी कारण उन्हें अपने छोटे-मोटे तनख्वाह पाने वाले मीडियाकर्मी याद नहीं रहते. और जिन पर इन मीडियाकर्मियों को याद रखने का दायित्व है, उन स्वतंत्र मिश्रा जैसे लोगों के पास फुर्सत नहीं है कि वे अपनी साजिशों-तिकड़मों से टाइम निकालकर आम सहाराकर्मियों का भला करने के बारे में सोच सकें. इसी कारण मारे जाते हैं बेचारे आम कर्मी.

इसी का नतीजा है कि इस दीवाली पर सहारा के मीडियाकर्मियों को सिर्फ 3500 रुपये का बोनस देने का निर्णय लिया गया है. इतना कम बोनस तो राज्य सरकार के चतुर्थ ग्रेड कर्मियों को भी नहीं मिलता. सहारा में साल भर से न कोई प्रमोशन मिला है और न ही इनक्रीमेंट. प्रमोशन-इनक्रीमेंट के लालीपाप देने के कई बार कई लोगों ने वादे किए पर अमल किसी ने नहीं किया. सहारा के पास अपने इंप्लाइज को देने के लिए पैसे नहीं होते, लेकिन जब खेलकूद की बात आती है तो इनके पास अथाह पैसा जाने कहां से आ जाता है. ताजी सूचना आप सभी ने पढ़ी होगी कि सहारा इंडिया परिवार ने विजय माल्या के स्वामित्व वाली फॉर्मूला-वन टीम में 42.5 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली है.

इस खरीद के लिए सहारा इंडिया परिवार ने 10 करोड़ डालर का निवेश किया है. इसके बाद फोर्स इंडिया का नाम बदलकर सहारा फोर्स इंडिया कर दिया गया है. देश में खेलों के सबसे बड़े प्रमोटर और संरक्षक के रूप में सहारा इंडिया का नाम लिया जाता है. पर जब बात सहारा मीडिया की आती है तो प्रबंधन के पास पैसा नहीं होता. सहारा के लोग कई तरह की परेशानियों में जी रहे हैं. पीएफ से लेकर हेल्थ तक के मसले पर सहारा के कर्मी खुद को ठगा हुए महसूस करते रहते हैं. पर उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती क्योंकि सहारा में प्रबंधन के खिलाफ मुंह खोलने का मतलब होता है नौकरी से हाथ धोना.

उपेंद्र राय और स्वतंत्र मिश्रा के बीच की रार में आम सहाराकर्मी खुद को पिसा हुआ पा रहा है. जो लोग कथित रूप से उपेंद्र राय के खास थे, वे अब किनारे लगाए जा चुके हैं और जो लोग स्वतंत्र मिश्रा के करीबी माने जाते थे उन्हें फिर से बड़े पदों व बड़े दायित्वों से नवाजा जा रहा है. देखना है कि इन सब तिकड़मों-चालबाजियों के बीच सहारा प्रबंधन अपने कर्मियों पर धनबौछार करना याद रखता है या फिर 3500 रुपये की छोटी रकम देकर ही अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लेता है.

सहारा में कार्यरत एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर इस पत्र के मजमून पर किसी को आपत्ति हो तो वह  अपना विरोध नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए दर्ज करा सकता है या फिर bhadas4media@gmail.com के जरिए भड़ास संचालकों तक पहुंचा सकता है.

लाइव इंडिया में सस्पेंस कायम- सुधीर चौधरी का क्या होगा!

लाइव इंडिया न्यूज चैनल में सस्पेंस गहरा हो गया है. लोग बेचैन हैं. कर्मी परेशान हैं. वेंडर हैरान हैं. काम करने वालों को तनख्वाह की प्राब्लम हो रही है तो वेंडर्स को पैसे न मिलने से परेशानी हो रही है. सुधीर चौधरी का रुटीन ब्रेक हो चुका है. वे न प्राइम टाइम पर टीवी में नजर आते हैं और न ही पहले जैसा कामधाम देख रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि चैनल के मालिक दीवान ने चैनल से पिंड छुड़ाने या फिर चैनल को नए हाथों में देने का मन बना लिया है.

चैनल पर हर महीने करोड़ों रुपये फूंकने वाले एचडीआईएल प्रबंधन को न्यूज चैनल खोलने का कोई लाभ नहीं दिख रहा है. जिन सरकारी और गैर-सरकारी विभागों के उत्पीड़न-उगाही से एचडीआईएल प्रबंधन पहले से परेशान था, वहां से वे लोग आज भी परेशान है. उल्टे कई नए दुश्मन पैदा हो गए हैं. मुंबई में टीवी9 चैनल साल भर से एचडीआईएल के खिलाफ मुहिम चला रहा है और खबरें दिखा रहा है. ऐसे में एचडीआईएल प्रबंधन को सूझ नहीं रहा है कि वह लाइव इंडिया न्यूज चैनल का क्या करे. इस चैनल पर पांच करोड़ से ज्यादा हर महीने जा रहा है पर मिल कुछ नहीं रहा है.

चैनल को प्राफिट में लाने के लिए सेल्स व मार्केटिंग में जो बंदे लाए जाते हैं, उनसे सुधीर चौधरी की बन नहीं पाती और अंततः सेल्स व मार्केटिंग के प्रोफेशनल बंदे चल नहीं पाते. सूत्रों का कहना है कि एचडीआईएल प्रबंधन ने सुधीर चौधरी को कह दिया है कि वह एडिटोरियल कंटेंट देखें, सीईओ के रूप में किसी और को लाया जाएगा. इस प्रस्ताव पर सुधीर चौधरी राजी नहीं हैं. सुधीर चौधरी की कुर्सी फिलहाल एडिटर इन चीफ और सीईओ की है. जानकारों का कहना है कि सुधीर चौधरी इतनी आसानी से लाइव इंडिया का पिंड नहीं छोड़ने वाले. उनके पास एचडीआईएल के कई गहरे राज हैं और उनके दिल्ली में सरकारी मंत्रालयों में अच्छे जुगाड़ संपर्क है. एचडीआईएल भी नहीं चाहता सुधीर चौधरी को झटके में बाहर करके या किनारे करके अपना दुश्मन बनाना. इसीलिए दोनों पक्ष धीमी चाल चल रहे हैं. इन तनाव व परेशानी के दिनों में भी सुधीर चौधरी अपना पीआर चमकाने का काम जारी रखे हुए हैं. कुछ पीआर वेबसाइटों पर सुधीर चौधरी ने अपने इंटरव्यूज छपवाकर अपना महिमामंडन और बखान कराया है.

कोशिश है कि एचडीआईएल प्रबंधन तक अच्छे संकेत और मैसेज जाएं जिससे उन्हें आगे भी कांटीन्यू कराया जा सके. सूत्रों के मुताबिक लाइव इंडिया में तख्तापलट की तैयारी है. पर यह तय नहीं है कि यह कब होगा और किस तरह होगा. इस बीच, खबर है कि लाइव इंडिया के वेंडरों ने अपना पैसा निकालने के लिए पुलिस का सहारा लिया. जिन लोगों की गाड़ियां किराये पर लाइव इंडिया में चलती हैं, उन्हें बहुत दिनों से पैसा नहीं मिला है. वे लोग जब पैसा मांगते मांगते थक गए तो आखिरकार थक हारकर पुलिस के पास चले गए. पुलिस ने लाइव इंडिया आफिस में प्रवेश कर पूरे मामले की जानकारी ली और प्रकरण निपटाने की सलाह दी.

उधर, लाइव इंडिया में काम करने वाले मीडियाकर्मी सबसे ज्यादा परेशान हैं. सबको अपने भविष्य की चिंता सता रही है. हर कोई एक दूसरे से जानना चाह रहा है कि लाइव इंडिया में आगे क्या होगा. पर किसी के पास इसका सटीक जवाब नहीं है. उधर, सुधीर चौधरी अपने खास लोगों से यही कहते फिर रहे हैं कि कहीं कोई टेंशन या दिक्कत नहीं है. जो कुछ भी थोड़ी बहुत परेशानी है, वह जल्द ही दूर हो जाएगी और उसके लिए किसी अन्य स्टाफ को परेशान होने की जरूरत नहीं है.

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अगर आपको भी लाइव इंडिया के अंदरखाने चल रही उथल-पुथल और एचडीआईएल के हालात के बारे में कुछ जानकारी है तो अपनी बात नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए कह सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com के जरिए मेल कर सकते हैं.

मेरठ के दैनिक जागरण और अमर उजाला के तीन पत्रकारों का तबादला

खबर है कि दैनिक जागरण, मेरठ के दो और अमर उजाला, मेरठ के एक पत्रकार का तबादला दूसरे संस्करणों में कर दिया गया है. दैनिक जागरण से राहुल पांडेय और अरुणेश पठानिया का तबादला किया गया है. ये दोनों लोग रिपोर्टिंग में थे और पूर्व संपादक विजय त्रिपाठी के कार्यकाल में भर्ती किए गए थे. राहुल पांडेय को दैनिक जागरण, मुरादाबाद भेजा गया है जबकि अरुणेश पठानिया को दैनिक जागरण, देहरादून.

राहुल और अरुणेश दोनों लोगों को मेरठ एडिशन से रिलीव कर दिया गया है. प्रबंधन ने इनका तबादला इनके अनुरोध पर किया है. बताया जा रहा है कि विजय त्रिपाठी के इस्तीफा देकर अमर उजाला ज्वाइन करने के बाद से उनके द्वारा अप्वाइंट किए गए रिपोर्टर द्वय राहुल पांडेय और अरुणेश पठानिया सहज नहीं महसूस कर रहे थे. स्थानीय पत्रकारों का एक काकस जो प्रबंधन को प्रिय है, लगातार इन दोनों को परेशान कर रहा था. इस कारण ये लोग असहज महसूस कर रहे थे और किन्हीं और यूनिटों में जाने के लिए परेशान थे ताकि दैनिक जागरण, मेरठ के घटिया किस्म के माहौल से मुक्ति मिल सके.

उधर, अमर उजाला, मेरठ के चीफ रिपोर्टर शादाब रिजवी का तबादला मुरादाबाद कर दिया गया है. इन्हें भी रिलीविंग लेटर दे दिया गया है. सूत्रों का कहना है कि शादाब रिजवी की संपादक शंभूनाथ शुक्ला से नहीं बन रही थी. शादाब रिजवी पर हाजी याकूब की करीबी को लेकर कई आरोप लगे. इन्हीं कई कारणों से इनका तबादला मेरठ के बाहर किया गया है.

साध्वी चिदर्पिता का कुबूलनामा- इसलिए मैंने विवाह का निर्णय लिया!

साध्वी चिदर्पिता गौतमबचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थी. माँ के साथ लगभग रोज़ शाम को मंदिर जाती. बाद में अकेले भी जाना शुरू कर दिया. जल का लोटा लेकर सुबह स्कूल जाने के पहले मेरा मंदिर जाना आज भी कुछ को याद है. दक्षिणी दिल्ली के कुछ-कुछ अमेरिका जैसे माहौल में भी सोमवार के व्रत रखती. इसी बीच माँ की सहेली ने हरिद्वार में भागवत कथा का आयोजन किया.

उसमें मुझे माँ के साथ जाने का अवसर मिला. उसी समय स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जी से परिचय हुआ. वे उस समय जौनपुर से सांसद थे. मेरी उम्र लगभग बीस वर्ष थी. घर में सबसे छोटी और लाडली होने के कारण कुछ ज्यादा ही बचपना था. फिर भी ज्ञान को परखने लायक समझ दी थी ईश्वर ने. स्वामी जी की सामाजिक और आध्यात्मिक सूझ ने मुझे प्रभावित किया. मेरे पितृ विहीन जीवन में उनका स्नेह भी महत्वपूर्ण कारण रहा जिसने मुझे उनसे जोड़ा. उन्हें भी मुझमें अपार संभावनाएं दिखाई दीं. उन्होंने कहा कि तुम वो बीज हो जो विशाल वटवृक्ष बन सकता है. वे मुझे सन्यास के लिये मानसिक रूप से तैयार करने लगे. कहा कि ईश्वर को पाने का सबसे उचित मार्ग यही है कि तुम सन्यास ले लो. लड़की होकर किसी और नाते से तुम इस जीवन में रह भी नहीं पाओगी. यह सब बातें मन पर प्रभाव छोड़तीं रहीं.

मेरी ईश्वर में प्रगाढ़ आस्था देखकर वे आश्रम में आयोजित होने वाले अधिकांश अनुष्ठानों में मुझे बैठाते. धीरे-धीरे आध्यात्मिक रूचि बढ़ती गयी और एक समय आया जब लगा कि यही मेरा जीवन है. मैं इसके सिवा कुछ और कर ही नहीं सकती. स्वामी जी से मैंने कहा कि अब मैं सन्यास के लिये मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार हूँ. आप मुझे दीक्षा दे दीजिये. उन्होंने कहा पहले सन्यास पूर्व दीक्षा होगी, उसके कुछ समय बाद संन्यास होगा. २००२ में मेरी सन्यास पूर्व दीक्षा हुई और मुझे नाम दिया गया– साध्वी चिदर्पिता. अब पूजा-पाठ, जप-तप कुछ अधिक बढ़ गया. नित्य गंगा स्नान और फिर कोई न कोई अनुष्ठान, स्वाध्याय और आश्रम में चलने वाले कथा-प्रवचन. इसी बीच स्वामी जी ने आदेश दिया कि तुम शाहजहांपुर स्थित मुमुक्षु आश्रम में रहो. तुम आगे की पढ़ाई करने के साथ ही वहाँ मेरी आँख बनकर रहना.

कुछ समय वहाँ बिताने के बाद मैं उनकी आँख ही नहीं हाथ भी बन गयी. मुमुक्षु आश्रम का इतना अभिन्न भाग बन गयी कि लोग आश्रम को मुझसे और मुझे आश्रम से जानने लगे. इस बीच वहाँ महती विकास कार्य हुए जिनका श्रेय मेरे कुछ खास किये बिना ही मुझे दे दिया जाता. अब स्वामी शुकदेवानंद पीजी कॉलेज और उसके साथ के अन्य शिक्षण संस्थानों का बरेली मंडल में नाम था. आश्रम की व्यवस्था और रमणीयता की प्रशंसा सुनने की मानो आदत सी हो गयी थी. दूसरे लोगों के साथ स्वामीजी को भी लगने लगा कि इस सब में मेरा ही सहयोग है. अब उनके लिये मुझे आश्रम से अलग करके देखना असंभव सा हो गया. इतना असंभव कि प्रमुख स्नान पर्वों पर भी मेरा शाहजहाँपुर छोड़कर हरिद्वार जाना बंद कर दिया गया. गंगा की बेटी के लिये यह कम दुखदायी नहीं था पर कर्तव्य ने मुझे संबल दिया.

इन वर्षों में जाने कितनी बार मैंने अपने संन्यास की चर्चा की. उन्होंने हर बार उसे अगले साल पर टाल दिया. आखिर में उन्होंने संन्यास दीक्षा को हरिद्वार के कुम्भ तक टाल कर कुछ लंबी राहत ली. मैंने धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की. कुम्भ भी बीत गया. मेरी बेचैनी बढ़ने लगी. बेचैनी का कारण मेरा बढ़ा हुआ अनुभव भी था. इस जीवन को पास से देखने और ज्ञानियों के संपर्क में रहने के कारण मैं जान गयी थी कि स्वामीजी सरस्वती संप्रदाय से हैं और शंकराचार्य परंपरा में महिलाओं का संन्यास वर्जित है. जो वर्जित है वो कैसे होगा और वर्जित को करना किस प्रकार श्रेयस्कर होगा मैं समझ नहीं पा रही थी. मैंने सदा से ही शास्त्रों, परम्पराओं और संस्कृति का आदर किया था.

इस सबको भूलकर, गुरु आदेश पर किसी प्रकार से संन्यास ले भी लेती तो भी शास्त्रोक्त न होने के कारण स्वयं की ही उसमें सम्पूर्ण आस्था नहीं बन पाती. साथ ही देश के पूज्य सन्यासी चाहकर भी मुझे कभी मान्यता नहीं दे पाते. और फिर उस मान्यता को मैं माँगती भी किस अधिकार से? खुद शास्त्र विमुख होकर उनसे कहती कि आप भी वही कीजिये? साध्वी चिदर्पिताइन्ही सब बातों पर गहन विचार कर मैंने साहसपूर्वक स्वामी जी से कहा कि आप शायद मुझे कभी संन्यास नहीं दे पायेंगे. अपने मन में चल रहे मंथन को भी आधार सहित बताया, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि परम्पराएँ और वर्जनाएं कभी तो तोड़ी ही जाती हैं. हो सकता है यह तुमसे ही शुरू हो. संन्यास देना मेरा काम है. इसके लिये जिसे जो समझाना होगा वह मैं समझाऊंगा. तुम परेशान मत हो. यह कह कर उन्होंने अगली तिथि इलाहबाद कुम्भ की दी.

यह बात होने के बाद हरिद्वार में रूद्र यज्ञ का आयोजन हुआ. स्वामीजी ने मुझे तैयार होकर यज्ञ में जाने को कहा. मैं गयी. शास्त्रीय परम्परा को निष्ठा से निभाने वाले आचार्य ने मुझे यज्ञ में बैठने की अनुमति नहीं दी, जबकि वे मेरा बहुत सम्मान करते थे. स्वामीजी को पता चला तो उन्होंने आचार्य से कहा कि वो तो शुरू से सारे ही अनुष्ठान करती रही है. पर वे न माने और स्वामीजी चुप हो गये. उनकी उस चुप्पी पर मैं स्तब्ध थी. सन्यासी आचार्य से अधिक ज्ञानी होता है. मैंने अपेक्षा की थी कि स्वामीजी अपने ज्ञान से तर्क देकर उन्हें अपनी बात मनवाएंगे. पर ऐसा नहीं हुआ. अब मेरा विश्वास डिग गया और लगा कि आचार्य को न समझा पाने वाले अखाड़ों के समूह को क्या समझा पायेंगे.

यज्ञशाला से लौटकर स्वामीजी ने मेरी व्यथा दूर करने को सांत्वना देते हुए कहा कि दोबारा इन्हें फिर कभी नहीं बुलाएँगे. पर इससे क्या होता. आचार्य ने तो शास्त्रोक्त बात ही की थी. उन्होंने जो पढ़ा, वही कह दिया. अब मैं सच में दुखी थी. मुझे समझ में आ गया था कि इलाहबाद कुम्भ भी यूँ ही बीत जायेगा. मेरे संन्यास के निर्णय पर माँ के आँसू, भाई-भाभी के स्तब्ध चेहरे आँखों के आगे घूम गये. लगा, मानो यह धोखा मेरे साथ नहीं, मेरे परिवार के साथ हुआ. ग्यारह साल का जीवन आज शून्य हो गया था. उसी दौरान मैं गौतम जी के संपर्क में आयी. उस समय उन्होंने प्रकट नहीं किया पर उनके ह्रदय में मेरे प्रति प्रेम था. बिना बताये ही मानो वे मेरे जीवन की एक-एक घटना जानते थे.

उन्होंने बिना किसी संकोच के कहा- आप चुनाव लड़िए. मेरा सवाल था कि चुनाव और संन्यास का क्या सम्बन्ध. तब उन्होंने समझाया कि आपकी सोच आध्यात्मिक है. आप जहाँ भी रहेंगी ऐसी ही बनी रहेंगी और यह आपके हर काम में दिखेगी. मेरा विश्वास है कि आपके जैसे लोग राजनीति में आयें तो भारत का उद्धार हो जायेगा. सन्यास नहीं दे सकते तो कोई बात नहीं, आप स्वामीजी से अपनी चुनाव लड़ने की इच्छा प्रकट कीजिये. क्षेत्र वगरैह भी उन्होंने ही चुना. पर, यह इतना आसान नहीं था. अभी जिंदगी के बहुत से रंग देखने बाकी थे. मेरे मुँह से यह इच्छा सुनते ही बाबा (स्वामीजी) बजाय मेरा उत्साह बढ़ाने के फट पड़े. उनके उस रूप को देख कर मैं स्तब्ध थी. उस समय हमारी जो बात हुई उसका निचोड़ यह निकला कि उन्होंने कभी मेरे लिये कुछ सोचा ही नहीं. उनकी यही अपेक्षा थी कि मैं गृहिणी न होकर भी गृहिणी की ही तरह आश्रम की देखभाल करूँ.

आगंतुकों के भोजन-पानी की व्यवस्था करूँ और उनकी सेवा करूँ. आश्रम में या शहर में मेरी जो भी जगह थी, ख्याति थी वो ईश्वर की कृपा ही थी. ईश्वरीय लौ को छिपाना उनके लिये संभव नहीं हो पाया था. इस लिहाज़ से जो हो रहा था वही उनके लिये बहुत से अधिक था. तिस पर चुनाव लड़ने की इच्छा ने उन्हें परेशान कर दिया. उन्होंने मना किया, मैं नहीं मानी. उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारी टिकट के लिये किसी से नहीं कहूँगा. पैसे से कोई मदद नहीं करूँगा, तुम्हारी किसी सभा में नहीं जाऊंगा, यहाँ तक कि मेरी गाड़ी से तुम कहीं नहीं जाओगी. जहाँ जाना हो बस से जाना. मैंने कहा ठीक है. इस पर वे और परेशान हो गये और उन्होंने अपना निर्णय दिया कि यदि तुम्हें चुनाव लड़ना है तो दोपहर तक आश्रम छोड़ दो. मैंने उनकी बात मानी.

मेरा आश्रम छोड़कर जाना वहाँ के लिये बड़ी घटना थी. दोपहर तक शहर के संभ्रांत लोगों का वहाँ जुटना शुरू हो गया. स्वामीजी के सामने ही वे कह रहे थे कि यदि आज आश्रम जाना जाता है तो आपकी वजह से, आपके जाने के बाद यह वापस फिर उसी स्थिति में पहुँच जायेगा. आप मत जाइये. स्वामीजी ने जाने को कहा है तो क्या, आपने आश्रम को बहुत दिया है, इस आश्रम पर जितना अधिकार स्वामीजी का है उतना ही आपका भी है. और भी न जाने क्या-क्या. स्वामीजी यह सब सुनकर सिर झुकाए बैठे थे. मुँह पर कही इन बातों का खंडन करना भी तो उनकी गरिमा के अनुरूप नहीं था. मेरे स्वाभिमान ने इनमें से किसी बात का असर मुझ पर नहीं होने दिया और मैं आश्रम छोड़कर आ गयी. शून्य से जीवन शुरू करना था पर कोई चिंता नहीं थी. एक मजबूत कंधा मेरे साथ था. श्राद्ध पक्ष खत्म होने तक मैं गौतम जी के परिवार के साथ रही जहाँ मुझे भरपूर स्नेह मिला. नवरात्र शुरू होते ही हमने विवाह कर लिया.

विवाह के बाद हज़ारों बधाइयाँ हमारा विश्वास बढ़ा रहीं थीं कि हमने सही कदम उठाया. विरोध का कहीं दूर तक कोई स्वर नहीं. शत्रु-मित्र सब एक स्वर से इस निर्णय की प्रशंसा कर रहे थे. केवल कुछ लोगों ने दबी ज़बान से कहा कि विवाह कर लिया तो साध्वी क्यों? साध्वी क्यों नहीं. रामकृष्ण परमहंस विवाहित थे, उन्होंने न सिर्फ अपना जीवन ईश्वर निष्ठा में बिताया बल्कि नरेंद्र को संन्यास दीक्षा भी दी. ऐसे न जाने कितने और उदाहरण हैं जिनका उल्लेख इस आलेख को लंबा करके मूल विषय से भटका देगा. इसके अलावा केवल शंकराचार्य परंपरा में अविवाहित रहने का नियम है. और उसमें महिलाओं की दीक्षा वर्जित है. तो मुझ पर तो अविवाहित रहने की बंदिश कभी भी नहीं थी.

सन्यासी का स्त्रैण शब्द साध्वी नहीं है. यह साधु का स्त्रैण शब्द है. वह व्यक्ति जो स्वयं को साधता है साधु है, साध्वी है. यदि साध्वी होने का अर्थ ब्रह्मचर्य है तो बहुत कम लोग होंगे जो इस नियम का पालन कर रहे हैं. इस प्रकार के अघोषित सम्बन्ध को जीने वाले और वैदिक रीति से विवाहित होते हुए सम्बन्ध में जीने वालों में से कौन श्रेष्ठ है और कौन अधिक साधु है इसका निर्णय कोई मुश्किल काम नहीं. इसके अलावा धर्म, आस्था या आध्यात्म को जीने के लिये विवाहित या अविवाहित रहने जैसी कोई शर्त नहीं है. जिसे जो राह ठीक लगती है वह उसी पर चलकर ईश्वर को पा लेता है यदि विश्वास दृढ़ हो तो. बस अन्तःकरण पवित्र होना चाहिये.

ऊपर लिखे घटनाक्रम को यदि देखें तो यह विवाह मज़बूरी लगेगा पर ईश्वर साक्षी है कि ऐसा बिलकुल नहीं था. दोनों के ही ह्रदय में प्रेम की गंगा बह रही थी पर दोनों ही मर्यादा को निष्ठा से निभाने वाले थे. सारा जीवन उस प्रेम को ह्रदय में रखकर काट देते परन्तु मर्यादा भंग न करते. मैंने पूरा जीवन ‘इस पार या उस पार‘ को मानते हुए बिताया. बीच की स्थिति कभी समझ ही नहीं आयी. जब तक संन्यास की उम्मीद थी तब तक विवाह मन में नहीं आया. दिल्ली का जीवन जीने के बाद मैं शाहजहांपुर जैसे शहर में और वो भी ५३ एकड में फैले आश्रम में नितांत अकेले कैसे रह लेती हूँ यह लोगों के लिये आश्चर्य का विषय था.

पर मेरी निष्ठा ने मुझे कभी इस ओर सोचने का अवसर नहीं दिया. जब संन्यास की उम्मीद समाप्त हो गयी तो त्रिशंकु का जीवन जीने का मेरी जैसी लड़की के लिये कोई औचित्य नहीं बचा था. साहस था और परम्परा में विश्वास था, उसी कारण वैदिक रीति से विवाह किया और ईमानदारी से उसकी सार्वजनिक घोषणा की. मैंने इस विवाह को ईश्वरीय आदेश माना है. मुझे गर्व है कि मुझे ऐसे पति मिले जो बहुत से सन्यासियों से बढ़ कर आध्यात्मिक हैं, सात्विक हैं, और सच्चे हैं. क्षत्रिय होते हुए भी भी मांस-मदिरा से दूर रहते हैं. उदारमना होते हुए भी मेरे मान के लिये सारी उदारता का त्याग करने को तत्पर रहने वाले वे भारतीयता के आदर्श हैं. ये उन्हीं के बस का था जो मुझे उस जीवन से निकाल ले आये वरना इतना साहस शायद मैं कभी न कर पाती और यह संभावनाओं का बीज वहीँ सड़ जाता. हरिः ओम्!

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साध्वी चिदर्पिता गौतम का यह लिखा उनके ब्लाग मेरी ज़मीं मेरा आसमां http://chidarpita.blogspot.com से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. साध्वी चिदर्पिता गौतम से संपर्क adishivshakti@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

दुख को स्थायी भाव बना चुके एक शराबी का प्रवचन

यशवंत: एक शराबी मित्र मिला. वो भी दुख को स्थायी भाव मानता है. जगजीत की मौत के बाद साथ बैठे. नोएडा की एक कपड़ा फैक्ट्री की छत पर. पक रहे मांस की भीनी खुशबू के बीच शराबखोरी हो रही थी. उस विद्वान शराबी दोस्त ने जीवन छोड़ने वाली देह के आकार-प्रकार और पोस्ट डेथ इफेक्ट पर जो तर्क पेश किया उसे नए घूंट संग निगल न सका… :

दुख मेरा प्रिय विषय है. मेरा स्थायी भाव है. ज्यादातर लोगों का होगा. क्योंकि ब्रह्मांड में फिलहाल हम्हीं लोग सबसे ज्यादा सोचने, समझने, महसूस करने और कहने-बोलने वाले लोग हैं. मनुष्य जो हैं हम लोग. कोई और जीव-जानवर होते तो शायद दुख स्थायी भाव नहीं होता. कुत्ता, बिल्ली, चींटी, चिड़िया, गोजर, सांप…. सैकड़ों तरह के गैर-मनुष्य कोटि के जीवों के नाम ले लीजिए. उनके सुख-दुख के रेशियो-प्रपोर्शन के बारे में हम लोग नहीं जानते, इसलिए कह सकते हैं कि दुख उनका स्थायी भाव नहीं होगा. कई तरह के भावों के साथ वे लगातार जीते रहते हैं. भय, आतंक, दुख वाले भाव भी अन्य भावों की तरह समान या कम ज्यादा मात्रा में उनमें होंगे. पर यह तय है कि दुख स्थायी भाव नहीं होगा.

इन गैर-मानव कोटि के प्राणियों के लिए किसी एक भाव पर हर पल टिके रहना संभव नहीं है. उनकी समझने-बूझने की चेतना उतनी उन्नत नहीं है जितनी हम लोगों की है. जो कहना चाह रहा हूं यह कि मेरे जैसे दुखी आत्मा वाले लोगों के लिए कई मौके आते हैं जब दुख की धधकन कुछ घटनाओं के कारण बढ़ जाती है, भभक जाती है, पूरी तरह प्रचंड हो जाती है. उन मौकों पर सोचता ही रह जाता हूं और सोचने-समझने की प्रक्रिया इतनी गहन हो जाती है कि खुद से बेगाना हो जाने का एहसास होने लगता है. जैसे कुछ इस तरह कि मैं यशवंत देहधारी अलग हूं और जो सोच-समझ पा रहा है वह आंतरिक यशवंत कोई अलग है. देह वाले यशवंत की जरूरतें अलग है. आंतरिक सोच-समझ वाले यशवंत की जरूरतें भिन्न हैं. कई बार देह की जरूरतों से प्रेरित होकर आंतरिक यशवंत संचालित होता है पर यह बड़ा छोटा वक्त होता है. यह वही वक्त होता है जब मैं मनुष्य नहीं होता. देहधारी कोई प्राणी होता हूं.

रुपया, पैसा, मकान, सेक्स, खाना, सुरक्षा, स्वास्थ्य…. ये सब वाह्य यशवंत की जरूरतें हैं. और इन जरूरतों के लिए आंतरिक यशवंत भी परेशान होता रहता है. पर अब वाह्य जरूरतों के लिए आंतरिक को परेशान होने का वक्त कम होता जा रहा है. ऐसा नहीं कि सब ठीकठाक हो गया है. इसलिए क्योंकि वो होता तो क्या होता और वो न होगा तो क्या होगा जैसी फीलिंग बढ़ गई है. तो वाह्य जरूरतों के लिए अब अंदर वाले हिस्से को परेशान करने का मन नहीं करता. दोनों यशवंत के मिजाज-काम अलग-अलग हैं, सो दोनों को अलग-अलग सोचना-जीना करना चाहिए. यह बड़ी अदभुत अवस्था होती है.

हालांकि कई बार एक का काम दूसरे के बिना संचालित नहीं होता, सहयोग लेने की जरूरत पड़ जाती है. जैसे, आंतरिक यशवंत को सक्रिय करने के लिए यदा-कदा मदिरा की जरूरत महसूस होती है तो उस मदिरा को वाह्य यशवंत यानि देहधारी धारण करता है. तो यह अन्योन्याश्रितता है. जैसे वाह्य यशवंत को पैसे की जरूरत महसूस होती है तो उसे आंतरिक उर्जा का भी इस्तेमाल करना पड़ता है. तो यह आपसी सौहार्द है. बावजूद इन एका के, दोनों की मूल प्रकृति और काम अलग-अलग है, वो तो दुनिया इतनी बेईमान है कि दोनों को एक दूसरे के काम के लिए कई बार एक दूसरे का सहारा लेने को मजबूर करती है.

: ज़ुल्मत कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है, इक शम्मा है दलील-ए-सहर, सो ख़मोश है :

तो अब, बाहरी जरूरतों को वैसे ही लेने लगा हूं जैसे अन्य देहधारी लेते हैं. पहनने को जो मिल गया, सब ठीक है. ना पहना भी तो क्या ग़म है. खाने को जो मिल गया ठीक है. ना खाया तो क्या ग़म है. पीने को जो मिल गया ठीक है, ना पिया तो क्या ग़म है. रोने को कोई मुद्दा मिल गया तो ठीक है. ना रोया तो क्या ग़म है. हंसने को कुछ मिल गया तो हंसा, ना हंसा तो दुखी होने के लिए कई ग़म ही ग़म हैं.

दुख वो आखिरी पड़ाव है जहां आकर ठहर जाता हूं. और कहीं पर आप बार बार अंटकते हों, रुकते हों तो उस जगह से आपको प्यार हो जाता है. दुख से भी हो गया है. स्टीव जाब्स चले गए. जगजीत सिंह भी चले गए. थोड़ा बहुत विश्लेषण दिमाग ने किया और फिर तुरंत बोल पड़ा- सब चले जाएंगे. एक दिन सब चले जाएंगे. जा ही रहे हैं लगातार. करोड़ों वर्षों से लोग जा रहे हैं. हर कोई जो जिंदा है, अपने अगले चालीस-पचास साठ सत्तर अस्सी नब्बे सौ साल में चला जाएगा. जाना उतना ही बड़ा स्थायी भाव है जितना दुख है. कह सकते हैं कि इस नकारात्मक दृष्टि के कारण मुझे वो नहीं दिख रहा है जो पाजिटिव है, आधी खाली है गिलास या आधी भरी की तरह.

जा रहे हैं लोग तो उससे ज्यादा मात्रा में आ रहे हैं. दुख है तो सुखों के हजार गुना ज्यादा कारण भी हैं, और मौके भी. सच है ये. पर उन रहस्यों के पार न जा पाने का दुख है कि ये लोग जाते कहां हैं, आते कहां से हैं. और क्यों आते हैं, क्यों जाते हैं. आखिरी सच क्या है. असीम प्रेम और असीम आनंद कहां है. दुखों को न समझ पाने की दुर्बुद्धि से कैसे पार पाया जाए… इन रहस्यों के ओरछोर समझने के लिए गौतम बुद्ध से पहले भी लाखों संत-साधक-मनीषी-ऋषि हुए और उनके बाद भी. सबके अपने-अपने तर्क, जीने और सोचने को लेकर. पर आदमी का रोना बंद नहीं हुआ. लोग जाते हैं तो लोग रोते हैं. कुछ लोगों के लिए ज्यादा लोग रोते हैं. कुछ लोग बिना किसी को रुलाए रुखसत हो जाते हैं.

स्टीव जाब्स गए तो उनकी सफलताओं की कहानी के बीच कुछ दाग-धब्बे दिखे तो मन वहीं अटक गया. स्टीव जाब्स जिन हालात में धरती पर आए, बिन ब्याही मां और पिता के संभोग के कारण, वही  कृत्य स्टीव जाब्स ने किया, एक बिन ब्याही लड़की से संभोग कर बच्चा पैदा किया. शादी-ब्याह ब्रह्म की लेखी नहीं है, खुले और बौद्धिक समाज में इसकी जरूरत कम से कमतर होती जाती है. लेकिन पता नहीं क्यों, अपन के संकुचित भारतीय दिमाग में यह बात टंग गई कि जैसा स्टीव जाब्स के मां-पिता ने किया और वैसा ही स्टीव जाब्स ने किया, वह ठीक न था. पर थोड़ा ठहरकर सोचता हूं तो लगता है कि इतने छोटे-छोटे ठीक और सही के पचड़े में अगर मैं फंस रहा हूं तो दिक्कत मेरी है. और ऐसी फच्चड़ों, फंसान से उबरते रहना चाहिए अन्यथा मेंटल ग्रोथ रुक जाएगी और कब हम चेतन की जगह गोबर हो जाएंगे, पता ही नहीं चलेगा. चलिए, ऐसी सोच रखने के लिए स्टीव जाब्स से सारी.

स्टीव जाब्स की महानत की गाथा हर कोई गाता रहा, कारपोरेट से लेकर आम बुद्धिजीवी तक, पर अभी तक केवल मैं नहीं समझ पाया कि स्टीव जाब्स ने जो क्रांति की, उसमें उनका मकसद मुनाफा पाना नहीं, लाभ कमाना नहीं तो और क्या था. क्या उनकी कथित क्रांति दुनिया के आम लोगों तक पहुंची? जिनके हाथ में आईपैड आ गया वो स्टीव जाब्स की महानता को समझ गया. पर जिनके हाथ वे एप्पल नहीं लगे, वो भला स्टीव जाब्स को क्या समझे-माने!

मतलब, आपकी महानता और आपका ओछापन भी क्लास के हिसाब से तय होता है. स्टीव जाब्स ने कोई सोशल काम नहीं किया. उन्होंने पैसे को किसी सामाजिक या पर्यावरणीय या मनुष्यता के भले के काम में नहीं लगाया. हां, वे खुद निजी जीवन में ज्यादा प्रयोगधर्मी, रचनाशील, संघर्षशील और विजनरी थे. पर समाज-देश-मनुष्य से कटकर यह कोई गुण कोई खास गुण तो नहीं! ऐसे न जाने कितने स्टीव जाब्स कारपोरेट कंपनियों में, मल्टीनेशनल कंपनीज के रिसर्च एंड डेवलपमेंट विंग में काम कर रहे हैं, अविष्कार कर रहे हैं और एक दिन सिधार जा रहे हैं. उन सभी का कुछ न कुछ योगदान है पर अंत में देखता हूं तो पाता हूं कि सतत महान खोजों-अविष्कारों के बावजूद ज्यादातर मनुष्यों के दुखों के आवेग में कमी नहीं आई है, हां तरीके में जरूर कमी आई होगी. तो स्टीव जाब्स एक इंडिविजुवल वर्कर, कारपोरेट लीडर के रूप में गजब के लगे पर ज्योंही सोशल कनसर्न पर आते हैं, उनका योगदान शून्य टाइप का ही लगा.

काश, कितना अच्छा होता जो स्टीव जाब्स ने दुनिया भर के आम लोगों को एप्पल फ्री में खिला दिया होता. यह बहस पुरानी है कि फ्री में क्यों, फ्री में किसलिए. समाजवाद या पूंजीवाद. कौन सा वाद अच्छा वाद…. और हर छोटी छोटी बड़ी बड़ी ऐसी बहसें एक समय के बाद कई लोगों के लिए अनसुलझी रह जाती हैं, उसी तरह जैसे आजतक यह हल नहीं हुआ कि सच्चाई की वैश्विक जयघोष के बावजूद दुनिया में मुनाफा आधारित, पूंजी आधारित, मुद्रा आधारित सिस्टम ही अघोषित रूप से वैल्यू सिस्टम क्यों बना हुआ है.

पूंजी आधारित वैल्यू सिस्टम जब अघोषित रूप से दुनिया का वैल्यू सिस्टम बन चुका है तो फिर हमें इसे घोषित, संवैधानिक रूप में मानने-बताने में क्या दिक्कत और क्यों नहीं हम खुला ऐलान कर देते हैं कि पूंजी ही अंतिम सच है, इसलिए हे गरीबों, अब नियम-कानून-संविधान वगैरह भूलो, पूंजी के लिए मरो-जियो. हालांकि बिना कहे हो भी यही रहा है. पर दुनिया के हुक्मरानों ने सच को एकरूप में नहीं पेश किया है. सच को अपने मुट्ठी में भींच रखा है और सच की लोक परिभाषा संविधानों, पोथियों, नैतिकताओं के जरिए लोगों में व्याख्यायित-प्रचारित कर दी है.

ज्यादातर लोगों के लिए जीने लायक स्थितियां नहीं क्रिएट हो पा रही हैं, तनाव, दुखों, अवसादों के ढेर लगे हैं हर एक की खोपड़ी पर लेकिन दुनिया ने मरने को गैरकानूनी कह दिया है. पेट भरने के लिए पैसे देने की, रोजगार देने की व्यवस्था नौजवानों के लिए नहीं की गई, वे जब छीनने लगते हैं, लूटने लगते हैं तो उन्हें लुटेरा कहकर मुठभेड़ में मार देते हैं. थोड़ा हटकर, थोड़ा धैर्य से सोचिए. क्या दुनिया में कुछ भी गलत लगता है आपको? गलत-सही की ठेकेदारी अलग-अलग देशों में अलग-अलग लोगों को दे दी गई है और सबने अपने अपने कबीले के नियम-कानून बना रखे हैं, अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से. पर हर जगह एक कामन सच है कि कबीलों में अमीर और गरीब होते हैं और ये अमीर-गरीब अपने कर्म से नहीं, अपने पास पाए जाने वाले मुद्रा की मात्रा से नामांकित होते हैं.

मैं खुद को तकनीक फ्रेंडली आदमी मानता हूं, इसलिए स्टीव जाब्स के जीवन को रोचक, प्रेरणादायी और महान मान लेता हूं. पर अगर मैं तकनीक फ्रेंडली नहीं होता तो स्टीव जाब्स का दुनिया से जाना उसी तरह का होता जैसे मेरे पड़ोसी गांव का कोई अपरिचित घुरहू भाई दमे की किसी घनघोर बीमारी से अचानक एक दिन विदा ले लेता और फोन से कुछ महीनों बाद बातों बातों में कोई गांववाला दोस्त बता देता कि अरे वो घुरहूवा मर गया.

: फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूं, मैं कहां और ये वबाल कहां :

जगजीत सिंह के चले जाने पर ऐसा लगा कि कोई अपने घर का चला गया है. मिडिल क्लास के डाक्टर कहे जाने वाले जगजीत सिंह की आवाज और उनकी गाई गई लाइनों के जरिए करोड़ों भारतीयों ने अपने अवसादों, अपने दुखों, अपने अकेलेपनों का इलाज किया है, विचित्र स्थितियों को जस्टीफाई किया है, ग़मों को सहज रूप से लेने की आदत डाली है. जैसे गांव के किसी आम आदमी के लिए एक लोकधुन उसे दिन भर के दबावों-तनावों से मुक्त कर देती है, उसी तरह किसी लोअर मिडिल क्लास, मिडिल क्लास और शहरी आदमी के लिए जगजीत की आवाज व लाइनें क्षणिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है. वह अपने दुखों को महिमामंडित होते देख खुश हो जाता है. वह अपने दुख में ग़ालिब जैसा दुख देखने लगता है और दुखों की इस अदभुत एका के आधार पर वह अंदर से समाज-लोगों से दूर होते जाते हुए भी ज्यादा नजदीक पाने लगता है क्योंकि उसे लगने लगता है कि विशाल दुखों को जीने वाले लोग दुखीजन नहीं, बल्कि बड़े आदमी होते हैं. मुझे भी कई बार ऐसी गलतफहमी होती है.

और इस तरह जगजीत जैसे लोगों की आवाज के पास करीब रहते हुए हम एकाकीपन से बच जाते हैं, अवसाद से उबर जाते हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में हम दुख को स्थायी भाव बनाने-मानने लगते है. हर शख्स उम्र के एक मोड़ पर अपनी मौत के बारे में खुद के अंदर से बतियाते हुए एक आमराय कायम कर लेता है. उसके बाहर की देह और अंदर का व्यक्ति जिस दिन मौत पर एक हो जाते हैं, वह व्यक्ति दुख को स्थायी भाव बना लेता है और जीने लगता है. जब आप किसी चीज को स्थायी भाव बना लेते हैं तो उससे उबर चुके होते हैं क्योंकि वह हर पल आपके पास रहता है इसलिए उस पर अलग से चिंता करने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती. लेकिन जो लोग इसे टालते, भगाते, गरियाते, समझाते रहते हैं, वे बीच-बीच में गहरे डिप्रेसन में उतरने लगते हैं. अचानक से बेचैन हो जाया करते हैं. बहुत कुछ सोचने विचारने लगते हैं. यहां वहां जहां तहां तक पहुंच जाते हैं. और आखिर में पस्त होकर सो जाते हैं. नींद न आने पर न सोना, खूब जगना भी नींद आने की राह को बनाता है. उसी तरह बहुत सोचने, बहुत विचारने और अंतहीन मानसिक कूद-छलांग लगाने के बाद ‘अनिर्णीत पस्त जीत’ हाथ में आ ही जाती है जिसमें ‘अनिर्णय’ और ‘पस्त’ का भाव दबा हुआ, सोया हुआ होता है सो कथित जीत के मारे हम तात्कालिक अवसाद, आवेग से उबरते हुए महसूस होते हैं.

अब जबकि दुख स्थायी भाव बन चुका है तो किसी के मरने जीने पर वैसा आवेग उद्विग्नता निराशा दुख क्षोभ अवसाद नहीं आता जैसा कुछ महीनों के पहले आया करता था. इस नयी डेवलप मानसिकता को मजबूत करने का काम एक छोटी घटना ने भी किया. दरवाजे को पैर से जोर से मार कर खोलने की कोशिश करने जैसी फुलिश हरकत के कारण अपने पैर के अंगूठे में हेयरलाइन फ्रैक्चर करा बैठा. डाक्टर ने प्लास्टर लगाया और तीन हफ्ते तक पैर को धरती से छुवाने से मना किया. सो, जरूर कार्यों के लिए चलने हेतु कांख में दबाकर चलने वाली लाठी का सहारा लेना पड़ा और एक पैर के सहारे कूद कूद कर बाथरूम-टायलेट के लिए चलना पड़ा. शुरुआती दो तीन दिन बेहद कष्ट में गुजरे. इस नई स्थिति के लिए मेरा मन तैयार नहीं था. पर डाक्टर की सलाह पर अमल करना था और अपने बेहद दर्द दे रहे अंगूठे के फ्रैक्चर को सही करना था, सो नसीहत के सौ फीसदी पालन के क्रम में धीरे-धीरे मन को इस हालात के अनुरूप ढलने को मजबूर होना पड़ा.

शुरुआती दो-तीन दिन बीत गए तो मैं शांत सा होता गया. दिन भर सोया बैठा. और रात में दारू. दारू का जिक्र आया तो बता दूं कि दर्जनों बार छोड़ने की बात कही, की, पर हर बार उसे पकड़ने को मजबूर हुआ. बिना इसके सूने व दुखदाई दिखते जीवन में कोई रंग, कोई दर्शन नहीं दिखता. पैर देखने के लिए घर आने वालों में एक नाम अमिताभ जी का भी है. आकर उन्होंने पैर पर चर्चा कम की, मेरे दारू प्रेम पर ज्यादा हड़काया. मैं निरीह और फंसे हुए बच्चे की तरह उनकी हां में हां, ना में ना करता रहा. और अगले दिन दोपहर से ही शुरू हो गया. तब उन्हें फोन करके उसी दिव्यावस्था में बताया कि आपका दारू पर भाषण देना मुझे ठीक नहीं लगा, इसीलिए आज दोपहर से ही शुरू हो गया हूं. वे बेचारे क्या कहते. घोड़ा को नदी तक ले जाने का काम घुड़सवार कर सकता है, उसे पानी पीने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. हालांकि अगले दिन सुबह उन्हें मैंने एक एसएमएस भेजकर कहा कि आज से छोड़ रहा हूं और उस आज से छोड़ने के वादे को तीन दिनों तक निभा पाया.

: तूने क़सम मैकशी की खाई है ‘ग़ालिब’, तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है :

अब फिर पीने लगा हूं. चाहता हूं पहले की तरह रोज रोज पीना पर रोज रोज पीने का दिल नहीं करता. और, पीने का सिलसिला, कई लोगों के बीच आनंदित-आप्लावित-आह्लादित होने का सिलसिला भी दुहराव देने लगता है, वैसे में सूनेपन अकेलापन कई बार अच्छा लगता है क्योंकि इसके जरिए कुछ नया माहौल मिलता है. कई बार सोचता हूं कि जो लोग नहीं पीते होंगे, वे कितने दुर्भाग्यशाली लोग होते होंग कि हर शाम उनकी जिंदगी में एक सी होती होगी, बेहद बोर और उबाऊ-थकाऊ. न पीने वाले हर शाम क्या करते होंगे, यह सोचने की कोशिश करता हूं तो लगता है कि वे वही करते होंगे जो मैं न पीने वाली शाम करता हूं. यानि थोड़ा ज्यादा सामाजिक हो जाना. खाना पकाने लगना. बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में बात करना. किसी से मिलने जुलने परिवार के साथ निकल जाना. कोई फिल्म देख लेना. किसी को घर पर बुलाकर उनसे बतिया लेना. कुछ सरकारी या आफिसियल काम निपटा लेना. कोई उपन्यास या कहानी या लेख वगैरह लिख देना.. और इन सबसे क्या होता है….

खैर, पियक्कड़ों के लिए दुनिया पैदा होने व मरने के बीच के दौरान खेल-तमाशे से भरी होती है और ना पीने वालों के लिए यह दुनिया पैदा और मरने के बीच में बेहद सफल या महान बन जाने के लिए जुट जाने की होती है, सो सबकी अपनी भावना, सबकी अपनी मनोकामना. दारू को लेकर कोई जिद नहीं है. जो ना पीता है, उसके ना पीने के दस अच्छे तर्क होते हैं और उन तर्कों से डेमोक्रेटिक स्प्रिट के साथ सैद्धांतिक रूप से सहमत रहता हूं. और, पीने वालों के अपने जो दस रंजोगम होते हैं, उनसे व्यावहारिक रूप से सहमत रहता हूं. कोई बुरा नहीं है. केवल देखने वालों के नजरिए में फर्क होता है.

एक शराबी मित्र मिला. वो भी दुख को स्थायी भाव मानता है. जगजीत की मौत के बाद एक दिन साथ बैठे थे. नोएडा की एक कपड़ा फैक्ट्री की खुली छत पर. उसी छत पर मांस पक रहा था और उसकी भीनी खुशबू के बीच शराबखोरी हो रही थी. वो दोस्त जीवन त्यागने वाली देह के प्रकार और पोस्ट डेथ इफेक्ट पर बोलने लगा- ”जग को जीत लो या जग में हार जाओ, दोनों को अंजाम एक होता है. फर्क बस ये होता है कि जग के जीतने वालों के जाने पर जग में शोर बहुत होता है जिससे दुखी लोगों की संख्या बढ़ जाया करती है जिससे पूरी धरती पर निगेटिव एनर्जी ज्यादा बढ़ जाया करती है और जो जग में हारा हुआ जग से जाता है तो उसकी चुपचाप रुखसती धरती के पाजिटिव एनर्जी के माहौल को छेड़ती नहीं. तो बोलिए, महान कौन हुआ. जो जग को रुला जाए या जो जग को एहसास ही न होने दे कि ये गया कि वो गया.”

उस विद्वान शराबी के तर्क को दारू के एक नए घूंट के साथ पी जाने को मन था, पर वह गले से नीचे सरका नहीं. सोचने लगा… कि कहीं दुनिया का बड़ा संकट यह बकबक ही तो नहीं है. जिसो देखो वो बकबक का कोई एक कोना थामे पिला पड़ा है. कोई कश्मीर के भारत से अलग होने की संभावना की बात कहे जाने पर पगलाया हुआ हमला कर रहा है तो कोई सारा माल गटककर भी खुद के निर्दोष होने का कानूनी व संवैधानिक तथ्य-तर्क गिनाए जा रहा है, कोई बंदूकधारियों की सुरक्षा से लैस होकर शांति का पाठ पढ़ा रहा है तो कोई शांति के नाम पर संस्थाबद्ध हत्याएं करा रहा है. कोई रुपये के मोहजाल में न फंसने की बात कहकर खुद को मालामाल किए जा रहा है तो कोई नशे से दूर रहने का उपदेश देकर देश में ब्लैक में नशा बिकवा रहा है. कोई पार्टी करप्शन में लीन होने के बावजूद करप्शन के खिलाफ रथ-अभियान चलाने में लगी है तो कोई दंगे कराकर खुद को निर्दोष-अहिंसक बता रहा है.

पर ठीक से देखिए, थोड़ा उबरकर सोचिए, थोड़ा शांत-संयत होकर मन को बांचिए तो पता चलेगा कि इस ब्रह्मांड के अनगिनत वृत्ताकार खेल-तमाशों के एक छोटे से वृत्त में हम भी कैद हैं और उस वृत्त को हम सिर से लेकर पैर तक से नचा नचा कर कुछ कहने समझाने की कोशिश कर रहे हैं पर दूसरा आपका सुनने कहने के दौरान अपना भी सुनता कहता रहता है और इस तरह अरबों-खरबों जीव जंतु प्राणी जड़ चेतन मनुष्य अपनी अपनी दैहिक-मानसिक सीमाओं के भीतर नाच रहे हैं, कह रहे हैं, रो रहे हैं, पुकार रहे हैं, हंस रहे हैं, सो रहे हैं, मर रहे हैं, पनप रहे हैं और कारोबार चल रहा है. जीवन का कारोबार. धरती का कारोबार. ब्रह्मांड का कारोबार. किसी कोने में कोई बाढ़ में फंसा मर रहा है तो कोई भूख से दम तोड़ रहा है तो कोई सुख की बंशी बजा रहा है तो कोई कांख-पाद रहा है…

बिखरे जाल को अब बटोरते हैं. फिर क्या माना जाए. क्या किया जाए. क्या सोचा जाए. कैसे रहा जाए. क्या कहा जाए. क्या सुना जाए. कैसे जिया जाए… बहुत सवाल खड़े होते हैं. माफ कीजिए. मैं अभी इन सवालों के जवाब तक नहीं पहुंचा हूं. पर इतना कह सकता हूं कि पहले फैलिए. खूब फैलिए. सांचों, खांचों, विचारों, वृत्तों, सोचों, वर्जनाओं, कुंठाओं, अवसादों… के माध्यम से इन्हीं से उपर उठ जाइए. जैसे पोल वाल्ट वाला खिलाड़ी लाठी के सहारे लंबी छलांग लगाकर लाठी को पीछे छोड़ देता है. जब तक उदात्तता को नहीं जीने लगेंगे, जानने लगेंगे तब तक जो हम करेंगे कहेंगे जियेंगे वह औसत होगा, किसी और की नजर में हो या न हो, खुद की नजर में औसत होगा. और जिस दिन खुद को आप खुद के औसत से उच्चतर ले जाने की सोच में पड़ जाएंगे, कुछ न कुछ नया करने लगेंगे, और स्टीव जाब्स के शब्दों में ”स्टे हंग्री, स्टे फुलिश” की अवस्था में रहकर बहुत कुछ कर पाएंगे. तड़प होना दूसरों को बेहतर करने की, एक ऐसी खोज, एक ऐसी यात्रा की शुरुआत कराती है जिस पर हम तमाम बाहरी दिक्कतों, दिखावों, दुनियादारियों के बावजूद चलते रहने लगते हैं.

और संक्षेप में बात कहना चाहूंगा ताकि अमूर्तता खत्म हो और बातें साफ साफ समझ में आएं. आप जैसे भी हों, अपनी मानसिक ग्रोथ के लिए प्रयास करें वरना अटक जाएंगे किसी गैर-मनुष्य जीव के बौद्धिक स्तर पर और फंसे हुए टेप की तरह रिपीट मारकर बजने लगेंगे जिससे बहुतों को सिरदर्द होगा और आखिर में आपको भी माइग्रेन या साइनस की दिक्कत हो जाएगी. जब आप खुद की मेंटल ग्रोथ करते, पाते हैं तो अपने अगल बगल वालों को भी खुद ब खुद बहुत कुछ दे देते हैं जिससे उनकी ग्रोथ होती रहती है. अभी बड़ी दिक्कत बहुतों की चेतना के लेवल के जड़ होने की है. जीवन स्थितियां ऐसी क्रिएट की गई हैं, सिस्टम ऐसा बनाया गया है कि बहुत सारे लोग मनुष्य की देह में जानवर जैसी सोच-समझ रखते हैं जिस कारण समाज और देश-दुनिया में बहुत सारे विद्रूप देखने को मिलते हैं जिससे हमारे आपके मन में दुख पैदा होता है.

यह हालत सिर्फ कम बुद्धि वालों को पैसे दे देने से भी खत्म नहीं होगीं. पैसा का इस्तेमाल हर कोई अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार करता है. बहुत ज्यादा बुद्धि रखने वाला कमीना आदमी पैसा बटोरकर विदेश के बैंक में रख देगा. बहुत कम बुद्धि वाला पैसा बटोरकर कई बीघे खेत खरीद लेगा और बाकी का दारू-मुर्गा में लगा देगा. तो पैसे से हालात नहीं बदलने वाले. हालात बदलेंगे जब हम शिक्षा को टाप प्रियारिटी पर रखें और एजुकेशन में पढाई गई बताई गई पवित्र चीजों, पवित्र भावना के अनुरूप सिस्टम को चलाएं-बढ़ाएं-बनाएं. पढ़ने और करने में जो हिप्पोक्रेसी है, जो भयंकर उलटबांसी है, वह अंततः पढ़े लिखे को बेकार और चोर-चिरकुट को समझदार साबित करता है. आजकल का माहौल ऐसा ही है. जिसने पढ़ लिखकर सत्ता का हिस्सा बनकर खूब चोरी कर ली, वह बड़ा आदमी और जो ईमानदारी से काम करे वह सड़ा आदमी. कुछ ऐसी हालत है आजकल की.

: बेख़ुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’, कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है :

विद्रोह और प्रेम. ये दो शब्द लगते अलग अलग हैं, पर हैं एक ही सिक्के के दो पहलू. सच्चा प्रेम वही कर सकता है जो विद्रोही हो. जो विद्रोही होता है वह सच्चा प्रेमी होता है. विद्रोही केवल अपने लिए नहीं जीता. वह अपने जैसी स्थितियों में रहने वालों का प्रतिनिधि होता है. मतलब वह बहुत सारे लोगों के लिए आगे बढ़कर नेतृत्व करता है, लड़ता है जड़ता से. तो वह उन सबसे प्रेम करता है जो हाशिए पर किए गए हैं,  वंचित किए गए हैं. वह सच्चा प्रेमी है. और जो सच्चा प्रेमी है वह लड़ता है अपने प्रेम के लिए, अपने हक के लिए, अपने सिद्धांत के लिए. बिना प्रेम किए विद्रोह संभव नहीं है. विद्रोही प्रेम ना करे, यह असंभव है. यह चरम अवस्था है. यही उदात्तता है. इसी में आनंद है.

स्टीव जाब्स और जगजीत सिंह के न रहने के बहाने अपने दुख-सुख-सोच-समझ की जो नुमाइश की है, उससे भले ही आपके कुछ काम लायक ना मिले पर मैं यह सब लिखकर कुछ ज्यादा उदात्त और संतोषी महसूस कर रहा हूं खुद को. मुझे खुद के उलझे हुए होने को सुलझाने के लिए कई बार मदिरा, तो कई बार कागज कलम, तो कई बार संगीत तो कई बार जादू की झप्पी लेने-देने की जरूरत महसूस होती है… और इसी तरह का हर किसी का होता है कुछ न कुछ. दुख का स्थायी भाव बनना विद्रोह की निशानी होती है. और, विद्रोही ही दुखों से ताकत खींच-सींच पाते हैं. सो, अपने स्थायी-तात्कालिक दुखों से दुखी होने के दिन नहीं बल्कि उससे ताकत लेकर मजबूत होने के दिन हैं, उदात्त होने के दिन हैं, ताकि शब्द, तर्क, शोर के परे के असीम आनंद को जीते-जी महसूस कर सकें हम-आप सब.

अपने प्रिय ग़ालिब साहिब की उपरोक्त कई जगहों पर कुछ एक लाइनों के बाद अब आखिर में, यहां चार लाइनों को छोड़ जा रहा हूं गुनने-गुनगुनाने के लिए…

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हां मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

(सहर यानि सुबह, बसर यानि गुजर-बसर वाला बसर और नाला यानि रोना-धोना शिकवा-गिला-शिकायत)

((हैदाराबाद में रह रहे बुजुर्ग पत्रकार भरत सागर जी से कहना चाहूंगा कि आपकी उस एक लाइन वाली मेल से इतना भारी भरकम लिख बैठा जिसमें आपने अनुरोध किया था- ”Jagjeet Singh par aapko sun ne ki tamanna thi !” पता नहीं क्या लिखा और कैसा लिखा, लेकिन हां, जो भी लिखा, आपके कहने के कारण लिखा क्योंकि मैं ठहरा भड़ास का क्लर्क जो दूसरों के लिखे को ही छापते देखते जांचटे काटते पीटते थक जाता है, सो, अपना भला कब और क्यों लिख पाएगा. भरत सागर जी मेरा प्रणाम स्वीकारें और मैं उनके लिए लंबी उम्र व अच्छी सेहत की कामना करता हूं. -यशवंत))

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया से जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

दर्जनों मीडियाकर्मियों की सांस अटकी, करोड़ों रुपये डूबने के आसार

: कई पत्रकारों पर लगे गंभीर आरोप : एक बड़ा प्रकरण सामने आया है. मीडियाकर्मियों वाली एक हाउसिंग सोसायटी के कर्ताधर्ताओं पर गड़बड़-घोटाले के आरोप लग रहे हैं. प्रकरण ग्रेटर नोएडा की एक सोसाइटी का है जिसमें दिल्ली-एनसीआर के छोटे-बड़े करीब 40 मीडियाकर्मी जुड़े हैं और बाकी पिचहत्तर मेंबर नान मीडिया के हैं. सदस्यों की कुल संख्या है 115. सोसायटी का नाम है मीडिया विला सहकारी समिति.

वर्ष 2004 में यह सोसाइटी बनी. वर्ष 2007 में मकान बनाकर सबको देना था. तीन तरह के प्लाट लिए गए थे. डेढ़ सौ स्क्वायर यार्ड, दो सौ स्क्वायर यार्ड और तीन सौ स्क्वायर यार्ड. डेढ़ सौ स्क्वायर यार्ड वालों ने करीब बीस लाख रुपये जमा किए. दो सौ स्क्वायर यार्ड वालों ने तीस लाख रुपये जमा किए और तीन सौ स्क्वायर यार्ड वालों ने बयालीस लाख रुपये दिए. इसी कैटगरी के प्लाटों के लिए नान-मीडिया वालों के लिए रेट क्रमशः सत्तर लाख रुपये, नब्बे लाख रुपये और डेढ़ करोड़ रुपये रखा गया. ऐसा इसलिए ताकि मीडिया वालों को प्लाट व मकान सस्ते में पड़ें.

इस हाउसिंग सोयाटी का प्रेसीडेंट प्रभात डबराल को बनाया गया और सेक्रेट्री अनिल कुमार शर्मा (उस समय सहारा में कार्यरत). अन्य जो कुछ लोग प्रमुख फंक्शनरीज थे, उनके नाम हैं- राज मिश्रा, राजेश कुमार सिंह आदि. ये लोग भी दिनों सहारा में हुआ करते थे और संभवतः आज भी हैं. इस हाउसिंग सोसायटी ने ग्रेटर नोएडा अथारिटी को जमीन की पूरी कीमत नहीं दी है. आठ करोड़ रुपये मूल्य के जमीन में अभी करीब डेढ़ करोड़ रुपये देने बाकी हैं. पैसे न देने के कारण अथारिटी वाले जो चक्रबृद्धि ब्याज लेते हैं, वह ब्याज की रकम करीब 85 लाख रुपये है. इस तरह ढाई करोड़ रुपये अभी तक जमीन के नहीं दिए गए. सोसाइटी को वर्ष 2007 में मकान बनाकर देने थे पर काम कंप्लीट नहीं हुआ है. आरोप है कि आधे अधूरे कुछ मकान बने हैं. इस बात को लेकर सोसाइटी के सदस्यों ने हल्ला मचाया तो पिछले महीने की 18 तारीख को इजीएम बुलाई गई. इसमें सदस्यों ने सोसाइटी के कर्ताधर्ताओं पर करोड़ों रुपये हड़पने और मीडियाकर्मियों के साथ धोखा करने के आरोप लगाए.

इसी के बाद ईजीएम में सोसाइटी के पदाधिकारियों ने इस्तीफा देकर अपना पल्ला झाड़ लिया. पर सोसाइटी के सदस्यों का गुस्सा ठंढा नहीं पड़ा है. भड़ास4मीडिया को फोन पर कई सदस्यों ने सूचित किया कि वे करोड़ों रुपये हड़पने वाले पत्रकारों को छोड़ेंगे नहीं. उन्हें एक-एक पैसे का हिसाब देना पड़ेगा. आधे अधूरे काम और जमीन का पैसा अथारिटी को ना देने का खामियाजा अब मेंबरों के मत्थे पड़ेगा. उन्हें फिर से अपनी जेब से पैसे देने होंगे. इस बात को लेकर सदस्यों में भारी गुस्सा है. इन सदस्यों ने कई स्तर पर शिकायत दर्ज कराने का मन बना लिया है.

इन आरोपों के बारे में सोसाइटी के प्रबंधन से जुड़े रहे कुछ लोगों का कहना है कि गलती सोसाइटी के पदाधिकारियों की नहीं बल्कि ग्रेटर नोएडा अथारिटी की है. सोसाइटी की तरफ से पूरा पैसा एक साथ जमा करा दिया गया बैंक से लोन लेकर. पर अथारिटी के लोगों ने पैसे इकट्ठे अपने पास रख लिया और महीने का इंस्टालमेंट काटकर जमा करते रहे. सोसाइटी के प्रबंधन से जुड़े लोगों के मुताबिक ग्रेटर नोएडा अथारिटी में कार्यरत कुछ कर्मियों ने कागज पूरे नहीं किए और कह दिया कि इतना ब्याज देना अभी बाकी है. जो पैसा पांच साल में देना था, उसे हम लोगों ने तो कुछ ही महीनों में दे दिया.

लेकिन अथारिटी वालों ने लापरवाही की. कागज आधा अधूरा रखा क्लर्कों ने. फिर पांच साल बाद बता दिया कि पेमेंट नहीं किया है इस तरह मिस्टेक टेक्निकल है, जो ग्रेटर नोएडा की तरफ से हुई है. वे लोग उसे ठीक करने जा रहे हैं. सारा पैसा जब दे दिया था तो ग्रेटर नोएडा अथारिटी को इंस्टालमेंट खत्म करके एक साथ ले लेना चाहिए था. पर कागजों में ये काम कंप्लीट नहीं हुआ. पैसा अपने पास रखकर हर महीने इंस्टालमेंट काटते रहे और इंट्रेस्ट जोड़ते रहे. प्रबंधन के लोगों का कहना है कि सोसाइटी फंक्शनल है. लोग वहां रह रहे हैं. थोड़े बहुत जो विवाद हैं, उसे सुलझा लिया जाएगा.

इस प्रकरण के बारे में अगर आपके पास भी कुछ जानकारी हो तो भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचाएं.

झारखंड में कुख्यात लोग बनेंगे सूचना आयुक्त!

रांची : झारखंड में सूचना आयोग के गठन को लेकर एक विवाद उत्पन्न हो गया है। चयन समिति द्वारा दस अक्तूबर को गुपचुप तरीके से तीन लोगों के नाम तय करने की बात सामने आयी है। लेकिन इन नामों को अब तक रहस्यमय तरीके से गोपनीय रखा जा रहा है। पारदर्शिता के कानून के मामले में ऐसी गोपनीयता से सब हैरान हैं। मीडिया में जिन तीन नामों की चर्चा सामने आयी है, उन नामों से भी सबको हैरानी हो रही है।

ज्यादातर नागरिक तो इन तीनों के बारे में कुछ जानते ही नहीं। जो लोग इन्हें जानते भी हैं, वे इनके किसी अच्छे कामों के कारण नहीं बल्कि इनके बुरे कामों के कारण जानते हैं। सूचना कानून के अनुसार सूचना आयुक्त के लिए योग्यता है विशिष्ट ज्ञान वाले विख्यात व्यक्ति। लेकिन यहां कुख्यात लोगों को सूचना आयुक्त बनाने की चर्चा सामने आ रही है।

यही कारण है कि आरटीआइ फोरम ने महामहिम राज्यपाल को ज्ञापन देकर सूचना आयोग के गठन में मनमानी रोकने की मांग की है। फोरम के अध्यक्ष श्री बलराम के अनुसार आज 12 अक्तूबर 2011 को सूचना कानून के छह वर्ष पूरे हुए। लेकिन आज ही झारखंड में इस कानून का मखौल किया गया है। श्री बलराम ने महामहिम राज्यपाल से मांग की गयी है कि राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हेतु अपारदर्शी, गोपनीय, मनमाने एवं संदेहास्पद तरीके से चयनित अयोग्य लोगों की सूची को वापस लौटाकर योग्य लोगों के चयन की प्रक्रिया शुरू करे।

झारखंड आरटीआइ फोरम द्वारा राज्यपाल को सौंपा गया ज्ञापन इस प्रकार है-

सेवा में,

महामहिम राज्यपाल,

झारखंड

विषय – राज्य सूचना आयोग का अपारदर्शी एवं मनमाने तरीके से गठन एवं अधिनियम के प्रावधान की अनदेखी करके अयोग्य लोगों का चयन रोकने संबंधी निवेदन

मान्यवर,

आज 12 अक्तूबर 2011 को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को लागू हुए छह वर्ष पूरे हुए। लेकिन आज ही झारखंड में इस अधिनियम की भावना एवं प्रावधानों का मखौल करने और नागरिकों के अधिकार पर कुठाराघात करने संबंधी राज्य सरकार की साजिशों से हम आहत हैं। यही कारण है कि हम सूचना का अधिकार का उपयोग करने वाले और इसके लिए जनजागरूकता से जुड़े नागरिक आपसे झारखंड राज्य सूचना आयोग का अपारदर्शी एवं मनमाने तरीके से गठन एवं अधिनियम के प्रावधान का मखौल करते हुए अयोग्य लोगों के चयन पर रोक संबंधी निवेदन करना चाहते हैं।

झारखंड राज्य सूचना आयोग का कार्यकाल 29 जुलाई 2011 को समाप्त हो गया। लेकिन राज्य सरकार ने नये राज्य सूचना आयोग के गठन के लिए कोई पारदर्शी एवं सार्वजनिक प्रक्रिया नहीं अपनायी। इसके बदले गुपचुप, मनमाने एवं संदिग्ध तरीके से अयोग्य लोगों को सूचना आयोग के गरिमामयी पद पर बैठाने की साजिश की गयी। इसके लिए कई गोपनीय बैठकों के संबंध में अखबारों में खबरें भी आयीं। लेकिन राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में एक बार भी कोई आधिकारिक सूचना नागरिकों को नहीं दी गयी। पारदर्शिता के कानून के मामले में यह गोपनीयता दुर्भाग्यपूर्ण है।

आज दिनांक 12 अक्तूबर 2011 को दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार कतिपय अयोग्य एवं संदिग्ध आचरण के लोगों को सूचना आयुक्त बनाने की प्रक्रिया चल रही है। इस संबंध में हम आपका ध्यान इन बिंदुओं की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं-

1. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 15(5) के अनुसार विविध विषयों में व्यापक ज्ञान और अनुभव वाले समाज के प्रख्यात व्यक्तियों को सूचना आयुक्त बनाना है। इसमें यह भावना स्पष्ट है कि आयोग का गठन व्यापक मानदंडों पर आधारित हो। लेकिन इसके गठन प्रक्रिया संबंधी नियमावली के अभाव में पूर्व में राज्य सूचना आयुक्तों के चयन को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं, जो लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए चिंताजनक है।

2. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 27 के अंतर्गत इस अधिनियम के क्रियान्वयन हेतु सरकार को नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है। राज्य सूचना आयोग का गठन एक महत्वपूर्ण दायित्व होने के नाते इसके गठन की प्रक्रिया संबंधी नियमावली बनानी चाहिए थी। ऐसी नियमावली के अभाव में आयोग के गठन में अपारदर्शिता, पक्षपात, अयोग्य के चयन और अन्य प्रकार के विवाद की संभावना होती है। लेकिन राज्य सरकार ने मनमाने तरीके से आयोग गठन की मंशा के कारण अब तक कोई नियमावली नहीं बनायी और न ही कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनायी।

3. यही कारण है कि हमने दिनांक 08.08.2011 को माननीय मुख्यमंत्री, झारखंड को एक ज्ञापन सौंपकर राज्य सूचना आयोग गठन नियमावली बनाने का निवेदन किया था (प्रतिलिपि संलग्न)। लेकिन राज्य सरकार ने ऐसा करने के बजाय गुपचुप एवं संदिग्ध तरीके से आयोग के गठन की साजिश जारी रखी।

4. ज्ञात हो कि झारखंड में सूचना आयोग के गठन हेतु कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाये जाने के कारण गत वर्षों में झारखंड में दो बार चयन समिति द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त/सूचना आयुक्तों का चयन करके महामहिम राज्यपाल के पास अनुशंसा भेजे जाने के बावजूद दोनों बार महामहिम राज्यपाल ने अपनी शक्तियों एवं विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए अनुशंसा लौटा दी और चयन के बावजूद दोनों बार नियुक्तियां नहीं हो पायीं। पहली बार ऐसा मधु कोड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ था जब मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी अनुषंसा को महामहिम राज्यपाल ने लौटा दिया। दूसरी बार वर्ष 2010 में भी शिबू सोरेन के मुख्यमंत्रित्व काल में मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति संबंधी अनुशंसा को महामहिम राज्यपाल ने लौटा दिया। इसके कारण लगभग तीन साल तक राज्य में मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिक्त रह गया।

5. इस संदर्भ में हम भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के परिपत्र संख्या एबी-14017/36/94- इएसटीटी.(आरआर) दिनांक 25.10.1994 का उल्लेख करना चाहते हैं (प्रतिलिपि संलग्न)। यह ऐसे वैज्ञानिक, तकनीकी अथवा विशिष्ट पदों पर नियुक्ति के संबंध में है जिनमें विशिष्ट पृष्ठभूमि, ज्ञान एवं अनुभव वाले समुचित एवं योग्य व्यक्तियों का चयन किया जाना है। इसके बिंदु 3.1.(पप) का अंश इस प्रकार है-

“It is to be kept in mind that as a rule, appointments in Government are to be made on the basis of open advertisement. Therefore, proper advertisement of vacancies to be filled up by direct recruitment is an essential requirement”

6. इसी तरह, ऐसे पदों पर नियुक्ति के संदर्भ में हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है। श्री पी. जे. थामस की मुख्य सतर्कता आयुक्त पद पर नियुक्ति रद्द करने के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश सुनाया था।

TRANSPARENT SELECTIONS ARE MANDATED BY SUPREME COURT

Supreme Court Judgment on P J Thomas’ appointment as CVC, in the Supreme Court of India, Civil Original Juridiction, Writ Petition (C) No. 348 OF 2010 with Writ Petition (C) No. 355 of 2010.

The Supreme Court’s recent verdict on CVC (Central Vigilance Commission) Selections also applies to selections of Information Commissioners and members of Human Rights Commission, Minorities Commission, and other constitutional authorities.

DIRECTIONS:

I. HIGH COURTS MUST ENTERTAIN WHEN APPOINTMENTS ARE CHALLENGED. “We reiterate that Government is not accountable to the courts for the choice made but Government is accountable to the courts in respect of the lawfulness/ legality of its decisions when impugned under the judicial review jurisdiction.”(Pg 52, Point 45)

II. RECOMMENDATION MADE WITHOUT DUE PROCEDURE ARE NULL & VOID. “If a duty is cast under the proviso to Section 4(1) on the High Powered Committee (HPC) to recommend to the President the name of the selected candidate, the integrity of that decision making process is got to ensure that the powers are exercised for the purposes and in the manner envisaged by the said Act, otherwise such recommendation will have no existence in the eye of law.” (Page 2, point 2).

III. CVC IS DEFINED AS AN “INTEGRITY INSTITUTION”. (THE SAME MAY APPLY TO INFORMATION COMMISSIONS.) “In our opinion, CVC is an integrity institution. This is clear from the scope and ambit (including the functions of the Central Vigilance Commissioner) of the 2003 Act. It is an Institution which is statutorily created under the Act. It is to supervise vigilance administration.

The 2003 Act provides for a mechanism by which the CVC retains control over CBI. That is the reason why it is given autonomy and insulation from external influences under the 2003 Act.” (Page 22, Point 26.)

IV. THE KEY ISSUE IS INSTITUTIONAL INTEGRITY, NOT PERSONAL INTEGRITY. “The constitution of CVC as a statutory body under Section 3 shows that CVC is an Institution. The key word is Institution.

We are emphasizing the key word for the simple reason that in the present case the recommending authority (High Powered Committee) has gone by personal integrity of the officers empanelled and not by institutional integrity.” (Point 28, page 30)

V. RECOMMENDATION OF SELECTION COMMITTEE MUST SHOW A PROPER THOUGHT-PROCESS. “The word ‘recommendation’ in the proviso stands for an informed decision to be taken by the HPC on the basis of a consideration of relevant material keeping in mind the purpose, object and policy of the 2003 Act…Thus, while making the recommendations, the service conditions of the candidate being a public servant or civil servant in the past is not the sole criteria.” (Point 28, page 31-32).

VI. THE LOGIC OF DECISION-MAKING PROCESS MUST BE SELF-EVIDENT. “Appointment… must satisfy not only the eligibility criteria of the candidate but also the decision making process of the recommendation. The decision to recommend has got to be an informed decision keeping in mind the fact that CVC as an institution has to perform an important function of vigilance administration. (Point 33, page 36)

VII. THE TOUCHSTONE IS PUBLIC INTEREST. “When institutional integrity is in question, the touchstone should be ‘public interest’ which has got to be taken into consideration by the HPC and in such cases the HPC may not insist upon proof ” (i.e. conclusive proof of the candidate being corrupt or ineligible.)… While making recommendations, the HPC performs a statutory duty. Its duty is to recommend. While making recommendations, the criteria of the candidate being a public servant or a civil servant in the past is not the sole consideration. The HPC has to look at the record and take into consideration whether the candidate would or would not be able to function…” (Point 33, page 37)

VIII. DON’T CONSIDER ONLY CIVIL SERVANTS. “No reason has been given as to why in the present case the zone of consideration stood restricted only to the civil service.” (Point 55, page 68).

IX. STEP-BY-STEP INSTRUCTIONS FOR SELECTION PROCEDURE, INCL. HOW LIST OF CANDIDATES WILL BE PREPARED (Point 55, pg 68 onwards):

(a) RECORD REASONS, ESPECIALLY IF THERE’S DISSENT. “As in the present case, if one Member of the Committee dissents that Member should give reasons for the dissent and if the majority disagrees with the dissent, the majority shall give reasons for overruling the dissent. This will bring about fairness-in-action. Since we have held that legality of the choice or selection is open to judicial review we are of the view that if the above methodology is followed transparency would emerge which would also maintain the integrity of the decision making process.”

(b) DON’T RESTRICT SELECTION TO CIVIL SERVANTS. “In future, the zone of consideration should be in terms of Section 3(3) of the 2003 Act. It shall not be restricted to civil servants.”

(c) IMPECCABLE INTEGRITY. “All the civil servants and other persons empanelled shall be outstanding civil servants or persons of impeccable integrity.”

(d) RATIONAL CRITERIA, RECORDING OF REASONS. “The empanelment shall be carried out on the basis of rational criteria, which is to be reflected by recording of reasons and/or noting akin to reasons by the empanelling authority.”

(e) FIXING ACCOUNTABILITY FOR EMPANELMENT. “The empanelment shall be carried out by a person not below the rank of Secretary to the Government… in the concerned Ministry.”

(f) DON’T WITHHOLD INFORMATION. “The empanelling authority, while forwarding the names of the empanelled officers/persons, shall enclose complete information, material and data of the concerned officer/person, whether favourable or adverse. Nothing relevant or material should be withheld from the Selection Committee. It will not only be useful but would also serve larger public interest and enhance public confidence if the contemporaneous service record and acts of outstanding performance of the officer under consideration, even with adverse remarks is specifically brought to the notice of the Selection Committee. ”

(g) TRANSPARENT SCREENING PROCEDURE. “The Selection Committee may adopt a fair and transparent process of consideration of the empanelled officers.”

X. A PRECEDENT HAS BEEN SET FOR QUASHING OF COMMISSIONER’S APPOINTMENT BY COURT. No need for roundabout methods to remove CIC/SIC! “The impugned appointment of Shri P.J. Thomas as Central Vigilance Commissioner is quashed.” (Point 56, page 71).

7. इस आलोक में यह स्पष्ट है कि झारखंड राज्य सूचना आयोग गठन प्रक्रिया नियमावली के अभाव में मनमाने एवं गोपनीय तरीके से अयोग्य लोगों को राज्य सूचना आयुक्त बनाया जाना पूरी तरह जनविरोधी, अनुचित, अलोकतांत्रिक, असंवैधनिक एवं अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ है।

8. झारखंड में ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति हेतु योग्यता के संबंध में अधिनियमों में स्पष्ट रूप से किये गये प्रावधानों की मनमानी व्याख्या करके अयोग्य के चयन के उदाहरण पहले भी देखे गये हैं। झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के अध्यक्ष पद पर श्री शाहदेव की नियुक्ति के संबंध में माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण आदेष में इस संबंध में स्पष्ट निर्देष देते हुए राज्य सरकार के विरूद्ध गंभीर एवं तीखी टिप्पणियां करते हुए श्री शाहदेव को तत्काल पदमुक्त करने का निर्णय सुनाया था।

9. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 15(5) के अनुसार तीन सदस्यीय समिति की अनुषंसा के आधार पर महामहिम राज्यपाल को राज्य सूचना आयोग के गठन की शक्ति प्राप्त है। इससे यह स्पष्ट है कि तीन सदस्यीय समिति को सिर्फ अनुशंसा करनी है। अनुषंसित व्यक्ति वास्तव में उस योग्य हैं अथवा नहीं, इसकी गुणवत्ता का आकलन करना और तदनुरूप निर्णय लेने की शक्ति एवं विवेकाधिकार महामहिम राज्यपाल के पास है। पूर्व में दो-दो बार महामहिम राज्यपाल, झारखंड द्वारा ऐसी अनुषंसाओं को अस्वीकार किया जाना इसका स्पष्ट उदाहरण है।

इस आलोक में आपसे निवेदन है कि-

क. राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हेतु अपारदर्शी, गोपनीय, मनमाने एवं संदेहास्पद तरीके से चयनित अयोग्य लोगों की सूची को वापस लौटाने का कष्ट करें।

ख.  राज्य सरकार को निर्देष देने का कष्ट करें कि पहले झारखंड राज्य सूचना आयोग गठन प्रक्रिया नियमावली बनायी जाये और तदनुरूप पारदर्षी प्रक्रिया के तहत योग्य लोगों के चयन की प्रक्रिया शुरू हो।

ग. राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि अधिनियम में सूचना आयुक्तों हेतु जिन विषिष्ट योग्यताओं एवं ज्ञान का प्रावधान किया गया है, उसकी मनमानी व्याख्या नहीं की जाये और अधिनियम के प्रावधानों एवं भावना को अक्षरषः लागू किया जाये। इसके लिए अहर्ता मापदंड के आधार पर आवेदन आमंत्रित करके पारदर्षी तरीके से आयोग का गठन किया जाये।

आशा है, राज्यहित में आप त्वरित कदम उठाते हुए राज्य सरकार को सुस्पष्ट निर्देष देना चाहेंगे और वर्तमान में की गयी अनुषंसा को वापस लौटाकर राज्य सरकार को विधिसम्मत निर्णय लेने का निर्देष देना चाहेंगे।

संलग्न –

  • कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार का परिपत्र सं. एबी-14017/36/94- इएसटीटी (आरआर)/25.10.94

  • पी. जे. थामस की मुख्य सतर्कता आयुक्त पद पर नियुक्ति रद्द करने के संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की प्रतिलिपि

  • राज्य के नागरिकों एवं सूचनाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा दिनांक 08.08.2011 को माननीय मुख्यमंत्री, झारखंड को प्रस्तुत ज्ञापन

  • दिनांक 12 अक्तूबर 2011 को दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचार

निवेदक

शक्ति पांडेय

पत्रकार
आरटीआई एक्टिविस्ट

अपनी असफलता का ठीकरा पुराने स्टाफ पर फोड़ते हैं एनके सिंह

अभी तक के अपने तीन माह के कार्यकाल में एनके सिंह (पीपुल्स समाचार, भोपाल के एडिटर) ने सिर्फ दो मुद्दों पर विशेष टिप्पणी लिखी. एनके सिंह की दिनचर्या में स्थानीय संपादकों को किसम-किसम के मेल भेजना, नोटिस देना और नौकरी से हटाने की धमकी देना शामिल है. पीपुल्स समाचार पत्र के स्टाफ की ख्वाइश एनके सिंह को काम करते देखने की है.

दोपहर 12 से 01 बजे के बीच में दफ्तर आकर एनके सिंह शाम को विश्राम के बाद 06 बजे तक दोबारा दफ्तर आते हैं. रात को 10 बजे विदाई लेने से पूर्व उनका अधिकांश समय मेल, नोटिस और स्टाफ को हतोत्साहित करने में बीतता है. रोजाना आठ-दस मेल करना एनके सिंह के लिए मामूली बात है. स्थानीय संपादकों का अधिकांश समय एनके सिंह की मिजाजपुर्सी और स्पष्टीकरण देने में गुजरता है. संपादक के व्यवहार से आजिज आ चुकी निज सचिव ने पिछले दिनों पीपुल्स समूह की दूसरी इकाई में अपनी स्थानांतरण मांग लिया.

निज सचिव के जिम्मे मेल टाइप करना, उनका जवाब मंगवाकर प्रस्तुत करना, सुबह और शाम की खबरों की लिस्ट मंगवाना और अन्य पत्र व्यवहार करना है. एनके सिंह के व्यवहार पर एक स्थानीय संपादक की टिप्पणी थी- एनके सिंह पैंसेजर ट्रेन को बुलेट ट्रेन की तरह चलाना चाहते हैं. एनके सिंह के साथ दैनिक भास्कर में काम करने वाले पत्रकार आज भी उन्हें नोटिस कुमार सिंह कहकर याद करते हैं. उस दौर में मेल का प्रचलन कम था, इसलिए एनके सिंह दिनभर स्टाफ को लिफाफे में नोटिस देकर त्रास दिया करते थे. दैनिक भास्कर के बाद हिन्दुस्तान टाइम्स, भोपाल के स्टाफ के साथ भी ऐसा ही व्यवहार चलता रहा.

दरअसल पीपुल्स समाचार में समूह संपादक रहते हुए अवधेश बजाज ने जो कार्यप्रणाली विकसित की थी, एनके सिंह उसमें रातोरात बेहिसाब परिवर्तन की उम्मीद लगाए बैठे हैं. उन्हें आस थी कि उनके संपादक बनने के बाद पीपुल्स समाचार पत्र में और बेहतर काम करने वालों की कतार लग जाएगी, लेकिन वे चारों संस्करण में कोई खास सहयोगी नहीं जुटा सके. पुराने स्टाफ को अकर्मण्य मानकर चलने वाले एनके सिंह अब बुरी तरह हाफ गए हैं, लेकिन अकड़ के चलते वे सच स्वीकारने को तैयार नहीं. अपनी असफलता का सारा ठीकरा वे पुराने स्टाफ पर फोड़ते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि उनके आने से पहले भी समाचार पत्र अब से कुछ बेहतर ही प्रकाशित होता था.

सीएम की पीसी में बाइलाइन ली थी एनके सिंह ने

पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी पत्रकारवार्ता में संपादकों को भी आमंत्रित किया. पत्रकारवार्ता में जो कुछेक संपादक पहुंचे, उसमें एनके सिंह शामिल थे. एनके सिंह ने बीजेपी कवर करने वाले संवाददाता को पीसी में जाने से मना कर दिया और खुद की बाइलाइन से सीएम की पीसी पहले पेज पर छपवाई.

पीपुल्स समाचार संकट में, एनके सिंह चले तीर्थाटन पर

जब रोम जल रहा था तब नीरो बंसी बजा रहा था…कुछ उसी तर्ज पर पीपुल्स समाचार के संपादक एनके सिंह चल रहे हैं. एनके सिंह ने सभी स्थानीय संपादकों को मेल भेजकर सूचित किया है कि वे 13 से 16 अक्टूबर तक अवकाश पर रहेंगे. खबर है कि एनके सिंह महाराष्ट्र के तीर्थस्थलों पर मत्था टेकने जा रहे हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि एनके सिंह खुद अपने आप से घबरा गए हैं और अब वे भगवान की शरण में जा रहे हैं. हम कामना करते हैं कि पिछले दिनों जो बातें सार्वजनिक की गई है, उन पर एनके सिंह और पीपुल्स प्रबंधन सकारात्मक रुख अपनाएं ताकि पीपुल्स  समाचार अपने लक्ष्य की ओर निर्बाध्य गति से आगे बढ़ता रहे.

भोपाल के सुशील शर्मा को दिया इंदौर का अतिरिक्त प्रभार

पीपुल्स समाचार भोपाल के स्थानीय संपादक सुशील शर्मा को फिलहाल इंदौर संस्करण का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. संपादक एनके सिंह के निर्देश पर सुशील शर्मा ने मंगलवार को इंदौर का प्रभार संभाल लिया. पीपुल्स समाचार में चर्चा है कि जबलपुर या ग्वालियर के स्थानीय संपादक को इंदौर भेजा जा सकता है.

पीपुल्स प्रबंधन से अपील

  • एनके सिंह बार-बार नौकरी लेने की धमकी देना बंद करें.

  • अगले दिन समीक्षा की बजाय एनके सिंह खुद भी जिम्मा लें.

  • संपादकीय और विशेष खबरों में एनके सिंह का हस्तक्षेप हो.

  • बेहतर परिणाम के लिए पहले बेहतरीन स्टाफ रखा जाए.

  • अन्य संपादकों की तरह वे भी देर रात तक दफ्तर में मौजूद रहे.

  • साप्ताहिक अवकाश के अलावा बार-बार अवकाश लेना बंद करें.

  • मौजूद स्टाफ पर शक की बजाय भरोसा सीखें.

…समाप्त…

प्रवीण खारीवाललेखक प्रवीण खारीवाल इंदौर के पत्रकार हैं. इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं. अभी हाल में ही उन्होंने पीपुल्स समाचार, इंदौर के स्थानीय संपादक के पद से इस्तीफा दिया है. उन्होंने अपने एडिटर एनके सिंह की कार्यशैली पर कुल चार पार्ट में लिखा. यह आखिरी पार्ट था. इसके पहले के तीन पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें..

भोपाल वाले एनके सिंह ने भी जगजीत को उसी समय मार दिया था

यौन अपराधों से संबंधित विधेयक का मजमून ही बदल डाला था एनके सिंह ने

धमकाया था एनके सिंह ने- खबर गलत निकली तो जाएगी नौकरी

इन सभी आरोपों पर अगर पीपुल्स समाचार के एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह की तरफ से कोई जवाब या प्रतिवाद भेजा जाता है तो भड़ास4मीडिया पर उसे भी सम्मान के साथ प्रकाशित किया जाएगा. भड़ास तक कोई भी अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकता है.

टाइम्स नाऊ के साथ ही हमलावर चेंबर में दाखिल हुए!

शर्मनाक। प्रशांत भूषण पर हमला। घृणित। सुप्रीम कोर्ट के लायर्स चैम्‍बर्स में घुस कर हुई वारदात। तालिबानीकरण। प्रख्‍यात वकील और टीम-अण्‍णा के सदस्‍य प्रशांत भूषण पर आज शाम हमला हो गया। सुप्रीम कोर्ट के लायर्स चैम्‍बर्स स्थित उनके कार्यालय में दो युवकों ने घुस कर उन्‍हें लात-घूसों से पीटा और जमीन पर गिरा कर मारा। प्रशांत भूषण पर यह हमला तब हुआ जब वे एक न्‍यूज चैनल को बाइट देने जा रहे थे।

इस न्‍यूज चैनल ने इस पूरे हादसे को अपने कैमरे में कैद कर लिया। इस शर्मनाक घटना के दौरान दूसरा हमलावर कैमरे की जद में नहीं आया। मिल रही खबरों के मुताबिक ये हमलावर प्रशांत भूषण द्वारा कश्‍मीर के मसले पर दिये गये किसी कथित बयान को लेकर उत्‍तेजित थे। पुलिस इन हमलावरों से पूछताछ कर रही बतायी जाती है। लेकिन आश्‍चर्य की बात तो इस टाइम्‍स नाऊ न्‍यूज चैनल की क्रियाविधि रही। अचानक हुए इस हादसे के बावजूद कैमरे पर किसी भी तरह का जर्क तक नहीं आया। जबकि ऐसी किसी भी अप्रत्‍याशित घटना के दौरान कैमरा सम्‍भाले व्‍यक्ति का हाथ हिल ही जाता है।

ऐसी घटना के प्रति प्रतिक्रियास्‍वरूप भय-मिश्रित व्‍यवहार हो जाना मानवीय स्‍वभाव भी है। हालांकि बाद में कैमरे को जूम इन और जूम आउट किया जाता रहा। आशंका यह भी जतायी जा रही है कि कहीं इस चैनल के साथ ही तो हमलावर चैम्‍बर में दाखिल नहीं हुए। अपने इस न्‍यूज फुटेज को इस चैनल ने एक्‍सक्‍लूसिव बता कर घंटों तक चलाये रखा जिसमें प्रशांत भूषण की पिटाई के ही अंश हैं। अभिषेक मनु सिंघवी ने इस हमले के प्रति पहले तो हंसते हुए अनभिज्ञता प्रकट की, लेकिन बाद में इसे घृणित कर्म की संज्ञा दी। अरूंधति राय और किरण बेदी ने भी इस घटना की कड़े शब्‍दों में निन्‍दा की है।

प्राथमिक खबरों के मुता‍बिक यह हमलावर युवक प्रशांत भूषण द्वारा कश्‍मीर के मसले पर दिये गये किसी बयान पर क्षुब्‍ध था। इस हादसे के बाद इन युवकों को तो दबोच कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। हालांकि इस खबर की कवरेज कर रहे न्‍यूज चैनल की भी इस घटना में संलिप्‍तता को लेकर कानाफूसी शुरू हो गयी है। बहरहाल, कांग्रेस समेत विभिन्‍न दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस हादसे की भर्त्‍सना की है।

खबरों के मुताबिक आज शाम करीब चार बजे प्रशांत भूषण अपने लायर्स चैम्‍बर्स स्थित दफ्तर में अपने सहयोगियों के साथ बैठे थे। इसी बीच एक न्‍यूज चैनल टाइम्‍स नाऊ की टीम उनके किसी बयान पर उनकी बाइट लेने पहुंची। कैमरे के सामने आने से पहले प्रशांत भूषण ने अपनी कमीज वगैरह ठीक किया और बाइट देने तैयार हो गये। ट्राइपॉड पर लगा कैमरा उनके चेहरे पर फोकस किया गया। माइक लगाकर बातचीत शुरू होने ही जा रही थी कि अचानक प्रशांत भूषण के चेहरे पर किसी ने तमाचा जड़ दिया। लड़खड़ा कर प्रशांत अपनी कुर्सी पर गिरे, लेकिन अब तक कैमरे ने हमलावर को अपने फोकस में ले लिया था।

कैमरे में दिखाया गया है कि हमलावर युवक ने प्रशांत पर बिलकुल तालिबानी अंदाज में थप्‍पड़ों की झड़ी लगा दी। कुछ लोग प्रशांत भूषण को बचाने बढ़े तो हमलावर ने उन्‍हें भी धकेल दिया और फिर प्रशांत भूषण के पैर पकड़ कर उन्‍हें इस तरह अपनी ओर खींचा कि वे अपनी कुर्सी से नीचे गिर पड़े। इसके बाद हमलावर ने उन पर लातों से हमला कर दिया। बाद में उन्‍हें कालर पकड़ कर उठाया तो लेकिन इसी बीच कुछ लोगों ने उसके शिकंजे से प्रशांत भूषण को छुड़ाया। बाद में उसकी पिटाई भी हुई। इसी बीच खबर पाकर मौके पर पहुंची पुलिस ने हमलावर को अपने कब्‍जे में ले लिया। खबर मिली है कि हमलावर भगत सिंह सेना अथवा किसी रामसेना का समर्थक है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

न्यूज24 का दीवाली धमाका, आजतक के गले तक पहुंचा

टैम वाले टामियों ने दीवाला धमाका कर दिया है. न्यूज24 टाप पाइव न्यूज चैनल्स की लिस्ट में आ गया है. उसने चौथे पायदान पर पहुंचने में कामयाबी पाई है. उसने यह कामयाबी जी न्यूज को पछाड़ते हुए हासिल की है. न्यूज24 की नजर अब आजतक पर है. न्यूज24 की कोशिश होगी कि वह आजतक को पटकनी दे दे. न्यूज24 का प्रतिद्वंद्वी चैनल आजतक हो गया है क्योंकि नंबर तीन पर आजतक विराजमान है.

इंडिया टीवी इस हफ्ते भी नंबर एक पर है. आजतक की बुरी हालत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि स्टार न्यूज ने उसे पछाड़कर नंबर दो की भी पदवी उससे छीन ली है. हालांकि कहने वाले कहते हैं कि आजतक पर इन दिनों दीवाली दशहरा के चलते विज्ञापनों की भरमार है, इस कारण टीआरपी पर असर पड़ रहा है. पर कुछ लोगों का कहना है कि आजतक में जिस जड़ता ने पैर जमा रखा है, उसको बिना तोड़े आजतक में कुछ नया हो पाना मुश्किल है. अरुण पुरी के लाख चाहने और न्यूज पर लौटने के आह्वान के बावजूद आजतक कंटेंट में कुछ नया कमाल नहीं कर पा रहा है जिसके कारण इस न्यूज चैनल की स्थिति बिगड़ी है.

सबसे आश्चर्यजनक ग्रोथ न्यूज24 ने हासिल की है. अजीत अंजुम द्वारा इस चैनल की कमान फिर से संभालने के बाद से इस चैनल की टीआरपी में जबरदस्त उछाल आया है. कुछ हफ्तों पहले भी न्यूज24 ने टीआरपी चार्ट में ऐसी ही उछाल पाई थी पर तब आलोचकों ने यह कहा था कि यह फौरी चढ़ाव है जो थम जाएगा पर अब जबकि न्यूज24 ने एक बार फिर एनडीटीवी, आईबीएन7, जी न्यूज जैसे चैनलों को पटकनी दी है तो आलोचकों की बोलती बंद है.

बड़े-बड़े शूरमा न्यूज24 और अजीत अंजुम की इस ग्रोथ को पचा नहीं पा रहे है. हालांकि कहने वाले यह भी कहते हैं कि जबसे राजीव शुक्ला केंद्र सरकार में मंत्री बने हैं, टैम वाले टामी लोग कुछ ज्यादा ही पूंछ उनके चैनल के वास्ते हिला रहे हैं. पर, सच तो यही है कि अगर बाकी चैनलों ने टैम और टीआरपी को माई-बाप मान रखा है तो इस माई-बाप के पैमाने पर न्यूज24 और अजीत अंजुम ने वाकई कमाल किया है. इसके लिए न्यूज24 की पूरी टीम बधाई की पात्र है.

इस हफ्ते का टीआरपी चार्ट इस प्रकार है-

सप्ताह 41, टीजी- 15प्लस

इंडिया टीवी 16.6 (चढ़ा 1.5), स्टार न्यूज 12.8 (गिरा 1.2), आजतक 12.2 (गिरा 1.4), न्यूज24 9.9 (चढ़ा 1.1), जी न्यूज 9.1 (चढ़ा 0.3), आईबीएन7 8.3 (गिरा 0.7), एनडीटीवी इंडिया 8.1 (चढ़ा 0.3), लाइव इंडिया 7 (गिरा 1.0), तेज 5.8 (चढ़ा 0.8), समय 4.1 (चढ़ा .5), पी7न्यूज 3.7 (गिरा 0.1) डीडी न्यूज 2.3 (गिरा 0.1)

प्रशांत भूषण पर हमला, टाइम्स नाऊ के पास एक्सक्लूसिव फुटेज

अभी अभी सूचना मिली है कि टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य और जाने-माने वकील व मानवाधिकारवादी प्रशांत भूषण पर सुप्रीम कोर्ट के उनके चेंबर में कुछ लोगों ने हमला कर दिया और बुरी तरह मारा पीटा. इस दौरान टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल का कैमरामैन व रिपोर्टर मौजूद थे जिन्होंने पूरे वाकये को कैमरे में कैद कर लिया. इसका प्रसारण टाइम्स नाऊ चैनल पर किया जा रहा है.

टाइम्स नाऊ की यह टीम किसी प्रकरण पर प्रशांत भूषण का कमेंट लेने गई थी कि तभी उनके चेंबर में वाकया हो गया. हमला करने वाले लोग दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े बताए जाते हैं. पूरे घटनाक्रम के बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई है पर देश के हर कोने के पढ़े-लिखे लोगों ने हमले की इस स्तब्धकारी घटना की निंदा की है. डेमोक्रेसी में हर किसी को हर एक मुद्दे पर शांति के साथ अपनी बात रखने का हक है. प्रशांत भूषण अगर कश्मीर या किसी मसले पर अपनी कोई बात, अपना मत रखते हैं तो उन्हें सुना, समझा जाना चाहिए. किसी पर हमला करके उनके सुर, उनकी आवाज को दबाने की कोशिश करना बेहद गलत काम है.

इस बार सच कह रहे थे कमबख्त चैनल वाले!

दिनेश चौधरी: जगजीत सिंह बरास्ते अमिताभ (तीन) : जगजीत साहब के चले जाने की खबर एक चैनल पर देखकर झटका लगा। पर उम्मीद खत्म नहीं हुई थी, यह सोचकर कि ये चैनलवाले तो उल्टी-सीधी सच-झूठ खबरें देते ही रहते हैं, चलो किसी और चैनल पर देखें। चैनल बदल दिया। लेकिन दूसरे-तीसरे हरेक चैनल पर यही खबर। पिछली बार एक मित्र ने कहा था कि जब किसी इंसान के गुजर जाने की झूठी खबर चल जाये तो उसकी उम्र बढ़ जाती है।

इस बात पर हमने दिल से यकीन किया था और उम्मीद भी की थी कि जगजीत साहब अस्पताल से बाहर आकर फिर से गालिब की ग़ज़लों को गायेंगे। उनके अस्पताल में दाखिल होने के एक दिन पहले ही अखबारों में यह खबर पढ़ी थी कि गालिब की ग़ज़लों के साथ जगजीत व गुलजार साहब की जोड़ी एक बार फिर सामने आ रही है। इसी उम्मीद में मैं ग़ज़लों के पूरे सफरनामे को याद कर रहा था कि जगजीत साहब फिर से अपनी ग़ज़लों की महफिल सजायेंगे, पर अफसोस ऐसा हो न सका क्योंकि इस बार सच बोल रहे थे कमबख्त चैनल वाले! कितने बेरहम होते हैं खबरों पर काम करने वाले कि इधर जगजीत साहब गुजरे नहीं कि वे विकिपीडिया में ‘हैं’ से अपडेट होकर ‘थे’ हो गये।

शुरुआती दौर में जब अपने पास कैसेट प्लेयर की सुविधा नहीं थी, उनकी ग़ज़लों को यहां-वहां सुनने का अवसर बमुश्किल मिलता था। दुर्ग के एक काफी हाउस में उनके दो तीन अलबम हुआ करते थे जिनकी ग़ज़लें मैं बार-बार किसी न किसी बहाने सुना करता था और ऐसा करते हुए एक अपराध बोध भी रहता था जैसे किसी शादी की दावत में बिन बुलाये घुस गये हों। दो-तीन ग़ज़लें इस दौर की खासतौर पर याद आती हैं, मसलन “सरकती जाये है रूख से नकाब आहिस्ता-आहिस्ता” जिसे आज भी सुनने पर वही ताजगी महसूस होती है। यह ग़जल उनके पहले सफल अलबम “द आनफारगेटेबल्स” से है, जिसकी एक नज्म “बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी” भी एक तरह से माइलस्टोन है और सुदर्शन फाकिर की यह नज्म खुद जगजीत साहब को बहुत पसंद थी।

“लाइव एट वेंबली” की ग़ज़लें “देर लगी आने में तुमको” और “उम्र जल्वों में बसर हो” भी खूब सुनी गयीं और आज भी उतनी ही व्यग्रता के साथ सुनी जाती हैं। जगजीत साहब की ग़ज़लें सुन पाना मेरे लिये इसलिये भी मुश्किल था कि उनकी ग़ज़लें तब आकाशवाणी अथवा विविध भारती में नहीं आती थीं। अगर मेरी याददाश्त सही है तो उन्हें दक्षिण अफ्रिका में किसी दौरे के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया था। उनकी जो पहली ग़ज़ल मैंने दूरदर्शन पर सुनी थी वो बहुत बाद में किसी नये साल के प्रोग्राम में आयी थी। उन पर प्रतिबंध कब लगाया गया था और कब हटाया गया, यह बता पाना मेरे लिये मुश्किल है, लेकिन यह भी याद आ रहा है कि कैफी साहब के कहने पर उन्होंने “इप्टा” के एक आयोजन की आर्थिक मदद के लिये मुफ्त में एक कंसर्ट किया था और वामपंथियों के एक धड़े ने इस आयोजन का विरोध भी किया था। मुद्राराक्षस ने सारिका के किसी अंक में इस आयोजन के खिलाफ एक कड़ी टिप्पणी लिखी थी।

बहरहाल किसी सरकारी माध्यम में मैंने जगजीत साहब की जो पहली ग़ज़ल सुनी थी वो निदा फाजली की सूफियाना मूड वाली एक मशहूर ग़ज़ल थी, “गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला, चिड़ियों को दाने बच्चों को गुड़धानी दे मौला।” बाद में यह ग़ज़ल ‘इनसाइट’ अलबम में आयी थी, जो उन्होंने निदा फाजली के साथ किया था। निदा फाजली कहते हैं कि जगजीत न केवल अच्छे गायक थे बल्कि बहुत अच्छे इंसान थे और हमेशा जरूरतमंद शायरों-गायकों को किसी न किसी रूप में मदद दिया करते थे। फिल्मी गीतों में जिस तरह से आर.डी. बर्मन ने पश्चिमी वाद्यों का बहुत खूबसूरती के साथ उपयोग किया वही काम जगजीत साहब ने ग़ज़लों के साथ किया। लेकिन आगे चलकर मुझे यह महसूस हुआ कि आर्केस्ट्रा जगजीत साहब की ग़ज़लों पर हॉवी हो रहा है। खासतौर पर तब जबकि लंदन के किसी स्टूडियों में उन्होंने डिजीटल तकनीक के साथ “बियॉंन्ड टाइम’” नामक अलबम की रिकार्डिंग की थी।

औरों का नहीं पता, मैने यह स्पष्ट महसूस किया कि तकनीक कला पर हॉवी हो गयी है और जगजीत साहब पर से आस्था कुछ उठती हुई-सी मालूम पड़ी। यह अस्सी के दशक का उत्तरार्द्ध था, जबकि पूवार्द्ध में “प्रेमगीत” में उन्हीं के गाये एक गीत “होठों से छू लो तुम” व “अर्थ” की ग़ज़लों के कारण देश में ग़ज़लों का फैशन-सा चल पड़ा था। जाहिर है कि इस ज्वार के बाद ग़ज़लों के उफान को तो उतरना ही था, लेकिन ‘बियॉन्ड टाइम’ ने मेरे सामने एक प्रश्न खड़ा किया कि क्या जगजीत-चित्रा ने ग़ज़लों की दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दे दिया है और अब वे ढलान पर हैं? यहां पर बहुत दुःख के साथ कहना पड़ता है कि कला की नयी उंचाइयों को छूने से पहले जगजीत साहब को व्यक्तिगत तौर पर एक बहुत बड़े सदमें से गुजरना पड़ा।

जगजीत साहब तो खैर उबर भी गये, बाबू (विवेक सिंह, जगजीत चित्रा के इकलौते बेटे) के असमय चले जाने से संगीत की दुनिया से चित्रा सिंह ने अपने आपको पूरी तरह से काट लिया। कैसी विडंबना थी कि जो चित्रा जगजीत के साथ-साथ गाती दिखाई पड़ती थीं, उन्हीं चित्रा को मैंने जगजीत के एक कंसर्ट में गहरी उदासी के साथ उन्हें सुनते हुए देखा था और जगजीत साहब एक ऐसा गाना गा रहे थे, जिसमें एक मां मिट्टी के पुतले से अपने जी को बहला रही है। “समवन समव्हेयर” को चित्रा-जगजीत ने बाबू को समर्पित किया था पर यहां भी आर्केस्ट्रा के स्वर कुछ ज्यादा ही तीव्र हो गये थे। 1991 या 92 की बात है जब लता मंगेशकर के साथ एच.एम.व्ही. ने जगजीत के दो कैसेटों का अलबम ‘सजदा’ जारी किया था और कहना न होगा कि किस तरह से जगजीत सिंह ने अपनी निजी तकलीफ को रचनात्मक उंचाइयों के साथ बेहद मार्मिक कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की थी।

जो भी जगजीत को लगातार सुन रहे थे वे समझ रहे थे कि यह किसके लिये कहा जा रहा है: “जाकर जहां से कोई वापस नहीं है आता, वो कौन सी जगह है अल्लाह जानता है” या फिर “दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह, या फिर मुझको दीवाना कर दे या अल्लाह।” इतना ही नहीं, इस अलबम में गालिब की इस ग़ज़ल को रिपीट भी किया गया, “दिल ही तो है न संगो खिश्त दर्द से भर न आये क्यों, रोयेंगे हम हजार बार कोई हमें सताये क्यों।” सजदा जैसे अलबम सदियों में एकाध ही आते हैं। निजी जीवन की त्रासदियों पर शोध करने वाले किसी भी स्कालर के लिये इस सवाल से जूझना बेहद मुश्किल होगा कि किस तरह चित्रा ने अपने दर्द को मौन रखकर साधा और जगजीत ने मुखर होकर। बकौल शायर, “जख्म जब भी कोई जख्मे-दिल पर लगा, जिंदगी की तरफ एक दरीचा खुला / हम भी गोया किसी साज के तार हैं, चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे।”

…जारी…

इसके पहले के दोनों पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें- पार्ट एक और पार्ट दो

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

मैं एचआर महुआ से बोल रहा हूं, आज से आपकी सेवाएं समाप्त

ट्रिन ट्रिन की घंटी बजी तो मोबाइल स्क्रीन पर महुआ न्यूज़ के नॉएडा ऑफिस के फोन नंबर को देख कर लखनऊ में महुआ की लांचिंग से जुड़े प्रवेश रावत ने फोन रिसीव कर जैसे ही हेलो कहा, उधर से आवाज आई- मैं एचआर महुआ न्यूज़ से बोल रहा हूं. प्रवेश जी, आज से आपकी सेवाएं समाप्त की जाती हैं. इतनी से बातचीत के बाद संवाद खत्म. इसको सुन कर प्रवेश के पैरों तले से जमीन खिसक गयी.

लखनऊ ब्यूरो में पहली नियुक्ति प्रवेश की हुयी थी. तब शायद किसी को ये पता नहीं था कि प्रवेश अपने हैंडीकैम से ही पीटीसी करा कर कुमार सौवीर के नेतृत्व में जीतोड़ मेहनत से महुआ को प्रदेश में पहचान दिलाएंगे. प्रवेश उनमें से हैं जिन्होंने तीन हजार रुपये से महुआ में नौकरी शुरू की और वो दिन भी देखे हैं जब लोग महुआ के बारे में हिकारत से कहते थे कि ये लोकल चैनल कब आ गया. ऐसे दौर में प्रवेश ने महुआ को पहचान दिलाई.

प्रवेश ने अपने और चैनल के संघर्ष के दिनों में कभी हार नहीं मानी. पर महुआ प्रबंधन ने एक बार फिर इतिहास दोहराया और कुमार सौवीर जैसे ईमानदार व्यक्ति के बाद प्रवेश रावत को भी महुआ से अलग कर दिया. इस तरह महुआ प्रबंधन ने प्रवेश रावत की मासूम बेटी के मुंह से निवाला छीनने का काम किया है. तीन साल से ज्यादा की सेवा में कैमरामैन रहे प्रवेश के व्यवहार और उसकी काम की तरीफ शायद ही किसी ने ना की हो. पर महुआ प्रबंधन को जाने क्या हो गया है. बिना कारण बताए पुराने और भरोसेमंद लोगों को बाहर निकाल दे रहा है.

कुमार सौवीर के बाद अगर लखनऊ में महुआ को किसी के जरिए कोई जनता था तो वो प्रवेश ही हैं. लेकिन प्रबंधन ने उसकी मेहनत का सिला ये दिया है और एक फोन से ही बिना कारण बताये बाहर का रास्ता दिखा दिया. सूत्रों का कहना है कि महुआ लखनऊ में कार्यरत निशांत रंजन के ऊपर भी तलवार लटक रही है और उनको भी एक फोन में ही निपटाने की तैयारी है. खबर ये भी है कि रवि श्रीवास्तव को नयी जिम्मेदारियों से नवाजा गया है. अगर आपको भी कुछ पता हो तो हमें सूचित करें, bhadas4media@gmail.com फर मेल करके.

पी7न्यूज में उथल-पुथल तेज, रमन से विवाद के बाद हटे राहिल

पीपी7न्यूज से खबर है कि आउटपुट हेड रमन पांडे से विवाद के बाद सीनियर वीडियो एडिटर राहिल चोपड़ा को दशहरा और दीवाली जैसे त्यौहार से ठीक पहले संस्थान से इस्तीफा देना पड़ा है. राहिल चोपड़ा इसके पहले एनडीटीवी और आजतक जैसे चैनलों में काम कर चुके हैं. खबर है कि पी7न्यूज में कई लोगों पर गाज गिराने की तैयारी है.

इसके अलावा इनपुट में कई नई भर्तियां हुई हैं. सहारा में सीनियर प्रोड्यूसर रहे गुरप्रीत सिंह ने एसोसिएट ईपी के रूप में ज्वाइन किया है. सूत्रों के मुताबिक वे अपने कुछ और लोगों को सहारा से पी7 में लाना चाहते हैं. इसके कारण इनपुट और आउटपुट से कुछ और लोगों को निकालने की तैयारी है. सूत्रों का कहना है कि चैनल की हालत लगातार खराब होने के कारण डायरेक्टर केसर सिंह को पीएसीएल कंपनी मैनेजमेन्ट की ओर से फिर अल्टीमेटम दे दिया गया है. इसीलिए पी7न्यूज में आजकल कुछ ज्यादा ही उथलपुथल है. पिछले कुछ समय में केसर सिंह ने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए कई प्रयोग किए, लेकिन चैनल अपना स्तर सुधार पाने में नाकाम रहा.

उल्टे लगातार ज्योतिष और दूसरे चैनलों से नकल कर तैयार किए कार्यक्रमों से चैनल की रही सही विश्वसनीयता भी दांव पर लग गई. इसके लिए जिम्मेदार आउटपुट हेड रमन पांडे और इनपुट हेड राजेश कुमार बताए जाते हैं. बीबीसी से आए एडिटर सतीश जैकब भी चैनल को चलाने के रवैये से खुश नहीं हैं. उन्होंने टॉ़प मैनेजमेन्ट को अपनी तरफ से सारी स्थितियों से अवगत करा दिया है. उधर, खबर है कि पी7न्यूज के महाराष्ट्र के स्ट्रिंगरों को सेलरी नहीं दी जा रही है. इससे पी7न्यूज की छवि पर असर पड़ रहा है. दीवाली और दशहरा जैसे त्योहार होने के बावजूद पी7न्यूज प्रबंधन अपने स्ट्रिंगरों को तयशुदा मानदेय नहीं दे रहा है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

राजेंद्र जोशी नहीं दे रहे हैं सेलरी के चौंतीस हजार रुपये

: नए लोग मीडिया में आएं तो हरामियों से निपटना भी सीखकर आएं : सेवा में, संपादक जी, bhadas4media, महोदय, चार महीनो से मैं डिप्रेशन में आ चुका हूँ. मुझे लगता है कि जब तक मैं अपनी पूरी भड़ास न निकाल लूँ, मुझे सुकून नहीं मिलेगा. इसलिए मैं आज अपनी आपबीती आपके पोर्टल के जरिये सबको बताना चाहता हूँ ताकि मेरे साथ साथ मेरे दूसरे साथी भी इस खबर को पढ़ कर हकीकत जान सकें.

यशवंत जी, मेरा नाम मानव सिंह रावत है. मैं जैन टीवी, उत्तराखंड में काम करता था. यहां के प्रभारी राजेन्द्र जोशी थे. उनकी निशंक जी से अच्छी खासी सांठगाँठ थी. इसके चलते उन्होंने जैन टीवी को उनकी एम्बुलेंस चलाने का ठेका उत्तराखण्ड में दिलवा दिया. साथ ही बदले में उत्तराखंड में जैन टीवी का एक स्लाट ले लिया. इसमें उनको स्टाफ की जरूरत पड़ी. तब हमको भी बुलाया गया. बड़ी-बड़ी बातें की गईं. बड़े-बड़े आश्वासन देकर हमें जैन टीवी के उत्तराखंड वाले स्लाट में काम करने को कहा गया क्योंकि उत्तराखंड में स्लाटों की कई दुकाने हैं जहां सेलरी देने में कई बार ना नुकर होती है. तब मैंने राजेन्द्र जोशी जी से कहा कि ऐसा हमारे साथ ना हो तो जोशी जी ने कहा- चिंता मत करो, मैं हूं ना, मुझ पर भरोसा नहीं है क्या.

उनके इस झूठे आश्वासन पर मैंने काम करना शुरू कर दिया. चार महीनों तक काम करने के बाद जब मेरी कुल सेलरी 34000 रुपये नहीं आई तो मजबूरन नौकरी छोड़नी पड़ी. अब मैं मुबई में एक प्रोडक्शन हाउस में काम कर रहा हूं. मगर मेरी आर्थिक स्थिति बड़ी खराब है. मैंने जोशी जी को भी कहा मगर वो हमेशा झूठ बोलकर टाल देते हैं. अभी मुख्यमंत्री निशंक बदले तो जोशी जी भी उत्तराखंड से हट गए. जब मैं उनसे अपनी सेलरी मांगने के लिए फोन करता हूं तो वो फोन नहीं उठाते. दिल्ली के लोग भी हमारी सेलरी नहीं दे रहे हैं. बार बार मिन्नत करके मैं थक गया हूं. नौकरी छोड़ते वक्त मैंने सेलरी मांगी तो मिल जाएगी कहकर बात टाल दी. तब से लेकर अब तक मैं लगातार अपनी मेहनत की कमाई मांग रहा हूं मगर मुझे बार बार गुमराह कर ये लोग बेवकूफ बना रहे हैं.

जोशी जी कहते हैं कि दिल्ली में संतोष से बात करो. संतोष से कहता है कि दिलीप से बात करो. दिलीप कहता है कि राजेन्द्र जोशी जी के अकाउंट में डाल दी है, जोशी जी से बात करो. जोशी जी कहते हैं कि मेरे अकाउंट में कोई पैसा नहीं आया है वापस सन्तोष को फोन करो. तो इस तरह से सबने घुमा कर रख दिया है. अब आपके माध्यम से सभी जिम्मेदार लोगों से गुजारिश करना चाहता हूं कि हमारी सेलरी दिलवा दो. हमारी मेहनत को यूं बर्बाद ना होने दो. अब हमारे दिल से हर रोज बददुआऐं निकल रही हैं. किसी दिन लग गई तो बाद में उसका हमें भी दुख होगा. मेरी तरह मेरे और साथी भी चाहते हैं कि उनकी मेहनत की कमाई उनको मिले. मीडिया में आने वाले लोगों से निवेदन है कि इस लाइन में आने की ना सोचें और आएं तो हरामियों से निपटना भी सीखकर आएं.

Manavendra Singh Rawat (Manav)

bipinravat@gmail.com

संसाधनों के अभाव से जूझ रहे हैं सीएनईबी के ब्यूरो, मयूर जानी का इस्तीफा

: अब न्यूज एक्सप्रेस के लिए अहमदाबाद से रिपोर्टिंग करेंगे मयूर जानी : सीएनईबी के अहमदाबाद ब्यूरो से मयूर जानी ने इस्तीफा दे दिया है. वे न्यूज एक्सप्रेस के ब्यूरोचीफ बनाए गए हैं. मयूर की सीएनईबी में दूसरी पारी थी. मयूर जानी राहुलदेव के समय में अहमदाबाद से सीएनईबी के लिए रिपोर्टिंग करते थे. अनुरंजन झा के सीओओ बनाए जाने के बाद मयूर ने इस्तीफा दे कर पी7 न्यूज चैनल ज्वाइन किया था.

अनुरंजन झा के सीएनईबी से हटाए जाने के बाद चेयरमैन की पहल पर मयूर ने पुन: सीएनईबी ज्वाइन किया था. मयूर जानी ने इस्तीफा देने से पहले एक पत्र चेयरमैन अमनदीप सरान को लिखा. इसमें उन्होंने विस्तार से बताया कि वो सीएनईबी में क्यों काम नहीं कर पा रहे है. माना जा रहा है कि सीएनईबी के नए एडिटर रजनीश प्रसाद के काम करने के तरीके से मयूर परेशानी में थे. मयूर ने कई बार पत्र लिख कर लैपटॉप की मांग की थी जिससे समय पर फीड भेजा जा सके. चैनल की ओर से डीवी और गाड़ी भी उपलब्ध कराए जाने की मांग की थी. परन्तु चैनल की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलने और असाइनमेंट डेस्क की ओर से समय पर फुटेज भेजने का दबाव ज्यादा होने की वजह से परेशान मयूर ने अपनी समस्या से चेयरमैन को अवगत करा दिया. पर जब बात नहीं बनी तो मयूर ने इस्तीफा दे दिया.

इस बीच उन्हें न्यूज एक्सप्रेस की तरफ से काम करने का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया. सूत्रों का कहना है कि सीएनईबी से कुछ और लोग इस्तीफा दे सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि सीएनईबी अपने ब्यूरो को डीवी (टेप), गाड़ी, फीड भेजने के लिए लैपटॉप, मोबाइल के बिल, इंटरनेट बिल नहीं दे रहा है. सभी ब्यूरो रिपोर्टर अपनी सेलेरी से इन खर्चों का भुगतान कर रहे हैं. गाड़ी के नाम पर प्रत्येक ब्यूरो को 12 हजार रुपये प्रति माह दिए जा रहे हैं और इसी में सभी खबरें भेजने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. इन समस्याओं के बावजूद कई ब्यूरो बेहतर काम कर रहे हैं लेकिन चैनल में आए कुछ एक वरिष्ठों के कारण कई लोग नाराज और परेशान हो रहे हैं. इनमें से कई लोग चैनल छोड़ सकते हैं.

सन टीवी के ठिकानों पर सीबीआई ने की छापेमारी

सीबीआई की कई टीमों ने सन टीवी के आफिसों पर छापे मारे हैं. इस चैनल के मालिक पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन हैं. दयानिधि के घर और दफ्तरों पर भी छापे पड़े हैं. छापे की जद में दयानिधि के भाई कलानिधि मारन भी हैं. सन टीवी पर छापेमारी के कारण इस चैनल के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई है. बताया जाता है कि सीबीआई ने रविवार देर रात दोनों मारन बंधुओं के साथ सन टीवी, एस्प्रो और मैक्सिस के खिलाफ एफआईआर दर्ज की.

इसके बाद सोमवार सुबह साढ़े सात बजे ही से ही छापों की कार्रवाई शुरू हो गई. सीबीआई प्रवक्ता धारिणी मिश्रा के मुताबिक सीबीआई ने मारन बंधुओं, राल्फ मार्शल और टी आनंदनकृष्णन तथा तीन कंपनियों के खिलाफ 120 बी, 13(2) और 13 (1) (डी) के तहत मामला दर्ज किया है. ये आरोप 9 अक्टूबर की रात रजिस्टर्ड किए गए, जिसके बाद छापे मारे जा रहे हैं.  चेन्नई में दयानिधि के घर के अलावा हैदराबाद, दिल्ली और कुछ अन्य जगहों पर भी छापे मारे गए हैं. यह कार्रवाई अभी जारी है. सीबीआई ने दयानिधि और कलानिधि के अलावा अस्ट्रो कंपनी के सीईओ राल्फ मार्शल और आनंदकृष्णन के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है. इन लोगों ने कलानिधि मारन के सन टीवी चैनल में निवेश किया था. दयानिधि मारन पर आरोप है कि उन्होंने दूरसंचार मंत्री रहते हुए मैक्सिस नाम की कंपनी को फायदा पहुंचाया.

सीबीआई के अनुसार दयानिधि मारन को 600 करो़ड़ रुपए की घूस मिली, जिसके एवज में उन्होंने कंपनी को फायदा पहुंचाया. एयरसेल-मैक्सिस कंपनी के बीच हुआ बड़ा सौदा विवाद में चल रहा था. गौरतलब है कि मैक्सिस कंपनी का नाम 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आया था. दयानिधि मारन ने कुछ ही समय पहले कप़डा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. माना जा रहा है कि अगर दयानिधि और कलानिधि मारन को गिरफ्तार किया जाता है, तो द्रमुक और कांग्रेस के बीच रिश्तों में खटास आ जाएगी, क्योंकि पाटी के दो बड़े नेता ए राजा और द्रमुक प्रमुख की बेटी कनिमोई पहले से ही इस मामले में जेल में हैं.

उस रोज़ जगजीत भाई किसी दूसरे ही जग में थे

: हमेशा आसपास ही कहीं सुनाई देती रहेगी मखमली आवाज़ : बात थोड़ी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है। ठीक वैसे जैसे जगजीत सिंह की यादें कभी धुंधली नहीं होने वालीं। ठीक वैसे ही जैसे एक मखमली आवाज़ शून्य में खोकर भी हमेशा आसपास ही कहीं सुनाई देती रहेगी। जगजीत भाई यूएस में थे, वहीं से फ़ोन किया – ‘आलोक, कश्मीर पर नज़्म लिखो। एक हफ़्ते बाद वहां शो है, गानी है।’

मैंने कहा – ‘मगर में तो कभी कश्मीर गया नहीं। हां, वहां के हालाते-हाज़िर ज़रूर ज़हन में हैं, उन पर कुछ लिखूं.?’ ‘नहीं कश्मीर की ख़ूबसूरती और वहां की ख़ुसूसियात पर लिखो, जिनकी वजह से कश्मीर धरती की जन्नत कहा जाता है। दो रोज़ बाद  दिसंबर को इंडिया आ रहा हूं तब तक लिख कर रखना। सुनूंगा।’ जगजीत सिंह, जिन्हें कब से ‘भाई’ कह रहा हूं अब याद नहीं। भाई का हुक्म था, तो ख़ुशी के मारे पांव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। मगर वही पांव कांप भी रहे थे कि इस भरोसे पर खरा उतर भी पाऊंगा, या नहीं.? जगजीत भाई के साथ ‘इंतेहा’ (एलबम) को आए तब कुछ वक़्त ही बीता था।  फ़िज़ा में मेरे लफ़्ज़ भाई की मखमली आवाज़ में गूंज रहे थे और दोस्त-अहबाब पास आकर गुनगुना रहे थे- मंज़िलें क्या हैं रास्ता क्या है / हौसला हो तो फ़ासला क्या है.”

वो सर्दी से ठिठुरती रात थी। दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट का मुशायरा था। डाइज़ शायरों से सजा था। रात के कोई ग्यारह बजे होंगे। मैं दावते-सुख़न के इंतज़ार में था कि तभी मोबाइल घनघनाया। वादे के मुताबिक़ जगजीत भाई लाइन पर थे और मैं उस नज़्म की लाइनें याद करने लगा जो सुबह ही कहीं थीं। ‘हां, सुनाओ, कहा कुछ.?’ ‘जी, मुखड़े की शक्ल में दो-चार मिसरे कहे हैं।’ ‘बस, दो-चार ही कह पाए… चलो सुनाओ।’ मैंने डरते हुए अर्ज़ किया –

पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झिलों के ज़ेवर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

‘हां अच्छा है, इसे आगे बढ़ाओ।’ जो जगजीत भाई को क़रीब से जानते थे, वो ये मानते होंगे कि उनका इतना कह देना ही लाखों दानिशमंदों की दाद के बराबर होता था। ‘जी, परसों संडे है, उसी दिन पूरी करके शाम तक नोट करा दूंगा।’ उनके ज़हन में जैसे कोई क्लॉक चलता है, सोचा और बोले – ‘अरे उसके दो रोज़ बाद ही तो गानी है, कम्पोज़ कब करूंगा। और जल्दी कहो।’ मगर मैंने थोड़ा आग्रह किया तो मान गए। दो रोज़ बाद फ़ोन लगाया तो कार से किसी सफ़र में थे ‘क्या हो गई नज़्म, नोट कराओ।’ मैंने पढ़ना शुरू किया –

पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झिलों के ज़ेवर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र

यहां के बशर हैं फ़रिश्तों की मूरत
यहां की ज़बां है बड़ी ख़ूबसूरत
यहां की फ़िज़ा में घुली है मुहब्बत
यहां की हवाएं भी ख़ुशबू से हैं तर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र

ये झीलों के सीनों से लिपटे शिकारे
ये वादी में हंसते हुए फूल सारे
यक़ीनों से आगे हसीं ये नज़ारे
फ़रिश्ते उतर आए जैसे ज़मीं पर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र

सुख़न सूफ़ियाना, हुनर का ख़ज़ाना
अज़ानों से भजनों का रिश्ता पुराना
ये पीरों फ़कीरों का है आशियाना
यहां सर झुकाती है क़ुदरत भी आकर
ये कश्मीर क्या है
है जन्नत का मंज़र

‘अच्छी है, मगर क्या बस इतनी ही है.?’ मैंने कहा – ‘जी, फ़िलहाल तो इतने ही मिसरे हुए हैं।’ ‘चलो ठीक है। मिलते हैं।’

एक बर्फ़ीली शाम 4 बजे श्रीनगर का एसकेआईसीसी ऑडिटोरियम ग़ज़ल के परस्तारों से खचाखच भरा, ग़ज़ल गायिकी के सरताज जगजीत सिंह का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। कहीं सीटियां गूंज रहीं थीं तो कहीं कानों को मीठा लगने वाला शोर हिलोरे ले रहा था और ऑडिटोरियम की पहली सफ़ में बैठा मैं, जगजीत भाई की फ़ैन फ़ॉलॉइंग के इस ख़ूबसूरत नज़ारे का गवाह बन रहा था।

जगजीत जी स्टेज पर आए और ऑडिटोरियम तालियों और सीटियों की गूंज से भर गया और जब गुनगुनाना शुरू किया तो माहौल जैसे बेक़ाबू हो गया। एक के बाद एक क़िलों को फ़तह करता उनका फ़नकार हर उस दिल तक रसाई कर रहा था जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ून ही गर्दिश कर सकता है। उनकी आवाज़ लहू बन कर नसों में दौड़ने लगी थी। जग को जीतने वाला जगजीत का ये अंदाज़ मैने पहले भी कई बार देखा था लेकिन उस रोज़ माहौल कुछ और ही था। उस रोज़ जगजीत भाई किसी दूसरे ही जग में थे। ये मंज़र तो बस वहां तक का है जहां तक उन्होंने ‘कश्मीर नज़्म’ पेश नहीं की थी। दिलों के जज़्बात और पहाड़ों की तहज़ीब बयां करती जो नज़्म उन्होंने लिखवा ली थी उसका मंज़र तो उनकी आवाज़ में बयां होना अभी बाक़ी था।

मगर जुनूं को थकान कहां होती.? अपनी मशहूर नज़्म वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी के पीछे जैसे ही उन्होंने पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर बिछाई पूरा मंज़र ही बदल गया। हर मिसरे पर ‘वंसमोर, वंसमोर’ की आवाज़ ने जगजीत भाई को बमुश्किल तमाम आगे बढ़ने दिया। आलम ये रहा कि कुल जमा सोलह मिसरों की ये नज़्म वो दस-पंद्रह मिनिट में पूरी कर पाए।

दूसरे दिन सुबह श्रीनगर के सारे अख़बार जगजीत के जगाए जादू से भरे पड़े थे। एक दैनिक समाचार में ‘ये कश्मीर क्या है, है जन्नत का मंज़र’ की हेड लाइन थी और ख़बर में लिखा था – ”पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर / चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर / हसीं वादियों में महकती है केसर / कहीं झिलमिलाते हैं झिलों के ज़ेवर / ये कश्मीर क्या है, है जन्नत का मंज़र आलोक श्रीवास्तव के इन बोलों को जब जगजीत सिंह का गला मिला तो एसकेआईसीसी का तापमान यकायक गरम हो गया। ये नज़्म की गर्मी थी और सुरों की तुर्शी। ऑडिटोरियम के बाहर का पारा माइनस में ज़रूर था मगर अंदर इतनी तालियां बजीं कि हाथ सुर्ख़ हो गए। स्टीरियो में कान लगाकर सुनने वाले घाटी के लोग और जगजीत सिंह बुधवार को यूं आमने-सामने हुए।”

बात थोड़ी पुरानी हो गई है। लेकिन बात अगर तारीख़ बन जाए तो धुंधली कहाँ होती है। ठीक वैसे जैसे जगजीत सिंह की यादें कभी धुंधली नहीं होने वालीं। ठीक वैसे ही जैसे एक आलोक श्रीवास्तवमखमली आवाज़ शून्य में खोकर भी कहीं आसपास ही सुनाई देती रहेगी। आमीन।

लेखक आलोक श्रीवास्तव चर्चित युवा शायर और साहित्यकार हैं. बतौर टीवी जर्नलिस्ट वे इन दिनों आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत हैं. उनसे संपर्क 09899033337 के जरिए किया जा सकता है.

यूपी प्रेस क्‍लब यानी धंधा ठगी और बटमारी का

: के. विक्रमराव के दस्‍तखत से जारी प्रेसनोट पर छिड़ा विवाद : राव बोले- मेरी छवि धूमिल करने के लिए जारी हुआ फर्जी पत्र : मायावती से प्रेसक्‍लब पर रिसीवर बिठाये जाने की मांग : प्रेसनोट में वही तथ्‍य हैं जो विक्रमराव के पत्र में थे : लखनऊ : यूपी प्रेस क्‍लब लगातार विवादों में घिरता जा रहा है। अब तो इसके वर्चस्‍व को लेकर ठगी और बटमारी का धंधा भी खूब फलने-फूलने लगा है।

ताजा मामला है चाइना बाजार गेट स्थित इसके भवन को लेकर। आईएफडब्‍ल्‍यूजे के अध्‍यक्ष के विक्रमराव के दस्‍तखत से जारी एक बयान में मुख्‍यमंत्री मायावती से अपील की गयी है कि पत्रकार माफियाओं की करतूतों के चलते धोखाधड़ी का केंद्र बन चुके इस प्रेस क्‍लब पर रिसीवर बिठाया जाए। हालांकि के विक्रमराव इस खत को फर्जी करार देते हैं। उनका कहना है कि प्रेस क्‍लब पर काबिज लोगों ने उनकी छवि पत्रकार और श्रमिक विरोधी बनाने के अपने गंदे अभियान के तहत यह फर्जी प्रेसनोट जारी कराया है।

उनका कहना है कि वे इस मामले में पुलिस के हजरतगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज करायेंगे। लेकिन इस दावे के तीन दिन बीत जाने के बावजूद अब तक उन्‍होंने रिपोर्ट नहीं लिखायी है। हालांकि इस प्रेसनोट में दिये गये तथ्‍यो का विक्रमराव अपने एक पत्र में खुलासा कर चुके हैं। बहरहाल, इस प्रेसनोट के मुताबिक कुछ स्‍वार्थी तत्‍वों ने प्रेस क्‍लब को अपनी जागीर बना डाला है और प्रदेश के पत्रकारों के नाम पर प्रेसक्‍लब से ही अवैध कार्यों को अंजाम देकर अपनी जेबें भर रहे हैं। पत्र के अनुसार यूपी प्रेस क्‍लब की गवर्निंग काउंसिल के सदस्‍य के विक्रमराव ने मुख्‍यमंत्री मायावती को एक पत्र भेज कर कहा है कि प्रेस क्‍लब पर सभी पत्रकारों का समान हक है और राज्‍य मुख्‍यालय पर मान्‍यता प्राप्‍त सभी पकारों को इसका सदस्‍य बनाया जाए।

पत्र के अनुसार इस भवन पर राजय सरकार का स्‍वामित्‍व है और इसकी लीज दशकों पहले ही खत्‍म हो चुकी है। प्रेसनोट के अनुसार विक्रमराव ने शासन से इस पर रिसीवर नियुक्‍त करने की मांग की है और कहा है कि राज्‍य मुख्‍यालय पर मान्‍यताप्राप्‍त सभी पत्रकारों को क्‍लब का सदस्‍य बनाकर वो‍टरलिस्‍ट दुरूस्‍त कराते हुए शासन को चाहिए कि वह अपनी देखरेख में तुरन्‍त चुनाव सम्‍पन्‍न कराये। इस प्रेसनोट के अनुसार विक्रमराव ने कहा है कि दिल्‍ली, कलकत्‍ता, चंडीगढ़, इंदौर, आगरा और कानपुर के प्रेस क्‍लबों ने सभी पत्रकारों को सदस्‍य बना रखा है। जबकि लखनऊ में ऐसा नहीं है। यहां राज्‍य मुख्‍यालय पर 350 पत्रकार मान्‍यताप्राप्‍त हैं लेकिन यूपी प्रेसक्‍लब के सदस्‍यों की संख्‍या पिछले बीस बरसों से महज 150 पर ही लटकी हुई है। इनमें भी राज्‍य मुख्‍यालय पर मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार केवल 50 ही है।

प्रेसनोट के अनुसार क्‍लब के बाकी सदस्‍य पत्रकारों में अपराधी, बिजनेसमैन, दलाल और शराबी लोगों को सदस्‍य बनाया गया है। प्रेसनोट के अनुसार प्रेसक्‍लब के वर्तमान अध्‍यक्ष रवींद्र कुमार सिंह, मंत्री जोखूप्रसाद तिवारी ने पिछले 12 बरसों से प्रेस क्‍लब पर कब्‍जा कर रखा है और पार्किंग माफिया की तरह फुटपाथ पर अतिक्रमण करके दो खोमचेवालों से 32 हजार रूपया महीना किराया वसूल रहे हें। साथ ही प्रेस क्‍लब के हाल, लान और कमरों को किराये पर उठाकर हर महीना लाखों रूपयों का गोलमाल कर रहे हैं। गुरुवार की शाम के विक्रमराव के हस्‍ताक्षर वाला यह प्रेसनोट अखबारों के दफ्तर पहुंचा तो कुछ पत्रकारों ने विक्रमराव से इसकी कैफियत पूछी।

विक्रमराव का कहना था कि यह प्रेसनोट फर्जी है और उन्‍होंने ऐसा कोई भी प्रेसनोट जारी ही नहीं किया। उन्‍होंने ऐलान किया कि इस षडयंत्र के खिलाफ वे पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करायेंगे। लेकिन अंतिम सूचना मिलने तक उनकी ओर से ऐसी कोई भी कार्रवाई नहीं की गयी है। आश्‍चर्य की बात तो यह है कि इस प्रेसनोट में उन्‍हीं सारे आरोपों का संक्षिप्‍त ब्‍योरा है जो विक्रमराव के उस पत्र में था जिसका खुलासा वे जोखूप्रसाद तिवारी और रवींद्र सिंह को लिखे अपने पत्र में कर चुके हैं।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने और बेबाक पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में काम करने के बाद इन दिनों एस टीवी में यूपी ब्‍यूरो प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

आठ साल में लिखी किताब का आठ तारीख को आठ संपादकों द्वारा लोकार्पण

टेलीविजन न्यूज चैनलों की भाषा पर सिलसिलेवार और गंभीर तरीके से लिखी गई एक किताब का विमोचन टेलीविजन और प्रिंट जगत के आठ संपादकों ने किया। टीवी के वरिष्ठ पत्रकार और IBN7 में कार्यरत एसोसिएट एक्जिक्यूटिव प्रोड्यूसर हरीश चंद्र बर्णवाल की किताब “टेलीविजन की भाषा” का विमोचन समारोह 8 अक्टूबर को दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित किया गया।

किताब के लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि भारत सरकार में संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला रहे, वहीं टेलीविजन की कई दिग्गज हस्तियां इसमें शरीक हुईं। इसमें IBN नेटवर्क के एडिटर इन चीफ राजदीप सरदेसाई, आज तक के न्यूज डायरेक्टर कमर वाहिद नकवी, इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी, IBN7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष, जी न्यूज के एडिटर सतीश के सिंह, न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम न सिर्फ इसमें शामिल हुए बल्कि हरीश बर्णवाल की किताब को लेकर अपने विचार भी रखे। हरीश बर्णवाल की किताब “टेलीविजन की भाषा” के ऊपर हुई परिचर्चा में दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर श्रवण गर्ग और पायनियर के संपादक और मैनेजिंग डायरेक्टर चंदन मित्रा भी शामिल हुए।

हरीश चंद्र बर्णवाल की किताब “टेलीविजन की भाषा” के बारे में बोलते हुए केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने कहा कि इससे टेलीविजन के विद्यार्थियों को ही नहीं बल्कि पेशेवर पत्रकारों को भी फायदा होगा। शुक्ला ने कहा कि देश भर में मीडिया के संस्थान भले ही बढ़ गए हों…. लेकिन उस तरह से किताबें अब तक नहीं लिखी जा सकी हैं। केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला के मुताबिक इस कमी की पूर्ति हरीश बर्णवाल की ये किताब करेगी। दिग्गज पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने किताब के बारे में बताया कि जब ये किताब उन्होंने पढ़ना शुरू किया तो उन्हें बेहद फायदा मिला क्योंकि खुद उनकी भी हिन्दी काफी कमजोर है।

राजदीप के मुताबिक मीडिया से जुड़े हर शख्स को ये किताब जरूर पढ़नी चाहिए। आज तक के न्यूज डायरेक्टर कमर वाहिद नकवी ने भी किताब की तारीफ करते हए कहा कि हरीश बर्णवाल ने इस किताब के माध्यम से जो ईमानदार कोशिश की है… उससे मीडिया में काम कर रहे लोगों को भरपूर फायदा होगा। नकवी ने किताब में दिए गए तमाम उदाहरणों की चर्चा करते हुए कहा कि मीडिया के विद्यार्थियों के लिए इस समय इस तरह की बेहद जरूरत थी। वहीं IBN7 के मैनेजिंग एडिटर ने लेखक की मेहनत की तारीफ की कि मीडिया में व्यस्त समय होने के बावजूद लेखक पिछले 8-9 साल से इस लेखन काम में जुटे रहे।

जी न्यूज के संपादक सतीश के सिंह ने किताब के बहाने टेलीविजन न्यूज चैनलों की भाषा पर सवाल भी उठाए और सार्थक बहस की शुरुआत करने की कोशिश की। वहीं इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी ने एसपी सिंह को याद करते हुए कहा कि टीवी की भाषा जितनी सरल हो, उतना बेहतर है। न्यूज24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम ने भी हरीश बर्णवाल की किताब को लेकर शुरू हुई इस सार्थक परिचर्चा में भाग लेते हुए कहा कि भाषा को लेकर टीवी पत्रकारों को बेहद संयमित होने की जरूरत है।

इस परिचर्चा में टीवी इंडस्ट्री के अलावा प्रिंट के भी दिग्गज संपादकों ने हिस्सा लिया। सांसद और पायनियर के संपादक चंदन मित्रा ने किताब की तारीफ करते हुए कहा कि आज भाषा का स्वरूप जिस तरह से बिगड़ता जा रहा है, उसे बचाने में इस किताब से काफी मदद मिलेगी। मित्रा ने कहा कि जिस तरह से हम हिन्दी भाषा को छोड़कर दूसरी भाषाओं के शब्द लेते जा रहे हैं, उससे बचना चाहिए। विमोचन समारोह में बोलते हुए दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर श्रवण गर्ग ने भी माना कि न्यूज चैनलों की भाषा में बेहद सुधार की जरूरत है।

कार्यक्रम के आखिर में लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल ने सबका आभार जताया और बताया कि इस किताब को लिखने में कम से कम 8 साल का वक्त लगा है। लेखक के मुताबिक इतना लंबा वक्त लगाने का एक ही मकसद था कि न सिर्फ मीडिया के विद्यार्थियों को इसका फायदा मिले, बल्कि वो टीवी मीडिया में आने से पहले ही स्क्रिप्टिंग और भाषा को लेकर बारीक से बारीक चीजों के बारे में समझ सकें। यही नहीं जिस तरह से एक मंच पर टीवी और प्रिंट जगत के दिग्गज संपादक जमा हुए, लेखक के मुताबिक टीवी पत्रकारिता की भाषा को लेकर उनका एक बड़ा सपना पूरा हुआ। प्रेस रिलीज

सीवीबी में सेलरी न मिलने के कारण असंतोष, मीडियाकर्मी पुलिस के पास गए

यशवंत देशमुख वाली टीवी न्यूज एजेंसी सी वोटर ब्राडकास्टिंग उर्फ सीवीबी से खबर आ रही है कि इसके इंप्लाइज ने कई महीनों से सेलरी न मिलने के कारण कानूनी कार्रवाई की तरफ रुख कर लिया है. मुंबई से आ रही सूचना के खिलाफ वहां के कैमरामैनों व रिपोर्टरों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी है. मुंबई में सीवीबी स्टाफ में कुल छह लोग हैं. एक ब्यूरो चीफ, तीन रिपोर्टर और दो कैमरामैन.

रिपोर्टरों व कैमरामैनों ने मुंबई के विले पार्ले पुलिस स्टेशन में शिकायत दी है कि उनको कई माह से वेतन नहीं दिया जा रहा है और जबरन काम कराया जा रहा है जिसके कारण वे अब मौत के कगार पर पहुंच चुके हैं. जब ये लोग प्रबंधन से सेलरी की बात करते हैं तो सभी एक दो दिन रुकने की बात कहकर टाल देते हैं. आज कल आज कल करते हुए अब अक्टूबर का महीना आ चुका है. अगस्त महीने से यही कहकर लोगों को मूर्ख बनाया जा रहा है. एचआर के लोग भी एक दो दिन रुकने की बात कहकर लोगों को बरगलाने में लगे रहते हैं. जब पुलिस में जाने की धमकी दी गई तो प्रबंधन ने सिर्फ एक महीने की सेलरी देने की बात कही. यह सुनकर मुंबई के सीवीबी कर्मी भड़क गए और पुलिस में चले गए.

मुंबई में सीवीबी के ब्यूरो चीफ सुभाष शिर्के हैं. सीवीबी, मुंबई के स्टाफ ने यशवंत देशमुख और सुभाष शिर्के खिलाफ लिखित शिकायत दी है. कर्मियों का आरोप है कि सुभाष शिर्के और शैलेंद्र सिंह की प्रबंधन से सेटिंग है, इसलिए ये लोग भी स्टाफ को सेलरी के लिए रुकने की बात कहते रहते हैं. भड़ास4मीडिया को फोन पर सीवीबी, मुंबई के एक कर्मी ने बताया कि अब सेलरी के लिए आरपार की लड़ाई होगी. दशहरा और दीवाली जैसे त्योहार सिर पर हैं. दशहरा तो बीत भी चुका. ऐसे में अब हम अपनी दीवाली काली नहीं करना चाहते.

एसपी मंजिल सैनी की बर्बरता की तस्वीरें : जबरा मारे और रोवे भी न दे

एक कहावत है. भोजपुरी इलाकों में कही जाती है. जबरा मारे और रोवे भी न दे. यही हाल कुछ अभिनव के साथ घटित हो रहा है. एसपी ने उन्हें पीटा. जमकर पिटवाया. जब अभिनव ने पिटाई के खिलाफ शिकायत की तो उन्हें अब फिर से धमकाया जा रहा है और बुरी तरह फंसा देने की धमकियां दी जा रही हैं. माजरा यूपी का ही है. जिला है फिरोजाबाद. पर अभिनव ने लड़ने की ठानी है.

पुलिस के कहर और पुलिस के दुर्व्यवहार की बात हम हमेशा सुनते और देखते रहते हैं. पुलिस उत्पीड़न की ज्यादातर शिकायतें निचले लेवल के पुलिस वालों के खिलाफ होती हैं. पर जब ऐसा आरोप पुलिस के किसी उच्चाधिकारी के खिलाफ हो, जिसके कंधों पर रक्षा करने और मानवाधिकारों का ध्यान रखने का भार हो तो प्रकरण वाकई गंभीर हो जाता है. खासकर जब आरोप किसी जनपद में कार्यरत महिला पुलिस अधीक्षक पर हो तब तो मामला निश्चित रूप से बेहद गंभीर हो जाता है.

यहां मैं एक ऐसा ही वाकया पेश कर रही हूं. यह प्रकरण मानावाधिकार हनन और पुलिस अत्याचार का गंभीर उदाहरण है.  मामला उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जनपद की पुलिस का है. पुलिस वाले धमका कर एक व्यक्ति पर इसलिए दबाव बना रहे हैं ताकि वह उस जिले की पुलिस अधीक्षक मंजिल सैनी के खिलाफ किये गए शिकायत को वापस ले ले. इस भारी दबाव के बीच जी रहे सज्जन का नाम है अभिनव चतुर्वेदी. पुलिस वाले एसपी साहिबा के खिलाफ दर्ज केस वापस नहीं लेने पर कई अन्य फर्जी मामलों में फंसा देने की धमकी दे रहे हैं.

अब थोड़ा पीड़ित अभिनव चतुर्वेदी के बारे में जान लें. अभिनव फिरोजाबाद के सम्मानित और पुराने परिवार से संबंधित हैं. मेरी उनसे जान-पहचान मेरे पति अमिताभ की फिरोजाबाद जिले में पोस्टिंग के दौरान हुई. मेरी उनके बारे में राय है कि वे फिरोजाबाद के सज्जन और जिम्मेदार लोगों में से हैं. अभिनव यदा-कदा अमिताभ से मिलने आया करते थे. वे कांग्रेस पार्टी के पुराने नेता भी हैं. हालांकि वे नेता कम, भले व भरोसेमंद आदमी ज्यादा हैं. इसी कारण वे वैसी नेतागिरी नहीं कर पाते जैसी राजनीति आजकल कई लोग करते दिख जाते हैं.

अभिनव यानि शरीर से भारी भरकम और चेहरे से शरीफ. यही उनकी प्रथम दृष्टया पहचान है. अभिनव पहली नजर में ही शरीफ घर और सभ्य संस्कार वाले आदमी लगते हैं. उनके बैकग्राउंड और स्वभाव को देखते हुए उनसे कोई गुंडागर्दी, तोड़फोड़, मारपीट, दंगाई जैसे आचरण की अपेक्षा कर ही नहीं सकता. उनके साथ एक वाकया घटित हुआ. अभिनव एक रोज कांग्रेस के एक धरने में शामिल हुए. घटना इसी साल के बारह मई की है. धरने का एजेंडा था भट्टा पारसोल में राहुल गाँधी की गिरफ्तारी का विरोध. तब कॉंग्रेस ने प्रदेश-व्यापी धरना-प्रदर्शन रखा था. इसी क्रम में फिरोजाबाद में धरना हुआ. पुराने कॉंग्रेसी नेता होने के कारण अभिनव धरने में शामिल हुए.

धरने में भीड़ बढ़ने लगी. संभव है किसी ने उत्पात भी कुछ किया हो. पुलिस को तो मौका चाहिए था. लाठीचार्ज शुरू. पर अभिनव के मामले में पुलिस का रुख बेहद घटिया रहा. शरीर से भारी-भरकम अभिनव जहां बैठे थे, वहीं बैठे रह गए. उनकी भाग न पाने की मजबूरी का पुलिस ने दोहन किया. वह लाठीचार्ज के दौरान पुलिस वालों के निशाना पर आ गए. उन पर खूब लाठियां बरसाई गईं. मुझसे हुई बातचीत में उन्होंने कुछ ऐसा ही बताया. उन्हें चारों तरफ से घेर कर बहुत बेरहमी से मारा गया.  इसके कारण उन्हें सिर पर गंभीर चोटें आईं. पूरे शरीर पर कई जगह अत्यधिक चोटें आयीं.

मैंने स्वयं उनके द्वारा भेजे कुछ फोटो देखे हैं. इनमें उनके शरीर पर कई नीले निशान वाले चोट हैं. इससे जाहिर होता है कि उन्हें बर्बरतापूर्वक मारा गया. उस पर भी दुर्भाग्य यह कि यह सब वहां की पुलिस अधीक्षक मंजिल सैनी की उपस्थिति और सक्रिय भूमिका में हुआ. एसपी साहिबा ने खुद ही एक ऐसे आदमी को मारा जो उनके घेरे में चुपचाप खड़ा था. इस तरह मारे जाने और पिटने के बाद पहले उन्हें गिरफ्तार कर फिरोजाबाद के दक्षिण थाने में ले जाया गया पर. वहाँ उनके द्वारा खून की उल्टी होने पर मारे डर के पुलिस वालों द्वारा उसी दिन उन्हें पहले जिला अस्पताल, फिरोजाबाद और फिर हालत बिगड़ने पर एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा में भर्ती कराया गया.

अभिनव चतुर्वेदी ने ठीक होने के बाद इस सारे घटनाक्रम की शिकायत कई जगहों पर की जिसमे उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग भी शामिल था. इनमें एसपी मंजिल सैनी, क्षेत्राधिकारी टूंडला एसके मलिक और फिरोजाबाद दक्षिण के इन्स्पेक्टर आरपी सिंह तथा अन्य के विरुद्ध मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए गए. पिछले सप्ताह इस मामले में फिरोजाबाद की एसपी सहित तमाम अधिकारी मानवाधिकार आयोग में अपना बयान देने लखनऊ गए थे और इस सप्ताह आयोग की टीम द्वारा फिरोजाबाद जा कर मामले की आगे की तहकीकात करना संभावित है.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. आयोग में अपने अभिकथन देने के बाद फिरोजाबाद की पुलिस ने फिर से अभिनव चतुर्वेदी तथा अन्य गवाहों को टारगेट कर लिया है. इन लोगों को लगातार परेशान किया जा रहा है. उन पर कई तरह के दबाव बना कर और धमकी दे कर उनसे अपनी शिकायत वापस लेने को कहा जा रहा है. इसी छह अक्टूबर को शाम 7 से 9 बजे तक आरपी सिंह (इन्स्पेक्टर, दक्षिण) ने चतुर्वेदी के घर पर जा कर उन्हें यही धमकी बार-बार दी और बताया कि शिकायत वापस नहीं लेने पर उनके साथ पुलिस किस तरह का सलूक करेगी. पूरे दो घंटे तक वे खुद अभिनव के घर में बैठ कर यही बातें उनको अलग-अलग तरीके से समझाते रहे. इसी तरह से सीओ टूंडला एस के मालिक ने भी इसी सात अक्टूबर को 3 से 4 बजे के बीच फोन करके इसी तरह की धमकी दी. आरपी सिंह ने दो अन्य गवाहों फिरोजाबाद के संजय श्रोतिय तथा संदीप तिवारी को भी छह अक्टूबर को अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर अपना बयान बदलने को धमकाया और ऐसा नहीं करने पर फर्जी मामले में फंसाने की धमकी दी.

अभिनव द्वारा इन सारी घटना से जब मुझे अवगत कराया तो मैंने और हमारी संस्था इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डोक्यूमेन्टेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस)  द्वारा मामले की पूरी जानकारी लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग को पत्र लिख कर इन घटनाओं की जांच कराने और ऐसा करने वाले पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की मांग की है. साथ ही हमने यह निश्चित किया है कि हम अभिनव के साथ मिल कर पुलिस के इस बर्बरता और अन्यायपूर्ण आचरण का अंत तक विरोध करेंगे जब तब उन्हें पूरी तरह न्याय नहीं मिल जाएगा.

मैं इस बात के लिए अभिनव की सराहना करती हूँ कि वे बिना किसी भय और घबराहट के स्थानीय पुलिस की इन धमकियों और अन्यायपूर्ण आचरण का कडा प्रतिवाद कर रहे हैं. मुझे भी उन्होंने यही बताया कि वे इस मामले में तब तक लड़ते रहेंगे जब तक न्याय नहीं हो जाता है. यदि हममे से हर कोई इसी तरह अपने साथ हुए अत्याचार का पूरी हिम्मत से विरोध करेगा तभी व्यवस्था में वास्तविक सुधार हो सकता है. अन्यथा केवल दूसरों के बल पर व्यवस्था को सुधारने का सपना देखने से कुछ नहीं होने वाला.

लेखिका डॉ नूतन ठाकुर मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्यरत लखनऊ स्थित संस्था इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डोक्यूमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) की सचिव हैं.

BEA strongly criticizes Govt. bid to control electronic media

New Delhi, 08.10.2011 : The Broadcast Editors’ Association (BEA) strongly criticized the move of  the Information and Broadcasting Ministry to the effect that renewal of permission would be considered subject to the condition that “the channel should not have been found guilty of violating the terms and conditions of the programme code on five occasions or more”.

The BEA has said that across all democratic nations, governments have no role in issues pertaining to content. The Indian constitution clearly restricts the Government from assuming any such role, the BEA said. With new norms, government is trying to control an otherwise independent electronic media by sending a subtle message that their permission to uplink can be withdrawn should they not ‘behave’.

“Can content be left to the wisdom of the bureaucrats in a democracy,” the BEA asked.

The net result of the new norms would be that an officer of the Government can question an individual channel on content for four times on one pretext or the other, and finally, threaten that channel of non-renewal, should it not fall in line The BEA said, this move is an attempt to undermine the landmark steps that electronic media has taken towards self-regulation. The BEA demands that proposed norms be immediately withdrawn otherwise media will be forced to take up this issue on other forums.

Shazi Zaman

President

NK Singh

General Secretary

Broadcast Editors’ Association (BEA)

अमी आधार निडर आगरा के नए लांच होने वाले अखबार में फीचर एडिटर बने

आगरा से जल्द लांच होने वाले हिंदी दैनिक द सी एक्सप्रेस के साथ अमी आधार निडर ने नई पारी शुरू की है. उन्हें सी एक्सप्रेस में फीचर एडिटर बनाया गया है. निडर इससे पहले बीपीएन टाइम्स, आगरा के संपादक हुआ करते थे. बीपीएन के बंद होने के बाद निडर समेत डेढ़ दर्जन लोगों ने इस्तीफा दे दिया. डा. निडर आई-नेक्‍स्‍ट, अमर उलाला, दैनिक जागरण, वायस आफ इंडिया आदि अखबारों-चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे. वे 18 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं. उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं. कई किबाबें भी उन्होंने लिखी हैं.

एमजे अकबर का कांट्रैक्ट खत्म होने वाला है!

एमजे अकबर को लेकर मीडिया में अटकलों का दौर शुरू हो गया है. एमजे अकबर ने जब इंडिया टुडे समूह ज्वाइन किया था, तब भी एक कोने से यह चर्चा उड़ायी गई थी कि वे बस दो तीन महीने के मेहमान हैं. अब फिर उनको लेकर चर्चा फैलाई गई है कि एमजे अकबर का कार्यकाल इस माह खत्म हो रहा है, उनका एक साल का कांट्रैक्ट था, जो इसी अक्टूबर में खत्म हो रहा है.

इस आधार पर लोग चर्चा फैलाए हुए हैं कि एमजे अकबर के कांट्रैक्ट को प्रबंधन रीन्यू नहीं कर रहा है. वहीं, एमजे से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि अरुण पुरी को फिलहाल एमजे का विकल्प नजर नहीं आ रहा इसलिए वे एमजे को कांटीन्यू करेंगे.  जो लोग उनको लेकर अफवाह फैला रहे हैं, वे किन्हीं न किन्हीं वजहों से उनसे चिढ़ते हैं, इसी कारण मौका देखकर एमजे को हिलाने या बदनाम करने की कोशिश की जाती है. सच्चाई चाहे जो हो, लेकिन इन दिनों इंडिया टुडे में काम करने वाले यही चर्चा करते फिर रहे हैं कि एमजे के लिए अक्टूबर महीना आखिरी होगा या उनकी पारी आगे भी बढ़ेगी.

निधीश त्यागी के भास्कर में लौटने की अटकलें

द ट्रिब्यून के चीफ न्यूज एडिटर निधीश त्यागी को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है. उनके दैनिक भास्कर के साथ फिर जुड़ने की चर्चाएं हैं. पर निधीश त्यागी इन चर्चाओं को फिलहाल गलत बताते हैं. उनका कहना है कि वे भास्कर से जुड़ने की सूचनाओं की पुष्टि नहीं कर रहे हैं. वे जहां थे, अब भी वहीं हैं. ज्ञात हो कि निधीश त्यागी पहले भी दैनिक भास्कर के साथ रहे हैं. तब वे चंडीगढ़ में इस अखबार के संपादक हुआ करते थे.

उनके नेतृत्व में दैनिक भास्कर ने चंडीगढ़ में नई उंचाई हासिल की. बाद में भास्कर प्रबंधन ने उनका तबादला भोपाल फिर मुंबई कर दिया. वहां से उन्होंने रिजाइन देकर टाइम्स आफ इंडिया समूह के अखबार पुणे के अखबार पुणे मिरर में एडिटर के बतौर ज्वाइन कर लिया. फिर वे द ट्रिब्यून में चले आए हैं. सूत्र बताते हैं कि निधीश के भास्कर से इस्तीफा देने के बावजूद उनके और भास्कर प्रबंधन के बीच संपर्क लगातार कायम रहा है. भास्कर प्रबंधन अखबार को जिस उंचाई पर ले जाना चाहता है, उसके लिए वह कई सक्षम प्रोफेशनल्स को ग्रुप के साथ जोड़ना चाहता है. खासकर उन लोगों को ज्यादा तवज्जो दे रहा है जो कभी उनके यहां बड़े पदों पर काम कर चुके हों और प्रतिभावान हों. इसी लिहाज से निधीश त्यागी का नाम चर्चाओं में है. पर निधीश अपने को लेकर लगाई जा रही सभी अटकलों को निराधार बताते हैं.

दैनिक भास्कर, जबलपुर का जमीन हड़पो प्रकरण क्या है?

भड़ास4मीडिया को एक सूचना मिली है. गलत है या सही, यह नहीं पता. इसकी सच्चाई बताएंगे जबलपुर वाले पत्रकार साथी. अपुष्ट सूचना ये है कि दैनिक भास्कर, जबलपुर के एक रिपोर्टर महोदय ने किसी की लंबी चौड़ी जमीन को कब्जाकर उसके एक हिस्से को अपने मालिक के नाम लिख दिया और दूसरे हिस्से को संपादक के नाम. शेष समस्त हिस्से पर खुद काबिज हो बैठे.

बताते हैं कि इस प्रकरण के बारे में थोड़ी बहुत खबर दैनिक भास्कर के प्रतिद्वंद्वी अखबार पत्रिका ने प्रकाशित की है. पूरे प्रकरण की सच्चाई क्या है, इस बारे में जबलपुर के साथियों से अनुरोध है कि वे पूरी जानकारी और पूरी रिपोर्ट bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें ताकि प्रकरण का पूरा खुलासा किया जा सके. साथ ही, इस प्रकरण से जुड़े लोगों से भी अपील है कि वे अपना पक्ष लिखकर भेज दें ताकि रिपोर्ट के साथ उनका पक्ष भी प्रकाशित किया जा सके. भड़ास तक खबरें भेजने और बताने का एक ही माध्यम है, वह  bhadas4media@gmail.com मेल आईडी है.

आज समाज में ”राडिया के रथ पर सवार आडवाणी” खबर छपने पर बवाल

सूचना है कि दो चार रोज पहले आज समाज हिंदी दैनिक (विनोद शर्मा वाला अखबार) में ”राडिया के रथ पर सवार हो गए आडवाणी” शीर्षक से एक खबर छपने के बाद बवाल हो गया. खबर में बताया गया था कि आडवाणी की रथयात्रा के प्रचार-प्रसार का ठेका राडिया की कंपनी वैष्णवी कम्युनिकेशंस को दिया गया है और इस तरह कई तरह के आरोपों से घिरी राडिया व उनकी कंपनी की सेवाएं आडवाणी ने ली हैं, जिससे भाजपा के कई लोगों में सुगबुगाहट है.

कुछ इसी किस्म की कहानी खबर में बयान की गई थी. खबर जोरदार थी. पर जिस अखबार में छपी, वह अखबार जोरदार नहीं है. राडिया एंड कंपनी ने आजसमाज वालों को, उनके मालिकों को, इनके संपादकों को फोन करना शुरू किया. हड़काना शुरू किया. कैसे खबर छाप दी. खंडन छापिए वरना मुकदमा ठोकेंगे. इस तरह की बातों से सकते में आए आज समाज के संपादकों ने तीन कालम में माफीनामा छापा. खबर लेखक का नाम है विशाल जैन.

खंडन में क्या छपा है, यह तो नहीं पता, और इस प्रकरण में राडिया व आज समाज के बीच क्या क्या संवाद हुआ, यह भी ठीक से नहीं पता, लेकिन आजसमाज अखबार के लोगों के बीच इस मामले को लेकर तरह-तरह की कानाफूसी है.  इस प्रकरण के कई तथ्य भड़ास4मीडिया को पता नहीं चल पाए हैं. अगर आपको पता हो तो नीचे दिए गए कमेंट बाक्स की मदद लेकर पूरी कहानी, पूरी दास्तान को लिख सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com के जरिए भड़ास तक पहुंचा सकते हैं.

इंडिया टीवी में प्रमोशन, शोषण के लिए नया पद सृजित

इंडिया टीवी से खबर है कि इंक्रीमेंट मिलने के साल भर बाद अब लोगों को प्रमोशन दिया गया है. हालांकि प्रमोशन में भी जमकर भेदभाव किए जाने का आरोप है. शोषण करने के लिए डिप्टी प्रोड्यूसर जैसा एक नया पद सृजित कर दिया गया है. यह पद एसोसिएट प्रोड्यूसर और प्रोड्यूसर के बीच का है. अभी तक आमतौर पर एसोसिएट प्रोड्यूसर को प्रमोशन देकर प्रोड्यूसर बना दिया जाता है पर इंडिया टीवी ने अपने युवा पत्रकारों का शोषम व प्रमोशन लंबा खींचने के लिए डिप्टी प्रोड्यूसर जैसा पद निकाल दिया है.

अब एसोसिएट प्रोड्यूसर को प्रोड्यूसर बनने के लिए कुछ बरस डिप्टी प्रोड्यूसर की एक फर्जी कुर्सी पर बैठकर बिताने होंगे. सूत्रों का कहना है कि जिन लोगों की नौकरी सात-आठ साल की है, उनमें से कई को सीनियर एडिटर बना दिया गया है और जिन लोगों को ग्यारह साल का एक्सपीरियेंस मीडिया में है, उन्हें डिप्टी प्रोड्यूसर के पद से नवाजा गया है. सेलरी और पद में भारी विषमता है.

सीनियर एडिटर को मार्केट में दूसरे चैनलों में जितना मिल रहा है, उससे आधी रकम इंडिया टीवी के कुछ सीनियर एडिटर्स को थमाया जा रहा है. कहने का आशय ये कि इंडिया टीवी सिर्फ खबरों की ऐसी-तैसी करने के लिए ही नहीं कुख्यात है बल्कि अब अपने इंप्लाइज के शोषण के लिए भी कुख्यात हो रहा है. कहने वाले कहते हैं कि आखिर रजत शर्मा कितना माल बांधकर अपने साथ परलोक ले जाएंगे. कम से कम अपने साथ काम कर रहे लोगों को बेहतर पद पैसा इज्जत मान सम्मान देकर वह सेल्फ सैटिसफेक्शन पा सकते हैं और गर्व से कह सकते हैं कि वे एक पत्रकार होने के कारण अपने यहां के पत्रकारों को सबसे अच्छी स्थिति में रखते हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर उपरोक्त सूचना में निहित तथ्यों में कोई कमी बेसी नजर आए तो शुद्धिकरण नीचे दिए कमेंट बाक्स या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल भेजकर कर-करा सकते हैं.

महुआ न्यूज के पश्चिमी यूपी ब्यूरो चीफ बने लोकेश पंडित

मेरठ से ताजी सूचना ये है कि सिटी से डाक पर भेजे गए पत्रकार लोकेश पंडित ने इस्तीफा दे दिया है. प्रिंट मीडिया में करीब 15 साल गुजारने के बाद लोकेश ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपनी दूसरी पारी शुरू की है. लोकेश पंडित ने महुआ न्यूज में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ब्यूरो इंचार्ज के तौर पर मेरठ में ज्वाइन किया है. लोकेश पंडित मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में सिटी इंचार्ज थे.

बाद में प्रबंधन को जब उनके महुआ में जाने की सूचना मिली तो उन्हें तत्काल सिटी से हटाकर डाक में कर दिया गया. इसी के बाद लोकेश ने अपना इस्तीफा सौंप दिया. लोकेश पंडित ने पत्रकारिता की शुरुआत राष्ट्रीय सहारा से की थी. इसके बाद पब्लिक एशिया, अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान और जनवाणी में काम किया. दैनिक जागरण और हिंदुस्तान में रहते हुए लोकेश ने कई बड़ी खबरें ब्रेक कीं, जिन्हें कई दिनों तक न्यूज चैनलों ने फॉलो किया. लोकेश जमीन से जुड़े रहे हैं और जमीन से उठकर धीरे धीरे उन्होंने अपने पांव जमाए. यही वजह है कि खबरों का उनका बेहद मजबूत नेटवर्क है.

लाइसेंस किराये पर देने वाले धंधेबाजों का भाव बढ़ा

: लाइसेंस लेकर धंधा करने वाले चैनलों व संचालकों का भड़ास4मीडिया पर जल्द होगा खुलासा : और नया न्यूज चैनल या टीवी चैनल लांच करना आसान नहीं रहा. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में गैर-जिम्मेदार कंपनियों के प्रवेश को रोकने के लिए सरकार ने कई नए कदमों का ऐलान किया है. इसके तहत निजी टीवी चैनलों के अपलिंकिंग-डाउनलिंकिंग नीति में बदलाव से संबंधित सूचना-प्रसारण मंत्रालय के प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है.

यह फैसला केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में लिया गया. सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने इस नीति में संशोधन का प्रस्ताव दूरसंचार नियामक ट्राई के साथ सलाह कर तैयार किया है. ‘नॉन-न्यूज एंड करंट अफेयर्स’ श्रेणी के तहत विदेशी चैनलों के अपलिंकिंग-डाउनलिंकिंग के लिए नेटवर्थ 1.5 करोड़ से बढ़ाकर अब 5 करोड़ रुपए किया जा रहा है. यह आवेदक कंपनी के पहले चैनल पर लागू होगी. अतिरिक्त चैनलों में हर चैनल के लिए 2.5 करोड़ रुपए की नेटवर्थ होना जरूरी होगा.

‘न्यूज एंड करंट अफेयर्स’ श्रेणी के तहत पहले चैनल की अपलिंकिंग के लिए नेटवर्थ 3 करोड़ से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपए की जा रही है. अतिरिक्त चैनलों के लिए नेटवर्थ 5 करोड़ रुपए प्रति चैनल होना जरूरी होगा. टेलीपोर्ट के लिए नेटवर्थ की शर्त को एक समान कर दिया गया है. अब चैनल की क्षमता पर कोई भेदभाव नहीं होगा. इसी के साथ टीवी चैनलों को अनुमति लेने के एक वर्ष के अंदर काम शुरू करना होगा.

वर्तमान में टीवी चैनलों के लिए दो गाइडलाइन हैं. इनमें से एक विदेशी चैनलों के लिए हैं जो देश के बाहर से अपलिंक कर भारत में कार्यक्रम दिखाते हैं. दूसरा, उन देसी चैनलों के लिए है जो देश से ही अपलिंक कर देश में ही कार्यक्रम दिखाते हैं. पहली गाइडलाइन 11 नवंबर 2005 को जबकि दूसरी गाइडलाइन 2 दिसंबर 2005 को अधिसूचित हुई थी. इसी के बाद देश में चैनलों का व्यापक विस्तार हुआ. 31 अगस्त 2011 तक सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने कुल 745 टीवी चैनलों को अनुमति दी. इसमें से 366 टीवी चैनलों को ‘न्यूज एंड करंट अफेयर्स’ श्रेणी में जबकि 379 चैनलों को ‘नॉन न्यूज एंड करंट अफेयर्स’ श्रेणी में अनुमति मिली है.

ताजा बने नियम के बाद उन धंधेबाजों की चांदी हो गई है जिन्होंने चैनलों के लिए लाइसेंस पहले ही ले लिया पर वे चैनल चलाने के प्रति गंभीर नहीं हैं. उनकी कोशिश चैनल के लाइसेंस के नाम पर धंधा करने की होती है. इसी कारण वीओआई जैसे चैनलों के लाइसेंस पर कई दूसरे चैनल विभिन्न राज्यों में चलाए जा रहे हैं. यही हाल कई अन्य चैनलों का है. भड़ास4मीडिया पर जल्द ही उन न्यूज चैनलों के लाइसेंसों का खुलासा किया जाएगा जो खुद तो चैनल नहीं चला रहे बल्कि लाइसेंस किराये पर बांटकर धंधा कर रहे हैं. ऐसे चैनलों के लाइसेंस को कैंसिल कराने के लिए भड़ास4मीडिया पर मुहिम शुरू की जाएगी.

पत्रकार राकेश को थैंक्यू, दर्ज हुई एफआईआर, ठग हुए गिरफ्तार

झारखण्ड राज्य के देवघर जिले में करियर काउंसिलिंग करने वाले कुछ लोगों ने मथुरा (उत्तर प्रदेश) और बिहार राज्य के तीन चार छात्रों को बीआईटी (देवघर) में एडमिशन कराने के नाम पर 1.8 लाख रुपये ठग लिए. जब तक छात्रों को अपने साथ हुए फर्जीवाड़े की भनक लगी तब तक बहुत देर हो चुकी थी. खैर, छात्र आनन-फानन में देवघर पहुंचे और अपने साथ हुई ठगी की शिकायत करने देवघर नगर थाना पहुंचे. मगर देवघर नगर थाने की पुलिस ने उन्हें उलटे पाँव लौटा दिया.

साथ ही धमकाया भी कि इस मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं कि जायेगी. सभी छात्र हताश और निराश होकर वापस लौटने को ही थे कि इस बात की भनक वहां समाचार संकलन के उद्देश्य से पहुंचे प्रभात खबर के पत्रकार राकेश पुरोहितवार को लगी. पुरोहितवार ने न सिर्फ मामले को संभाला बल्कि इस मुद्दे पर नगर थाना के कर्मियों से मोर्चा भी लिया. उनकी पुलिस वालों से तकरार हो गई.

पुरोहितवार ने इस प्रकरण की सूचना देवघर के एस.पी. को दी और साथ ही  नगर थाने की पुलिस के करतूत की भी उन्हें जानकारी दे दी. एस.पी. के आदेश के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया और प्रकरण के अभियुक्तों की गिरफ़्तारी भी कर ली गई है. इस तरह एक पत्रकार के कारण ठगी के शिकार छात्रों को न्याय मिलने की प्रक्रिया की शुरुआत हुई. देखना ये है कि पुलिसवाले अपना फर्ज ठीक से निभाकर छात्रों को पैसे लौटाते हैं या आपस में ही खा-पी जाते हैं.

अनंत झा की रिपोर्ट

सहारा समय से मोनालिसा रॉय पहुंचीं पी7 न्यूज

सहारा समय (बिहार-झारखंड) की एंकर मोनालिसा रॉय ने इस्तीफा देकर पी7न्यूज ज्वाइन कर लिया है. मोनालिसा रॉय को सहारा समय की महत्वपूर्ण एंकर्स में शुमार किया जाता है. मधुर व्यवहार और प्रोफेशनल कुशलता जैसी खूबियों वाली मोनालिसा ने 2005 में ईटीवी हैदराबाद से अपने करियर की शुरुआत की. 2008 में उन्होंने वायस आफ इंडिया न्यूज चैनल ज्वाइन किया लेकिन वहां की खराब स्थिति की वजह से तीन महीने बाद ही इस्तीफा देकर सहारा समय बिहार-झारखंड के साथ जुड़ गईं. मोनालिसा ने तीन साल तक सहारा को अपनी सेवा देने के बाद इस्तीफा दे दिया है.

स्टीव जॉब्स की जुबानी, उनकी अपनी तीन कहानी

मैं दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटियों में से एक आपकी यूनिवर्सिटी में आकर आज खुद को सम्मानित महसूस कर रहा हूं। आज मैं आपको अपनी जिंदगी की तीन कहानियां सुनाना चाहता हूं। बस इतना ही। कोई बड़ी बात नहीं। सिर्फ तीन कहानियां। पहली कहानी कुछ बिंदुओं के मिलन के बारे में है। रीड कॉलेज की पढ़ाई मैंने छह महीने के बाद ही छोड़ दी थी, लेकिन उसके अगले 18 महीनों तक, जब तक कि मैंने वास्तव में पढ़ाई छोड़ न दी, मैं वहां ड्रॉप-इन छात्र के रूप में बना रहा।

मैंने पढ़ाई क्यों छोड़ी? मेरे पैदा होने से पहले ही इसकी शुरुआत हो गई थी। मुझे जन्म देने वाली मां एक अविवाहित कॉलेज ग्रैजुएट थीं और उन्होंने मुझे गोद देने का फैसला किया। उनकी ठोस राय थी कि वह मुझे किसी कॉलेज ग्रैजुएट को ही गोद देंगी, सो मेरे जन्म से पहले ही सब कुछ तय हो गया था कि मुझे एक वकील और उनकी पत्नी गोद लेंगे। जब मैं पैदा हुआ, तो अंतिम समय में मुझे गोद लेने वालों ने फैसला बदल दिया कि वे वास्तव में एक लड़की चाहते थे। इसलिए मेरे वर्तमान अभिभावकों को, जो उस वक्त प्रतीक्षा सूची में थे, आधी रात में फोन आया और उनसे पूछा गया, ‘हमारे पास एक अवांछित बालक हैं, क्या आप उसे लेना चाहेंगे?’ उनका त्वरित जवाब था, ‘बेशक।’ मुझे जन्म देने वाली मां को जब बाद में पता चला कि मेरी नई मां ने कभी कॉलेज से कोई डिग्री नहीं ली है और मेरे पिता के पास तो हाई स्कूल की भी कोई डिग्री नहीं है, तो उन्होंने गोद लेने के आखिरी कागजात पर दस्तख्त करने से इनकार कर दिया। कुछ महीनों के बाद वह तब जाकर नरम पड़ीं, जब मुझे गोद लेने वालों ने उनसे वायदा किया कि वे मुझे उच्च शिक्षा जरूर दिलवाएंगे।

और 17 वर्ष की उम्र में मैंने कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन इसे मेरी बेवकूफी कहिए कि मैंने एक ऐसे कॉलेज का चयन किया, जो स्टैन्फोर्ड की तरह ही महंगा था। मेरे कामकाजी माता-पिता की पूरी जमा-पूंजी मेरी ट्यूशन फीस में ही खर्च हो जाती थी। छह महीने के बाद मुझे लगा कि इससे कुछ सार्थक नहीं होने वाला। मुझे उस वक्त कुछ भी नहीं मालूम हो पा रहा था कि आखिर मैं अपनी जिंदगी से क्या चाहता हूं और न ही मैं यह समझ पा रहा था कि आखिर कॉलेज कैसे मुझे अपने जीवन को एक दिशा देने में मदद कर सकता है, जबकि मैं अपने माता-पिता की पूरी जमा-पूंजी अपनी पढ़ाई पर खर्च कर रहा हूं, जो उन्होंने अपने भविष्य के लिए बचाकर रखी है। इसलिए मैंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ने का निश्चय किया। उस वक्त मेरा वह फैसला यकीनन कुछ भयभीत करने वाला था, लेकिन सच मानिए, आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे यही लगता है कि मैंने अपने जीवन में जो बेहतर फैसले किए हैं, वह उनमें से एक था।

कॉलेज की पढ़ाई छोड़ने के लगभग 10 साल बाद, जब हम पहले ‘मैकिनतोश’ कंप्यूटर की डिजाइन तैयार कर रहे थे, तो पढ़ाई छोड़ने के बाद जो कुछ भी मैंने सीखा था, मसलन कैलिग्राफी, सेरिफ व सैन सेरिफ टाइपफेस आदि के बारे में जो जानकारियां हासिल की थीं, वे सब मेरे दिमाग में थीं। यदि मैंने एक विषय में ग्रैजुएशन की कॉलेज की पढ़ाई नहीं छोड़ी होती, तो उम्दा टाइपोग्राफी वाला मैकिनतोश अस्तित्व में न आ पाता। निस्संदेह, जब मैं कॉलेज में था, तब भविष्य के बिंदुओं को जोड़ना नामुमकिन था, लेकिन दस वर्षों के बाद पीछे मुड़कर देखने पर उन बिंदुओं का जुड़ाव साफ-साफ दिख रहा था।

मेरी दूसरी कहानी प्रेम और नाकामयाबी के बारे में है। मैं खुशकिस्मत था कि अपनी जिंदगी के शुरुआती वर्षों में जो कुछ मैं करना चाहता था, मैंने किया। 20 साल की उम्र में वोज के साथ मैंने अपने पिता के गैराज में एप्पल की शुरुआत की। हमने कड़ी मेहनत की और दस वर्ष के भीतर ही यह दो बिलियन डॉलर की कंपनी हो गई। हमने अपनी सर्वश्रेष्ठ कल्पनाशीलता की उपज ‘मैकिनतोश’ को एक साल पहले ही लॉन्च किया था और उस वक्त मेरी उम्र 30 साल हुई ही थी। फिर मुझे निशाना बनाया गया। आखिर जिस कंपनी की शुरुआत आपने की हो, वह आप पर कैसे हमलावर हो सकती है? दरअसल, एप्पल की तरक्की के साथ हमने एक ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति को चुना, जिनके बारे में मेरी राय थी कि वह मेरे साथ अच्छी तरह से कंपनी चला सकते हैं। शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा, लेकिन फिर भविष्य को लेकर हमारे दृष्टिकोणों में अंतर आने लगा और धीरे-धीरे हम संबंध टूटने के कगार पर पहुंच गए। निदेशक मंडल ने उनका साथ दिया और मैं कंपनी से बाहर कर दिया गया। उस समय मेरी उम्र 30 वर्ष थी। यह मेरे लिए बेहद त्रासद था।

कुछ महीनों तक मैं समझ ही नहीं पाया कि आखिर क्या करूं? बहरहाल, अगले पांच वर्ष के दौरान मैंने एक नई कंपनी की शुरुआत की। उसका नाम रखा ‘नेक्स्ट।’ एक अन्य कंपनी का नाम ‘पिक्सर’ रखा। उसी समय मुझे एक बेमिसाल औरत से प्यार हुआ और वह मेरी बीवी बनी। पिक्सर ने दुनिया का पहला कंप्यूटर एनीमेटेड फीचर फिल्म ‘ट्वॉय स्टोरी’ प्रस्तुत किया। आज इसके पास दुनिया का अत्यंत कामयाब एनीमेशन स्टूडियो है। फिर उल्लेखनीय घटनाक्रम के तहत एप्पल ने नेक्स्ट को खरीद लिया और मैं फिर एप्पल से जुड़ गया। नेक्स्ट में जो टेक्नोलॉजी हमने विकसित की थी, वह एप्पल की ताजा कामयाबी के मूल में है। लॉरेन्स के साथ मेरा परिवार खुशहाल है। मुझे पक्की राय है कि यदि एप्पल से मुझे निकाला नहीं गया होता, तो ये तमाम उपलब्धियां मैं हासिल नहीं कर पाता।

मेरी आखिरी कहानी मौत के बारे में है। लगभग एक वर्ष पहले मुझे पता चला कि मैं कैंसर का शिकार बन गया हूं। एक सुबह 7.30 बजे मेरा स्कैन हुआ और उसमें मेरे पैंक्रियाज में ट्यूमर साफ दिख रहा था। डॉक्टरों ने मुझे बताया कि यह एक तरह का कैंसर है, जिसका इलाज मुमकिन नहीं। और फिर अचानक एक दिन जांच के दौरान डॉक्टरों ने कहा कि आपका रोग अलग तरह का है और ऑपरेशन के जरिये इसका इलाज हो सकता है। मुझे कुछ दशक और मिल गए। दोस्तो, कोई भी मरना नहीं चाहता। लेकिन समय तो सबका तय है। इसलिए इसे दूसरों की जिंदगी जीने में जाया मत करो। दूसरों की नुक्ताचीनी पर बहुत ध्यान मत दो। सिर्फ अपनी अंतरात्मा की सुनो और उसी के मुताबिक अनुसरण करो।

एप्पल कंप्यूटर्स के संस्थापक स्टीव जॉब्स के 12 जून, 2005 को स्टैन्फोर्ड में दिए गए भाषण के अंश. स्टीव के भाषण का वीडियो देखने सुनने के लिए क्लिक करें- स्टीव का ऐतिहासिक लेक्चर

पांच साल पहले कत्ल हुई रूसी पत्रकार अना पोलितकोव्स्काया का कौन है कातिल?

: रूस की पत्रकार अना पोलितकोव्स्काया की हत्या को पांच साल हो गए हैं. आज भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि उनका कत्ल किसने कराया -पुतिन सरकार ने, या उन लोगों ने जो पुतिन सरकार को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं? :

मास्को : 7 अक्टूबर 2006 को रूसी पत्रकार अना पोलितकोव्स्काया का उनके घर के बाहर कत्ल कर दिया गया. राजधानी मॉस्को में घर के बाहर सीढ़ियों पर खून से लथपथ उनकी लाश मिली. 48 साल की अना बाजार से सब्जी ले कर घर लौटीं थीं और घर के बाहर बैठे खतरे से अनजान थीं. अना ‘नोवाया गजेटा’ नाम के अखबार के लिए काम किया करती थीं और उस समय राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आलोचकों में से एक थीं. वे चेचन्या में पुतिन सरकार द्वारा की गई कार्रवाईयों के बारे में लिखती थीं. माना जाता है कि इसी ने उनकी जान ले ली. आज पांच साल बाद भी उनके कातिलों का कुछ पता नहीं.

कौन हुआ गिरफ्तार?

हालांकि रूसी अधिकारियों का मानना है कि उन्हें इस दिशा में कामयाबी मिल रही है. इस साल मई में चेचन्या में एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया. जांच अधिकारियों के अनुसार जब अना का कत्ल हुआ उस समय चेचन्या का रहने वाला रुस्तम मखमुदोव उनके घर में मौजूद था. उसके बाद अगस्त में एक उच्च पुलिस अधिकारी को भी गिरफतार किया गया. रिपोर्टों के अनुसार दिमित्री पावल्युचनकोव नाम के इस पुलिस अधिकारी को हत्या की साजिश के बारे में पता था. हालांकि यह आरोप अब तक तय नहीं हो पाया है.

गिरफ्तारी के बाद सितम्बर में ‘नोवाया गजेटा’ के मुख्य संपादक दिमित्री मुरातोव ने मॉस्को में इस बारे में प्रेस कांफ्रेंस की. जांच अधिकारियों की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा, मुझे इस बात की खुशी है कि जांच एजेंसियां लेफ्टिनेंट कर्नल दिमित्री पावल्युचनकोव को केवल एक गवाह के रूप में ही नहीं, बल्कि गुनाहगार के रूप में भी देख रहीं हैं.” मुरातोव ने कहा कि उन्हें इस बात का यकीन है कि विभाग के और भी कई लोगों का अना के कत्ल में हाथ था, “हम जानते हैं कि हत्या की साजिश किसने रची, लेकिन मुझे लगता है कि कोई नहीं चाहता कि इसके आगे कोई भी बात सामने आए.”

पुतिन के विरोधी की साजिश?

हालांकि अधिकारियों ने अभी तक किसी का नाम नहीं लिया है, लेकिन स्थानीय अखबारों में रूस के पूंजीपति बोरिस बेरेजोव्स्की का नाम लिया जा रहा है. अखबार ‘कोमेरसांट’ ने सितम्बर में लिखा कि पावल्युचनकोव ने जांच में यह बात स्वीकार की है कि बेरेजोव्स्की ने किसी बिचौलिये की मदद से यह कत्ल कराया. अखबार में कहा गया कि बेरेजोव्स्की इस हत्या से पुतिन को राजनैतिक नुकसान पहुंचाना चाहते थे.

बेरेजोव्स्की लम्बे समय से रूस सरकार की आलोचना करते रहे हैं. वह पिछले दस सालों से ब्रिटेन में निर्वासन में रह रहे हैं. रूस में उन पर भ्रष्टाचार और घूसखोरी के कई मुकदमे चल रहे हैं. लंदन में रहते हुए भी बेरेजोव्स्की रूस की राजनीति से जुड़े रहे हैं और उन्होंने कई बार पुतिन सरकार की समाप्ति की मांग की है.

प्रमुख जांच अधिकारी एलेक्जेंडर बास्त्रिकिन ने कत्ल के पीछे बेरेजोव्स्की का हाथ होने से इंकार किया है. अखबार में चल रही रिपोर्टों के बारे में उन्होंने कहा, “हम नहीं जानते कि इस हत्या के पीछे कौन है. हमारे पास बेरेजोव्स्की पर आरोप लगाने का कोई आधार नहीं है.” कई पत्रकारों और मानवाधिकार संगठनों का भी यही मानना है कि बेरेजोव्स्की का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है. ‘नोवाया गजेटा’ के एक संपादक ने इसे एक ‘बुरा मजाक’ बताया है.

मानवाधिकार संगठन ‘मॉस्को हेलसिंकी ग्रुप’ की अध्यक्ष ल्युडमिला अलेक्स्येवा ने इस बारे में कहा, “अना पोलितकोव्स्काया किस तरह से उनके रास्ते में थी? मेरे ख्याल से यह जांच अधिकारियों की एक चाल है ताकि लोगों को असली मुद्दे से भटकाया जा सके. ऐसा नहीं है कि बेरेजोव्स्की कोई महापुरुष हैं और मुझे उनके साथ कोई सहानुभूति भी नहीं है, लेकिन यहां केवल अटकलें लगाई जा रही हैं और मुझे समझ नहीं आ रहा कि इसका फायदा किसे मिल रहा है?”

रूस के पत्रकारों येगोर वीनोग्रादोव, मार्कियान ओस्टाप्चुक और ईशा भाटिया की रिपोर्टस का संपादन किया है महेश झा ने. साभार- डायचेवेले

मीनाक्षी मैडम की जय-जय

आजकल दैनिक जागरण वाली मीनाक्षी मैडम की जय जय है. पहले पन्ने पर उनकी तीन-तीन बाइलाइन छप रही है. ऐसे भाग्यशाली पत्रकार कितने हैं जो पहले पन्ने पर एक ही दिन में तीन तीन बाइलाइन पा जाएं. पर जब जिस पर खुदा मेहरबान होता है तो उसकी किस्मत ऐसी ही होती है. मीनाक्षी मैडम चंडीगढ़ में बैठती हैं और पूरे पंजाब हरियाणा पर राज करती हैं. काफी पुराने दिनों से दैनिक जागरण से इनका नाता है.

इनकी निष्ठा आदि को देखते हुए जागरण प्रबंधन ने इन्हें राष्ट्रपति के साथ विदेश दौरे पर भेज दिया. दूसरे, जब राष्ट्रपति महिला हों तो उनके साथ महिला रिपोर्टर को भेजना ज्यादा लाजिकल और उचित फैसला है. दैनिक जागरण, पंजाब में कार्यरत कर्मी मीनाक्षी को विदेश भेजे जाने के जागरण प्रबंधन के फैसले पर चर्चा नहीं कर रहे हैं. ये कर्मी आजकल दैनिक जागरण, पंजाब में पहले पन्ने पर मैडम की तीन तीन बाइलाइन छपने से दांतों तले उंगलियां या उंगलियां तले दांत, जो भी समझ लीजिए, दबा रहे हैं.

अभी तक चलन यह रहा है कि कोई रिपोर्टर विदेश से खबरें भेजता है तो उसकी सबसे प्रमुख खबर पर बाइलाइन देकर, अन्य खबरों के साथ उसके पद का जिक्र कर दिया जाता है. पर मीनाक्षी जी पर यह कृपा कई लोगों को पच नहीं रही है. हालांकि न्यूज चैनलों की रिपोर्टिंग को देखते हुए अखबार वाले अपने यहां अपने रिपोर्टरों को ज्यादा तवज्जो, एक्सपोजर, सम्मान दे रहे हैं तो इसे पाजिटिव सेंस में लेना चाहिए पर अखबार वालों की आदत ठहरी टांग खिंचाई की सो मौका मिलते ही शुरू हो जाते हैं. कुछ न सही तो यही सही कि मैडम को तीन-तीन बाइलाइन क्यों और बाकियों को एक भी बाइलाइन पाने के लिए क्यों नाक रगड़ना पड़े?

खण्डूरी थे तो लोस में हारे, खण्डूरी हैं तो विस में हारेंगे!

: उत्तराखण्ड भाजपा में घमासान : बीसी खण्डूरी धनुष-बाण लिये हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को ढूंढ रहे हैं : उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री अपनी महान उपलब्धि बताते हुए कह रहे हैं कि शासन व प्रशासन में शुचिता व पारदर्शिता लाने के लिए प्रभावी पहल की गयी है। सुराज, भ्रष्टाचार उन्मूलन व जन सेवा के नाम से अलग विभाग बनाया गया है, लोकायुक्त को और अधिक सशक्त व प्रभावी बनाने के लिए प्राविधान किए जा रहे हैं।

लोकसेवकों द्वारा अनाधिकृत तरीके से अर्जित सम्पत्ति को जब्त करने के लिए कानून बनाकर उत्तराखण्ड सरकार ने एक बड़ी पहल की है। ऐसे में आम जन में चर्चा है कि क्या इन उपायों से भाजपा की सीटों उत्तराखण्ड में बढ जाएंगी, पहले 7 की सर्वे रिपोर्ट थी, अब क्या इन उपायों से 37 हो जाएगी, इस ओर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री का ध्यान भी नहीं है, वह तो धनुष-बाण लिये हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को ढूंढ रहे हैं।

सीटें बढ़ाने के नाम पर खंडूरी को लाकर भाजपा हाईकमान ने डा. रमेश पोखरियाल निशंक को सीएम पद से हटा दिया। अब निशंक का भाजपा में राजनैतिक पुनर्वास कर दिया गया है। पर इन कदमों से उत्तराखण्ड में भाजपा में घमासान बढ़ जाने के आसार हैं। भाजपा में अंदरखाने घमासान की शुरुआत राज्य गठन के बाद से ही हो गई थी। इसी कारण राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी अपने कार्यकाल का पहला साल भी पूरा नहीं कर पाये। वर्ष २००७ में उत्तराखंड में सत्तासीन होने के बाद उत्तराखण्ड भाजपा ने फिर यह कहानी दोहराई। यह क्रम जारी है। और इस कारण विवाद-घमासान का बढ़ना जारी है।

तभी तो, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने अपने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का स्वागत करना उचित नहीं समझा। डा. रमेश पोखरियाल निशंक के भाजपा के राष्टीय उपाध्यक्ष बनकर देहरादून भाजपा कार्यालय पहुंचने के कार्यक्रम से सीएम खंडूरी दूर रहे। इससे आम जनता को लगा कि क्या राज्य में कांग्रेस की सरकार आ गयी है, जो निशंक से दूरी बनायी गयी है। कायदे के अनुसार तो सूबे के सीएम को अपनी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पहली बार देहरादून पहुंचने पर उपस्थित रह कर भाजपा की एकजुटता का संदेश देना चाहिए था परन्तु ऐसा नहीं हुआ और इस तरह उत्तराखण्ड की फिजां में यह साफ संदेश गया कि उत्तराखण्ड में सत्ता के दो केन्द्र बन गए हैं, और दोनों ही सत्ता केंद्र अपनी अपनी उपलब्धि गिनाने में लगे हैं। पर कोई भी भाजपा सरकार की उपलब्धि नहीं गिना रहा है।

आम जनता को यह आशा थी कि बीसी खण्डूरी एकजुटता का संदेश देंगे, परन्तु हो उल्टा रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पदभार मिलने के बाद देहरादून बीजेपी कार्यालय आ रहे निशंक को उपेक्षित करते हुए मुख्यमंत्री बीसी खण्डूडी रामपुर तिराहा मुजफ्फरनगर चले गये। निशंक शहीद स्मारक देहरादून पहुंचकर उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के शहीदों को नमन करने गये। इस दौरान उनके साथ कैबिनेट मंत्री विजया बडथ्वाल समेत महिला आयोग की अध्यक्षा श्रीमती सुशीला बलूनी तथा उत्तराखंड दैवीय आपदा सलाहकार समिति के अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत व उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद की अध्यक्ष ऊषा रावत, आंदोलनकारी सम्मान परिषद के पूर्व अध्यक्ष रविन्द्र जुगरान तथा हरिद्वार भाजपा जिलाध्यक्ष सुशील चौहान, जिलाध्यक्ष महिला मोर्चा रेणू गर्ग आदि मौजूद थे।

निशंक के देहरादून पहुंचने पर समर्थकों ने भरपूर शक्ति प्रदर्शन किया। इसका साफ मतलब था कि अगर विधानसभा चुनाव में डा. निशंक को उपेक्षित किया गया तो राजनीति का यह माहिर खिलाडी इसे आसानी से बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। समर्थकों ने भारी संख्या में पहुंकर और निशंक का स्वागत कर संदेश देने की कोशिश की।  हजारों की संख्या में पहुंचे भाजपा कार्यकर्ताओं ने जॉली ग्राण्ट से लेकर भाजपा के प्रदेश कार्यालय तक भव्य स्वागत किया। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने के बाद डा. रमेश पोखरियाल निशंक जॉली ग्राण्ट स्थित एयरपोर्ट पर पहुंचे, तभी उनके हजारों की संख्या में समर्थक वहां पहुंच गए और उन्हें फूलमालाओं से लादकर भव्य स्वागत कर नारेबाजी शुरू कर दी जिससे डा. निशंक का चश्मा भी टूट गया।

समर्थकों का हुजूम इस कदर था कि भारी संख्या में सैकडों लोग जॉली ग्रांट के बाहर ही खडे रहे। इसके बाद डोईवाला, जोगीवाला, मोहकमपुर सहित कई स्थानों पर उनका फूलमालाओं से लादकर स्वागत किया गया। इसके बाद श्री निशंक भाजपा के प्रदेश कार्यालय पहुंचे जहां उनका भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ कई विधायकों व प्रदेश पदाधिकरियों ने स्वागत किया। डॉ. निशंक के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने पर भाजपा के प्रदेश कार्यालय पर जमकर आतिशबाजी कर मिष्ठान भी वितरित किया। समर्थकों के इस संदेश को समझने में भूल करते हुए मुख्यमंत्री ने एकजुटता का कोई संदेश देने की कोशिश नहीं की। वहीं मुख्यमंत्री बनने के बाद अभी उनका राज्य में व्यापक दौरा भी नहीं हो पाया है जबकि निशंक ने हर विधानसभा वार अपना व्यापक दौरा कर भाजपा की जड़ों को मजबूती दे दी थी। मुख्यमंत्री के कदम से तो अभी तक यहीं संदेश गया है कि वे येन केन प्रकारेण सिर्फ मुख्यमंत्री का पद चाहते थे।

हालांकि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. निशंक ने अपनी सफाई पेश करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा ही भाजपा आलाकमान की बातों को मानकर पार्टी के एक अनुशासित सिपाही की तरह उसका सम्मान किया है और जो नयी जिम्मेदारी उन्हें दी गई हैं उसका वह बखूबी निर्वहन करेंगे। उन्होंने कहा कि २०१२ के विधानसभा चुनाव में सबको साथ लेकर इस नयी जिम्मेदारी को मजबूती के साथ निभाया जाएगा और अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उनके द्वारा उत्तराखण्ड को विकास की पगडंडी पर लगातार आगे बढाया जाता रहा और देश भर के नक्शे पर राज्य का नाम विकासशील राज्य के रूप में लिया जाने लगा। राज्य के विकास को आगे बढाने के साथ-साथ उत्तराखण्ड की संस्कृति व राज्य आंदोलनकारियों को भी सम्मान राज्य सरकार द्वारा दिया गया। उन्होंने कहा कि भाजपा हाईकमान ने जिस विश्वास के साथ उन्हें नयी जिम्मेदारी दी है उस पर वह पूरी तरह खरा उतरकर भारतीय जनता पार्टी को पुनः सत्ता में वापस लाने के लिए कोई कसर नहीं छोडेंगे।

इसके बाद डॉ. निशंक ने कचहरी स्थित शहीद स्मारक पहुंचकर उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के शहीदों को नमन किया तथा  गांधी पार्क स्थित महात्मा  गांधी जी की प्रतिमा पर पुष्प चढाकर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इस दौरान कैबिनेट मंत्री खजानदास, विधायक पेमचन्द्र अग्रवाल, शैलेन्द्र रावत, कुलदीप कुमार, गणेश जोशी, दायित्वधारी श्री ज्योतिपसाद गैरोला, रघुनाथ सिंह नेगी, आदित्यराम कोठारी, संदीप गुप्ता, सुभाश बडथ्वाल, चमनलाल वाल्मिकि, मेजर कादिर हुसैन, डॉ. आदित्य कुमार, सूरतराम नौटियाल, पंकज सहगल, दलजीत सिंह तथा पार्टी पदाधिकारियों में सतीश लखेडा, मुकेश महिन्द्रु, विनय गोयल, पुनीत, मित्तल, राजीव गोयल, विनोद उनियाल, राजेन्द्र भण्डारी, नरेन्द्रपाल सिंह रावत, सहदेव पुण्डीर, सुनील उनियाल गामा, गोवद्धर्न भारद्वाज सहित कार्यकर्ता उनका स्वागत करने पहुंचे।

वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री मेजर जनरल (से.नि.) भुवन चंद्र खण्डूडी रामपुर तिराहा मुजफ्फरनगर में शहीद स्मारक में शहीदों को पुष्पांजलि करने पहुंचे। वह डा. निशंक के कार्यक्रम में नहीं गये। भुवन चंद्र खण्डूडी ने कहा कि २ अक्टूबर को राज्य आंदोलनकारियों पर गोली चलाये जाने की घटना के समय वे स्वयं संसद सदस्य थे और उन्हें यह घटना सुनकर दुःख, पीड़ा, हताशा और आश्चर्य हुआ और उन्होंने तत्कालीन गृह राज्य मंत्री राजेश पायलट स तत्काल वार्ता की, जिन्हें उस समय इस घटना की गंभीरता का पता नहीं था।

मुख्यमंत्री बीसी खण्डूडी विश्वास जता रहे हैं कि सेवा का अधिकार कानून बनने से उत्तराखण्ड की जनता को निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से निजात मिलेगी। लोक सेवकों द्वारा अनाधिकृत तरीके से अर्जित सम्पत्ति को जब्त करने के लिए कानून बनाकर उत्तराखण्ड सरकार ने एक बडी पहल की है। सरकार द्वारा विशेष न्यायालयों की स्थापना की जाएगी जहां लोकसेवकों का पक्ष सुनकर अधिकतम छः माह में अवैध तरीके से अर्जित धन व सम्पत्ति का अधिग्रहण किए जाने के संबंध में आदेश दिए जाएंगे। राज्य सरकार ऐसे अर्जित धन या सम्पत्ति का अधिग्रहण करके जनकल्याण के प्रयोग में लाएगी। इससे जहां भ्रष्ट लोकसेवकों में भय व्याप्त होगा वहीं अनाधिकृत सम्पत्ति का उपयोग लोकोपयोगी कार्यों में किया जा सकेगा। इस विधेयक को भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था निर्माण में एक क्रांतिकारी कदम के रूप में देखा जा रहा है।

इसके अलावा मुख्यमंत्री श्री खण्डूडी का कहना है कि स्थानांतरण प्रक्रिया को उचित, भेदभाव रहित व पारदर्शी बनाने के लिए स्थानांतरण नीति के स्थान पर कानून बनाया गया है। इस बारे में जनचर्चा है कि मुख्यमंत्री को अपने पूर्वकाल का ब्यौरा भी देना चाहिए, उस समय उनकी क्या विशेष उपलब्धि रही, वह यही हो सकती है कि राज्य में पहली बार पांचों लोकसभा सीटें भाजपा ने खो दी, अब कहीं विधानसभा चुनाव में तो ऐसा माहौल तो नहीं बनता जा रहा है। यह तो समय ही बताएगा, पर भाजपा कार्यकर्ता दबी जुबान से इसकी चर्चा अवश्य कर रहे हैं।

देहरादून से जर्नलिस्ट चन्द्रशेखर जोशी की रिपोर्ट

बीबीसी में 2000 नौकरियां सदा के लिए खत्म कर दी जाएंगी

बीबीसी के डायरेक्टर जनरल मार्क थॉम्सन ने घोषणा की है कि बीबीसी के बजट में 20 प्रतिशत की कटौती को पूरा करने के लिए वर्ष 2017 तक लगभग 2000 नौकरियाँ बंद की जाएँगी. ब्रिटेन में टीवी लाइसेंस फ़ीस को 2016-17 तक 145.50 पाउंड प्रति वर्ष प्रति घर रखा गया है. बीबीसी अपना बजट लाइसेंस फ़ीस के ज़रिए एकत्र राशि से चलाती है.  मार्क थॉम्सन ने कहा, “इस प्रक्रिया में बीबीसी के कुल कर्मचारियों में से लगभग दस प्रतिशत की नौकरी जा सकती है.”

दुनिया भर में फैले बीबीसी के कर्मचारियों को संबोधित करते हुए थाम्सन ने कहा- मूल सेवाएँ बंद नहीं होगीं.  बीबीसी में इन बदलावों की घोषणा पिछले नौ महीने में कर्मचारियों के साथ चर्चा के बाद की गई है और प्रक्रिया को डिलिवरिंग क्वालिटी फ़र्स्ट का नाम दिया गया है. थॉम्सन ने कहा है कि बीबीसी की अत्यावश्यक माने जाने वाली मूल सेवाएँ बंद नहीं की जा रही हैं क्योंकि किसी भी सेवा को बंद करने का मतलब है कि बीबीसी श्रोताओं या पाठकों को गँवा देगा.

बीबीसी के अत्यंत लोकप्रिय रेडियो-4 के कार्यक्रम बजट में कोई बदलाव नहीं होगा. बीबीसी वन के बजट में तीन प्रतिशत की कटौती होगी. बीबीसी न्यूज़ के बजट में कुछ कटौती होगी. बीबीसी स्पोर्ट के बजट में 15 प्रतिशत की कटौती होगी. बीबीसी के एंटरटेनमेंट बजट भी कुछ घटेगा. बीबीसी-2 के दिन के कार्यक्रमों का बजट ख़त्म होगा. थॉम्सन ने जनवरी में कहा था कि बीबीसी को सामने चार साल में अप्रैल 2017 तक 20 प्रतिशत पैसा बचाने की चनौती है.

थॉम्सन से पहले बोलते हुए बीबीसी ट्रस्ट के चेयरमैन लॉर्ड क्रिस पैटन ने बताया कि ट्रस्ट किस तरह से लाइसेंस फ़ीस देने वाले लोगों के साथ इन योजनाओं पर चर्चा करेगी. लाइसेंस फ़ीस देने वाले लोग इस साल के अंत तक इन योजनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं. फ़िलहाल बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए ब्रिटेन का फॉरन एंड कॉमनवेल्थ ऑफ़िस पैसा देता है और अप्रैल 2014 से इसके लिए पैसा भी टीवी लाइसेंस फ़ीस के ज़रिए ही आएगा.

सीएनईबी में रात में काम करने वाले कर्मियों की जिंदगी भगवान भरोसे

: तो इसलिए सीएनईबी ने खबर नहीं चलाई? : सीएनईबी तोड़ रहा है दिल्ली और यूपी पुलिस के नियम कायदे को. दिल्ली और यूपी पुलिस ने रात में काम करने वाले कर्मचारियों के नियोक्ता कंपनियों को निर्देश दे रखा है कि वो रात के 9 बजे के बाद ऑफिस आने और जाने वाले महिला कर्मचारियों को पिक और ड्राप उपलब्ध करवाएं. इसके बावजूद सीएनईबी अपने कर्मचारियों के प्रति असंवेदनशील बना हुआ है.

खर्चे कम करने के नाम पर कर्मचारियों की सुरक्षा से खिलवाड़ किया जा रहा है. अभी हाल ही में सीएनईबी की महिला रिपोर्टर उषा लाल और डेस्क पर काम करने वाली महिला पत्रकार तुहिना चौबे पर हमला हुआ. वे रात के 10 बजे ऑफिस नोएडा सेक्टर 62 से सहारा कम्प्यूटर के पास ऑटो लेने के लिए जा रही थीं. इस बीच कुछ लफंगे किस्म के आवारा लड़कों ने इन दोनों लड़कियों पर फब्तिया कसना शुरू कर दिया. हिम्मत दिखाते हुए रिपोर्टर उषा ने एक लड़के को पकड़ लिया और तीन चार तमाचा जड़ दिया. लफंगों के साथी अपने पिटते मित्र को बचाने के लिए आगे आ गए और उन लोगों की उषा लाल से हाथापाई भी हुई. मौके पर पहुंचे टेक महेन्द्र के कुछ कर्मचारियों का मदद से एक लड़के को पकड़ा गया.

हद तो ये हो गई कि पत्रकारों से मारपीट करने वाले लफंगों के खिलाफ चैनल ने कोई रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई. मौके पर पहुंचे सेक्टर 57 के एसएचओ ने चैनल से आग्रह किया कि वो इस मामले में कोई एफआईआर दर्ज करा दें, जिससे कार्रवाई का पुख्ता आधार मिले पर चैनल ने पहले पकड़े गए लड़के को थाने ले जाने की बात कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया. कंप्लेन ना होने के कारण थाने को उस लड़के को छोड़ना पड़ा. चैनल को डर था कि कंप्लेन लिखाने के बाद उससे भी पूछताछ हो सकती है कि वह अपनी महिला कर्मचारियों को रात के 9 बजे के बाद पिक और ड्राप क्यों नहीं उपलब्ध कराया. यही कारण था कि सीइनईबी चैनल पर इस खबर को भी नही चलाया गया. सीएनईबी में रात के पिकअप को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है.

सीएनईबी के मेन गेट पर इस संबंध में एक नोटिस पेस्ट कर दी गई है जिसमें साफ लिख दिया गया है कि अब नाईट पिक अप बंद किया जा रहा है. अब आप सभी लोगों को पिक अप नोएडा सिटी सेन्टर से ही मिलेगा. यदि आप गाजियाबाद, बैशाली, बसुन्धरा, लक्ष्मीनगर से आते हैं तो आप को पिकअप की यह सुविधा भी नहीं मिलेगी. नए एडिटर रजनीश कुमार ने रिपोर्टरों को भी बता दिया है कि 110 किलोमीटर से ज्यादा गाड़ी किसी भी हालत में नहीं चलनी चाहिए. इस सब के बीच रात में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ समस्या आ रही है. उन्हें नहीं सूझ रहा कि वो इन परिस्थिति में करें तो क्या करें. नौकरी करें या छोड़ दें. पर ज्यादातर लोगों की स्थिति यही है कि पापी पेट को पालने के लिए किसी भी हालत में नौकरी तो करनी ही है, जब तक कोई नया बेहतर विकल्प नहीं मिल जाता.

दुर्भाग्य यह है कि यह सब कुछ तब हो रहा है जब चैनल के चेयरमैन अमनदीप सरान खुद चैनल के कामकाज को सीधे तौर पर देखने लगे हैं. सीएनईबी में नाइट शिफ्ट में काम करने वाले कर्मचारी अपील करते हैं कि चेयरमैन अपने कर्मियों की जिंदगी के प्रति चिंतित होते हुए नाइट पिक-ड्राप की सुविधा को फौरन बहाल करने का आदेश दें अन्यथा नाइट शिफ्ट में काम करने वाले किसी कर्मी की जिंदगी के साथ कभी कोई हादसा हो गया तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सीएनईबी न्यूज चैनल की होगी और तब एक नहीं, दर्जनों लोग पुलिस को बताएंगे कि इस चैनल में किस तरह नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं.

सीएनईबी के एक कर्मी द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित. पत्र भेजने वाले ने नाम-पहचान का खुलासा ना करने का अनुरोध किया है.

शातिर-खुर्राट दलालों का हाथ और एक संवेदनशील पत्रकार की किताब

यशवंत: एक होने वाले आयोजन के बहाने आज की मीडिया पर भड़ास : आज जो जितना बड़ा दलाल है, वो उतना ही धन-यश से मालामाल है. आज जो जितना बड़ा दलाल है, सत्ता-बाजार में उसका उतना बड़ा रसूख है. आज जो जितना बड़ा दलाल है, लालची-तिकड़मी मिडिल क्लास की नजरों में उतना ही बड़ा विद्वान है.

और, ऐसे ही कथित यशस्वी, रसूखदार, विद्वान आजकल दिल्ली में भांति-भांति के आयोजनों की शोभा बढ़ाते फिरते हैं. पर दुख तब होता है जब कोई ठीकठाक पत्रकार इन दलालों के बहकावे में आकर इन्हें अपना मुख्य अतिथि या नेता या परम विद्वान मान लेता है. आईबीएन7 में कार्यरत और टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार हरीश चंद्र बर्णवाल अच्छे पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं. विनम्र, पढ़े-लिखे, समझदार, संवेदनशील और सरोकार को जीने वाले हरीश ने हाल-फिलहाल एक किताब का उत्पादन किया है. नाम है- “टेलीविजन की भाषा”.

इस किताब का जोरदार विमोचन कराने के चक्कर में हरीश लोकार्पण समारोह में ऐसे-ऐसों को बुला बैठे हैं कि कोई सं