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इस बार सुभाष राय की शख्सियत से होगी ‘गुफ्तगू’

इलाहाबाद से प्रकाशित हो रही त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका गुफ्तगू के जून 2011 के अंक के शख्सियत कालम में वरिष्‍ठ पत्रकार सुभाष राय की शख्सियत प्रकाशित की गई है। पत्रिका ने इस कालम की शुरुआत वरिष्ठ पत्रकारों की जीवनी और उनके अनुभवों को प्रकाशित करने के उद्देश्‍य से किया है। इससे पहले दिसंबर अंक में नरेश मिश्र और मार्च अंक में फजले हसनैन के बारे में प्रकाशित किया गया था। इन वरिष्ठ पत्रकारों से विजय शंकर पांडेय ने बात की है। सुभाष राय ने बातचीत में बताया कि उन्होंने पत्रकारिता को एक मिशन की तरह अपनाया और निभाया।

इलाहाबाद से प्रकाशित हो रही त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका गुफ्तगू के जून 2011 के अंक के शख्सियत कालम में वरिष्‍ठ पत्रकार सुभाष राय की शख्सियत प्रकाशित की गई है। पत्रिका ने इस कालम की शुरुआत वरिष्ठ पत्रकारों की जीवनी और उनके अनुभवों को प्रकाशित करने के उद्देश्‍य से किया है। इससे पहले दिसंबर अंक में नरेश मिश्र और मार्च अंक में फजले हसनैन के बारे में प्रकाशित किया गया था। इन वरिष्ठ पत्रकारों से विजय शंकर पांडेय ने बात की है। सुभाष राय ने बातचीत में बताया कि उन्होंने पत्रकारिता को एक मिशन की तरह अपनाया और निभाया।

श्री राय ने जहां देश और समाज में आ रही गिरावट और भ्रष्टाचार के प्रति नाराजगी प्रकट की,  वहीं इस गिरावट से उबरने के लिए मीडिया में उन्हें एक उम्मीद की किरण भी नज़र आई। श्री राय का मानना है कि ऐसे वक्त में जब लोगों के हक मारे जा रहे हों, लोगों पर जुल्म हो रहे हों, अपराध बढ़ रहे हों लोग अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ करके निजी स्वार्थों की पूर्ति में लिप्त हो गये हों,  तब इस धारा को उलटने में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। पत्रकारों की सफलता वे इस बात से आंकना चाहते हैं कि उसने समाज के लिए देश के लिए क्या किया। यही बात वह अपने उपर भी लागू करते हैं।

उनके अनुसार पत्रकार को परिवर्तन की गति को पहचानने की समझ होनी चाहिए और इस परिवर्तन को सही दिशा में गति देना उसकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि पत्रकार अपने विजन में पूरी तरह से समर्पित नहीं दिखता, इसका सबसे बड़ा कारण है बाजारवाद और पूंजीवाद। पत्रकार अब पूरी तरह से पूंजी से नियंत्रित हो रहा है। पूंजी ने मीडिया को भी अन्य धंधों की तरह एक धंधा बना दिया है, जिसमें पूंजी लगाने वाला फायदे की बात सबसे पहले सोचता है। शायद यही वजह है कि मुद्दों की तलाश भी पूंजी के दृष्टिगत होने लगी है और वही मुद्दे उठाये जाते हैं जिससे धंधा बढ़े। इसी दबाव ने पत्रकारों की आजादी में ब्रेक लगा रखा है।

उन्‍होंने माना कि पत्रकार की कलम और वाणी धंधे के वसूलों से बंध गई है। उसे उतनी ही आजादी है जितनी उसे उसका मालिक देता है। बावजूद इसके कोई भी मीडिया की भूमिका को नकराने की हिमाकत नहीं कर सकता है। यह नहीं कह सकते हैं कि मीडिया की ताकत खत्म हो गई है। समय-समय पर यह बात सिद्ध हुई है और मीडिया के दबाव के चलते ही न्याय भी मिला है,  चाहे वह जेसिका लाल का मामला हो, रुचिका का या फिर सांसदों की रिश्वतखोरी की मामला रहा हो।

श्री राय का मानना है कि सूचना देकर या कुछ शब्द लिखकर दे देने से पत्रकार की भूमिका खत्म नहीं हो जाती। पत्रकारों की भूमिका एक सोशल एक्टिविस्ट की होनी चाहिए और आज के दौर में तो यह और भी बेहद जरूरी हो गया है। आज के परिदृश्य को गर देखें तो हमारे समाज में पहल करने की इच्छा लोगों में खत्म होती जा रही है। लोग अन्याय, जुल्म, भ्रष्टाचार व अत्याचार देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। अपनी जरूरत पर वह भी इसमें शामिल हो जाते हैं। उसका विरोध नहीं करते। ऐसी स्थिति में जब शब्दों की सार्थकता को अपना वजूद खोने का भय हो तो इस वजूद को बचाने के लिए पत्रकार को शब्दों से आगे जाना ही होगा।

श्री राय का मानना है कि यह वक्त मीडिया के लिए ‘कठिन दौर’ है और पत्रकार को नई भूमिका तलाशने का भी सही समय है। यह भूमिका क्या होगी इसके लिए विचार की आवश्यकता है। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और चंद्रशेखर आजाद को अपना रोल माडल मानने वाले श्री राय कालेज के जमाने से ही क्रांतिकारी विचारधारा के रहे हैं। आपातकाल का विरोध करते हुए उन्हें जेल जाने में भी हिचकिचाहट नहीं हुई, जहां उनकी मुलाकात संघियों, जमाते इस्लामियों और आंनद मार्गियों से हुई और अनेकता में एकता की असली तस्वीर देखने को मिली। वहीं उनके प्रथम काव्य गुरु पंडित उमाशंकर तिवारी मिले तो कवि श्याम नारायण पांडे का भी सानिध्य मिला, जिनसे प्रेरित होकर श्री राय वीर रस की अनेक कविताएं पहले ही लिख चुके थे। यद्यपि आपातकाल ने पहले ही श्री राय के भीतर प्रेमगीत लिखने वाला एक सुकुमार कवि था जो कालांतर में मंगनू सिंह की प्रेरणा से राष्‍ट्रीय भावना को जगाने वाला ओज से भरपूर कवि बन बैठा।

सुप्रसिद्ध समाजसेवी गोविंदाचार्य, राम बहादुर राय, प्रबाल मैत्र, डा. कन्हैया सिंह, राम नरेश यादव, यशवंत सिंह, जयशंकर गुप्त, कैलाश गौतम,  डा. मुकुंद देव शर्मा, पंडित परमानंद शुक्ला, बाल कृष्ण पांडेय, हेरम्ब मिश्र, अवध बिहारी श्रीवास्तव, सत्य नारायण जायसवाल, डा. जगदीश द्विवेदी, एसके दुबे, केबी माथुर जैसे अपने क्षेत्र की महान प्रतिभाओं के सानिध्य में रहे श्री राय हिन्दी दैनिक आज, देशदूत, अमृत प्रभात,  अमर उजाला और डेली न्यजू एक्टिविस्ट जैसे सामाचार पत्रों में उच्च पदों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। अध्यात्मिकता के रंग में रंगे श्री राय को न तो आरएसएस बांध सका और न हीं वामपंथ। एक समय तक साधना की ओर दीवानगी की हद तक आकर्षित श्री राय का इस ओर से भी आकर्षण खत्म हो गया है। विशुद्ध रूप से मानवता की ओर वर्तमान में जीने वाले श्री राय हमेशा भविष्य की ओर पैनी नजर रखते हैं। प्रेस रिलीज

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0 Comments

  1. Dr Maharaj singh Parihar

    May 6, 2011 at 4:35 pm

    हम बेताबी से इंतजार कर रहे हैं पत्रिका के जून अंक का। इस प्रेस रिलीज में आपने डॉ.सुभाष राय के बारे विभिन्‍न अखबारों का उल्‍लेख किया है लेकिन मेरी जानकारी में उन्‍होंने डेली न्यजू एक्टिविस्ट में अपनी सेवाएं नहीं दी हैं। मैं भी डॉ. राय से पिछले दो दशक से जुडा हुआ हूं । वह आगरा सहित कई स्‍थानों से प्रकाशित डीएलए के विचार संपादक रहे हैं। इस अखबार में उनके सांनिध्‍य में काम करने का मुझे भी सुअवसर मिला है।

  2. madan mohan

    May 6, 2011 at 7:33 pm

    yeh to ttm hai bhai sab.

  3. ashwani

    May 14, 2011 at 7:59 am

    adarniya rai sir ke ek baat bahut khaas hai jo wo mujhse aksar kahte hain ‘prakriti har insan ko jindagi me mauka deti hai’ ye baat rai sir par puri sateek baithe hai. rai sir kabhee mauko ke piche nahe bhaage, balke khud ke sakshiyat ko aisa banaya ke mauke unke piche rahe. naye jamane ke journlists ko bhee is baat ka matlab samajhna chahiye, rai sir ke sakshiyat ko prakashit karne ke liye shree pandey je ko sadar dhanyavaad.

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