यशवंत जी, नमस्कार, उत्तराखण्ड के हल्द्वानी में एक संजय रावत नाम के पत्रकार हुआ करतें हैं। सन्डे पोस्ट, जनपक्ष, आजकल सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में बीते 14 सालों से पत्रकारिता करते हुये जनपक्षीय सवालों को उठाते रहें है।
जमीनी स्तर पर पत्रकारिता करते हुये पत्रकार और उसके मालिक / संपादक के सम्बंधों के साथ पर बीते दिनों उन्होने एक कविता लिखी है। कविता का क्षेत्र न होते हुये भी उन्होंने जिस मार्मिकता के साथ जमीनी पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों का दर्द उकेरा है, उसके चलते लगा कि इसे भड़ास में होना चाहिये। ‘आगे ढलान है’ , शीर्षक से लिखी उनकी यह कविता कुछ जनपक्षीय पत्रिकाओं ने अपने यहां पर प्रकाशित भी की है।
सलीम मलिक
रामनगर (नैनीताल)
उत्तराखंड
आगे ढलान है
-संजय रावत-
सलाम सम्पादक / मालिक!
तुम ज्ञानी हो, वाचक हो, अंर्तयामी, युगदृष्टा और पथप्रदर्शक भी.
तुम्हारे संपादन से जायज, नाजायज और प्रजातंत्र परिभाषित होते हैं.
तुम दुनिया देखने का बेहतर नजरिया पेश करते हो.
लेकिन, हमारी संकुचित जुबान और फैले हुये कान बहुत कुछ वह देख लेते हैं.
जिसे तुम सम्पादित करने से हमेशा बचते हो
क्या तुम नहीं जानते…
कि हमारे बच्चों की आंखों के बीच पड़े स्याह गड्ढे
तुम्हारे बच्चों के गालों में सुर्खियां भरते हैं!
क्या तुम नहीं महसूसते…
कि एक अखबार से खड़े तुम्हारे सैंकड़ों कारोबारों से
हमारे पसीने की बू आती है!
दरअसल,
तुम ‘अर्थशास्त्र’ को विज्ञान और अपनी आस्थाओं को ‘दर्शन’ समझने लगे हो.
तुम देखना नहीं चाहते!
जिन सीढ़ियों को लांघकर तुम शिखर तक पहुंचने की जुगत में हो.
वे हमारे कन्धों में गहरी धंस चुकी हैं.
लेकिन याद रखो सम्पादक…
पहाड़ पर रहने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि
शिखर के बाद ढलान शुरू होती है….
तो संभलो सम्पादक, आगे ढलान है!
रचनाकार संजय रावत से 09759800123 या [email protected] के जरिए सम्पर्क किया जा सकता है.
संजय रावत












narendra dev singh
June 15, 2011 at 6:39 am
punjipati hoti ja rahi media par tamacha hai ye kavita………
दयानंद पांडेय
June 15, 2011 at 10:04 am
वाह क्य बात है संजय जी. जमील खैराबादी का एक शेर आप की इस कविता पर न्यौछावर करना चाहता हूं.
बहुत बलंद फ़िज़ां में तेरी पतंग सही
मगर ये सोच कि डोर किस के हाथ में है.
बहुत खूबसूरत है आप की यह कविता. आह और गान दोनों का आनंद देती है. पर आप को क्या लगता है कि ऐसी कविताएं इन खून पीने वालों को समझ भी आती हैं? या फिर वह इसे पढने भर का समय भी रखते हैं? समझ तो खैर नहीं ही होती है.होती तो आप को यह कविता लिखने की ज़रूरत ही क्यों पडती भला? संजय कुंदन की एक कविता हे अधिकारी भी देखिए अभी याद आ गई. जिस में वह लिखते हैं; हे अधिकारी, हे अवतारी हे कृश्णमुरारी…..!करें आप मुझे नित नए ढंग से अपमानित/ करता हूं कोशिश/न दिखे मेरी कमीज आप की कमीज से ज़्यादा सफ़ेद.आदि-आदि कुछ ऐसी ही बातें.ठीक शब्द नहीं याद आ रहे. पर ध्वनियां यहीं हैं.
shiv prasad semwal
June 15, 2011 at 12:09 pm
very good kavita.