
अनीता वशिष्ठ
ये कविताएं स्त्री को समझने के लिए नई निगाह-नई नजर की जरूरत को महसूस कराती हैं. बहुत साफगोई से अपनी भावनाओं का इजहार किया है अनीता ने. उनके ब्लाग ”रास्ते खत्म नहीं होते” से कुछ उनकी कविताएं उठाकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है. अनीता की अभी इसी महीने शादी हुई है. इनके पति पेशे से होम्यो चिकित्सक हैं. इन दोनों को शादी और बेहतर भविष्य के लिए शुभकामनाएं. -एडिटर
स्तनों का जोड़ा
अकसर देखती हूं,
राहगीर, नातेरिश्तेदार
और यहां तक कि
मेरे अपने दोस्तयार…
उन्हें घूरघूर कर देखते हैं,
उनकी एक झलक को लालायित रहते हैं…
—
आज मैं
उन लालायित आत्माओं को
कहना चाहती हूं,
जिनके लिए वे अकसर मर्यादा भूल जाते हैं,
वह मेरे शरीर का हिस्सा भर हैं…
ठीक वैसे ही, जैसे
मेरे होंठ,
मेरी आंख
और मेरी नाक
या फिर मेरे पांव या हाथ…
—
इसी के साथ
मैं उनसे अनुरोध करती हूं…
मेरे मन में यह संशय न उठने दें
कि मैं नारी हूं या महज स्तनों का एक जोड़ा…
मेरा अस्तित्व: वीर्य सा
मेरा अस्तित्व
तुम्हारे हस्तमैथुन से
गिर पड़े उस वीर्य सा है,
जिसे फेंकना
तुम्हारे लिए
जरूरी होगा,
—
काश कि
मेरा अस्तित्व
किसी के पेट में पलते
तुम्हारे वीर्य के
उस कण सा होता
जिसे देखना
तुम्हारे लिए
सबसे जरूरी होगा।
बेचैन आयु
मुझे माफ करना जीवन
के मैं तुम्हें न जी सकी,
मुझे तोड़ देना संघर्ष
के मैं तुम्हें न सह सकी…
झूठी परंपराओं की वेदी पर…
अपने नेह को घोट पाना
कितना मुश्किल है
मेरे नेही
तुमने भला कब जाना
इससे तो अच्छा है
पिघल कर घुल जाउं,
लिप्त हो जाउं
तुम में
तुम्हारी प्राण वायु में
खो जाउं वाष्प सी कहीं
कि लौट कर
वापस न आ पाऊं
इस बेचैन आयु में…
मेरी एक और मौत
मेरी मौत को
आत्महत्या का नाम न देना
यह तो एक कत्ल है
इसकी शिनाख्त करवाना…
समाज के
हर उस ठेकेदार को
इसकी सजा दिलवाना
जो मेरी आजादी पर
अपने नियमों का
पहरा दिए रहता था…
हर उस शख्स पर
जुर्माना लगाना
जिसने मेरे अरमानों को
सहला सहला जवां किया
और परंपराओं की वेदी पर
नग्न कर शोषित किया
उस खास शख्स को
यातना जरूर देना
जिसने झूठे वादों की सेज पर
बार बार मेरा बलात्कार किया…
और हां
अंत में
यह घोषण करना न भूलना
कि
यह आत्महत्या नहीं थी
यह कत्ल था
वह भी अनजाने में नहीं
बल्कि
एक सोच समझी साजिश के तहत…
काश
काश कि
मैं पत्थर होती
कोई मूर्तिकार आता…
और मुझ पर
गढ़ जाता
तुम्हारे नाम का पहला अक्षर।
बनना और बिखरना
कभी नहीं चाहा था
कि मैं किसी के बिस्तर की,
सिल्वट भर बन रहूं,
कुछ ऐसी
कि उठने पर,
उसे खुद न पता हो
कि किस करवट से,
उभर आई थी मैं.
जरा गौर से देखो,
हमारा रिश्ता,
कुछ ऐसा ही तो है,
हां,
मैं हमेशा चाहते,
न चाहते
तुम्हारे सामने बिछ जाती हूं,
तुम उठते हो
और मुझे झाड़ देते हो
सदा के लिए…
तुम्हारी कसम
सच कहती हूं,
यह सोचकर अजीब लगता है
कि
मेरे अस्तित्व का बनना
और
बन कर बिखर जाना
तुम्हारे ऊपर ही निर्भर करता है.
स्नेहमयी पराजय
छीन लो आज मुझसे
मेरा यह भय,
हो जाओ सदा के लिए
कहीं गहन अंधकारमय,
नित क्षणप्रतिक्षण
तुमसे दूर होने का,
यह निर्बाध भय,
निस्वार्थ सा बढ़ता है,
मुझमें अक्षय
बना लो दूरियां मुझसे,
तुम हो निर्भय
न घबराओ परिणाम से
कदाचित तय है
मेरे अस्तित्व का क्षय
क्योंकि मैं स्वयं ही
स्वीकार चुकी हूं,
तुमसे,
अपनी स्नेहमयी पराजय…
मैं और मेरा कमरा…
मैं जमीन पर पडे एक गूदड पर रजाई लिए बैठी हूं
ठीक सामने एक संदूक पर,
सिल्वटों भरी मेरी पेंट पडी है
उपर हैंगर पर एक चाइनीज जींच टंगी है,
दो दीवारों पर टिका एक टांड भी है
जिसमें न जाने क्या क्या भरा है
टांड पर पुरानी साडी का परदा
और उसके ठीक नीचे एक डबलडोर फ्रिज रख है
साथ में एक गेंहू की टंकी
तनी खडी है षायद किसी अकड में है
साथ ही सटी है पूजा की अलमारी
जिस पर परदा लगा है
श ssss षायद भगवान सो रहे हैं
इसके नीचे रखी है सिलाई मषीन
और तितर बितर पडे धागे
एक केंडल स्टेंड और
डाइनिंग टेबल सेट की एक कुर्सी
कुल मिलकार पता चलता है
कि मैं
एक मध्यवर्गीय परिवार से हूं
निरक्षर हाथों का जोड़ा
रोज देखती हूं
एक निरक्षर हाथों का जोडा
दिल्ली की हर रेड लाइट पर
बेच रहा होता है
साक्षरता का पहला ‘अक्षर’
इस जोडे को शायद
जमा घटा का ज्ञान नहीं
किंतु एक रुपय की कीमत
भली भांती ज्ञात है
मैला सिर, मैले लत्ते,
और मैली आंखों में चमकता वो शुद्ध मन…
मुझे रोज याद दिलाता है
कि
वह मेरे साक्षर हाथों का श्रष्टा है…
इसलिए ही कहती हूं
जब कभी
अपनी साक्षरता का पर गुरुर हो,
दौड कर उस रेड लाइट पर जाएं
और देखें
आपके हाथों को साक्षर बनाने वाले
वो नन्हें हाथों का जोडा
आज भी उसी चौराहे पर
10 रुपय के जोडे के हिसाब से
पैंसिलें बेच रहा है
वही पैंसिल
जिसे पकड
आपने पहला अक्षर लिखा था…












baquer mohsin
May 26, 2011 at 2:16 pm
admirable,thought provoking and beautiful poems,being poet iwould like to read some poems of the poetess.
संजीव चौहान
May 26, 2011 at 10:31 am
अनिता,
आपके लिखे शब्दों में “आपको” पढ़ा। समझने की कोशिश नहीं की। क्योंकि शायद मैं खुद को इस लायक नहीं समझता कि मैं आपको समझने की कोशिश करूं। मैं समझता हूं, कि अगर किसी को समझना हो, किसी को जानना हो, तो उसका लिखा पढ़ो। और खुद की कुव्वत हो, तो लिखने वाले को समझ जाओ। दाद देता हूं तुम्हारे लिखे को। तुमने वही लिखा है, जो जिंदगी में देखा-परखा है। ये मत समझना कि भड़ास पर लगी तुम्हारी फोटो देखकर, भावनाओं में बह कर ये सब लिख मारा है। अगर तुम्हारी फोटो नहीं देखी होती, तब भी यही लिखता जो लिखा है। दाद तुम्हें कम तुम्हारी सोच को ज्यादा देता हूं। तुम्हारे ऊपर मौजूद उस मां सरस्वती को प्रणाम करता हूं, जो तुमसे वही लिखवाती है, जिसे तुम अपने चारों ओर देखती हो। मसलन- संदूक पर पड़ी पैंट। टांड़ पर लगा पुरानी साड़ी का परदा। हैंगर पर टंगी जींस। मर्द की उस आंख की सोच-समझ, जो सामने मौजूद लड़की-औरत के स्तनों को देखकर बयां होने लगती है खुद-ब-खुद। संभव है तुम्हारे द्वारा कागज पर उतारे गये स्त्री के स्तनों के जोड़े के सच को पढ़ने के बाद शायद मर्द जात कुछ शर्म खाये। सोचे कि जिन स्तनों को देखकर वो सड़क पर ही लार टपकाने लगता है, इन्हीं स्तनों का दूध पीकर वो आज दुनिया में किसी मां का बेटा कहलाने के लिए जिंदा है। अगर स्तन सिर्फ लार टपकवाने भर की ही चीज तक सीमित होते, तो शायद आज मां नाम के रिश्ते का नाम-ओ-निशां नहीं होता। शुक्रिया एक औरत की उस कलम को जिसने लिखा औरत के स्तनों के उस सच को, जिन्हें देखकर मर्द लार-टपकाऊ सोच से आगे कभी नहीं बढ़ सका। खुद भी मर्द हूं, इसलिए दो टूक लिख रहा हूं।
संजीव चौहान
arvind singh
May 26, 2011 at 5:06 pm
anita ne us kadave sacha ka bayaan kar diya hai jo jaan boojha kar har koi sweekar nahi kar sakata,kyunki kisi ke msweekaar bahr kar lene se usaki sadi hui socha ujaagar ho sakati hai. sacha me anita ne bahut badi baad ko behad sadagi se bayaan kiya hai jise padhane ke baad apane mard hone ka garoor apane aap khatam ho jata hai ki kyaa ham itane hi gire huye hai ki ham jisaka doodha peekar bade huye hai use mahaj ek hi maksaad ya niyat se dekhana chahate hai aur jis jagah se nikale hai usake bare me to usase bhi vibhast socha rakhate hai.kyaa karogi anita badakismati se aaj wahi sachai hai jisaki peeda ko tumane badi dard se bayaan kiya hai. sacha me tumhari rachana kabile tareef hai. is kadave sacha ko koi nahi zuthala sakata ki aaj bhi is padhe likhe aur tatha kathit sabyaa kahe jaane waale samaj ke purusho ki socha aaj bhi itani gandi hi hai.ki manav samaz ke liye sabase jyaada jaroori anga ko dekhane ki unaki socha kuchha isi tarah ki hai. anita u r really gr8 who dare to express her feelings in this manner.
Kumar Rajendra
May 26, 2011 at 8:53 pm
aneeta ji is zamaane me itni boldness ko kya kahoon, kyonki log to peeda ko bhi Mazaa samajh lete han.
ravi
May 26, 2011 at 9:34 pm
सुंदर
kumarkalpit
May 27, 2011 at 12:53 am
anita ji aap ki kavita mae dhumil ke chalak dikh rahi hai . yah poorush pradhan shamaj ki manshikta hai ki yah nari ko dehn se aage kuch samj hee nahee paya.yaa u kahen kee samajhana hee nahe chahata
vikram dutt
May 27, 2011 at 4:37 am
अनीता आपने बहुत अच्छा लिखा है, जो लिखा सच्च लिखा ! लेकिन मै ज्यादा नहीं सिर्फ इतना भर कहना चाहूँगा की मैंने भी स्तन देखे, उनसे दूध पिया, गालों को चूमा और पाया की वो मेरी जननी है, माँ है जिसका मै उपकार भूला नहीं सकता ! जिस वीर्य की बात करती है आप मै सब उसी का परिणाम है, ये सब होने के बाद ही तो जीवन उसके बाद आगे बढ़ता है ! लेकिन जिस बात से आप की आहत कविता में उभरी है, उसे दिल पे ना लो मै ये नहीं कहता की ये सही नहीं है क्योंकि मेरी भी बहन है, माँ है,भाभी है और दोस्त है ! लेकिन हर नजर के मायने बदल जाते है ! आपने लिखा, आपका शुक्रिया ! बहुत सच्च जिसे लिखने की हर किसी की हिम्मत नहीं होती ! साथ ही माफ़ी चाहता हूँ की मेरी बात अगर किसी को बुरी लगी हो तो मुझे माफ़ करना ! [email protected]….
ziaurrahman aligarh
May 27, 2011 at 6:29 am
anita g , aap vahut achhi soch rakhti hain . samaj me ab bhedixe jyada paida ho gaye hain
Aneeta
May 27, 2011 at 6:59 am
aap sabhi ka bahut bahut shukriya. par mene stan aur virya se hat kar bhi kavitayein likhi hain… mera vishey kevat itna bhar nahi hai. agar samay mile to unhein dekhna na bhulein.
Aneeta
kavita singh ,bareilly
May 27, 2011 at 7:10 am
anita ji apko likhne me hitkichahat nahi hui kya well bahut achha likha hai
virendra gupta
May 27, 2011 at 12:22 pm
duniya m sab ak jaisai nhi hoti …….
ghanshyam saini
May 27, 2011 at 1:55 pm
madam, hidustan ki TASLEEMA NASREEN banna chati hai shayad. akavita ke shorshrabe me PAGALPAN ko bhi kavita mana ja sakta hai. ye iska sunder udaharan hai. madam aap likh sakti hai par kalam se BLAATKAR mat karie please.
sunila
May 28, 2011 at 6:29 am
har purush ma ke istano ka doodh peekar bada hota hai to kya jindgi bhar har istri ke istano ko apni ma ke istan samajhta rahe? har purush ma ki yoni se janm leta hai to kya har istri ki yoni ke prati vaisa hi bhav rakhe? kya ye nature aur saansaarik jarurato ke khilaaf nahi hoga? han, maryada jaruri hai magar wo maryada lekhan mai bhi to honi chahiye. agar aap khud ko purush ke hastmaithun se nikle veerya ki boond man sakne wali soch aur samajh rakhti hain to istano ko dedhne par aitraj kyo?
Aneeta Vashishta
May 28, 2011 at 9:12 am
Ghanshyam Saini ji,
Main kisi ki pehchan lena nahi chahti. Maine jo bhi likha hain vo meri bhavnaon ka shudh roop hai. Ab nazar aapki hai, jo mehaz ek hi kavita par atak gayi. uske atirikt bhi bahut kuchh tha yadi aap dekhna ya parhna chahte toh. Khair main kavita likhti hun ya nahi ,ye toh khud mujhe nahi pata, par jo bhi ye ban padta hai vo mera ya kisi aur ladki ke bhawnaon ka hi ek rup hai, iske sarthak paksh ko dekhein.
duniya mein koi bhi prakrtik manveey kriya galat nahi hai, use galat ya sahi aapki nazar ya nazariya hi banate hain… is baare mein nishpaksh hokar sochiyega jarur…
Aur Main koi kavi nahi banana chahti bas man ki peeda ko nikal bahar karti hun, ise aap chahe jis tareh se lein ye apki apni svatantrata hai.
—
Rgds
Aneeta Vashishta
ghanshyam
May 29, 2011 at 9:51 am
अनीता जी
लड़की के महज स्तन का जोड़ा होने की पीड़ा जताने के लिए तपाक से सारे पुरुषो को कोसने का चलन
कोई नई बात नहीं है. तथाकथित नारीवाद की नीव इसी पर खड़ी है. हर बालिग नाबालिग के सामने
स्तनों की नुमाईस करने वालो को भी देखिये. मै आपको नहीं जानता, न ही मै आपकी बात कर रहा हु
लेकिन दुनिया में कोई भी मानवीय प्राक्रतिक क्रिया गलत नहीं होती तो आदम ने कपडे पहनने ही क्यों शुरू किये ?
आप यह तर्क क्यों देती है कि मै एक ही कविता पर अटक गया, कविता तो आप ही ने लिखी है,
फिर तो आप अपने कविता सग्रह के ऊपर यह भी लिख दे कि कौन कौन सी कविता पढनी है. खैर आपको शादी कि शुभकामनाये
एक बात और, अब से एक साल बाद आप जो लिखेंगी वो भी मै जरूर पढना चाहूँगा,
शायद तब कुछ मर्दों के हक़ में भी पड़ने को मिले.
Aneeta Vashishta
May 30, 2011 at 7:51 am
Hope for the best Ghanshyam Saini ji. n thx so much for ur wishes. My regds too.
Aneeta
ashok gupta
May 31, 2011 at 12:48 pm
ourat admi ko jo dikhana chahti hai aadmi vahi dekhta hai.
khurram nizami
June 3, 2011 at 9:57 am
ANITA JEE ZARA YEH BHEE PADH LEEJIYE
AURAT AUR MARD MEIN
AB NAHI BACHA HAI KOI BHI FARQ
KAM KOI BHEE HO
MARD KE SAATH AURAT KHADI AATI HAI NAZAR
AUR KABHI KABHI TO
AURAT MARD SE AKSAR AAGE BHEE AATI HAI NAZAR
LEKIN KAAM KE WAQT
AURAT KEHTI HAI AKSAR
DER TAK DAFTAR MEIN RUKNA
UNKI MARYADA NAHIN
BUS MEIN MARD KA BAITHNA AUR AURAT KA KHADA REHNA
HAMARE SANSKAR NAHIN
BUS MEIN AURAT KE KHALI SEAT PAR BAITHNA
SHISHTACHAR NAHIN
KYA YEHI HAI NARIWAAD
AGAR YEHI HAI NAARIWAAD
TO BAND KARO DHAKOSLA
BARABARI KEE BAAT BHEE KARTE HO
AUR ABLA BHEE BANTE HO
YEH DHAKOSLA NAHIN TO PHIR KYA HAI