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दुख-दर्द

मुझसे मत जी को लगाओ कि नहीं रहने का…

विश्व प्रसाद बसुहमारी नस्ल ने ऐसे में आँख खोली है,

जहां पे कुछ नहीं बेरंग मंज़रों के सिवा

लोकतंत्र में सच कहने वालों को क्या-क्या झेलना-सहना पड़ता है, इसके ढेरों उदाहरण होंगे लेकिन 72 साल के वरिष्ठ पत्रकार विश्व प्रसाद बसु की कहानी सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। पथराई आंखें-जर्जर शरीर के बावजूद यह शख्स गलत के सामने झुकने और समझौता करने को तैयार नहीं है, भले ही जिंदगी के एक-एक पल पहाड़ जैसे हो गए हों। 

विश्व प्रसाद बसुहमारी नस्ल ने ऐसे में आँख खोली है,

जहां पे कुछ नहीं बेरंग मंज़रों के सिवा

लोकतंत्र में सच कहने वालों को क्या-क्या झेलना-सहना पड़ता है, इसके ढेरों उदाहरण होंगे लेकिन 72 साल के वरिष्ठ पत्रकार विश्व प्रसाद बसु की कहानी सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। पथराई आंखें-जर्जर शरीर के बावजूद यह शख्स गलत के सामने झुकने और समझौता करने को तैयार नहीं है, भले ही जिंदगी के एक-एक पल पहाड़ जैसे हो गए हों। 

असम सरकार द्वारा 1997 में बेस्ट जर्नलिस्ट एवार्ड से सम्मानित विश्व प्रसाद बसु असम के पहले बंगाली साप्ताहिक अखबार ‘देशबानी’ के संस्थापक और संपादक रहे हैं। फ्रीडम फाइटर जग बंधु बसु जिन्होंने एक दशक से ज्यादा वक्त अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की अगुवाई करने के चलते जेल में गुजारा, के पुत्र विश्व प्रसाद बसु काले अंग्रेजो की व्यवस्था से एक जंग लड़ रहे हैं और सात साल से अपने परिवार के साथ अपना मूल ठिकाना छोड़कर इस शहर से उस शहर भटक रहे हैं। लेकिन यह भटकाव भी सायास है- खुद को बचाते हुए मिशन को अंजाम तक पहुंचाने की मुहिम।

कलम के इस सिपाही की दास्तान जहां अदम्य साहस-संघर्ष की गाथा है, वहीं लोकतंत्र के खोखलेपन की कथा भी है-


विश्व प्रसाद बसुबंगाली मूल के असमी विश्व प्रसाद बसु असम के मंगलदोई जिले के निवासी हैं। बाबा इस जिले के पहले वकील थे तो पिता फ्रीडम फाइटर और आजादी के बाद जिला कांग्रेस के सचिव रहे। बनारस में जन्मे विश्व प्रसाद बसु ने गुवाहाटी में कोलकाता विश्वविद्यालय से डिस्टेंस एजूकेशन के जरिए इंटरमीडिएट किया। 18 वर्ष की उम्र से ही कलम व पत्रकारिता को जिंदगी का मकसद बना लिया। मंगलदोई की खबरें कोलकाता से प्रकाशित होन वाले युगांतर अखबार में भेजते थे। बाद में गुवाहाटी के अखबार दैनिक शांतिदूत में मंगलदोई के जिला प्रतिनिधि बने। 1957 में गुवाहाटी से असम का पहला बंगाली साप्ताहिक अखबार ‘देशबानी; शुरू किया। धारधार रिपोर्टिंग और स्टोरी के जरिए पूरे असम में नाम कमाया। असम के अन्य सभी छोटे-बड़े अखबारों में विश्व प्रसाद बसु राजनीतिक विषयों पर आलेख रेगुलर लिखते रहे। नार्थ इस्ट के मसलों पर बेबाक और धारधार लिखने वाले विश्व  प्रसाद को असम सरकार ने 1997 में बेस्ट जर्नलिस्ट एवार्ड से नवाजा।

राज्य में उल्फा की सक्रियता बढ़ने और गैर-असमी लोगों की लगातार हत्या से परेशान विश्व प्रसाद बसु ने उल्फा को निशाने पर लिया और इस संगठन की करतूतों के खिलाफ अपने लेखन के जरिए जनमत बनाने में जुट गए। असम में कांग्रेस और उल्फा की मिलीभगत, बांग्लादेशी मुस्लिमों को असम में बसाने और नरसंहार के जरिए हिंदुओं को असम से खत्म कर असम को मुस्लिम बहुल राज्य बनाने की साजिश का अपने लेखों के जरिए विश्व प्रसाद बसु ने खुलासा किया। विदेशी घुसपैठ समेत कई ज्वलंत मुद्दों पर विश्व प्रसाद ने ‘अग्निरथ’ नाम से आठ पेज का एक विशेषांक निकाला। इसकी 5000 कापियां एक हफ्ते में बिक गईं। ‘अग्निरथ’ के लेखों और खुलासों से उल्फा भड़क उठा। विश्व प्रसाद बंधु के उपर हमला हुआ लेकिन संयोग से बच गए। उल्फा के लोग इनसे रंगदारी मांगने लगे।

तत्कालीन असम सरकार ने जान-माल का खतरा देखते हुए विश्व प्रसाद बसु और इनके परिवार की सुरक्षा में बाडीगार्ड तैनात करा दिया। बाद में चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस द्वारा उल्फा से साठगांठ करने से संबंधित एक रिपोर्ट विश्व प्रसाद बसु ने प्रकाशित किया तो असम की तत्कालीन कांग्रेस सरकार नाराज हो गई और बदले की कार्यवाही करते हुए विश्व प्रसाद से सुरक्षा वापस ले लिया। विश्व मजिस्ट्रेट के पास विश्व प्रसाद बसुपहुंचे तो मजिस्ट्रेट के लिखित आदेश के बावजूद सरकार के दबाव के चलते एसएसपी ने विश्व प्रसाद को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया। उल्टे पुलिस वाले भी विश्व और उनके परिवार को धमकाने लगे। विश्व की स्कूल जाती बेटियों को धमकियां मिलने लगीं। सिर पर मंडराते खतरे से परेशान विश्व ने परिवार की सुरक्षा को खतरे में न डालने का निर्णय लेते हुए वर्ष 2001 में गुवाहाटी छोड़ दिया।

वहां से कोलकाता गए और सीपीएम के कई नेताओं से मिलकर ज्योति बसु सरकार से रहने और जीवन यापन के लिए मदद करने की अपील की। कई दिनों तक बहस के बाद आखिरकार सीपीएम ने विश्व से हाथ जोड़ लिया। विश्व प्रसाद परिवार के साथ पुरी पहुंचे और वहां के शंकराचार्य से मिले। शंकराचार्य ने इन्हें आडवाणी के पास भेजा। दिल्ली आकर आडवाणी समेत भाजपा के कई नेताओं से मिले लेकिन दया के अलावा कहीं से कुछ नहीं मिला। पुरी के बाद काफी वक्त फरीदाबाद में बिताया। बाद में विश्व प्रसाद ने अपना परिवार बनारस अपने गुरु के आश्रम भेज दिया और खुद संघर्ष के लिए इस शहर से उस शहर भटकने लगे।

चंदे के सहारे जिंदगी जी रहे विश्व प्रसाद बसु अब भी असम की मुक्ति के लिए सक्रिय हैं और विभिन्न मंचों के जरिए इस मसले को उठा रहे हैं। विश्व प्रसाद बसु का कहना है कि मुश्किलें बहुत हैं, पर मिशन अधूरा नहीं छोड़ेंगे। कुछ महीनों में कलम के जरिए एक बड़ा काम (इस काम के बारे में कुछ भी बताने-लिखने से विश्व प्रसाद ने मना कर किया) करने की तैयारी में जुटे विश्व प्रसाद चिंतित तो होते हैं लेकिन अपने लिए नहीं, अपने परिवार के लिए। गुवाहाटी छोड़ने से बच्चियों की पढ़ाई छूट चुकी है। बड़ी बेटी ग्रेजुएशन कंप्लीट कर चुकी थी और छोटी बेटी बारहवीं। उसके बाद से इन दोनों की पढ़ाई बंद है।

विश्व प्रसाद बसुविश्व प्रसाद बंधु की कहानी देश के कई हिंदी अंग्रेजी अखबारों में प्रकाशित हो चुकी है। दस्तावेजों से भरे बैग को जब विश्व प्रसाद बंधु खोलते हैं तो उसमें अखबारों की कतरनों का अंबार होता है। वे दिखाते हैं, टाइम्स आफ इंडिया में चार कालम में प्रकाशित खबर, शीर्षक है-

Assam journalist escapes ULFA’s wrath

वे हिंदुस्तान टाइम्स पढ़ाते हैं, पांच कालम में खबर, विश्व की तस्वीर के साथ, शीर्षक है

Pen mightier than the sword? Think again

‘द वीक’ में विश्व और उनके परिवार की ग्रुप फोटो के साथ स्टोरी छप चुकी है, इस शीर्षक और उप-शीर्षक के साथ-

Hunted for the truth : Award-Winning Assamese journalist is forced to flee

 ‘द वीक’ की फुल पेज स्टोरी में बसु को कुछ यूं कोट किया गया है- ”Hardship is not new to me, but they are trying to make me a refugee in my own country”

विश्व प्रसाद बसुविश्व प्रसाद ने भड़ास4मीडिया को बताया कि कांग्रेस के कई नेताओं ने लेख के लिए उल्फा से माफी मांगने को कहा ताकि गुवाहाटी में वापसी कर आराम की जिंदगी जी सकूं लेकिन मुझे यह शर्त मंजूर नहीं है। जो लिखा है, कहा है वह सच है और सच से समझौता किसी कीमत पर नहीं करूंगा, भले ही जान चली जाए।

बात करते करते विश्व प्रसाद कई बार आसमान की ओर निहारने लगते हैं। भर आई आंखों को छुपाने की कोशिश करते हुए अचानक बोल पड़ते हैं- ‘‘बस, बेटियों की चिंता है। मेरे चलते उनकी जिंदगी भी कष्ट में है। इसका अपराधबोध मुझे है। लेकिन देश-समाज के लिए संघर्ष में कई बार परिवार को भुगतना पड़ता है। यह सदा से होता आया है। आजादी के समय जाने कितने परिवारों को तबाह किया गया। मेरे पिता को बारह साल तक जेल में रहना पड़ा। मेरी मां और हम भाइयों ने कितना कुछ सहा था। उसी तरह मेरी बेटियां झेल लेंगी। मुझे किसी से शिकायत नहीं है। मैं केवल अपना फर्ज निभा रहा हूं। कलम का फर्ज।” इतना कहते-कहते विश्व अपनी आंखों को रुमाल से ढंक लेते हैं।

दोस्तों, इसके आगे कुछ भी लिखने का मतलब नहीं है। वैसे भी, इसके बाद विश्वजीत से कोई बातचीत संभव नहीं थी।

विश्व को मदद चाहिए लेकिन उन्हें हम और आप मदद नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास मोबाइल नहीं है, मेल आईडी नहीं है, बैंक एकाउंट नहीं है, पता-ठिकाना नहीं है। जो अस्थाई पते हैं, उसका वे सुरक्षा कारणों से खुलासा नहीं करना चाहते। ऐसे में कलम का ये सिपाही हमें-आपको मदद देने का कोई मौका नहीं दे रहा।

इस रिपोर्ट का अंत इन पंक्तियों के साथ करना चाहूंगा-

मुझसे मत जी को लगाओ कि नहीं रहने का, मैं मुसाफिर हूँ कोई दिन को चला जाऊँगा।


(इस रिपोर्ट पर कुछ कहना चाहते हैं तो [email protected] पर मेल कर सकते हैं)
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