
महेश भट्ट से बातचीत करते संजीव चौहान
: इंटरव्यू : महेश भट्ट (प्रख्यात फिल्म निर्देशक) :
महेश भट्ट अपनी बेबाकबयानी के लिए जाने जाते हैं. अपने सरोकार के लिए विख्यात हैं. साथ में सेलिब्रिटी भी हैं. उन्हें चर्चाओं में रहना आता है. पिछले दिनों महेश भट्ट इराक से मुंतज़र अल ज़ैदी को भारत ले आए. वही इराकी पत्रकार मुंतज़र अल ज़ैदी, जिन्होंने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर जूते फेंककर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. भट्ट साहब आजकल व्यस्त चल रहे हैं “द लास्ट सैल्यूट” नाटक के मंचन में.
जी हां, द लास्ट सैल्यूट यानि मुंतज़र अल ज़ैदी की आपबीती. राजेश कुमार के लिखे और अरविंद गौड़ के निर्देशन में मंचित हो रहे नाटक द लास्ट सैल्यूट का मंचन 29 मई 2011 को कोलकता में हो रहा है. इससे पहले दा लास्ट सैल्यूट का पहली बार मंचन दिल्ली के मंडी हाउस में मौजूद श्रीराम सेंटर में किया जा चुका है. इसमें महेश भट्ट और नाटक के असली किरदार मुंतज़र अल ज़ैदी खुद भी मौजूद थे. नाटक में मुख्य किरदार में हैं महेश भट्ट की आने वाली फिल्म “चंदू” के हीरो इमरान जाहिद. पिछले दिनों मुंतज़र अल ज़ैदी को लेकर महेश भट्ट से तमाम मुद्दों पर बातचीत की न्यूज एक्सप्रेस चैनल के एडिटर (क्राइम) संजीव चौहान ने… भट्ट साहब से बातचीत के खास अंश…
सवाल- मुंतज़र का ध्यान अचानक इतने साल बाद कैसे आ गया आपको?
जवाब- नीयत पाक-साफ हो। तो आप जो ठानते हैं आपको मिल जाता है। हमने जब मुंतज़र ज़ैदी के बारे में सुना तो गांधी जी की याद आ गयी।
सवाल- मुंतज़र के ध्यान आने से गांधी की याद आने का क्या ताल्लुक?
जवाब- गांधी ने कैसे अंग्रेजों के खिलाफ सिर उठाकर एक रेवल्यूशन, एक एतिहासिक जंग लड़ी। उसके बाद ये हमने आज़ादी पाई थी। तो कहीं पर हमें लगा कि ये तहजीब हमारे मुल्क की ही तहजीब है। तो हमने सोचा कि उन्हें (मुंतज़र अल ज़ौदी) यहां हिन्दुस्तान बुलाकर हमें अपनी ही तहजीब में जान डालनी चाहिए।
सवाल- जॉर्ज बुश पर जूता फेंकने के बाद मुंतज़र को किसी भी देश ने वीजा नहीं दिया था। पहली मर्तबा किसने आपके कान में डाला कि मुंतज़र को हिन्दुस्तान बुलाया जाये और आप लेकर आये।
जवाब- हमारे मित्र हैं इमरान जाहिद साहब (महेश भट्ट की फिल्म चंदू के मुख्य किरदार और मुंतज़र अल ज़ैदी की किताब “द लास्ट सैल्यूट” पर आधारित नाटक में मुंतज़र ज़ैदी का किरदार निभाने वाले) ने मुंतज़र ज़ैदी का जिक्र किया था मुझसे।
सवाल- यानि महेश भट्ट नहीं, इमरान जाहिद लाना चाह रहे थे मुंतज़र को भारत!
जवाब- नहीं ऐसा नहीं था। इमरान ने जब मुंतज़र का जिक्र मेरे सामने किया, उसी समय मेरे जेहन में अपने गांधी बाबा (महात्मा गांधी) आये। सोचा कि मुंतज़र अल ज़ैदी को भारत लाकर गांधी जी के ज़ज्बे को जिन्दा रखा जाये। हमने इस ज़ज्बे में नई उर्जा उड़ेली है।
सवाल- मुंतज़र और गांधी जी में कहीं कोई समानता दिखती है?
जवाब- सोच की सिमिलरिटी (समानता) है, लेकिन क्रांति का अंदाज़ दोनो का अलग-अलग है।
सवाल- खुलकर समझायें जरा। आपके कहने का मतलब क्या है?
जवाब- शायद गांधी की सोच में शत्रु का कोई कान्सेप्ट नहीं है।
सवाल- यानि मुंतज़र शत्रुता की सोच वाले हैं!
जवाब- हां। मुंतज़र की सोच में अब भी शुत्र है। जिसके खिलाफ उन्होंने (मुंतज़र) आवाज उठाई थी। मगर वो (मुंतज़र) एक नौजवान शख्स है। धीरे-धीरे अपना दामन बचाकर एक नई दिशा में चलना शुरू कर देगा।
सवाल- “द लास्ट सैल्यूट” लिखवाने के पीछे क्या वजह रही है ? कहते हैं महेश भट्ट ने ही लिखवाया है!
जवाब- नहीं ये आपबीती है उनकी (मुंतज़र)। जो मुंतज़र के दिल से फूटी और हमने इस राइटिंग को नाटक में तब्दील किया।
सवाल- जिस काम के लिए आप देश-दुनिया में मशहूर हैं….कहीं मुंतज़र ज़ैदी आपकी फिल्म में…..(बीच में ही रोकते हुए)
जवाब- नहीं। नहीं। मुंतज़र एक क्रांतिकारी है। एस सोशल वर्कर है। और मुझे लगता नहीं कि उसका कोई इरादा है। मुझसे जुड़ने का (मेरी फिल्म में हीरो बनने का….)
सवाल- आपकी नज़र में खरे उतरते हैं मुंतज़िर (भट्ट साहब की फिल्म में संभावित हीरो की नज़र से)
जवाब- नहीं मैने कभी इस नज़र से सोचा ही नहीं। हम किस्म के शख्स को जब देखते हैं, वो दूसरी तरह से देखते हैं।
सवाल- आपकी वो कौन सी नज़र है ? जरा खुलकर बतायें…
जवाब- मंच पर अभिनय करने की जो समझ होती है। वो अलग होती है। दरअसल ज़िंदगी में एक क्रांतिकारी का रोल निभाने के लिए एक अलग ज़ज्बा चाहिए।
सवाल- मुंतज़र ज़ैदी महेश फट्ट की फिल्म के हीरो नहीं हो सकते, लेकिन क्या आप मुंतज़र की ज़िंदगी पर फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं?
जवाब- मेरे ख्याल में नाटक (द लास्ट सैल्यूट ) अपने आप में एक सम्पूर्ण माध्यम है। मुझे लगता है इसी के जरिये जो हम सोच रहे हैं, वो हमारी कोशिश के जरिये (नाटक) ही पूरा हो जायेगा।
सवाल- नया क्या धमाका कर रहे हैं आप इन्डिया में?
जवाब- फिलहाल इसी (मुंतज़र और उन पर लिखे नाटक “द लास्ट सैल्यूट” के मंचन ) को जी रहा हूं। इसी को सपोर्ट कर रहा हूं।
सवाल- महेश भट्ट साहब को खुलवाना मुश्किल है…कुछ तो खुलकर बोलिये…
जवाब- नहीं । मैंने अपनी ज़िंदगी को खुली किताब की तरह खोलकर दिखाया है दुनिया को । आज भी वही कर रहा हूं।
सवाल- क्या मुंतज़र अल ज़ैदी को उसकी सर-ज़मीं (इराक) का गांधी मानते हैं?
जवाब- आज की तारीख में नहीं।
सवाल- क्यों?
जवाब- क्योंकि गांधी की सोच से अब भी ये (मुंतज़र) कोसों दूर है।
सवाल- भारत से वापिस जाने के बाद मुंतज़र को अपने देश में क्या कुछ फायदा मिलेगा?
जवाब- शायद एक नई सोच लेकर जाए। और आने वाले कल में एक “पीसफुल-रिवोल्यूशन” क्या होता है? इसकी शुरुआत वहां (इराक) जाकर करे।
सवाल- मुंतज़र अल ज़ैदी की पहचान है बुश पर जूता फेंकने वाले के रूप में। इसी के बाद दुनिया में “जूता- कल्चर” शुरू हुआ। आप इसको किस तरह से देखते हैं?
जवाब- मैंने कहा न, कि उसकी (मुंतज़र ) उम्र का लिहाज करना चाहिए। एक नौजवान इंसान है।
सवाल- क्या आप मुंतज़र के जूता फेंकने की बात को सही मानते हैं? उसकी वकालत कर रहे हैं!
जवाब- नहीं संजीव भाई। सुनिये तो पूरी बात। बोलने भी तो दीजिए मुझे…आप जवाब पूरा होने से पहले ही पकड़ लेते हैं मुझे।
सवाल- जी, जी। बोलिये, बताईये!
जवाब- मैं मुंतज़र के जूता फेंकने की वकालत नहीं कर रहा। न ही उसे सही मानता हूं। मैं ये कहना चाहता हूं, अगर आप मुझे बोलने का मौका दें तो, कि मुंतज़र ने जो भी किया बेबसी और लाचारी में किया। उसने अपने आक्रोश का इज़हार किया था।
सवाल- यानि फिर वही मुंतज़र का बचाव…..?
जवाब- संजीव भाई नहीं। मैं न वकील हूं, न अदालत। मैं सिर्फ महेश भट्ट हूं। उसने (मुंतज़र) अपने देश (इराक) पर बम बरसते देखे हैं। अपनों को बम धमाकों में मरते, बिलखते- तड़पते देखा है। उसका वही अहसास, इजहार था , किसी के ऊपर (जॉर्ज बुश का नाम लिये बिना ) जूता फेंकना। जो शायद मुंतज़र के अंदर से जागा था।
सवाल- क्या इज़हार के इस गलत तरीके पर मुंतज़र काबू नहीं रख सकते थे?
जवाब- माफ करें चौहान साहब। मैं आपके सवाल से बिल्कुल सहमत नहीं हूं। जो हालात इराक में पैदा हुए या किये गये थे, उनमें किसी नौजवान (मुंतज़र का नाम लिये बिना ) से ये उम्मीद करना कि वो अपने आप पर “लगाम” लगा सकता था, तो शायद ये हमारी नादानी होगी।
सवाल- मुंतज़र से आपकी लम्बी बातचीत हुई होगी। आप फैमलियर हैं उससे। क्या मुंतज़र ने अपनी जेल-यात्रा के बारे में आपसे खुलकर बातचीत की?
जवाब- नहीं। मुझे लगता है आदमी वही और उतना ही बताता है, जो और जितना वो बताना चाहता है। और जब रिश्ते मजबूत होते हैं, तो आप अपने आप उसका इज़हार करना शुरू कर देते हैं।

सवाल- मुंतज़र अल ज़ैदी क्या आज के अपने वतन (इराक) के “हीरो” हैं आपकी नज़र में?
जवाब- शायद कुछ “पॉकेट्स” में हैं। पूरे अरब वर्ल्ड में अभी उसे (मुंतज़र) “हीरो” का दर्जा दिया नहीं गया है।
सवाल- अगर महेश भट्ट उसे (मुंतज़र को) अपने प्लेटफार्म पर जगह दे दें, तो शायद हीरो बन जाये?
जवाब- नहीं। मुझे लगता है कि ये (महेश भट्ट और बॉलीवुड) का प्लेटफार्म ही अलग है।











jaihind
May 28, 2011 at 11:18 am
sanjeev sir yeh interview bhatt jee ka hai aap to jaide ko hero banaye manoge nahi ……
tcare
अरीबा खानम, कराची, पाकिस्तान
May 28, 2011 at 12:10 pm
बिलकुल सही फरमाया संजीव जी। महेश भट्ट जी ने खूब भुनाया है मुंतज़र अल ज़ैदी को। आपसे कहते हैं मुतज़र उनकी फिल्म में हीरो नहीं होंगे, और वे यानि महेश भट्ट साहब मुंतज़र अल ज़ैदी को लेकर कोई फिल्म नहीं बना रहे हैं। जबकि मैने पिछले सप्ताह ही महेश जी की पुत्री पूजा भट्ट का इंटरव्यू एक हिंदी अखबार में पढ़ा है। जिसमें वे फरमा रहीं हैं कि मुंतज़र पर फिल्म बनेगी। और उसकी शूटिंग लेबनान या तेहरान में होगी। जहां तक मुझे ध्यान आ रहा है। अबकि भट्ट साहब मिलें तो संजीव जी उनसे पूछ लीजिए कि क्या पूजा भट्ट से भी लड़ाई हो गयी है। बेटी जो कहती है वो पापा जी को पता ही नहीं होता। या पापा की फितरत ही है झूठ बोलना और सुर्खियों में रहना।
अरीबा खानम यूसुफ, कराची, पाकिस्तान
ताहिर रज़ा, बारामूला, कश्मीर,भारत
May 28, 2011 at 12:30 pm
मुंतज़र साहब दुनिया आपके साथ है। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, क्या ईसाई । आप ईमान से मत खेलना। ईमान आपके साथ रहेगा। ये तो दो दिन की मेहमानवाजी थी। हिंदुस्तान में अगर और रहते तो, आपका यहां से इराक जाने को दिल नहीं करता । आपने कुछ भी गलत नहीं किया। आपने तो सिर्फ बुश साहब और अमेरिका की तमन्ना को अंजाम तक पहुंचाया। अल्लाह आपकी मदद करे।
आपका ताहिर रज़ा, बारामूला, कश्मीर, भारत
visrsingh
May 29, 2011 at 7:21 am
sanjeev sir yeh interview bhatt jee ka hai phir bhi aap jaidi ko bhul nahi pate lagta hai aap jaidi ko cash karna chahte ho…
tcare
+0
rajiv singh
May 29, 2011 at 9:58 am
संजीब भाई आपका जबाव नही भट्ट सहाब जबाव देने ले कई बार कतरा रहे थे, आपके तीखे सवालो से
राजीव कुमार
May 29, 2011 at 10:01 am
संजीब भाई आज कल आप मिडिया में आप बीती कहानी पर लिखो ,बहुत लिख दिया आपने इधर-उधर के लिये, पत्रकारो की कहानी अपने कलम से बयां सतो करो….हमें इंतेजार रहेगा और उम्मीद करते है अगले वार आप पत्रकारो पर ही लिखेगे आपको कसम है भड़ास फोर मिडिया की
संजीव चौहान, दिल्ली
June 2, 2011 at 6:38 am
वीर सिंह जी,
आप भड़ास के शुभचिंतक और पाठक हैं। भड़ास और मुझे दोनो को आप सर्वोपरि हैं। आपने भड़ास4मीडिया पर मुंतज़र साहब, महेश भट्ट जी के मेरे द्वारा लिये गये इंटरव्यू पढ़े। इसी के लिए शुक्रिया। इन इंटरव्यू पर आपने अपने जो विचार लिखे। उनका भी तहेदिल से सकारात्मक रुप में शुक्रिया। आप हमारे पाठक हैं, इससे बढ़कर भला और क्या खुशी हो सकती है। भड़ास4मीडिया पर हमारा लिखा पढ़कर इसी तरह हमारे साथ अपनी प्रतिक्रिया बांटते रहिए। खुले दिल-ओ-दिमाग से। आपका संजीव चौहान
kappor
June 2, 2011 at 9:42 am
gud its apriciated dear