जी हां, पटना के इस अखबार के बारे में अब यही कहा जाने लगा है। वजह है यहां की व्यवस्था। ऑफिस का हाल यह है कि कब कोई चपरासी या ऑपरेटर आपसे बहस कर बैठे, कुछ भी पता नहीं। ऐसा पहले कई बार हो चुका है। दूसरी बात कि मैनेजमेंट की तरफ से कुछ लोगों को इतनी छूट मिली हुई है कि वे किसी को बेइज्जत कर सकते हैं। बदले में वे पल-पल की जानकारी मैनेजमेंट तक पहुंचाने का काम करते हैं।
जब से सन्मार्ग लांच हुआ, अभी तक कई सीनियर पत्रकार यहां से उबकर दूसरा दरवाजा देख चुके हैं। हिन्दुस्तान से गये विजय पाण्डेय, राजीव मणि, सुनील सिन्हा और प्रभात खबर से गये अरबिन्द सिन्हा एवं पाण्डेयजी कब का छोड़ चुके। इसके बाद पंवार जी गये, लोग उन्हें भी सम्मान नहीं दे सके। अब बारी है सुनील दुबे, पंकज किशोर और विनायक विजेता की। ये कब तक निभा पाते हैं, जल्द ही पता चल जाएगा। वैसे चर्चा है कि इनमें से कई लोग अभी से ही दूसरे दरवाजे की ताक में हैं। आखिर कोई क्या करे, बेरोजगारी जो है। बेरोजगार थी तो कर ली नौकरी। अच्छे की तलाश सभी को रहती है। जल्द ही यहां फिर से आदमी की तलाश शुरू हो जाएगी।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.












madan kumar tiwary
April 26, 2011 at 9:21 am
सन्मार्ग बिहार में कोई जगह नही बना सका कारण शायद प्रतिबद्ध पत्रकारों की कमी है । यथार्थ लिखा है आपने ।
ham bihari
April 26, 2011 at 2:43 pm
tum sale pagal ho gaye ho kya. tum bhi jaild hi hkg me jayega.ham log tumhe jan rahe hai jald hi tumhara kalyan ho jayega. ak bar sanmarg aa ke dekho jindgi sudhar jayega.
KUMAR BHAWESH
April 27, 2011 at 7:32 am
सन्मार्ग पत्रकारिता का जौहर दिखाने का संस्थान है. जिन्हें इस संस्थान में इज्ज़त नहीं मिली वो बिहार के कथित बरे अखबार के मालिको के तलवे चाट कर अपना इज्ज़त बढ़ाये. जिस महानुभाव ने सन्मार्ग के बारे में पत्र लिखा है, अगर वो संस्थान के अन्दर है तो उनके चरित्र को समझ सकते है और अगर सन्मार्ग से जा चुके है तो फिर………….
pawan
April 27, 2011 at 1:43 pm
to fir jhanabad sanmarg ka office ke partinadhi to malamal hai bhai ji jara ja kar pata to lagiya.
Y K SHEETAL
April 27, 2011 at 1:47 pm
सन्मार्ग में ज्यादातर एक्सपायरी डेट के पत्रकार हैं,जब तक जोश था तब तक इन्होने विज्ञापन के लिए दलाली की और जब सरेआम हो गए तो पत्रकारिता में आकर छिपी दलाली शुरू कर दी….इन्हें उनकी दलाली और बिहार के एक आई पी एस अधिकारी का पत्तल उठाने के एवज में नियुक्ति दी गई है. विनायक विजेता की मती मारी गई थी की सन्मार्ग में आये. जो लोग खुद किसी एन जी ओ के तलवे के स्वाद के आदि हों वो किसी को बड़े अखबार के मालिको के तलवे चाट कर अपना इज्ज़त बढ़ाने की सलाह दें तो अपनी सोच और पुष्ट हो जाती है. समय का इन्तजार कीजिये जल्द ही सन्मार्ग में विज्ञापनदाता से अचानक पत्रकार बने कुछ दलालों के सबूत भड़ास पर सरेआम होंगे.विनायक विजेता की ख्याति बिहार से बाहर तक है.
madan kumar tiwary
April 28, 2011 at 4:25 am
सन्मार्ग अच्छा है या बुरा की बात नही हो रही है , मुद्दा है कुव्यवस्था का । आप सब लोग कंटेंट की बात पर आ जा रहे हैं। सन्मार्ग का सर्कुलेश्न नगण्य है क्यों ? एक दिन मैं सन्मार्ग के लिये सभी जगह घुमा नही मिला , अंत में स्टेशन पर एक प्रति मिली । आप पहले इसका सर्कुलेश्न बढायें। जब आप जनता तक पहुंच हीं नही पा रहे हैं तो आप क्या छापते हैं , उसका क्या अर्थ रह जाता है । मेरे मित्र भी सन्मार्ग में और उनसे भी मैने यह बात कही थी । वैसे यह रिपोर्ट मेरी नही है , मैं अपने नाम से लिखता हूं। यह भी सही है कि बिहार के सभी नामचीन अखबार नीतीश के गुणगाण में व्यस्त हैं । सन्मार्ग अच्छा लिखता होगा इससे मैं इंकार नही करता लेकिन पढने के लिये मिलेगा तब तो लोगो को पता चलेगा आप क्या लिखते हैं। यह आलोचना नही एक सुझाव है , अन्यथा लेने की जरुरत नही है । अन्यथा लेंगे तो खुद का बुरा करेंगे ।
Y K SHEETAL
April 28, 2011 at 9:09 am
अखवार अच्छा है या बुरा इसे सर्कुलेशन से जोर कर देखना मुझे सही नहीं लगता है…दिल्ली में कोमन वेल्थ की दलाली करने और प्राइवेट ट्रीटी न करने पर कलमाड़ी के खिलाफ सीरीज छपने वाला अखवार टाइम्स ऑफ़ इंडिया का सर्कुलेशन सबसे अधिक है वहीँ विकिलीक्स की खबर छापने वाले द हिन्दू को ऑक्सीजन की जरुरत है. सन्मार्ग का नैतिक पतन का सबसे वीभत्स रूप देखना हो तो बेगूसराय कार्यालय हो आइये.अपने लिखे को ही खुद ही सो पचास में गरिया लिया जाता है और भी कई तरह के जौहर दीखते हैं वहां.
bhawesh
April 28, 2011 at 9:56 am
सन्मार्ग की प्रसार संख्या बहुत ही कम है. इसमें कोई दो राय नहीं. और अगर सन्मार्ग की प्रसार संख्या बढ़ जाये तो तो इसमें काम करने वाले भी उत्साहित ही होंगे. प्रसार के लिए न जाने क्यों प्रबंधन चिंतित नहीं है , समझ से परे है. वैसे निंदा से निखार ही आती है.
Y K SHEETAL
April 28, 2011 at 6:42 pm
@भवेश: निंदा से निखार तभी आती है जब वातावरण इस प्रतिक्रिया के अनुकूल हो और उत्प्रेरक का काम करे. हर जगह हाइड्रोजन ऑक्सीजन मिला देने से पानी नहीं बन जाता.सन्मार्ग अभी पटना में शिशु अवस्था में है लेकिन उस पर इतने गंभीर और संगीन आरोप लग चुके हैं जो वहां वर्षों से प्रकाशित हो रहे बुजुर्ग अखवारों पर भी नहीं लगे हैं. प्रबंधन पर सारा दोष मढ़ कर खुद ओट में छुप जाना कायरता है. जब बहस तर्कों के आधार पर हो रही हो तो वहां ”अगर” को प्रयोग में लाने का उद्देश्य भ्रम में डालना होता है.
madan kumar tiwary
April 29, 2011 at 4:42 pm
एक विनायक विजेता क्या कर लेंगे ? यह सही है कि विजेता जी निर्भिक पत्रकार हैं और पूर्वाग्रह से उपर उठकर काम करते हैं। विचारधारा के स्तर पर भी किसी वाद से जुडे हुये नही हैं लेकिन सबकुछ उनके हाथ में तो है नही वैसे मेरी शुभकामना उनके साथ हैं , जहां भी रहें अपने तेवर को बनाये रखें ।