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यह रहा मेरी संपत्ति का नहीं, स्रोत का खुलासा

संजय सिंहजनसत्ता की नौकरी छोड़े नौ साल पूरे हो गए। 5 मई 2002 को 38 साल की उम्र में वीआरएस लिया था तो ये नहीं सोचा था कि बगैर नौकरी के नौ साल इतनी आसानी से कट जाएंगे। पर अनुवाद का धंधा मैंने सही समय पर शुरू किया और इसने पूरा साथ दिया है। दुनिया भर में चली मंदी का असर इस धंधे पर और इसके साथ मुझ पर भी हुआ और इसीलिए बीता साल कैसा रहा, लिखते हुए हालांकि मैंने स्थिति का बयान किया था पर कुछ लोगों ने उसमें निराशा का भाव देखा और चिन्ता भी जताई।

संजय सिंहजनसत्ता की नौकरी छोड़े नौ साल पूरे हो गए। 5 मई 2002 को 38 साल की उम्र में वीआरएस लिया था तो ये नहीं सोचा था कि बगैर नौकरी के नौ साल इतनी आसानी से कट जाएंगे। पर अनुवाद का धंधा मैंने सही समय पर शुरू किया और इसने पूरा साथ दिया है। दुनिया भर में चली मंदी का असर इस धंधे पर और इसके साथ मुझ पर भी हुआ और इसीलिए बीता साल कैसा रहा, लिखते हुए हालांकि मैंने स्थिति का बयान किया था पर कुछ लोगों ने उसमें निराशा का भाव देखा और चिन्ता भी जताई।

हालांकि उस लेख के बाद यानी इस साल के शुरू से स्थिति में काफी सुधार हुआ है। अपने पिछले लेख में मैंने लिखा था कि नए साल में एक वेबसाइट बनाने का इरादा है और मुझे खुशी है कि वेबसाइट www.prachaarak.com अब तैयार है हालांकि मुझे जो पुराने मैटर अपलोड करने हैं वो अभी नहीं कर पाया हूं और इसमें समय लगेगा। इस बारे में आगे।

नौ साल बगैर नौकरी के कट गए और ठीक ठाक ही कटे। नौकरी नहीं मिली यह सही है पर मैं मांगने भी नहीं गया। कम-ज्यादा, जो भी पैसे कमाए नौकरी जाने का कभी कोई डर नहीं रहा। किसी की जी हुजूरी नहीं करनी पड़ी सो अलग। संपत्ति के खुलासे की खबरें पढ़कर मुझे लगा कि मैं किसी पद पर हूं ही नहीं तो पद के दुरुपयोग की गुंजाइश ही नहीं है। रही बात किसके लिए अनुवाद करते हो, तो वह हरेक अनुवाद में साफ-साफ लिखा है। जो फ्लैट खरीदने के लिए पैसे कम पड़ने पर मैंने वीआरएस लेने का सबसे आसान रास्ता चुना था वो उसी समय, जनसत्ता में मेरे बॉस शंभू नाथ शुक्ल के शब्दों में चौथाई करोड़ रुपए का था। और इस शानदार फ्लैट में मेरी जीवन शैली ऐसी थी कि उत्तर प्रदेश में तैनात आईपीएस अफसर की पत्नी और मेरी बहन ने मजाक में ही सही, कहा था – अनुवाद से इतना पैसा? दाउद इब्राहिम के लिए काम करते हो क्या। जनसत्ता में मुझे जो पैसे मिलते थे वो हमेशा ही बहुत कम लगे। पर वहां रहते हुए एक राहत थी। क्या करते हो का सीधा और विश्वसनीय जवाब था, जनसत्ता में हूं। कुछ दिनों तक तो “जनसत्ता में था, छोड़ दिया” – कहकर भी काम चला। पर धीरे-धीरे तो स्थिति यह हो गई कि इस सवाल से मैं डरने लगा। जी हां, सब कुछ होते हुए भी क्या करते हो – मुझे हमेशा असहज कर देता था।

हालत ऐसी हो गई कि टीवी प्रोग्राम बनाने वाली कंपनी के सर्वे सर्वा एक मित्र ने बातचीत के दौरान बताया कि सिर्फ कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए रखे गए एक सेलीब्रिटी एंकर के नखड़े (और खर्चे) भी काफी ज्यादा हैं तो न चाहते हुए भी मैंने वह काम मुफ्त में करने की पेशकश कर दी। सेलीब्रिटी की जगह मैं कहां ले सकता था, बात नहीं बनी। पर इससे मेरी स्थिति का अनुमान तो लगता ही है। इसके बाद मुझे एक वेबसाइट बनाने का ख्याल आया। भड़ास की सफलता के बाद लगा कि क्या करते हो का जवाब – भड़ास चलाता हूं, हो सकता है। पर साइट भड़ास जैसा लोकप्रिय नहीं हुआ तो यह जवाब वैसे ही होगा जैसे छोटे शहरों में स्ट्रिंगर जब खुद को पत्रकार बताते हैं तो लोग पूछते हैं, कमाने के लिए क्या करते हो? मेरी स्थिति थोड़ी अलग है। साइट से पता चल जाएगा कि मैं किसके लिए अनुवाद करता हूं। वैसे तो मुझे कोई परहेज नहीं था पर संयोग से इनमें नीरा राडिया नहीं हैं।

फिर भी, साइट पर पढ़ने योग्य काफी सामग्री है और खास बात यह है कि अभी तक लगभग सारा मैटर दोनों भाषाओं में है। इरादा तो साइट पर हिन्दी के मैटर ही रखने का था पर कुछ मित्रों ने सलाह दी कि अंग्रेजी का मैटर उपलब्ध है ही तो क्यों नहीं उसे भी अपलोड कर दिया जाए। अपने अनुवाद को मूल अंग्रेजी के साथ पबलिक डोमेन में रखने का आईडिया मुझे जरा चुनौतीपूर्ण लगा और इसीलिए पसंद आया। इसके बाद मैंने देखा कि पिछले दो साल के अंग्रेजी के मैटर तो हैं पर पुराने वाले मैंने संभाल कर नहीं रखे हैं। जबकि हिन्दी में मैंने जितना अनुवाद किया है, लगभग सारा ही उपलब्ध है। ऐसे में जो साइट बना है उसमें आप जहां भी हैं, स्विच टू इंग्लीश पर क्लिक करेंगे, वही पेज अंग्रेजी में खुल जाता है और यह पेज किसी वेबसाइट के गूगल अनुवाद से काफी बेहतर है, यह देखकर मुझे तो गर्व होता ही है।

पर जो दो आलेख हिन्दी में ही हैं उसका अंग्रेजी न होने के कारण जो स्क्रीन खुलता है वह मुझे काफी निराशाजनक लगा। इसलिए काम ढीला हो गया और मामला आगे नहीं बढ़ा। पिछले 15-20 साल में मैंने जिन आलेखों और प्रचार सामग्रियों का अनुवाद किया है वह इतना है कि भरपूर सूचनाओं, जानकारियों से समृद्ध हिन्दी का एक बढ़िया वेबसाइट होगा जहां खेती से लेकर स्वास्थ्य और कार से लेकर तकनालाजी तक की खबरें हैं। इनमें पढ़ने योग्य सामग्री इतनी है कि उसे छोड़ने पर साइट बनाने का उद्देश्य ही पूरा नहीं होता। कइयों से बात करने के बाद फिनेस़ पीआर की आभा आजाद ने सुझाव दिया कि मूल अंग्रेजी न होने के कारण हिन्दी की सामग्री को भी अपलोड नहीं करना अक्लमंदी नहीं होगी। उनका सुझाव है कि हिन्दी के आलेख में ही प्रमुखता से लिखा रहे कि उसका मूल अंग्रेजी नहीं है ताकि निराश करने वाला स्क्रीन खुले ही नहीं। मुझे भी आईडिया पसंद आया – मैं चाहता हूं कि ऐसे आलेखों के साथ स्विच टू इंग्लीश को निष्क्रिय कर दिया जाए। इस लाइन पर काम करके हिन्दी के मैटर अपलोड करने का काम अभी होना है। फिलहाल, इन दिनों जो अनुवाद कर रहा हूं उन्हें अपलोड करता जा रहा हूं।  इस बीच सभी साथियों और पाठकों से आग्रह है कि प्रचारक डॉट कॉम को देखकर इसे और बेहतर बनाने के लिए [email protected] पर सुझाव दें।

लेखक संजय कुमार सिंह लंबे समय तक जनसत्ता, दिल्ली से जुड़े रहे. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना खुद का काम शुरू किया. अनुवाद के काम को संगठित तौर पर शुरू किया. ब्लागिंग में सक्रिय रहे. सामयिक मुद्दों पर लिखते-पढ़ते रहते हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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0 Comments

  1. ये बेचारा काम के बोझ का मारा..

    May 5, 2011 at 4:53 am

    संजय की आजकल की ज़िंदगी देखकर ईर्ष्या होती है। क्या मस्त लाइफ है।
    पैसा तो सब कमाते हैं कोई कम कोई ज़्यादा। लेकिन ज़िंदगी का सारा आनंद संजय ले रहा है। जब मेरे जैसे बंधुआ ऑफिस के लिये भागने की जल्दी में होते हैं संजय को वैशाली में बेफिक्री से घूमते देखता हूं तो रश्क होता है।

  2. विपुल रस्तोगी

    May 5, 2011 at 10:51 am

    संजय जी नें जो कुछ भी लिखा है उससे मैं पूर्ण रूप से सहमत हूँ। और साथ-ही-साथ दिये गये पहले कमेंट से भी। जब भी इनके घर जाता हूँ यह मुझे अपनी यूनीफार्म में मिलते है। यूनीफार्म से मेरा अभिप्राय ( कुर्ते-पायजामे) से है। सो जब कभी भी उससे अलग परिधान में मिलते है तो स्वतः ही पता चल जाता है कि श्रीमान आज या तो बाहर जा रहे है या कहीं से आ रहे है। ऐसी स्वच्छंदता भला कहाँ नसीब होती हो सबको।

    संजय जी, आप शायद इपना ई-मेल पता गलत लिख गये है, सो सही कर रहा हूँ।

    [email protected]

  3. Rajesh Ahuja

    May 5, 2011 at 12:43 pm

    आपका सन्देश क्या है? लोग प्रोपर्टी बनाने के लिए पत्रकारिता का पेशा छोड़ दें और शानदार जीवन शैली के लिए एलजी सैमसंग की बिक्री बढाने वाले विज्ञापनों का अनुवाद करें? हद है यार कैरियरवाद की भी.

  4. Ashok Bansal, Mathura

    May 5, 2011 at 1:23 pm

    sanjay तुम जिंदगी को chunoti के रूप में ले रहे हो.ऐसा आपके आलेख को pad कर लगा. Mene आपको डेस्क पर kaam करते dekha है.लीक से hatkar जीवन जीने वाले मुज्क्षे अछे लगते है.nokri की तलाश में तो duniya दर दर की ठोकरें kha रही है.

  5. umesh joshi

    May 7, 2011 at 7:26 am

    patrakaarita mein bahut kam log hain jo izzat paane ke haqdaar hain. sanjay un kam logon mein bhi bahut uper hain. Mere Sanjay se arase se kareebi sambandh hain. Aaj bhi sambandhon mein wohi taazgi hai. Aisa isliye hai ki Sanjay behad bindaas, paardarshi aur imaandaari ke saath apani sharton per jeene wala patrakaar hai.

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