गोबर- मिट्टी लिपा आँगन, तुलसी चौरा, केले-पपीते अमरूद के पेड़ों का झुरमुट, चहचहाती चिडि़या, धूल से सने पर उल्लसित खिलंदडे बच्चे। आकाश चूमती पतंगों और कंचों का रंगीला संसार। इक्कीसवीं सदी की ओर पगलाये दौड़ते किसी भी के लिए यह दृश्य किसी फिल्म या अदबी रिसाले का हिस्सा भर हो सकता है।
पर यह ऐसी ईमानदार सच्चाई है जो महानगर के फ्रेम के बाहर निकलकर हजारों- हजार कस्बों व शहरों में आम बिखरी रहती है, यह दुनिया वह है जहां शाम बिना तुलसी चौरे पर दिया जलाये पूरी नहीं होती और घंटियों के टुनटुनाते शोर में माँ- दादी व बुआ का संध्या वंदन यह संकेत है कि बच्चों अब घर लौटो, खेल का समय खत्म हो गया, पढ़ाई का समय शुरू।
उत्तर प्रदेश के कस्बों और पिछडे़ व कम पिछडे़ शहरों में जन्म से जवानी तक लम्बा समय बिताकर दिल्ली आया मेरा मन बार-बार लौट कर उसी दुनिया में जाता रहा है, जहां मेरी माँ अपनी कस्बाई भाषा में कहती ‘मेरी नार गड़ी है’ इसका अर्थ चाहे कुछ भी होता हो पर इतना सच है कि दिल्ली की आपा-धापी में तन तो जूझ रहा है पर मन ऐसे ही किसी कस्बाई आँगन के खूंटे से जीवन जीने की त्रासदी में बरस-दर बरस अपनी ढोये जा रहा हूँ। यह मेरी अपनी और नितांत निजी त्रासदी है जिसे मैं अकेले ढोने को अभिशप्त हूँ।
इसे अपने महानगरीय मित्रों के साथ बांट पाना संभव नहीं है। महानगर की दहलीज से बाहर कदम न रखने वाले या छुटिट्यों में तफरीह के लिये मसूरी, शिमला या नैनीताल जाने वालों को मेरी ‘पीड़ा दिमागी फितूर’ या किताबी लग सकती है। अपनी निजी पीड़ा का सार्वजनीकरण भी तो घर से निकलकर कोठे पर बैठने जैसा है।
तीन वर्ष पुरानी पक्की नौकरी ज्वाइन करने मैं बीबी-बच्चों और सामान से लदा फदा दिल्ली पहुँचा था तो हम सब बहुत उल्लसित थे। लगता था छोटे शहरों की छोटी- छोटी उपलब्धियों पर रीझता अपना मन अपने आप को धोखा देने जैसा था। वह सब इस महानगरीय विस्तार के सामने कितना छोटा तथा बेमानी लगने लगा था। नये किले फतह करने और राजधानी में अपना झंड़ा गाड़ने का जोश ढांढे भर रहा था। दिल्ली की भागती जिंदगी मेरे लिये तेजी से तरक्की करने का पर्याय थी और सुबह से रात तक की बतरह मेहनत कामयाबी की शर्तिया कुंजी। पत्नी और बच्चों को समय न दे सकना कष्ट नहीं देता था क्योंकि विश्ववास था कि ‘यह सब उन्हीं के भले के लिये तो है’।
समय के साथ दिल्ली से परिचय तो बढ़ता गया पर पता नहीं क्यों दोस्ती घनिष्ठता में नहीं बदल सका। मोह भंग होने की प्रक्रिया कुछ ही महीनों में शुरू हो गयी थी और इंसानी रिश्तों के प्रति दिल्ली वालों की उदासीनता ने रिश्ते कभी मजबूत बनने ही नहीं दिये। मोहल्ले में पड़ोसिन- चाची, मौसी या भौजी के अलावा भला कुछ और कभी हो सकती थी? सोनू की मम्मी या मिसेज खंडेलवाल तो कतई नहीं।
घर के काम करने वाली को दिल्ली की रिहायशी बस्तियों में बच्चें ‘आंटी’ और सब्जी वाले को ‘अंकलजी’ जरूर कहते हैं, पर यह रिश्ता कितना बनावटी और फीका है। कालोनी के बाहर न वह सब्जी वाला हमें पहचाने की कोशिश करता है और न ही हम उससे गर्मजोशी से मिलना चाहते हैं। यहाँ तमाम रिश्ते लेन- देन के दायरे में कैद रहते हैं।
रिश्तों की व्यवसायिकता का पहला आघात हमें तब लगा जब हम सब (मैं, पत्नी व बेटियां बया-बकुल ) 25 किमी का सफर तय कर जमुना पार कालोनी से पश्चमी दिल्ली में परिचित परिवार से मिलने गये और ‘आओ जी’ के साथ ठंड़े पानी और चाय बिस्कुट की सरसरी खातिरदारी के साथ विदा हो गये। यह हम ‘कम प्रगतिशील’ इलाके में पले बढ़े लोगों के लिये एक गहरा धक्का था। क्या यह सम्भव है कि सपरिवार, वह भी बरसों बाद घर आया मित्र बिना भोजन किये वापस चला जाये? लगा था महानगर के लोग बहुत तरक्की कर गये हैं हम ही कहीं जड़ खड़े रह गये।
पहले पहल एक कालोनी के दूसरे तल्ले का एक फ्लैट और फिर एक बेहतर कालोनी में एक तल और ऊंचा फ्लैट। वेतन के एक तिहाई हिस्से से महीने भर के लिये कमाये 2 कमरे, बैठक और रसोईघर। बच्चों के लिये इतनी बड़ी दिल्ली में बस इतनी सी दुनिया थी। दिन भर वह इन्हीं कमरों में दौड़-भाग व खेलकूद करते। बड़ी बेटी स्कूल चली जाती तो छोटी बिटिया बकुल अकेली पड़ जाने पर खिड़की से बाहर झांकती उदास खड़ी रहती। उसके बचपन का वह तमाम हिस्सा 10 गुणा 12 के दो कमरों व बैठक में बीत गया।
फुर्सत होने पर मां के साथ वह कभी जमीन पर उतरती। अकबकाये से इधर-उधर देखती और फिर जल्द ही अपनी छोटी ही दुनिया में वापस लौट आती। मुझे बच्चों विशेषकर छोटी बेटी को देखकर अपनी ददिहाल के पिजंडे में बंद उस ‘मिट्ठू’ की याद आती जो सालों तक पिंजडे में कैद रहने के बाद बाहर खुला देने पर भी मुक्ताकाश में न जाकर वापस पिंजडे में लौट आता था।
हम कैसी मानसिकता तैयार कर रहे हैं इन नौनिहालों की? कितनी संकुचित-सीमित दुनिया है इनकी- महानगरीय विस्तार के बावजूद। घर में यदा-कदा घुस आती जिद्दी गौरिया या तार पर बैठे अपशकुनी कौवों के अलावा ये किसी पक्षी को नहीं पहचानते। उन्हें स्कूल जाने पर किताबें बताती हैं कि हमारे आस-पास कितने तरह के पशु-पक्षी हैं। इस किताबी ज्ञान से हम कितना उन्हें धरती से जोड़ पायेंगे भला?
कभी- कभी कल्पना करता हूँ कि गुडिया सी तीन वर्षीय बकुल को अगर मैं अपने बचपन का संसार दे दूं तो वह क्या करेगी? पर सोच नहीं पाता। क्योंकि मेरे बचपन के इर्द- गिर्द घिरे पता नहीं कितने ही करेक्टर जीव-जंतु, पेड़- पौधे और किस्म किस्म के खेल बकुल की नन्हीं दुनिया में समा ही नहीं पायेंगे। अब क्या हो सकता है? कोई चारा नहीं हैं। थकान और बेचैनी में आंखें मूंद कर नन्हीं गुडिया को उसकी अपनी दुनिया में जीने के लिये छोड़ देता हूं।
लेखक बिशन कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा पिछले तीन दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इंडियन एक्सप्रेस, डेक्कन हेराल्ड, आईबीएन7, इंडिया न्यूज, यूएनआई, सहारा, बीबीसी, शिकागो ट्रिब्यून जैसे संस्थानों में रिपोर्टर से लगायत संपादक तक का सफर राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में कर चुके हैं. फिलहाल अब अपनी खुद की कंपनी ब्लू इंक मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के समूह संपादक हैं.












Mohammad anas
June 16, 2011 at 11:36 am
Jitni tareef ki jaye kam hai,apni yogyta aur anubhav ki chasni me khubsurat rachna..[b][/b]
sudeep panchbhaiya
June 16, 2011 at 12:03 pm
sir aalekh man ko chchu gaya.vastav me metro city me jindgi len den ki aupcharikton se lad giyi hai. yahan gaon ki yaadon ke sahre hi ji sakte hain. [b][/b]
मदन कुमार तिवारी
June 16, 2011 at 12:37 pm
्हमने बहुत तरक्की कर ली है । हो सकता है आनेवाले समय में हम रोबट डैड और मौम बन कर रह जायें। ्व्यवहारिकता का मतलब है असंवेदनशील । मुझे तो दिल्ली हमेशा एक निराशा से भर देती है । असमान विकास ने सबकुछ बदल दिया । रिश्तों के मायने भी । पानी और बिस्कुट न दे तो क्या करें। खाना कितने को खिलायें , अपने हीं खाने का जुगाड मुश्किल है , फ़िर टाईम मैनेजमेंट यानी कम समय है और सबकुच करना है । काश अपने गांव – कस्बे में दो रोटी का जुगाड और शिक्षा वगैरह की व्यवस्था रहती । लेकिन फ़िर दिल्ली रहती हीं क्यों । दिल्ली के धनवालों के लिये हम आप जैसे दिलवालों का वहां रहना जरुरी है सर जी । खोखला पन बहुत सालता है ।
ANURAG DWARY
June 16, 2011 at 1:04 pm
Kya kahon … laga meri kahani aapki roshnaai se likh di gayi ho … bahut badhiya
jp gupta
June 16, 2011 at 1:07 pm
Hi Bishan,
In fact you have penned my very own feelings. I too feel just like you. My Patna can never be a match to Delhi when it comes to life.culture,simplicity and all that……
mahesh sharma
June 16, 2011 at 4:24 pm
विशन जी, आपका लेख मन के सोये तारों को झंकृत सा कर गया। कहा संवेदना और अपनेपन के भाव से दूर महानगर और कहां अपना कस्बा और गांव…… चलो अब लौट चले पूरब की ओर……
ravish ranjan shukla
June 17, 2011 at 1:42 am
sir saandar likha apne yee hum sab ki pida hai..sahi mayene me yee visthapan ka dard hai…
ashok anurag
June 17, 2011 at 4:13 am
bishan g,kuchh saal pahley ki baat hai mai ek feature all india radio ke liye bana raha tha title tha-KISEY BATAYE HUM GHAR Q NAHI JAATEY…. ye programme un majdoro par tha jo chah kar bhi sahar chhor nahi patey….bishan g aap ko gaon ab bhi yaad aata hai achha laga jaankar…..aaj mujhey 13 saal ho gaye hai mai gaon gaya hi nahi….mana delhi me dil nahi hai lekin o ROTI to deta hai….delhi gaali deta hai kahta hai saaley bihario aur up walo ne delhi ko ganda kar diya hai…..yahi sab waha bhi sunta tha….fir sochna kya….itna hi jaanta hu daldali zameen par aashiyaney nahi bantey….o daldali zameen gaon ki bhi ho sakti hai….
rajkumar
June 17, 2011 at 7:44 am
bishan ji aapne dil nikalkar rakh diya hai. aapki tareef ke liye shabd nahi mil rahe hain. purani yadon ka aisa sajeev chitran kabhi nahi dekha. aapne likha to laga meri hi kahani likh rahe hain. main bhi delhi me kai saal raha hoon aur ab jharkhand me hoon. pardesh me apnon ki doori ka dard bahut satata hai. kuch aur bhi likhiye hume aapke article ka intzaar rahega. apka koi phone number ya email jaroori samjhen to de dijiye.
Amit Tyagi
June 17, 2011 at 11:58 am
Sach Main, apna gaon baar baar yaad aata hai.
Har koi jaise yahan ek business kar raha hai. Rishton ka business.
narendra goyal
June 17, 2011 at 1:29 pm
sach bishan ji aapke anter se nikle pida ke ye swar hazaro-lakho logon ki zamini schchai hai. lekin ye to us tathakathit pragatishilta ka moolya hai jo aap ham or tamam be log ada kar rahe hain zinki zaden abhi gaun or kashbo se zudi hain………padkar aankhen nam ho gayen .
sandeep bhatt
June 23, 2011 at 11:19 am
sir mera baCHPAN to kancho or patang udane me to nahi beeta but aapk marmm shparshi lekh ko pad kr dil khta hai kash ainsha hua hota……..? sir aapk lekh ne metro city ki or badhne ki koshish mere kadmo ko rok diya hai……..