Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

चंपू बदनाम हुआ… डार्लिंग तेरे लिए…

उसे लिखने का बहुत शौक था, समझिए कि हर वक्त बस लिखने का भूत सवार रहता था उस पर… उसे खुद नहीं मालूम था कि वो कब से लिख रहा है। दिन रात बड़ा लेखक बनने का सपना पाले वो लगातार अख़बार, मैगज़ीन में लिखता रहता था। कुछ लोगों के कहने पर उसने इंजीनियरिंग छोड़कर पत्रकारिता में कदम रखने की ठानी.. लोगों ने उसे बताया कि पत्रकारिता में पैसा भी है और शोहरत भी और तुम तो इतना अच्छा लिखते हो, तुम तो छा जाओगे.. उसे लगा कि अपने लेखन के दम पर वो मीडिया में छा जाएगा।

उसे लिखने का बहुत शौक था, समझिए कि हर वक्त बस लिखने का भूत सवार रहता था उस पर… उसे खुद नहीं मालूम था कि वो कब से लिख रहा है। दिन रात बड़ा लेखक बनने का सपना पाले वो लगातार अख़बार, मैगज़ीन में लिखता रहता था। कुछ लोगों के कहने पर उसने इंजीनियरिंग छोड़कर पत्रकारिता में कदम रखने की ठानी.. लोगों ने उसे बताया कि पत्रकारिता में पैसा भी है और शोहरत भी और तुम तो इतना अच्छा लिखते हो, तुम तो छा जाओगे.. उसे लगा कि अपने लेखन के दम पर वो मीडिया में छा जाएगा।

अब क्या किया जाए… दो चार महानुभावों ने उसे पत्रकारिता का कोर्स करने की सलाह दे डाली… हालांकि उसके परिवारवाले उसे ऐसा न करने को कह रहे थे लेकिन वो अपनी जिद पर अड़ा रहा और उसने पत्रकारिता के कोर्स में दाखि़ला ले लिया। कोर्स में एडमिशन लेने के बाद वो बेहद खुश रहने लगा, उसे लगता जैसे वो भी कल को टीवी पर खबरें पढ़कर सीधे बडे़-बडे़ लोगों से रुबरु हो सकेगा। ऐसे ही चहलकदमी करते हुए वो दिन भी आ गया जब उसका कोर्स पूरा हो गया।

अब उसे चिंता सताने लगी कि कैसे नौकरी का जुगाड़ किया जाए लेकिन नौकरी तो दूर उसे इंटर्नशिप भी नहीं मिल पा रही थी। अब क्या होगा इसी उधेड़बुन में वो अपना दिमाग लगाता रहता। तभी एक चमत्कार हुआ उसे एक चैनल में इंटर्नशिप मिल गई.. अब ये मत पूछना कैसे… बस भई कैसे भी जैसे हर किसी को मिल जाती है.. यानी जुगाड़। धन्य हो गुरु बादल आ गए और आप छा गए.. लड्डू बंट गए साहब… मानो कोई जंग जीत ली हो… मिंया का कहना साफ था अब देखना कौन माई का लाल रोकता है मुझे।

खैर पहला दिन और काम शुरु… अरे… क्या नाम तुम्हारा… नए हो… इंटर्न… जरा प्रिंटर से पेज ले आओ तो… सुनो यार कैंटिन में बोल देना कि वर्मा जी ने बिना शक्कर की चाय मंगाई है… जी सर… अभी कहता हूं… हां… जल्दी जाओ… ठीक है..सर… दिल को समझाया उसने… ऐसे ही तो लिंक निकलेंगे… क्या फर्क पड़ता है… कोई बात नहीं… सुबह से शाम तक वो अपने आपको दिलासा देकर काम करता रहता… आखिर बडे़ पत्रकारों ने भी यही सब किया होगा। लेकिन ऐसा कब तक चलेगा यहां तो कोई कुछ भी सिखाने को तैयार नहीं है… क्या ये सब इस बात से डरते हैं कि कहीं मैं इनसे आगे निकल गया तो… कैसे-कैसे लोग भरे पडे़ हैं यहां… इन्हें तो पत्रकारिता की एबीसीडी भी नहीं आती और रौब देखो….

पूरे दो महीने हो गए… काम भी अपने दम पर सीख लिया… लेकिन अब नौकरी की तलाश की जाए तो बेहतर हो… सोचकर उसने अपना इंटर्नशिप लेटर ले लिया और चक्कर काटने लगा चैनलों के दफ़्तरों के… लेकिन काफ़ी धक्के खाकर भी उसे नौकरी न मिली, घरवाले पूछते-पूछते थक गए… लेकिन हर बार जवाब न ही सुनने को मिलता तो घरवाले कोसते, लेकिन कहते हैं न देर है अंधेर नहीं, जनाब की किस्मत बुलंद निकली एक चैनल ने उसे नौकरी दे दी… अब क्या था उसकी तो बल्ले-बल्ले… जो जो चैनल वाले कहते गए मिंया आंख मूंदे हर वो काम करते गए… लेकिन हर बार अपने आपको ठगा सा महसूस करते गए…

ये क्या कर रहा हूं मैं… पत्रकारिता या भड़वागिरी… काम बीस हजार का करवाते हैं और पैसा पांच हजार देते हैं… उपर से कभी भी निकाले जाने का डर… कहां फंस गया… लेकिन एक दिन तो गज़ब ही हो गया… बुलेटिन लेट हो गया… एडीटर ने न्यूज़ डेस्क के सारे बंदों की जमकर क्लास लगाई… जो भी मुंह पे आया बक दिया… सारे चुपचाप सुन रहे थे… उससे न रहा गया… उबल पड़ा वो… सर इसमें हम लोगों की क्या गलती है… सारी गलती तो आउटपुट और इनपुट की है… हमें टाइम पे न्यूज़ नहीं मिलती… जानता हूं तुम जैसों को अपनी गलती का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ना आसान है… उसे जैसे करंट लग गया… उससे रहा न गया… अगर ऐसा है तो ये रही तुम्हारी नौकरी… यहां काम करने के लिए हैं तुम्हारी गाली सुनने के लिए नही… जोश में पांव पटकता हुआ घर चला आया…

एक बार फ़िर से संघर्ष शुरू… फ़िर से चैनलों के चक्कर काटना शुरू पर अफ़सोस नौकरी नहीं मिली। और एक रात वो सोचता रहा ऐसे नहीं मिलेगी नौकरी छिननी पड़ेगी, बेशर्म बनना पड़ेगा। अब उसने कुछ नया करने की ठानी… जैसे को तैसा में बदल डाला उसने अपने आपको… और फ़िर अगली सुबह नौकरी हाथ में थी… बिल्कुल हो जाएगा सर आप चिंता न करें, कोई काम हो बंदा हाज़िर, भाड़ में गया लेखन, ये सही है पैसा भी शोहरत भी, सही कह रहे थे लोग, जल्दी समझ में आ गया, फालतू ईमानदारी से काम किया, क्या सिला मिला सिर्फ़ गालियां…अब देखो…छा गए गुरू…

आज वो दो साल में ही दबंग पत्रकार माना जाता है… बडे़-बडे़ लोगों से उठ-बैठ है उसकी… उसकी नज़र बदल गई… उसका काम भी बदल गया… वो बैखौ़फ लोगों को डराता धमकाता उनकी ख़बर लीक करने की धमकी देता और जमकर पैसे वसूल करता… चापलूसी में तो उसने महारत हासिल कर ली थी… अब उसका काम पत्रकारिता कम भड़वागिरी ज्यादा थी… वो बदनाम हो गया था… जब भी कोई उससे इस बारे में पूछता वो बड़ी बेशर्मी के साथ बेहिचक कहता चंपू बदनाम हुआ डार्लिंग (पत्रकारिता) तेरे लिए…

लेखक इंतिखाब आलम नोएडा में टीवी पत्रकार हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. Anshul

    June 4, 2011 at 11:36 am

    Bakai bahut sahi likha hai.Patrakarita jagat ki sachchai hai isme.

  2. visrsingh

    June 4, 2011 at 12:02 pm

    yar dard to hai, yeh ek journalist ki sachchi khani hai…… jo apne field me imandari se kam karna chahata tha….

  3. amitvirat

    June 4, 2011 at 12:04 pm

    kya baabt hai guru behtreen lekhan

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...